सोमवार, 15 अप्रैल 2013

नन्दलाल भारती की कहानी - छोटे लोग


छोटे लोग।

कहानी।


नयन लाल के बी.ए.पास करते ही उसके माता-पिता की आंखों में चमक आ गयी। उन्हें लगने लगा था कि जीवन का मधुमास जो पतझड़ में बदल गया था,नयनलाल को सरकारी नौकरी मिलते ही घर-मंदिर में मधुमास लौट आयेगा। खैर हर माँ-बाप को अपनी औलाद से ऐसी ही उम्मीद होती है। मां-बाप को अपनी औलाद को लेकर सपने बुनना भी चाहिये परन्तु उनके सपनों का आकस्मिक मानवीय सोच की दुर्घटना के शिकार न हो। भारतीय व्यवस्था में ऐसी आकस्मिक दुर्घटनायें आम है जो अक्सर हाशिये के लोगों के साथ अक्सर हो ही जाती है। कभी छोटे लोग के नाम पर,कभीं छोटी जाति के नाम पर कभी क्षेत्र के नाम पर कभी प्रान्त के नाम पर किसी और नाम से। ऐसी ही दुर्घटना नयनलाल के साथ हुई नतीजतन उसके मां-बाप गुणवन्ती और हरीलाल के सपनों का चकनाचूर होना था। नयनलाल को अभी नौकरी ज्वाइन किये चन्द महीने हुए ही थे। अर्धशासकीय मल्टीनेशनल खेती विकास कम्पनी में आरक्षण की व्यवस्था लागू होने की सुगबुगाहट शुरू हो गयी। प्रबन्धन ने जाति प्रमाण प्रस्तुत करने की सूचना जारी कर दी थी। जाति प्रमाण के सामने आते ही नयनलाल के कैरिअर की तबाही के भाषणयन्त्र शुरू हो गये। खैर सामन्तवादी सोच के धनिखाओं ने आरक्षण तो लागू नहीं होने दिया। सरकारी कानून ना जाने कहां खो गये पर छोटे लोग के नाम पर तथाकथित उच्च वर्णिक ब्रांचहेड आर.के.डंकना ने नयनलाल के उपर मुसीबतों के ओले आवारा बादलों की बरसात के साथ गिराने शुरू कर दिये थे जाति प्रमाण पत्र देखने के बाद। आर.के.डंकना बात-बात पर नयनलाल को दुरियाना भी शुरू कर दिये थे


आर.के.डंकना विजय दुर्धर जो स्टेटहेड थे से कहते हुए सुने गये साहब कम्पनी में छोटे लोग आने लगे है,कम्पनी सरकारी रवैये पर ना चलने लगे।


विजय दुर्धर-अरे क्यों चिन्ता करते हो डंकन किसको छोटा बनाये रखना है किसको बड़ा बनाये रखना है,ये हमें तय करना है और रच गये नयनलाल को छोटे बनाये रखने का भाषणयन्त्र । उसकी सी.आर.मध्यम गति से खराब की जाने लगी थी जो उसे पदोन्नति से दूर रखने के लिये काफी थी छोटा बनाये रखने के लिये छोटे लोग के खिलाफ। नयनलाल का सच भी डंकन साहब को झूठ लगता था,उसकी तकलीफें उन्हें बहाना लगती थी। नयनलाल को मिलने वाली तनख्वाह डंकना साहब को ज्यादा लगती थी। नयनलाल के लिये नौकरी किसी सजा से कम नहीं लग रही थी। वही दूसरी ओर डंकन साहब के खास धनपति जो नौकरी के शुरूआती दौर में विक्षिप्त हो गया था। धनपति भले ही पागल सरीखे हो गया था अतिसुन्दर जीवनसंगिनी का साथ भी था। डंकन साहब की जी हजूरी में तनिक भी कोताही नहीं बरतता था। मदद के लिये डंकन साहब भी रात-विरासत उसके घर पहुंच जाते थे। डंकन साहब धनपति की हर तरह से मदद करते थे आर्थिक लाभ भी खूब पहुंचाते थे। दफ्तर के दूसरे लोग डंकन साहब को नालायक लगते थे। डंकन साहब की कृपा धनपति पर खूब बरसती थी। दफ्तर के बड़े-बड़े बुद्धिमान धनपति के सामने बौने से हो गये थे। धनपति का प्रमोशन भी धड़ल्ले से हो रहा था ।धनपति के साथ के लोग पन्द्रह साल पिछड़ गये पर विक्षिप्त धनपति सब का कान काट रहा था। ना जाने डंकना साहब को धनपति से कौन लाभ मिल रहा था जिसकी वजह से डंकना साहब दूसरे कर्मचारियों की शिकायत भी करने में तनिक नहीं हिचकते थे। जब-जब डंकना साहब का स्थानान्तरण हुआ डंकना साहब ने धनपतिकुबेर का भी स्थानान्तरण वही करवाया जहां वे स्थानान्तरित हुए।

स्टेटहेड,विजय दुर्धर साहब के तो आर.के.डंकना साहब इतने खास थे कि उनकी इच्छा पूर्ति के लिये चांद भी धरती पर उतार लाये। इसके अलावा डंकना साहब में कोई योग्यता नहीं थी। मामूली से ग्रजुयेट थे अंग्रेजी तो दूर हिन्दी भी लिखने में इतने हाथ तंग थे कि बड़े अफसर की तरह दस्तख्त कर लेते। विभाग में दनादन तरक्की की चोटी पर चढ़ते जा रहे थे,उनसे वरिठ निम्नवर्णिक ए.ए.ध्यान का तो कैरिअर खत्म हो गया था। वही हाल नयनलाल के साथ शुरू हो गया खैर नयनलाल तो मामूली से क्लर्क की नौकरी पर लगा था पर वह जानता था कि मामूली क्लर्क पर लगे योग्य लोग उच्च पदों पर जा सकते थे। कई को तो जनरल मैनेजर के पद से रिटायर होते भी देखा था। इसी उम्मीद में नयनलाल आंसू से अपने कैरिअर का कैनवास रंगने का भरसक प्रयास कर रहा था। अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ अगर मुंह खुला तो नौकरी जाने का खतरा भी था। स्टेटहेड,विजय दुर्धर साहब नयनलाल के गांव के पास के ही थे इसके बाद भी वे नयनलाल की परछाईं से भी नफरत करते थे। सुनने में आता है कि क्षेत्रवाद भी भ्रष्टाचार का कारण बनता है परन्तु स्टेटहेड,विजय दुर्धर लकीर से हटकर फायदा पहुंचाने की बात तो दूर उसको हकों पर तलवार लटकाये रखते थे। स्टेटहेड,विजय दुर्धर के मातहत काम करने वाले अफसर ही नहीं चपरासी भी नयनलाल को दोयम दर्जे का आदमी ही समझते थे क्योंकि नयनलाल निम्नवर्णिक जो था।

स्टेटहेड,विजय दुर्धर के हाथ के नीचे प्रशासन में काम कर रहे एस.एस.चोरावत ने तो हद की कर दिया था। नयनलाल की एल.टी.सी का भुगतान नहीं होने दिया था। पुराना स्कूटर खरीदने के लिये नयनलाल ने आवेदन लगाया था पर दो साल तक लोन पास नहीं होने दिया था। स्टेटहेड,विजय दुर्धर और आर.के.डंकना साहब की सह पर एस.एस.चोरावत ने तो नयनलाल की पत्नी के मेडिकल बिलों की जांच करवाने के लिये कमेटी तक बैठवा दिया था ।सांच को आंच कहां नयनलाल ने एक-एक खुराक दवाई का हिसाब दिया था । मुंह की खानी तो पड़ी थी पर जली हुई रस्सी की तरह इनकी ऐंठने नहीं गयी थी। मौंके-बेमौंके नयनलाल का अहित में तथाकथित उच्च मानसिकता वास्तव में दोगली मानसिकता के लोग जुटे रहते थे। आर.के डंकना साहब होंठों पर मुस्कान लिये हर साल मौन कैंची चलाये जा रहे थे और उपर बैठे स्टेटहेड,विजय दुर्धर अपनी मुहर लगाये जा रहे थे। नयनलाल को दफतर की सरकारी सुविधा भी उनकी आंखों में धंसने लगी थी। कहते छोटे लोगों की सरकारी सुविधाओं की लत लग रही है। चम्बल संभाग की गर्मी आग में आलू भुनने जैसा होती है,ऐसी गर्मी में सरकारी दफ्तर का रो-रोकर चलने वाला पंखा भी नयनलाल की सीट से आर.के डंकना ने अपने तथाकथित रिश्तेदार के घर शिफ्ट करवा दिये थे। नयनलाल की नाक से टपकता से उठा पसीना नख तक बहता रहता था ऐसी परिस्थिति में काम थोपने का सिलसिला भी ।

एक कहावत है अगर बास कर्मचारी को सुनते हैं तो कर्मचारी भी पूरी ईमानदारी बरतते हैं। यहां तो नयनलाल काम के प्रति समर्पित था पर दुख में था। बास ही नहीं दफ्तर के दूसरे लोग भी छोटे लोग कहकर उपहास करते,ईमानदारी के साथ किये गये काम के बदले दण्ड मिलता बेचारे निरापद नयनलाल को। एक कहावत दबी जबान सुनने को और आती है बास आफिस का तनाव दूर कर सकते है। सच भी है काम की अधिकता से कर्मचारियोंमें होने वाले तनाव को बास अपने सौम्य और भावनात्मक व्यवहार से काफी हद तक कम कर सकते है। इससे काम भी समय पर पूरा होजाता है। बास भी परिवार के मुखिया की तरह अपनत्व की सौम्यता भी दिखा सकते है।कर्मचारियों के लिये काम बोझ नहीं लगता। काम के निपटान के लिये कर्मचारियों को अलग से समय की जरूरत भी नहीं पड़ती। समय लेने का तात्पर्य यह होता है कि कर्मचारी बीमार होने की लम्बी छुट्टी लेकर घर बैठ जाते हैं जिससे कम्पनी के काम में बाधायें आती है। काम समय से पूरा नहीं होता है। यदि कर्मचारी स्वस्थ होता है और बास परिवार के मुखिया की तरह सौम्यता के साथ काम लेता है तो कर्मचारी काम सही ढंग से करता है और काम समय से पूर्व अथवा समय पर पूरा हो जाता है। बास बिना किसी भेदभाव के कर्मचारी के साथ पेश आता है तो कर्मचारी में कम से कम छुट्टियों पर जाते है। लेकिन यह तभी सम्भव है जब बास कर्मचारी की मनोदश समझे उसके हितों का ध्यान रखे और मानवता के प्रति ईमानदारी बरतते हुए बिना किसी जातीय भेदभाव के हर कर्मचारी से प्यार से काम ले।

नयनलाल पूरी ईमानदारी,कर्तव्यनिठा के साथ काम करता था परन्तु उसके साथ सभी अधिकारियों-वी.पी.दुर्धर,देवेन्द्र दुर्धर,अवध दुर्धर,आर.पी.दुर्धर,कनक नाथ दुर्धर,जगजीत दुर्धर,देवकी और डंकना ने दोयम दर्जे का आदमी मानकर अन्याय ही किया। नयनलाल काम के बोझ से हमेश दबा रहता था,उसके जीवन का मधुमास इन अफसरों ने पतझड़ बना दिया,उसके खुली आंखों के सपने मारते रहे छोटे लोग कहकर। नयनलाल,उच्च शिक्षित और कर्तव्यनिष्ठ होने के बाद भी दण्डित किया जा रहा था। उसे अपरोक्ष रूप आत्महत्या करने तक को हत्तोत्साहित किया जाने लगा था। उसके आगे बढ़ने के रास्ते बन्द किये जाने का भाषणयन्त्र जारी था सिर्फ जातीय अयोग्यता की आड़ में। नयनलाल को हमेश तनाव में रखा जाता था ताकि वह हत्तोत्साहित होकर नौकरी छोड़ दे या दुनिया ।ढेर सारी खूबियों के बाद भी नयनलाल को दण्ड मिल रहा था। नयनलाल संस्थाहित में बड़ी ईमानदारी से काम तो कर रहा था पर उसे दफ्तर में घुटन महसूस हो रही थी। घुटन में काम करते हुए उसे कई बीमारियों ने घेर लिया था। विभाग में किसी का कभी नयनलाल को सहयोग नहीं मिला परन्तु छोटे लोग के नाम पर उसकी योग्यता का बलात्कार कर्मपूजा का चीरहरण जरूर किया गया। नयनलाल की भावनाओं को समझना तो दूर उसकी मेहनत की कमाई पर गिद्ध नजरें टिकी रहती थी। काम नयनलाल करता था,अतिरिक्त प्रतिपूर्ति ओवर टाइम धनपतिकुबेर और ऐसे दूसरे लोगों के हिस्से चला जाता था। धनपतिकुबेर को तो तनख्वाह से अधिक दूसरी कमाई का लाभ मिल जाता था। यह सब डंकना साहब की कृपादृटि का प्रतिफल था। हाँ नयनलाल पर तो हमेशा कोपदृटि बनी रहती थी बस छोटे लोग के नाम पर।


डंकना साहब ने नयनलाल के साथ पशुता तक का व्यवहार कर डाला,पहले उसकी सीट पर चल रहे मरियल पंखे को उठवा लिये,फिर उसे खुले नन्हें से बरामदे में टाइपराइटर देकर बहरिया दिया जहां झुलसा देने वाली लू में वह झुलसने को विवश था। गर्मी की प्रचण्डता को देखकर दफ्तर के लिये सरकारी खर्चे पर कूलर लगाने का बजट स्वीकृत हुआ पर नयनलाल के लिये आया कूलर आर.के.डंकना साहब अपने घर उठवा ले गये । धनपतिकुबेर के मुंह से जरूर सुनने को मिला था कि छोटे लोगों को सरकारी सुविधा की लत लग जायेगी तो काम कौन करेगा। कहावत सुनने में आती है कम्पनी के नुकसान को कम करने और लाभ को बढाने में बास अहम् भूमिका निभाता है वी.पी.दुर्धर,देवेन्द्र दुर्धर,अवध दुर्धर,आर.पी.दुर्धर,कनक नाथ दुर्धर,जगजीत दुर्धर,देवकी और आर.के डंकना जैसे अफसर संस्था,मानवसमाज,देश और नवयुवकों के लिये खतरा साबित होते है। भ्रष्टाचार के जनक साबित होते है। ऐसे लोगों को क्या कहा जा सकता है जातीयता को योग्यता मानकर शैक्षणिक का बलात्कार करते है सिर्फ छोटे लोग के नाम पर। इस तरह के लोग ठीक वैसे ही लगते है जैसे वामन जो चक्रवर्ती सम्राट बलि से छलकर उनका सर्वस्व ठग लिया था। जातीय भेदभाव के नाम पर चेहरा बदलकर हाशिये के आदमी अथवा छोटे लोगों की नसीब कैद करने वाले लोग आदमी के वेा में नरपिशाच लगते है आज के विज्ञान के युग में भी। नयनलाल का भविष्य भेद के भंवर में फंसा हिचकोले खा रहा था इसी बीच उसे महात्मा ज्योतिराव फुले द्वारा लिखित किताब गुलामी, मराठी का हिन्दी भाषान्तर पढ़ने को मिल गयी। यह पुस्तक पढ़ ही रहा था कि डाँ.रमा पांचाल द्वारा सम्पादित पुस्तक सिन्धु संस्कृति के निर्माताओं के वंशज महाराजा बली हाथ लग गयी। इन पुस्तकों का पढ़कर नयनलाल को वैदिककाल से वर्तमान के भाणयन्तकारियों और उनके पात्रों के विाय में जानने और समझने का अवसर मिला। इन पुस्तकों से उसे ज्ञात हुआ कि वह सिन्धु सभ्यता के वंशावली से हैं,सच भी यही हैं। देश की आबादी के अस्सी प्रतिशत लोग जिन्हें शोषित वंचित आदिवासी के नाम से जाना जाता है जो लोग विकास की लय आजाद देश में नहीं पकड़ पाये हैं, भाषणयन्त्र के शिकार हैं, असल में वे लोग छोटे लोग नहीं है। छोटे लोग तो वे है जो लोग खुद का बड़ा घोषित कर,शोषित-वंचित समुदाय का हक हड़प रहे है। ऐसा ही तो आधुनिक वैज्ञानिक युग में जहां दूरियों की सीमायें टूट चुकी है परन्तु जातीय भेद की दूरियों पर आंच तक नहीं आयी है जिसकी वजह से नयनलाल और उस जैसे अनगिनत लोगों को आंसू से रोटी गीला करना पड़ रहा था। नयनलाल एकदम आश्वस्त हो चुका था कि वह और उसके लोग छोटे लोग नहीं हो सकते।


नयनलाल के व्यवहार में आयी परिवर्तन से विभाग में जैसे खलबली मच गयी। उसको रोकने के अपरोक्ष रूप से खूब प्रयास होने लगे थे। सी.आर. तो पहले से शनै-शनै खराब की जा रही थी,उसके भविष्य पर कालिख तो पोत दी गयी थी।इसके बाद भी कई बार पदोन्नति के मौके भी आये वह कई अग्नि परीक्षायें भी पास कर लिया लेकिन परिणाम उसके पक्ष में कभी नहीं आया। वह हत्तोत्साहित होने की बजाय और उत्साहित होता चला गया जिसका परिणाम यह हुआ कि सभ्य समाज के बीच उसकी पहचान उभर कर आ गयी। सेवा में उसके जीवन के पच्चीस मधुमास पतझड़ में बदल चुके थे पर उसके मन में कल से आस थी जो कुसुमित रहती थी। अरसे बाद उसे डी.पी.सी में बुलाया गया पर इस बार भी परिणाम में कोई बदलाव नहीं हुआ होता भी कैसे यह तो महज खानापूर्ति थी,उसकी योग्यता पर एकबार फिर अयोग्यता की मुहर लग गयी। नयनलाल ने कमरकस लिया और बोर्ड आफ डायरेक्टर को लिखित में अन्याय के खिलाफ अर्जी लगा दिया। खैर इस अर्जी से भी नयनलाल को कोई तरक्की नहीं मिली मिलती भी कैसे सी.आर.जो खराब कर दी गयी थी तरक्की से दूर रखने के लिये।


अचनाक आर.के डंकना साहब के विदेश अध्ययन की मंजूरी विभाग से मिल गयी। उस डंकना साहब को जो लिखने-पढ़ने से काफी दूर थे पर ग्रेजुयेट थे। विदेश में जाकर क्या समझेंगे,क्या बोलेंगे। इस समस्या का समाधान डंकना साहब के एक भक्त उदय के मस्तिक में उपज गयी। खैर उस वक्त गजनी पिक्चर बनी तो नहीं थी शायद ऐसा कुछ उन्होंने किसी विदेशी पिक्चर में देखा हो। गजनी के तर्ज पर जैसे नायक फोटो खींचकर कोडिंग कर लेता है। ठीक वैसे ही आर.के.डंकना साहब के प्रतिदिन के उपयोग हेतु डायलाग और लेक्चर की मैनुस्क्रिप्ट तैयार की गयी थी। इस मैनुस्क्रिप्ट रचना में नयनलाल भी सहभागी था। मैनुस्क्रिप्ट तैयार करने में सप्ताह भर लगे थे पर यह आयडिया कामयाब भी रही। डंकना साहब दिल्ली प्रस्थान करने से नयनलाल से बोले-तुम्हारा कोई काम तो नहीं है मुख्यालय में कोई काम हो तो बताओ दो दिन दिल्ली में रूकना है,तुम्हारा काम करवा दूंगा।


नयनलाल-नहीं।
डंकना साहब-माथा ठोंकते हुए बोले तुम्हारी पदोन्नति का मामला तो है क्यों नहीं कोई काम।
नयनलाल-मेरा काम नही हो सकता।
डंकना-मैं जा रहा हूं,प्रशासन हेड से बात करूंगा।
नयनलाल-म नही मन बोला अभी तक तो कब्र खोदते रहे एकदम से मेरे कैरिअर की चिन्ता कैसे होने लगी।
डंकना साहब-कुछ बोले ।
नयनलाल-नहीं साहब ।
धनपतिकुबेर-साहब आबे बढ़कर तुम्हारा काम करवाने को कह रहे है। तुम कह रहे हो नहीं होगा।
डंकना साहब-तुमने अपनी पदोन्नति के विषय में जितने पता्रचार कियो हो सब पत्रों की एक-एक प्रति दे दो। तुम्हारी पदोन्नति जरूर होगा। तुम्हारे इतना योग्य प्रदेश में तो कोई नहीं है। 


नयनलाल को ना जाने क्यों दाल में काला क्या पूरी दाल काली लगने लगी थी। वह बोला हड़ताल आज है सभी दुकानें बन्द है। फोटोकापी नहीं हो पायेगी। बाद में जब जायेंगे तो दे दूंगा।


डंकना साहब-अभी दे दो। मैं वही करवाकर दे दूंगा,तुम्हारे नाम से कोरिअर करवा दूंगा।
आखिरकार नयनलाल को सारा रिकार्ड देना पड़ गया । दो महीने की विदेश यात्रा के बाद डंकना साहब स्वदेश लौटे थे और उनके दफ्तर आते ही नयनलाल दस्तावेज के बारे में जानकारी चाहा तो फटेमुंह डंकना साहब का जबाब था यार तुम्हारे दस्तावेज तो हेडआफिस में दे दिया था जबकि सारे रिकार्ड डंकना साहब नट कर दिये। प्रमोशन तो दूर रिकार्ड भी खत्म हो गये एक साजिश के तहत् छोटे लो जानकर।
नयनलाल बुदबुदाया छोटे लोग का भला कौन चाहेंगे?


नयनलाल को पददलित बनाये रखने में तथाकथित उंचे दोगली मानसिकता के लोग कामयाब रहे। नयनलाल ऐसी राह पर चल चुका था जहां से उसे न पीछे देखना सम्भव था और ना लौटना मुमकिन था। वह मानता था कि वह संर्घारत् जीवन व्यतीत कर रहा है लेकिन वह अपनी जिद पर अडिग था। वह कहता जब तक मेरा अस्तित्व है प्रयास जारी रखूंगा। एक उसका अथक प्रयास कामयाब हुआ उसके किये गये परहित के कामों की सर्वत्र सराहना हुई। कलम के सिपाही को   पी.एच.डी.की उपाधि प्रदान कर विश्वविद्यालय ने सम्मानित किया पर विभाग में तरक्की नही हुई । नयनलाल के कद की उंचाई देखकर वी.पी.दुर्धर,देवेन्द्र दुर्धर,अवध दुर्धर,आर.पी.दुर्धर,कनक नाथ दुर्धर,रणवीर दुर्धर,देवकी और डंकना इतने बौने हो गये थे कि नयनलाल से आंख मिलाने में नीचे गड़ जाते थे। कमेरी दुनिया का आदमी छोटा नहीं हो सकता क्योंकि सृजन और विकास का आधार तो वही होता है ऐसे फरिश्ते छोटे लोग कैसे हो सकते है। नरपिशाच छोटे लोग तो वे होते हैं जो शोषित-वंचित,कमेरी दुनिया के लोगों खून पीते हैं। 


डाँ.नन्दलाल भारती


 

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जनप्रवाह।साप्ताहिक।ग्वालियर द्वारा उपन्यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन
उपन्यास-चांदी की हंसुली,सुलभ साहित्य इंटरनेशल द्वारा अनुदान प्राप्त
नेचुरल लंग्वेज रिसर्च सेन्टर,आई.आई.आई.टी.हैदराबाद द्वारा भाषा एवं शिक्षा हेतु रचनाओं पर शोध  ।

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