रविवार, 27 जनवरी 2013

नूतन डिमरी गैरोला की कहानी - एक तितली की मौत

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एक तितली की मौत 

"ग". ह लाल, पीली, नारंगी, नीली, आड़ी, तिरछी रेखाओं वाली या गोल बूटी वाली साड़ी में बेतरतीबी से लिपटी सेब के बगीचों में, अखरोट के पेड़ों के नीचे, तो कभी खुबानी के या पूलम के बगीचों में पहाड़ी नदी की तरह उछलती मचलती, घास काटती किसी रंगीन तितली से कम न दिखती थी …कभी वह प्यूली के फूलों सी पीली तो कभी लाल बुरांस सी लाल लाल हो जाती .. कोई उसे रोक नहीं सकता था वह इतना खिलखिला कर हँसती कि सामने वाला समझ नहीं पाता था कि वह इतना क्यों हँसी .. दिल की इतनी साफ़ थी कि जो कुछ भी मन में आया रोका नहीं उसने, कह दिया सामने वाले से … और कभी तो जोर जोर से रो भी जाती जब कोई उसका मन दुखाता …तब रास्ते आते जाते लोग ठिठक जाते …पर उसे अपनी फिकर न रहती या कहिये कि उसे किसी की फिकर नहीं रहती कि लोग उसके बारे में क्या कहेंगे .. वह नदी जैसी थी जो कि आने वाले आयें या जाये या कुछ भी कहे उसके लिए, उसकी धारा को, उसकी कलकल को कोई रोक नहीं सकता था … वह निष्कपट खुल कर हँसती उसकी खनकती हँसी वादियों में गूंजती मंदिर की घंटियों से कम न लगती थी जिसको सुन कर एकबारगी लोग रुक जाते और दूसरी तरफ गुस्से का अहसास मात्र लगने पर वह जाहिर करती और कहती कि मैं नाराज हूँ तुमसे, मना लो मुझको ..और जैसे ही कोई मनाने की बात करता वह अगले ही पल खुश हो कर हंस देती पर रंचभर क्रोध या शिकायत को अपने मन में घर बसाने नहीं देती ….

जैसा स्वभाव था ग का वैसा ही उसका पहनावा … साड़ी बस लपेटती भर थी.. साड़ी किस करीने से पहनना है इसका उसे पता नहीं था ना जरूरत ही लगी उसे .. आखिर गाँव में इतना काम करना होता है तो तरतीबी से कब तक पहने ..हल के फल के पीछे दौड़ना, लकड़ी इकठ्ठा करना, खेतों में गुडाई निराई, घर का खाना, चौका बर्तन, गाय भेंसों के लिए घास काट कर लाना, दूध दुहना, गौशाला से गोबर की सफाई, खेतों से अनाज इकठ्ठा करना, दाल कुटना, सेब के पेड़ों और बाग बगीचे की देखभाल के साथ साथ बच्चों की देखभाल घर की साफ़ सफाई ..जाने कितने ही काम … दिन तो वही चौबीस घंटे का होता था, पर पहाड़ की सुबह देर से और शामें जल्दी .. बस कुछ घंटे हाथ में और ढेर सारे काम … तो साड़ी तो वह ऊँची नीची जल्दी जल्दी लपेट कर निकल पड़ती …पर साड़ी खरीदते समय फेरी वाले से बहुत चटख भडकीले रंग की साड़ी ही खरीदती …साड़ी की कीमत नहीं साड़ी के रंग उसको खुशी देते थे । जाने उसके जीवन में कौन से खुशियों के फूल खिल उठते थे उन रंगों के साथ की उसका मन उन रंगों के साथ गद्गद् रहता … जाड़ों के लिए लाल मोज़े खरीदती और अपनी सहेलियों से कहती - अरी! क्यों हँसती हो । लाल रंग देख कर जाड़ों में भी गर्मी का अहसास होता है ..

ग के इतने चटख रंगों का पहनावा -- गर्मी हो जाड़ा हो, उसको फरक नहीं पड़ता .. बस फेरी वाले से लाल पीली नीली हरी चूडियाँ खरीदने का उसका शौक और बहुत ही रंगरंगीली फूलों वाली साडियां, यही तो उसका शौक था .. गाँव में फेरी वाला आया है, यह सुन कर वह अपने हाथों की कुटली, दरांती सब फैंक दूर खेंतो से दौड़ती हुई फेरी वाले के पास आ जाती .. गाँव की औरतें भी फेरी वाले के पास की पोटली से उसके लिए लाल, नारंगी, पीली, नीली, गुलाबी  तीखे रंगों वाली साड़ी निकाल कर उसे दिखाते .. और उसका चेहरा रंगों के साथ अजब खिल उठता । हां, उसके चेहरे पर मेकअप तो कभी नहीं दिखा …उसके तीखे नैन नक्श उनकी सांवली सलौनी सूरत का यूँ भी श्रृंगार करते थे .. ग की निश्छल खिलखिलाहट और उसका पहनावा उसके भोलेपन को उजागर करता था..

गाँव में सभी उसके चटख रंग के पहनावे को ले कर आपस में गुणमुण करते पर उससे कोई कहता नहीं था   …कहे भी कैसे वह गाँव में जब ब्याह के आई थी तब मात्र तेरह साल की थी। अपने से पच्चीस साल बड़े आदमी की दूसरी ब्याहता ..जिसकी पहली पत्नी चौथे बच्चे के प्रसव के समय में चल बसी थी …. पीछे छोड़ गयी थी तीन बच्चे ..और दुनियाभर की खेती का काम .. और मायके में ग का तो कोई पूछने वाला ही नहीं था। माँ बाप बचपन में गुजर गए थे .. मामा की मजबूरी कि वह उसे किसी तरह से पाल रहे थे .. उससे पच्चीस साल बड़े आदमी का रिश्ता और ग की छोटी उम्र भी उन्होंने नजरअंदाज कर दी थी .. फ़ौरन बिना किसी गाजे-बाजे, ढोल शहनाई के और बिन बरात के ग का व्याह कुछ मंत्रोत्च्चारण के साथ हो गया था  .. वह खेती का काम और घर की देखभाल के लिए ब्याह कर घर लायी गयी थी। जब ग ससुराल आई तो पाया उसकी पहली बेटी तो उसके बराबर ही थी .. और उसने झट से उसे अपनी सहेली बना लिया । उनके साथ खूब हँसती, काम करती .. बच्चे जो उसकी उम्र के थे, स्कूल जाते और ग माँ बन कर वह उनको खाना खिलाती और खुद खुशी खुशी  खेत जाती । पर कभी किसी ने ग को शोक में डूबा नहीं देखा … कभी एक बूँद आंसू किसी ने उसके बहते नहीं देखा जो कहे कि उसे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत है। जिंदगी ने उसके जीवन में चटख रंग की साड़ियों के साथ तितली जैसे रुपहले रंग भर दिए थे ..

आज ग के घर में मातम था … ग के पति का देहावसान हो गया । पन्द्रह साल का सुहाग से भरपूर जीवन का अंत हो गया … ग की बहु ने सास ( ग ) को संभाला ..बेटियां भी खबर सुन कर अपने अपने ससुराल से आ गयी … बेटियों ने घर को संभाला … ग भी दो चार दिनों में आने जाने वालों से मुखातिब होने लगी .. तेहरवीं से पहले बच्चे शाम को ग के साथ बैठे हुए थे। बातों बातों में ग के रंगीन साड़ियों वाले बक्से का जिक्र आया तो ग बोली- हाँ वह मैंने संभाला हुआ है अपने कमरे में …. बच्चे बोले वह बक्सा दिखाओ माँ …माँ ( ग ) वह संदूकची ले आई .. बच्चों ने उसे खोला तो लाल पीली बैंगनी नारंगी और रंगबिरंगी फूलों और बूटों वाली साडियाँ खिल उठीं … बच्चे बोले माँ अब आप इन साड़ियों को लोगों में बाँट दो या कहीं रख दो, अब यह तुम्हारे काम की नहीं .. माँ बोली क्यों इन्होंने मेरा क्या बिगाड़ा है कि इन्हें कहीं रख दूँ ..कुछ समय बाद इन्हें पहनूंगी ना ..एक एक साड़ी मेरी पसंद की है .. बेटी बोली - नहीं माँ तुम समझो। अब तुम वही पहनोगी जो हम देंगे …. हम तुम्हारे लायक हल्के हल्के रंग की भूरी काली सफ़ेद साडियाँ खरीद कर भेजेंगे .. ग अवाक रह गयी .. बच्चे बोले माँ परेशान मत हो, हम महंगी से महँगी अच्छे स्तर की साडियाँ लायेंगे तुम्हारे  लिए .. ग कुछ ना बोल पायी  उसकी आवाज रुंध गई और उसके आंसू धार धार बह निकले ..आज जितना दुःख उसने अपने पूरे जीवन में महसूस न किया .. वह व्यथित हो उठी, इतना लंबा जीवन कैसे बीतेगा ..रंगों से भरा उसका संसार उस से छिनने लगा। उसको लगा उसके जीवन को खुशियों से भरने वाली रंगबिरंगी तितली के भरी जवानी में पंख नोच लिए गए और वह तितली बेसहारा तड़प तड़प कर मर रही है .. उसका दम घुटने लगा और साँसे रुकने लगी …उसको अपना पूरा जीवन बेरंग काला सफ़ेद नजर आने लगा ।


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स्व-परिचय


डॉ नूतन डिमरी गैरोला,
जन्मस्थान देहरादून उत्तराखंड।  पिता श्री ताराचंद्र डिमरी, माता श्रीमती रमा डिमरी हैं। मायका जोशीमठ चमोली ( बदरीनाथ के पास) और ससुराल नैणी चमोली उत्तराखंड में है। पति डॉ मित्रानंद गैरोला (सर्जन ) हैं। पिता केन्द्रीय सरकार में इनफोर्मेशन और ब्रोडकास्टिंग में कार्यरत थे जिस वजह से उनके तबादलों के साथ साथ अलग अलग जगह से शिक्षा ली । इसलिए जहाँ देवभूमि की नैसर्गिक सुंदरता और पवित्र वातावरण में पहाड़ का दर्द  बारीकी से जाना वहीँ मध्यप्रदेश में बस्तर जिले में आदिवासियों के जीवन को भी बहुत नजदीक से देखा परखा समझा । कानपुर, लखनऊ, कलकत्ता भी अध्ययन के लिए रही।  बचपन से ही बहुत संवेदनशील होने की वजह से जहाँ कहीं भी समाज में दुख और सुख देखा, मन की गहराईयों से खुद को उसमें डूबा पाया। । पढ़ाई के साथ लेखनी सतत चलती रही। चिकित्सक के रूप में भी हर दिन जहाँ मरीज के दैहिक  दर्द को महसूस किया और  निवारण करने का समुचित प्रयास करती रहीं वहीँ समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके भावात्मक पहलू से भी रूबरू होती रही। और यह दर्द कलम से पन्नों पर उतरता रहा। ।


सम्प्रति – चेयरपरसन और कंसल्टेंट गायनेकोलोजिस्ट मधुर नर्सिंग होम, श्रीनगर, गढवाल, उत्तराखंड
        महिलारोग चिकित्सक , दून चिकित्सालय ( महिला विभाग ), देहरादून ।

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ई मेल.. nutan.dimri@gmail.com

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  1. एक इन्‍सान के रूप में जो सहज जीवन हमें जीने को मिलता है, उसे सामाजिक मान्‍यताएं और रूढ़ियां कितना बनावटी और बेरंग बना देती है, उसी को नूतन की यह कहानी बहुत मार्मिक शब्‍दों में बयान करती है। पहाड़ी देहात की लोक-संवेदना को सहेजने वाली जीवंत भाषा और सामाजिक विसंगतियों को जिस बारीकी और मासूमियत के साथ इस कहानी में बुना गया है, लाजवाब है। नूतन को हार्दिक बधाई।

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  2. सुन्दर भावो से युक्त रचना

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  3. बहुत ही भाव पूर्ण और मार्मिक चिंतन युक्त..साथ ही एक प्रश्नचिन्ह भी पति की मौत की बाद भावनाओं के पंख क्यों क़तर लियी जाते हैं ??? दुःख भरी जिंदगी को और भी बेझिल करने वाले
    रीती रिवाजों के औचित्य पर गंभीर प्रश्न चिन्ह ??
    शुभ कामनाएं !!!

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  4. Anoop Dimri1:35 pm

    very sensitive and well written story...and the way you represent it is marvelous..pranam didi

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  5. आपकी हर लेखन में एक आकर्षण है नूतन जी ....तहे दिल से शुक्रिया ..:) मैं तो आपकी फेन हो गयी हूँ .......इसी तरह लिखते तहरी ...जय हो

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  6. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...नूतन जी .आपकी लेखनी से हम तो काफी प्रभावित हुए जी ...:)

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  7. बेनामी9:20 pm

    bahut hee umdaa rachnaa hey ,mahilaao ki sthiti ko ujagar karti hui,Dil Ko Chuu liya iss rachna ne..

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