प्रमोद भार्गव का आलेख - इतिहास बदलते अनुवांशिक अनुसंधान

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इतिहास बदलते अनुवांशिक अनुसंधान प्रमोद भार्गव वैज्ञानिकों ने आज से लगभग चार हजार साल पहले भारतीय और आस्‍ट्रेलिया के मानव समुदायों के बीच ...

इतिहास बदलते अनुवांशिक अनुसंधान

प्रमोद भार्गव

वैज्ञानिकों ने आज से लगभग चार हजार साल पहले भारतीय और आस्‍ट्रेलिया के मानव समुदायों के बीच होने वाले जैविक प्रवाह के सबूत खोज निकाले हैं। भारत और आस्‍ट्रेलिया का यह संपर्क भारत के यूरोप के साथ संबंधों से भी पुराने हैं। श्‍शोधकर्ताओं ने आस्‍ट्रेलिया के सबसे पुराने निवासियों ‘‘न्‍यू गिनी '' के लोगों, दक्षिण पूर्वी एशियाई और भारतीयों में जीन परिवर्तन का विश्‍लेशण किया है। इन परिणामों से पता चलता है कि आज से 4230 साल पहले भारत से आस्‍ट्रेलिया की ओर बड़ी संख्‍या में लोगों ने प्रस्‍थान किया था। इसलिए यह उम्‍मीद प्रबल हुई है कि आस्‍ट्रेलियाई निवासी भारतीय आनुवांशिक (जीन्‍स) आधार पर निकट हो सकते हैं। यह अनुसंधान जर्मनी के ‘‘मैक्‍स प्‍लांक इंस्‍टीट्‌यूट फॉर एबोल्‍यूसनरी एन्‍थ्रोपोलॉजी'' ने किया है। इस अध्‍ययन से यह भी तय होता है कि आर्य ही भारत के मूल निवासी थे और वही जैविक प्रवाह के चलते भारत से बाहर विभिन्‍न देशो में गये थे।

ये अनुवांशिक अनुसंधान ऐतिहासिक-अवधारणाओं को बदलने को आतुर दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में ‘आर्यों' के ऊपर भी ‘अनुवांशिकी' के आधार पर एक नया शोध सामने आया है। उससे तय हुआ है कि भारतीयों की कोशिकाओं का जो अनुवांशिकी ढ़ांचा है, वह बहुत पुराना है। इसके पहले भी डीएनए के आधार एक महत्‍वपूर्ण खोज से साबित हुआ है कि भारत के बहुसंख्‍यक लोगों के दक्षिण भारतीय दो आदिवासी समुदाय पूर्वज हैं। मानव इतिहास के विकास क्रम में ये स्‍थितियां जैविक प्रक्रिया के रुप में सामने आई हैं। एक अन्‍य सूचना प्रौद्योगिकी तकनीक द्वार किए गए अध्‍ययन ने तय किया है कि भगवान श्रीकृष्‍ण हिन्‍दू मिथक और पौराणिक कथाओं के काल्‍पनिक पात्र न होकर एक वास्‍तविक चरित्र नायक थे और कुरुक्षेत्र के मैदान में हकीकत में महा-भारत युद्ध लड़ा गया था। विश्‍व-इतिहास के परिदृश्‍य में उपरोक्‍त मान्‍यताएं स्‍वीकार ली जाती है तो ‘आर्यो' के गढ़े गए इतिहास और महाभारत युद्ध से जुड़ी मिथकीय अवधारणा की जड़ता टूटेगी ?

अनुवांशिकी सरंचना के आधार पर हैदराबाद की संस्‍था ‘‘सेंटर फॉर सेल्‍युलर एण्‍ड मॉलीक्‍युलर बायोलॉजी'' के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध से जो निष्‍कर्ष सामने आए हैं, उनसे स्‍पष्‍ट हुआ है कि मूल भारतीय ही ‘आर्य‘ थे। इस शोध का आधार भारतीयों की कोशिकाओं का अनुवांशिकी ढांचा है, जिसका सिलसिलेबार अध्‍ययन किया गया। जिससे तय हुआ कि भारतीयों की कोशिकाओं का संरचनात्‍मक ढांचा पांच हजार साल से भी ज्‍यादा पुराना है। इस आधार पर यह कहानी एकदम निराधार साबित हो जाती है कि भारत के लोग 3․5 हजार साल पहले किसी दूसरे देश से आक्रमणकारियों के रुप में यहां आए थे। यदि आए होते तो हमारा अनुवांशिकी ढांचा भी 3․5 हजार साल से ज्‍यादा पुराना नहीं होता। क्‍योंकि जब वातावरण बदलता है तो अनुवांशिकी ढांचा भी बदल जाता है। इस तथ्‍य को इस मिसाल से समझा जा सकता है। मसलन हमारे बीच कोई व्‍यक्‍ति आज अमेरिका या ब्रिटेन जाकर रहने लग जाए तो उसकी जो चौथी-पांचवी पीढ़ी होगी, उसकी सवा-डेढ़ सौ साल बाद अनुवांशिकी संरचना अमेरिका या ब्रिटेन निवासियों जैसी होने लग जाएगी। क्‍योंकि इन देशों के वातावरण का असर उसकी अनुवांशिकी संरचना पर पड़ेगा।

इस अध्‍ययन से जुड़े श्‍शोधकर्ता इरीना पुगाचा का कहना है कि अफ्रीका के बाहर कुछ आधुनिक इंसानों की मौजूदगी के पुरातात्‍विक साक्ष्‍य आस्‍टे्रलिया में देखने को मिले हैं। यह साक्ष्‍य 45 हजार साल से भी ज्‍यादा पुराने हैं। इनसे तय होता है कि आस्‍ट्रेलिया में अफ्रीका के अलावा सबसे पुरानी और लगातार जनसंख्‍या होने की पुश्‍टि हुई है। पहले यह माना जाता था कि साहुल-समग्र, आस्‍टे्रलिया-न्‍यू गिनी भू-भाग पर लोगों के आने के बाद और 18 वीं सदी के अंत में यूरोपीयों के आगमन के बीच आस्‍ट्रेलिया बाकी दुनियां से अलग-थलग था। अब यह श्‍शोध आस्‍टे्रलिया के पुरातात्‍विक साक्ष्‍यों में कई दबलावों की तारीखों से मेल खाता है। जो यह तय करते हैं कि आस्‍टे्रलियाई निवासियों में भारतीयों की आनुवांशिक संरचना मौजूद है।

भारत व भारतीयता के परिप्रेक्ष्‍य में इसके पहले किए शोध ने तय किया था कि मूल भारतीय दो आदिवासी परिवारों की संताने हैं। भारतीयों की उत्‍पत्‍ति संबंधी इस सिद्धांत को आधुनिक डीएनए तकनीक के माध्‍यम से व्‍यापक स्‍तर पर किए गए एक अध्‍ययन से सामने लाया गया था। आर्य-अनार्य के स्‍थापना संबंधी मूल्‍यों को नकारते हुए इस जांच से साबित हुआ है कि दक्षिण भारतीय पूर्वज 65 हजार वर्ष पहले भारतीय उप महाद्वीप में आए थे। अध्‍ययन ने तय किया है कि देश की सबा अरब जनसंख्‍या अनेक भाषाओं, बोलियों, जातियों व धर्मों में बंटी होने के बावजूद उसमें गहरी अनुवांशिक समानताएं हैं। इन सिंद्धातों के सामने आने के पश्‍चात भी क्‍या हम इस प्रचलित धारणा को नकार पाएंगे कि आर्य मूल भारतीय नहीं थे ? यदि हम इन नए आंख खोल देने वाले सत्‍यों पर विश्‍वास नहीं करते तो ये अध्‍ययन किसलिए ?

भारतीय संस्‍कृति के निर्माता और वेदों के रचियता आर्य भारत के मूल निवासी थे। यदि प्राचीन भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्‍टि से देखें तो आर्य भारत के ही मूल निवासी थे। पाश्‍चात्‍य इतिहास लेखकों ने पौने दो सौ साल पहले जब प्राच्‍य विषयों और प्राच्‍य विद्यााओं का अध्‍ययन शुरु किया तो बड़ी कुटिल चतुराई से जर्मन विद्वान व इतिहासविद्‌ मेक्‍समूलर ने पहली बार ‘आर्य' शब्‍द को जाति सूचक शब्‍द से जोड़ दिया। वेदों का संस्‍कृत से जर्मनी में अनुवाद भी पहली बार मेक्‍समूलर ने ही किया था। ऐसा इसलिए किया गया जिससे आर्यो को अभारतीय घोषित किया जा सके। जबकि वैदिक युग में ‘आर्य' और ‘दस्‍यु' शब्‍द पूरे मानवीय चरित्र को दो भागों में बांटते थे। प्राचीन साहित्‍य में भारतीय नारी अपने पति को - आर्यपुरुष' अथवा ‘आर्य-पुत्र' नाम से संबोधित करती थी। इससे यह साबित होता है कि आर्य श्रेष्‍ठ पुरुषों का संकेतसूचक शब्‍द था। ऋग्‍वेद, रामायण, महाभारत, पुराण व अन्‍य संस्‍कृत ग्रंथों में कहीं भी आर्य शब्‍द का प्रयोग जातिसूचक शब्‍द के रुप में नहीं हुआ है। आर्य का अर्थ ‘श्रेष्‍ठि' अथवा ‘श्रेष्‍ठ' भी है। वैदिक युग में तो वैसे भी जाति व्‍यवस्‍था थी ही नहीं। हां, वर्ण व्‍यवस्‍था जरुर अस्‍तित्‍व में आ गई थी। इसके अलावा वेद तथा अन्‍य संस्‍कृत साहित्‍य में कहीं भी उल्‍लेख नहीं है कि आर्य भारत में बाहर से आए। यदि आर्य भारत में बाहर से आए होते तो प्राचीन विपुल संस्‍कृत साहित्‍य में अवश्‍य इस घटना का उल्‍लेख व स्‍पष्‍टीकरण होता।

ताजा शोधों का सार है कि सबसे पहले 65 हजार साल पहले अंडमान और दक्षिण भारत में लोगों का आगमन और आबादी का क्रम शुरु हुआ। इसके करीब 25 हजार साल बाद उत्‍तर भारत में लोगों के आने का सिलसिला शुरु हुआ। इस अध्‍ययन दल के निदेशक डॉ लालजी सिंह का कहना है कि हम सब भारतीय उत्‍तर और दक्षिण के इन आदि पुरखों की ही संताने हैं। सवर्ण-अवर्ण जातियों और आदिवासियों के अनुवांशिक गुण व लक्षण कमोबेश एक जैसे हैं। इसलिए आर्य और द्रविड़, अनार्य के परिप्रेक्ष्‍य में कोई विभाजित रेखा खींचने की जरुरत नहीं रह जाती।

इस अध्‍ययन से सामने आया है कि जब भारतीय समाज में निर्माण की प्रक्रिया शुरु हुई तब अलग-अलग कबीलों जैसे समूहों से जातियों का उदय हुआ। फलस्‍वरुप अखण्‍ड भारत का उत्‍तर और दक्षिण भारत में विभाजन तो व्‍यर्थ है ही कबीले और जातियां भी बेमानी हैे, क्‍योंकि सभी भारतीय समुदाय व जातियां एक ही कुटुम्‍ब से विकसित हुए हैं।

ये शोध भाषा, रंग और नस्‍ल जैसे भेद भरे विभाजक छद्‌म को भी नमंजूर करते है। दरअसल उत्‍तर और दक्षिण के विभाजन की बात तो अंग्रेज हुक्‍मरानों ने बांटों और राज करो दृष्‍टिकोण के चलते की। उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में योरोपीय विचारकों ने अपने वंशों के लोगों को श्रेष्‍ठ साबित करने के नजरिये से रंग व नस्‍ल के आधार पर श्रेष्‍ठता की अवधारणा गढ़ी। मसलन गोरा रंग श्रेष्‍ठ माना गया और उसी के अनुसार गोरे, गेहुएं और तांबई त्‍वचा वाले उत्‍तर भारतीय श्रेष्‍ठ और काले या सांवले रंग वाले दक्षिण भारतीय हेय मान लिए गए। उत्‍तर की भाषा संस्‍कृत और दक्षिण की भाषाओं को भिन्‍न परिवारों में रखा गया। जबकि इन सभी भाषाओं की जननी संस्‍कृत रही है। गंगा घाटी से आयरलैंड तक की भाषाएं एक ही आर्य परिवार की आर्य भाषाएं हैं। इसी कारण इन भाषाओं में लिपि एवं उच्‍चारण की भिन्‍नता होने के बावजूद अपभ्रंशी समरुपता है और इन भाषाओं का उद्‌गम स्‍त्रोत संस्‍कृत है। इससे भी यह निश्‍चित होता है कि आदिकाल में एक ही परिवार की आर्य भाषाएं बोलने व लिखने वाले पूर्वज कहीं एक ही स्‍थान पर रहे है। बंगाली इतिहासकार ए․सी․ दास इस स्‍थान अथवा मूल भारतीयों का निवास स्‍थान ‘सप्‍त सिंधु' मानते हैं जो पंजाब में था। यदि ताजा अवधारणा को भारतीयों के जन्‍म की मान्‍यता मिल जाती है तो हो सकता है हम धर्म, जाति और संप्रदाय से उठकर कुछ नया सोचें और अपनत्‍व की भावना कायम हो। नए अर्थ की यह सैद्धांतिकी अपना ली जाती है तो भारत का नया सामाजिक व सांस्‍कृतिक पुनर्जन्‍म तो होगा ही हमारी संप्रभुता को उत्‍पन्‍न हो जाने वाले आंतरिक खतरों पर भी किसी हद तक विराम लगेगा

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म․प्र․

मो․ 09425488224

फोन 07492-232007, 233882

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

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रचनाकार: प्रमोद भार्गव का आलेख - इतिहास बदलते अनुवांशिक अनुसंधान
प्रमोद भार्गव का आलेख - इतिहास बदलते अनुवांशिक अनुसंधान
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