सोमवार, 21 जनवरी 2013

प्रेम मंगल की कविता - मेरा देश भारत

मेरा देश भारत

हमारा भारत समस्‍याओें का देश है

समस्‍याएं एक नहीं अनेक है।

कभी भुखमरी व शिक्षा की समस्‍या थी

कभी आरक्षण, और लोकपाल बिल की समस्‍या थी

अन्‍त हुआ नहीं इन समस्‍याओं का

जन्‍म हो गया गैस सिलेन्‍डर की समस्‍या का

भ्रष्‍टाचार और बेरोजगारी की समस्‍या का तो नाम लेना नहीं

आंतकवाद,मिथ्‍यावाद, की परिभाषा को कोई समझना नहीं

स्‍थिति बिगड़ चुकी है सारे ही जहां की

बच्‍चों को कमी नहीं है चांदी के टुकड़ो की

सीता, सावित्री की, जरुरत नहीं है अब इस घरा पर

अप्‍सराओं और परियों की मखमली चादर बिछी है धरा पर

सुन्‍दर काण्‍ड नहीं रेपकाण्‍ड यहां होते है

राम, तो क्‍या रावण भी नहीं इस जहां मैं होते है

मनुष्‍य की जान से सस्‍ती कोई वस्‍तु नहीं जहां में है

कभी आतंकवादी कभी भूचाल औ तूफान ले जाते हैं।

कभी दुर्घटनाओं में शीष औ धड कट जाते हैं

कभी पडोसी देश देशसेवकों को मौत के घाट उतार देते हैं

पता नहीं किस मोड़ पर दोस्‍ती दुश्‍मनी में बदल देते हैं

दोस्‍ती और दुश्‍मनी का पैमाना नहीं कोई शेष है

दुर्गुणों के सारे अब रखे यहां अवशेष हैं।

कारण इस बदलाव का क्‍या है

हमारी समझ से तो बहुत ही परे हैं।

 

श्रीमती प्रेम मंगल

कार्यालय अधीक्षक

स्‍वामी विवेकानन्‍द कालेज आफ इंस्‍टी्रट्र्‌यूशन्‍स इन्‍दौर

2 blogger-facebook:

  1. it is a very good poem and very interesting too i like this poem .

    उत्तर देंहटाएं
  2. it is a very good poem and very interesting too i like this poem .

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