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सुधीर मौर्य की कविताएँ

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6) ना सही प्यार, मेरी इबादत तो कबूल कर ले

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एक दरिया जो मेरी आँख से बहता है अभी

उसके साहिल पे तेरे नाम की इमारत है कोई

मेरी आँखों के नमकीन पानी की वजह

खंडहर सी दिखती हुई वो मिस्मार सी है

तेरे इश्क में ये बात मैंने कुफ्र की कर दी

तेरी याद में वहां इबादत तेरे बुत की कर दी

न धूप, न कपूर, न लोबान की खुशबू

तेरी यादें, मेरी आहें,और अश्कों की माला

ऐ दोस्त मेरे वजूद ने तुझे इश्क की देवी माना

न सही प्यार, मेरी इबादत तो कबूल कर ले

 

7) दिनचर्या

***********************

दिन गुज़रा जब रो रोके

और आँखों से बरसात हुई

दिल और भी तब बेचैन हुआ

जब साँझ ढली और रात हुई

घडी की हर एक टिक टिक का

सम्बन्ध बना मेरी करवट से

तेरी याद में कितना तड़पा हूँ

पूछो चादर की सलवट से

छिपते ही आखिरी तारे के

मेरी आँख की नदिया फूट पड़ी

सूरज की पहली किरन के संग

तेरी यादें मुझ पर टूट पड़ी

दिन गुज़रा जब रो रो के

और आँखों से बरसात हुई

 

8) सबसे खूबसूरत पल

************************

ओ ! प्रियतमे

हमारी जिन्दगी का

सब से खूबसूरत पल

हमारे इंतजार में

बेकरार है वहां

जहाँ पे

फलक और जमी

आलिंगन बद्ध

होते हैं।

फल - जमीं का

मिलन

कोई मरीचिका नहीं है

वह तो

शास्वत सत्य है

जिन्हें हम

दूर की नज़र से

देख सकते हैं

किन्तु नजदीक से नहीं।

क्यों?

क्योंकि यह मिलन

अदैहिक है,

रूहों का है।

अरे ! प्रियतमे

न सही दैहिक

हम आत्माओ से मिले है

जिसे

दुनिया देख नहीं सकती

 

9) फ्रेंडशिप बेंड

******************

लांघ कर

अपनी अटारी की

मुंडेर

मेरी अटारी पे

आ के

उसने बांधा था

मेरी कलाई पे

लजाते - सकुचाते

फ्रेंडशिप बैंड

जिसका रंग था

राजहंस के पंखों जैसा।

बेंड तो बेंड था

वक़्त के साथ

टूट कर बिखर गया।

लेकिन उसका उजलापन

अब भी मेरी रातों में

चांदनी बिखेरता है

मेरी कलाई पर

तेरी अँगुलियों का लम्स

अब भी महकता है।

में जब भी देखता हूँ

अपनी कलाई

ऐ मेरे

बिछड़े दोस्त मुझे तेरी

दोस्ती

याद आती है।

 

10) हाँ मैं जनता हूँ उसे

*********************

हाँ

में नहीं जनता उसे

कभी मिला भी नहीं

पर उसकी सूरत

न जाने क्यों

तुमसे मिलती है।

ओ ! गंगा के किनारे

मेरे नाम का

घर बनाने वाली लड़की

आ कभी

लहरों पे आके देख

मैंने कश्ती पे

तुम्हारे दुपट्टे का

बादबान बांधा है।

तू एक लड़की का

जिस्म नहीं मेरे लिए

जिसमें, मैं डूबूं या उतराऊं

तू मेरा ही बदन है

क्योंकि बसाया है

मैंने तुझे

अपने रूह की

अनंत गहराइयों में।

हाँ मैं

जनता नहीं तुझे,

हाँ

में जनता हूं

ऐ लड़की !

तेरी आँखों में

मेरी चाहत का

समुन्दर बसा है।

 

सुधीर मौर्य 'सुधीर'

ग्राम और पोस्ट - गंज जलालाबाद

जनपद - उन्नाव ( उत्तर प्रदेश )

पिन – 209869

Phone: 09619483963 /09699787634 / 09582844580

कविता 449184744885522708

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