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अर्जुन प्रसाद की कहानी - अधर्मा

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अधर्मा शि वा नन्द पाण्डे एक खूबसूरत बाँका जवान थे ।   रंग बिल्कुल गोरा चिट्टा। हँसमुख चेहरा। गठीली और मजबूत देह। चेहरे से सदा सज्जनता टपकती...

अधर्मा

शिवा नन्द पाण्डे एक खूबसूरत बाँका जवान थे  रंग बिल्कुल गोरा चिट्टा। हँसमुख चेहरा। गठीली और मजबूत देह। चेहरे से सदा सज्जनता टपकती। उनकी शीलता और उनके साहस का कोई जबाब न था। उनकी पत्नी सावित्री उन्हें पाकर बहुत खुश थी। ईश्वर को बार-बार धन्यवाद देती कि परमात्मा करे सबको ऐसा ही पति मिले। वह पाण्डे जी के साथ हर कष्ट सहर्ष सहने को तैयार थी। सिर पर पति नाम की साया देखकर वह अपना सारा कष्ट भूल जाती। दोंनों बच्चेां को रूखा-सूखा खिलाकर खुद बिना खाए ही रह जाती। उसे आये दिन उपवास ही करना पड़ता। मानो, उसके नसीब में यही लिखा था।

मंहगाई और बेरोजगारी के कहर से तंग आकर शिवा नन्द शहर में नौकरी करने चले गए। उनके लुधियाना जाने के बाद सावित्री पुत्रों के साथ अकेली रह गई। दरिद्रता की विवशता न होती तो वह उन्हें शहर भी न जाने देती। पाण्डे जी लुधियाना जाकर बीवी-बच्चों को धीरे-धीरे भूल गए। मानो, उनके सिर से कोई बहुत बड़ा बोझ उतर गया। उन्हें पुत्रों की देखभाल के लिए पत्नी के नाम पर मुफ्त में जो एक नौकरानी मिल गई थी। उन्हें अब घर की कोई फिक्र न रही। वह तकदीर के धनी थे। पंजाब जाते ही उन्हें एक मिल में नौकरी मिल गई। वहाँ ठाट से जीवन व्यतीत करने लगे। मकान के लिए कोई अधिक भाग-दौड़ न करनी पड़ी। तीन सौ रूपये माहवार पर एक अच्छा कमरा मिल गया।

मकान मालिक रामू चौधरी एक पुत्र और पुत्री, दो बच्चों को छोड़कर ईश्वर को प्यारे हो चुके थे। विरादरी के लोगों को युवावस्था में सीमा के विधवा होने का बड़ा शोक हुआ। चौधरी जी के परलोक सिधारने के बाद सीमा को उनके स्थान पर नौकरी मिल गई। लेकिन,चौधरी जी की अनुपस्थिति उन्हें रात-दिन खटकती रहती। भरी जवानी में विधवा का जीवन जीना उनके लिए असहय हो गया।

यह कैसी बिडम्बना है कि पत्नी के मरने के बाद पुरूष बिल्कुल स्वतंत्र हो जाता है। वह बिना किसी रोक-टोक के स्वछन्द विचरण करने लगता है। सज-धज कर रहता है। युवा ललनाओं को हाट बाट में घूर-घूर कर देखता है।

पर, पति की मृत्यु होने पर पत्नी को किसी पुरूष को देखना भी पाप समझा जाता है। किसी से हँसना-बोलना तो बहुत दूर की बात है। उसे बिल्कुल सादा जीवन बिताना पड़ता है। शौक-श्रृंगार को कौन कहे? उसे ढ़ंग के कपड़े भी पहनना अनुचित समझा जाता है। जीते जी उसे नर्क भोगना पड़ता है। कुछ दिन बाद जब पाण्डे जी का बड़ा पु्त्र ईश्वर दत्त दस बारह साल का हो गया तो उन्होंने उसे भी अपने पास बुला लिया। सावित्री के पास पाण्डे जी के पुत्र -झिनकू के अलावा और कोई न रह गया। उधर सीमा के पास पाण्डे जी को रहते डेढ़ दो वर्ष बीत गये। ड्यूटी से छूटने पर दोनों एक साथ बैठकर बोल-बतला लेते। सीमा कभी-कभी अवसर पाकर शिवा नन्द से हँसी-मजाक भी कर लेती।

पाण्डे जी को पहले तो उनकी मसखरी अच्छी न लगती। वह उन पर बिगड़-खड़े होते। मकान बदलने की धमकी देते। पर, कुछ दिन के बाद इसके अभ्यस्त हो गए। धीरे-धीरे वह खुद भी सीमा से हँसी ठट्ठा करने लगे। वह उनका बहुत खयाल रखते। उनके सुख-दुख में काम आते। उनका अपनापन देखकर सीमा का हृदय द्रवित हो गया। धीरे-धीरे वह चौधरी जी को भूल गयीं और एक दिन पाण्डे जी से बोली - आज से आपका अलग खाना-पकाना बन्द। बाप-बेटे दोनों का भोजन मैं ही बना दिया करूँगी।

पाण्डे जी न चाहते हुए भी मना न कर सके और सहमति में गर्दन हिला दिए। लेकिन कुछ सोचकर उन्होंने सीमा से कहा - आप मेरे खाने की चिंता न करें - ड्यूटी करें और बच्चों की देखभाल करें। तब सीमा ने कहा - मुझसे ऐसा न होगा। जब आप हम सबका इतना ध्यान रखते हैं तो, अपनी सेवा करने का अवसर दीजिए। मुझे भी अपना कर्तव्य निभाने दें। पाण्डे जी अपनी मौन स्वीकृति में गर्दन हिला दिए। दोनों चूल्हा एक होने के बाद उनकी घनिष्टता और भी गहरी होती चली गई। दोनों परिवार के बच्चे अब एक साथ खेलने - खाने लगे। कभी - कभी एक ही साथ सो भी जाते।

इसी प्रकार कुछ दिन और बीते कि एक दिन शाम को सीमा ने पाण्डे जी से कहा - आप अपनी पत्नी को भी यहीं बुला लीजिए। सब एक साथ मिलकर रहेंगे। एक दूसरे के सुख-दुख में हाथ बटाएंगे। यह सुनकर पहले तो पाण्डे जी ठकुआ गए, फिर संभलकर बोले - आपकी यह मंशा कभी पूरी न होगी। क्योंकि मैं उसे जीवन भर अपने पास नहीं रख सकता।

सीमा ने पूछा - क्यों, आखिर, क्या कमी है उनमें?

पाण्डे जी जबाव दिए - एक दो कमी हो तो बताऊँ भी। उसके तो पोर-पोर में कमी ही कमी भरी हुई है। न शक्ल-सूरत है और न सीरत ही। रहन-सहन भी भौंडा है। उसकी कर्कशता का कोई जबाव ही नहीं। उस पर भी एक पैर पोलियो का शिकार हो चुका है। चलना फिरना मुश्किल है।

शिवानन्द का दामपत्य जीवन दुखमय सुनकर सीमा के मुँह से आह निकल गई। उनकी आँखें नम हो गई। उन्होंने आँसू पोंछते हुए कहा- तब आपने ऐसी शादी ही क्यों की? भली-भाँति देखभाल कर करते तो ऐसा कदापि न होता। पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक होते हैं। दोनों में एक बार मतभेद उत्पन्न हो जाने पर सारा जीवन नर्कमय बन जाता है। पाण्डे जी बोले - क्या किया जा सकता है? जो भाग्य में बदा था, वही हुआ। इसके बाद उन्होंने सावित्री से विवाह करने की सारी कथा सीमा को सुना दिया।

पाण्डे जी की दुखभरी कहानी सुनकर सीमा को बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा - काश, मैं आपका दर्द कम कर सकती । लेकिन विवश हूँ। यह समाज भीं बड़ा विचित्र है। न जीने देगा और न मरने ही देगा। क्योंकि मैं एक विधवा जो ठहरी। यदि मैं आपकी बिरादरी में पैदा हुई होती तो क्या गम था। इतना सुनते ही पाण्डे जी बोले- लगता है आप अपने होश हवास में नहीं हैं। वरना, ऐसी बहकी-बहकी बातें न करतीं। अभी चौधरी जी को मरे हुए ही कितने दिन हुए। मुझ जैसे ब्राहमण को आप पाप का रास्ता दिखा रही हैं और यदि आप मेरा इम्तहान लेना चाहती हैं तो शौक से लीजिए। लेकिन ऐसी स्थिति में मैं किसी दूसरी स्त्री के बारे में सोच भी नहीं सकता।

तब सीमा बोली - तो क्या आप भी इस समाज के उटपटाँग आडम्बरों को मानते हैं? आप दूसरी जाति के हैं तो क्या हुआ? आपके विचार तो ऊँचे ही हैं। ईश्वर ने सबको एक जैसा ही बनाया है। वही लाल खून जो मेरी नसों में दौड़ रहा है, आपकी भी रगों में है। यह जाति-पाँति हमने और आपने ही बनाए हैं। एक ही परमात्मा की संतान होकर आपस में यह भेदभाव क्यों? मनुष्य को कुरीतियों को त्याग देना चाहिए। ऊँच नीच का बंधन समाज के विकास में सबसे बड़ा बाधक है। यदि सिक्ख ईसाई और मुसलमान इस परम्परा का निर्वाह नहीं करते तो हिन्दू ही इन रूढ़िवादी विचारों का समर्थन क्यों करें?

सीमा का जाति-पाँति विरोधी विचार सुनकर पाण्डे जी दाँतों तले उंगली दबा लिए। वह एकदम दंग रह गए। आश्चर्य से सीमा की आँखों में झाँककर वह बोले - मान गया, आपका भी कोई जबाव नहीं। आपके विचार बहुत स्पष्ट और ऊँचे हैं। मेरे पास अब कहने को बचा ही क्या है? आपने हमारी आँखे खोल दीं। मैं आपका यह एहसान जीवन भर न भूलूँगा।

तब सीमा बोली - मेरा कैसा एहसान? मैंने तो सच्चाई बयान किया है और हमारे धर्म ग्रन्थ भी तो यही सीख देते हैं। पर, एक बात सच-सच बताइए कि आप मु-ो ऐसे क्यों देख रहे हैं? पाण्डे जी बोले - सुन्दर चीज को देखकर नेत्रों को सुख मिलता है। दूसरे आपकी बातों को सुनकर मु-ो यकीन नहीं हो रहा कि मैं आपके पास ही हूँ या कोई स्वप्न देखा है।

सीमा ने कहा - यह कोई सपना नहीं, हकीकत है। तब पाण्डे जी बोले- रही बात किसी अन्य स्त्री को न देखने की तो सुनिए, नीयत में खोट न हो तो देखने में कोई दोष नहीं है। यह देखने वाले पर निर्भर है कि वह किसी को किस दृष्टि से देखता है।

ऐसे ही दिन बीतते गए। पाण्डे जी अपनी कमाई में से कुछ पैसे सावित्री के पास भेज देते। लेकिन कई वर्ष तक अपने गाँव जाकर उनकी खोज-खबर न लिए।

सीमा ने कई बार कहा - कि आप अपने बीवी-बच्चे से मिल आइए। लेकिन वह कोई न कोई बहाना बनाकर साफ निकल जाते। सीमा ने उन्हें बहुत समझाया कि पत्नी से इस तरह नाता तोड़ना ठीक नहीं। पति-पत्नी समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। यदि एक भी पहिया बेकार हो जाय या पटरी से उतर जाए तो गाड़ी चलना असम्भव हो जाता है।

तब पाण्डे जी ने कहा- मु-ो अब अपनी चिंता नहीं है, जीवन ऐसे ही गुजार दूँगा। उनका हठ देखकर का हठ देखकर सीमा ने कहा - यदि आपस में इतना मनमुटाव है तो उन्हें त्याग दीजिए - उन्हें उनके माँ-बाप के पास वापस पहुँचा दीजिए। पाण्डे जी ने जबाव दिया- कि मुश्किल तो यही है, कि न उसे अपना सकता और न ही उसे छोड़ सकता। अपाहिज है, बेचारी कहाँ जाएगी?

उनकी बात सुनकर सीमा बोली - तब आप दूसरा व्याह क्यों नहीं कर लेते? पाण्डे जी बोले - मुझ जैसे बदनसीब से कौन स्त्री भला व्याह करना चाहेगी। सीमा बोली - क्यों, क्या कमी हैं आप में । खूबसूरत है, जवान है, कमा रहे हैं। आप से तो कोई भी सभ्य स्त्री व्याह करने को तैयार हो जाएगी। पाण्डे जी ने कहा - कहना जितना सरल है, करके निभाना उतना ही कठिन।

आए दिन रोजाना सीमा का उपदेश सुनते - सुनते पाण्डे जी खीझकर बोले - आपको जब मेरी इतनी फिक्र है तो आप ही कर लीजिए। एक से अलग होकर सब कुछ त्याग दिया तो एक को पाकर बाकी और भी त्याग दूँगा। सलाह देने में कुछ लगता नहीं है। आप साफ-साफ जबाव दीजिए। क्या इस समाज का मुकाबला करने का साहस आप में है।

पाण्डे जी की बातें सुनकर सीमा मन ही मन बहुत खुश हुई। उनका उदास चेहरा खिल गया। लेकिन लज्जावश उनकी बातों का स्पष्ट जबाव न दे सकीं। वह बोली - मैं कैसे बता दूँ, कि आज मैं कितना प्रसन्न हूँ। कम से कम आप में इतनी हिम्मत तो आई। पुरूष को दब्बू नहीं होना चाहिए। पुरूष का पुरूषार्थ ही उसकी शोभा है। आपकी दाद देनी पड़ेगी।

तब पाण्डे जी ने कहा - मु-ो बातों में टालने की कोशिश मत करो। जो कुछ कहना है साफ-साफ कहो। अब मैं तुमसे अलग नहीं रह सकता। वरना, मैं इसी वक्त तुम्हारा घर छोड़कर कहीं और चला जाऊँगा।

सीमा ने कहा - हुजूर, ऐसी भी क्या बेताबी, जरा धैर्य तो रखिए। मैं कहीं चली थोड़े ही जाऊँगी। पाण्डे जी बोले - फिर मु-ो यूँ ही और अभी कब तक तड़पना होगा। सीमा बोली - आप इतना टेंशन क्यों ले रहे हैं? समय आने पर सब कुछ बता दूँगी।

पाण्डे जी बोले - प्यास बढ़ाकर प्यासे को पानी न देना अन्याय है। इसी प्रकार कुछ दिन तक आँख मिचौली का खेल चलता रहा और दोनों एक प्रेम-सूत्र में बँध गए। पाण्डे जी अपने पुत्र के साथ चौधरी के पुत्र-पुत्री को भी पढ़ाये-लिखाये। जीवन बड़ा सुखमय व्यतीत हो रहा था। घर में कहीं कोई कमी न थी। न कोई भेद-भाव था। बच्चे पाण्डे जी को बाबू जी और सीमा को अम्मा कहते।

लुधियाना से शिवा नन्द और सीमा रिटायर होने के बाद गाँव में जाकर रहने लगे। बच्चों की शिक्षा पूरी होने के बाद शिवा नन्द का बड़ा पुत्र ईश्वर दत्त और चौधरी का पुत्र सुरेश भी मिल में नौकरी करने लगे। दोनों कमाने लगे। कुछ माह तक तो सब कुछ सामान्य रहा। कुछ समय बाद सीमा को अपने बच्चों के विवाह की फिक्र सताने लगी। लेकिन, जहाँ भी लड़की या वर की बात चलती। लोग सुनकर मुँह सिकोड़ लेते। न लड़कों के लिए कोई अपनी पुत्री देने को राजी होता और न पुत्री को बहू के रूप में स्वीकार करने को।

ब्राह्मण जाति के लोग एक ही बात कहते - चौधरी बिरादरी को कौन अपनी पुत्री देगा। ब्राहमण और चौधरी बिरादरी के लोग लड़की को तो अपनाने को तैयार थे। लेकिन, विजातीय पुत्रों को दामाद बनाना स्वीकार न था। ब्राहमण बिरादरी का तर्क था कि पाण्डे जी अब चौधरी बिरादरी में शामिल हो गए हैं।

उधर चौधरी लोग कहते- जब ब्राहमण, चौधरी बिरादरी को नहीं अपना सकते और अपनी पुत्रियों का विवाह हमारे पुत्रों से नहीं करते तो हम क्यों उन्हें अपना समझें। हम भी उनके बेटों को अपना दामाद नहीं मान सकते। संतानों के विवाह में आने वाली अड़चन पति-पत्नी को अखरने लगी। उनके दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई। कुछ समझ में न आता, कि क्या करें। वे छटपटा कर रह जाते। शहर में बच्चे जाति-पाँति के भेद-भाव से अनभिज्ञ थे लेकिन, गाँव जाते ही उन्हें भी वहाँ की हवा लग गई। भाइयों को अपनी इकलौती बहन की और बहन को अपने भाइयों की शादी की चिंता सताने लगी। लोग उनका उपहास करने लगे। उन्हें ताने मारने लगे। वे कहते - जवानी के नशे में चूर थे। दोनों ने आगा पीछा कुछ भी न सोचा। जवानी में गुलछर्रे उड़ाए। बच्चों के बारे में कुछ सोचा ही नहीं। अब ऊँट आया है पहाड़ के नीचे।

चौधरी बिरादरी के कुछ लोग चौधराइन से यहाँ तक कह दिए कि यदि बच्चों का भला चाहो तो पाण्डे जी को घर से बाहर निकाल कर उनसे नाता तोड़ लो। सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह सुनकर चौधराइन मन मसोस कर रह जातीं। वह कहतीं - जिस पुरूष को मैंने अपना पति माना। अपना सब कुछ उसे सौंप दिया। उन्होंने भी बिना किसी भेद-भाव के पति और पिता का फर्ज निभाया। हमने जीवन भर जिनकी कमाई खाई, उस व्यक्ति के साथ मैं ऐसा कदापि न करूँगी। आज हमारा समाज इतना भटक गया है कि अपने को उच्च जाति का समझने वाले लोग दुकान पर बैठकर किसी भी बिरादरी के साथ खा-पी लेते हैं। शहरों में खान-पान रखते हैं तो गाँवों में ऐसी घृणा क्यों। लेकिन, धीरे-धीरे चौधराइन को सामाजिक कुरीतियों के आगे नतमस्तक होना पड़ा। रूढ़ियों के आगे अपने स्वार्थ के लिए उन्होंने घुटने टेक दिए। एक दिन न जाने क्या सोचकर अचानक उन्होंने अपने पुत्र सुरेश से कहा - बेटा, तुम्हारे बाबूजी अब कमाते तो हैं नहीं। अब रात-दिन व्यर्थ ही बुढ़ापे में उनकी खिदमत करनी पड़ती है। मैं इस उम्र में अब उनकी यह तीमारदारी नहीं कर सकती। किन्तु एक बात है, वे जैसे भी हैं, अब मेरे पति हैं। मैं उन्हें कुछ भी कह नहीं सकती। बेटा, तुम जानते ही हो कि उनके यहाँ रहते हुए तुम लोगों का विवाह होना असम्भव है। यह समाज बड़ा बिचित्र है। सच बताऊं ! मैं धर्म संकट में फँस गई हॅू। यह सब अब मुझसे सहन नहीं होता है। इसलिए तुम कलेजे पर पत्थर रखकर उन्हें इस घर से कहीं बाहर भेज दो। मैं अजीब संकट में घिर गई हूँ। जी में आता है कि घर द्वार छोड़कर कहीं दूर चली जाऊं।

यह सुनकर लड़के ने कहा- माँ, तुम पागलों जैसी कैसी बातें करती हो। वह आपके पति और हमारे पिता भी हैं। मु-ो अधर्म के मार्ग पर मत ले जाओ। यह मुझसे न होगा। लेकिन मॉ-बेटे की बातचीत पाण्डे जी के कानों में पड़ ही गई। उन्हें काटो तो खून भी न निकले। उन्हें निजकर्म पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उनका कलेजा जोर -जोर से धड़कने लगा। वह धीरे से अपने आप से बोले - कैसी अधर्मा स्त्री है ? इसे स्वर्ग - नर्क की कोई फिक्र नहीं। इसने मेरा भी धर्म बिगाड़ दिया। धोबी के कुत्ते की भॅाति मैं न घर का हुआ और न घाट का। यह सोचकर पाण्डे जी को बड़ा दुःख हुआ। वह पछताते हुए खुद से कहने लगे कि अपने बीवी-बच्चों से अलग होकर इसे अपनाया। लेकिन आज यह भी बदल गई। जब इसका यही बिचार है तो अब यहॉ रहना बेकार है। फिर, मेरे जैसे व्यक्ति के लिए सजा भी तो यही है।

उसके बाद पाण्डे जी कब और कहाँ गए, किसी को कुछ मालूम नहीं। वह जिन्दा भी हैं या नहीं। कुछ पता नहीं। वह रहस्मय ढंग से गायब हो गए। पर, फिर लौटकर न आए। धीरे-धीरे बात आई-गई हो गई। चौधराइन ने उन्हें लापता बता कर सब बच्चों का व्याह तो किया। पर, पाण्डे जी का वियोग उनसे सहन न हुआ। उन्हें अपनेकर्मों पर बड़ी ग्लानि हुई। वह रात-दिन पश्चाताप के आँसू रोतीं।

वह अपने आप से ही प्रश्न करती कि आखिर, उन्होंने मेरा क्या बिगाड़ा था? जो मैंने उन्हें धोखा दिया। अपने देवता के साथ कपट किया। अपनी जिंदगी उन्हें बोझ नजर आने लगी। कभी -कभी वह दहाडें मार- मार कर रोने भी लगतीं। अंत में दुखी होकर वह एक बार प्रयागराज कुम्भ मेले में नहाने गई और त्रिवेणी में विलीन हो गयीं।

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,88,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,226,लघुकथा,808,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: अर्जुन प्रसाद की कहानी - अधर्मा
अर्जुन प्रसाद की कहानी - अधर्मा
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