शनिवार, 29 जून 2013

पुस्तक समीक्षा - प्रीत मंजरी

पुस्तक का नाम – प्रीत मंजरी ( काव्य – संग्रह )

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लेखिका का नाम – डॉ प्रीत अरोड़ा

प्रकाशक --- देवभूमि प्रकाशन ,नैनीताल

पुस्तक मूल्य – ९० रूपये

हिंदी कविता की प्रीतभरी सुवास

इधर लिखी जा रही अधिकांश हिंदी कविता में एक खास किस्म की जड़ता है। नई कविता का ताना-बाना ऐसा है कि नया पाठक कविता की बगिया में जा कर भी वहाँ के फूलों से जुड़ नहीं पाता। न सौंदर्य, न गंध और न सौंदर्य। लगता है कागज के सुमन खिले हुए हैं। कविता की मंजरी ही नकली है। ऐसा इसलिए है कि अब अधिकांश कविताएँ दिल से नहीं, दिमाग से लिखी जा रही हैं, जबकि कविता कोमल अनुभूतियों की उपज होती है। जब तक अंतस में प्रीत न जगे, कविता संभव नहीं हो पाती। एक सार्थक कविता आत्मदर्पण भी होती है। वह चंद शब्दों का असंगत कोलाज भर नहीं होती, वह जीवन का जीवंत चित्र होती है। और आत्मा का अनगाया राग भी होती है। मन की बातों को अनुगुंंजन है कविता। जबकि समकालीन कविताओं में कविता के अनिवार्य तत्व लगभग अनुपस्थित हैं। यही कारण है ये कविताएँ पाठकों से दूर हंै। कविता की प्यास पुरानी कविताओं के पाठ से ही बुझ पाती है लेकिन ऐसा नहीं है कि सारी कवि-बिरादरी एक ढर्रे पर चल रही है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो कविता को शिल्प के स्तर पर और भाव के स्तर पर भी जीने की कोशिश कर रहे हैं। इनके यहाँ कविता बिल्कुल कविता की तरह ही उपस्थित होती है। इन लोगों में डॉ. प्रीत अरोड़ा सुपरिचित नाम बनता जा रहा है।

इस युवा कवयित्री ने अपनी कविता-यात्रा को एक प्रखर संभावना में तब्दील कर दिया है। प्रीत की कविताई में आडंबर नहीं है। सादगी है। और वह दिल से अपनी बात कहती है। चाहे वह प्रकति को देखे, या जीवन के विविध आयामों को। प्रीत की हर कविता प्रभविष्णुता के निकष पर खरी उतरती है। सभी कविताएँ अर्थवान हैं। इन्हें पाठक हृदयंगम कर लेगा। अधिकांश कविताओं को मैं फेसबुक या विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में देखता-पढ़ता रहा हूँ। कविता की सफलता इसी में है कि वह पढ़ते साथ ही भाव लोक से अर्थलोक की यात्रा करा दे। यह समझना न पड़े कि कविता के गूढ़ार्थ क्या हैं। कविता अपने अर्थ को नदी के जल की तरह पारदर्शी बनाए। एक फूल की तरह सुवास को प्राण तक पहुँचा दे। कविता के अर्थलोक तक पहुँचने के लिए पाठक अतिरिक्ति ज्ञान की कुंजी का सहारा न ले। प्रीत ने कविता की सही रीत से अपना रिश्ता जोड़ा है। उसने कविता को सरल किया। अपनी गहनतम अनुभूतियों को सरलतम अभिव्यक्ति दी है।

प्रीत की कविताओं की मंजरी मेरे सामने हैं। हर कविता की पंखुड़ी चटक रंग से भरी है। यह मंजरी अपनी सुवास बिखेर रही है। आकर्षित कर रही है। वह जीवंत है। यहाँ भावनाएँ नाना रूपों में सामने आती हैं। कभी कविता नव चेतना जगाती है , तो कभी संस्कारों से रिश्ता जोड़ती है। बेटियों की महत्ता पर विमर्श करती है तो माँ के अवदान पर भी अभिभूत हो कर उसका गुणगान करती है। कविता नन्हीं चिडिय़ा से भी बतियाती है तो प्रकृति का विहंगावलोकन भी करती है। प्रीत की कविता में नैतिक मूल्यों की बहुलता है। वह संस्कारों पर जोर देती है। यहाँ प्रेम भी है मगर उसकी अपनी नैतिकता है। प्रीत की स्त्री भी मुक्तिकामी है लेकिन संस्कारों के साथ। यह बड़ी बात है। क्योंकि इधर की अनेक कवयित्रियाँ पूरी तरह से मुक्त होने पर अआमादा हैं। वे देह से मुक्त हो रही हैं, परिवार से मुक्त हो रही हैं। मुक्ति की गलत परिभाषा को दिमाग में बिठा कर कविताएँ कर रही हैं। जबकित प्रीत की कविताएँ दिशा देती हैं और स्त्री को उसकी अस्मिता से प्रतिबद्ध रखती हैं। संस्कारों की जीत कविता में स्त्री का दर्द भी है और आगे बढ़ाने की ललक भी। लेकिन अंतत: जीतते हैं संस्कार। यही संस्कार कविता को बड़ा बनाते हैं, कवयित्री को भी भीड़ से अलग कर देते हैं। महान कवयित्री महादेवी वर्मा का स्त्री विमर्श भी कुछ इसी तरह का है। महादेवी भी मुक्ति के लिए बेचैन हैं मगर वे संस्कारों को नहीं छोड़ती। वह भारतीयता को नकारती नहीं। वे श्रेष्ठ परम्पराओं से बंध कर त्याग भी करती है। वे नीर भरी दुख की बदली भी है मगर नई रागिनी भी हैं। प्रीत भी इन्हीं स्थितियों का चित्र खींचती है कि -

''मन कहता उसका,बगावत करने को

तभी गूँजने लगती कानों में माँ की शिक्षा

और संस्कार देने लगते दुहाई

ठण्डी आह भर कर

पुन: कोशिश करती

लड़ती अपने विचारों से

आखिर

जीत जाते संस्कार और हार जाती वो

आदर्श समझाते और समझ जाती वो।''

कविता में इस तरह मूल्यवत्ता का आग्रह अद्भुत है। इधर की अधिकतर कवियित्रियों में यह बोध गायब है। अब कितनी कवयित्रियाँ नैतिकता की बातें करती हैं? नैतिकता एक हास्यास्पद शब्द बन कर रह गया है। यह स्त्री विमर्श से लगभग अनुपस्थित होता जा रहा है। क्योंकि बहुत-सी औरतें नैतिकता को भी बंधन मानती हैं। जबकि प्रीत की कविता में नैतिकता केंद्रीय स्वर बन कर उभरता है। प्रीत घर की बात करती है। नवचेतना भी जगाती हैं मगर उसके पीछे लोक मंगल है। सुधर जाने की वकालत है। कविता घर को जोडऩे के पक्ष में खड़ी है जबकि अब घर से मोहभंग होने की कविताएँ भी रची जा रही है। कुल मिला कर इस वक्त जबकि कवयित्रियाँ क्रांति के नाम पर सब कुछ छिन्न-भिन्न करने पर आमादा न•ार अआ ती है, प्रीत की कविताएँ जोडऩे का मंत्र देती हैं। सही कविता जोड़ती है तोड़ती नहीं। वह क्रांति करती है लेकिन सृजन का वातावरण बना कर। लोगों की ालाकियों को कवयित्री बखूबी समझती है इसलिए वह आगाह करती है कि

जरा संभल के

रोनी सूरत बना कर

लोग अक्सर हमदर्दी बटोर लेते हैं

भोली सूरत बनाकर

लोग अक्सर दूसरों को लूट लेते हैं

हुस्न के जलवे दिखाकर

लोग अक्सर बरबाद कर देते हैं

यारों ,जरा संभल के रहना इन जमाने वालों से

लोग अक्सर निर्दोष को बलि का बकरा बना देते हैं ।''

मतलब यह कि प्रीत की कविताएँ सबको संदेश देती है ताकि बेहतर दुनिया रची जा सके। घर को माँ को, जीवन मूल्यों को प्रीत ने अधिक महत्व दिया है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि प्रीत निरीह स्त्री के पक्ष में है। वह स्त्री की मजबूती का आग्रह करती है और मुहिम चलाने पर भी जोर देती है। वह दो टूक कहती है कि बेटी हूँ पर कमज़ोर नहीं/ माँ-बाप का अभिमान हूँ मैं/ नए संकल्प और नई सोच से, देश का मान बढ़ाऊंगी/ होंगें सबके सपने पूरे/ये विश्वास दिलाऊंगी/ अत्याचारों से लड़कर/ जीत का बिगुल बजाऊंगी/ सत्कर्म,सदभावना से/ आगे बढ़ती जाऊंगी/ करना होगा सब का उत्थान, प्रीत-मंजरी के संग, ऐसी मुहिम चलाऊंगी ।''

मुझे उम्मीद है कि 'प्रीत' की यह काव्य-'मंजरी' लोगों को पसंद आएगी। इन ताजा युवा कविताओं में परम्परा के दर्शन हैं और आधुनिकता का संस्पर्श भी। बगावती तेवर भी हैं तो संस्कारों के प्रति प्रबल आग्रह भी। इस संग्रह की तमाम कविताओं पर सुदीर्घ विमर्श हो सकता है लेकिन अपनी बात को यही पर विराम दे रहा हूँ, इस विश्वास के साथ कि समकालीन कविता की गुमराह दुनिया में प्रीत की कविताएँ रास्ता सुझाएँगी और मरती हुई नई कविता को प्राणवान बनाने का काम करेंगी। यह अतिरंजित तारीफ नहीं है, दिल से निकली भावनाएँ है क्योंकि इस तरह की सरल, तरल और नैतिक कविताएँ दुर्लभ होती जा रही है।

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गिरीश पंकज

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