मंगलवार, 13 अगस्त 2013

महावीर सरन जैन का आलेख - तुलसीदास के राम

तुलसीदास के राम
    प्रोफेसर महावीर सरन जैन

विगत आमचुनावों के पहले कुछ राजनेताओं ने राम सेतु का मुद्दा उछाला था। मैंने अपने एक मित्र को बताया कि पउम चरिउ एवं अध्यात्म रामायण जैसे ग्रन्थों में राम सेतु का जो विवरण मिलता है वह राम चरितमानस से भिन्न है। उन्होंने उत्तर दियाः
“हमें आपकी बात से कोई प्रयोजन नहीं है। इसका कारण यह है कि हमारी श्रद्धा तो केवल तुलसीकृत रामचरितमानस में है”


इस प्रसंग की चर्चा करने का उद्देश्य यह प्रतिपादित करना है कि उत्तरभारत के जनमानस की आस्था तुलसीकृत राम चरितमानस में बहुत गहरी है। आस्था भी ऐसी कि उसके आगे किसी अन्य ग्रंथ की कोई सार्थकता एवं प्रासंगिकता नहीं रह जाती। रामचरितमानस की लोकप्रियता अप्रतिम है। 


रामचरितमानस का सम्पूर्ण प्रयास मानवीय वृत्तियों का उन्नयन करना है, मानवीय भावों का उदात्तीकरण है। यहाँ मैं प्रबुद्धजनों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि रामचरितमानस के कथा-विधान में दो धरातल हैं; दो स्तर हैं। एक धरातल पर राम अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं। इस रूप में राम आम आदमी की भाँति क्रियाएँ करते हैं। उदाहरण के रूप में सीता हरण पर आम आदमी की तरह विलाप करते हैं – “ एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहु महा बिरही अति कामी”। वियोग में इतनी विदग्धता कि पशु पक्षियों से भी सीता के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं –

“हे खग मृग हे मधुकरश्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनयनी”।।


राम का यह रूप आम आदमी के लिए सहज है। इस प्रकार के चित्रण एवं प्रसंग राम-कथा में राम की लीलाएँ हैं; एक अभिनेता का कथा के विभिन्न प्रसंगों के अनुरूप अपने पार्ट का अभिनय करना है। दूसरे धरातल पर राम आम आदमी नहीं हैं; वे परात्पर परब्रह्म स्वरूप हैं। वे भगवान हैं। वे उपास्य हैं। वे आराध्य हैं। राम-कथा का वाचक या रामलीला का दर्शक अभिनेता रूप को ही वास्तविक न समझ बैठे – इस बारे में तुलसीदास पग-पग पर भगवान राम के तात्त्विक स्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं, वाचक एवं दर्शक को सचेत करते हैं। अयोध्या कांड में गुरु वशिष्ठ सबको स्पष्ट करते हैं कि श्रीराम का जन्म सामान्य घटना नहीं है, उनका जन्म लोकमंगल के लिए ही हुआ है –


सत्य संध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतु।।


जैसे किसी भी बालक का नाम-संस्कार होता है, राम का भी नाम-संस्कार होता है। इस अवसर पर भी तुलसीदास गुरु वशिष्ठ के द्वारा सबको राम के वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं कि राम के रूप में जिस बालक ने जन्म लिया है वे कोई बालक नहीं हैं, वे प्रभु हैं जो अखिल लोक दायक विश्रामा हैं –


जो आनन्द सिंधु सुख रासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।
जो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक विश्रामा।।


कितने स्थलों पर तुलसी व्यक्त करते हैं कि “राम कथा जग मंगल करनी”। श्रीराम और सीता का यश समस्त मंगलों की खान है।


विगत दशकों में समाज में राम का अभिनय वाला रूप उभर रहा है या कहें जानबूझकर उभारा जा रहा है। एक अभिनेता विभिन्न फिल्मों में अनेक पात्रों का अभिनय करते हैं। जब हम किसी फिल्म में किसी अभिनेता को फिल्म के पात्र का अभिनय करते हुए देखते हैं तो उस अभिनेता को उस फिल्म के उस पात्र के रूप में समझ बैठते हैं। फिल्म के पात्र का अभिनय करने में एवं जिंदगी में अपने परिवार के साथ जिंदगी जीने वाले व्यक्ति का अंतर स्पष्ट है।

मैं तुलसीदास के रामचरितमानस और भगवान राम के भक्तजनों तथा समस्त प्रबुद्धजनों के लिए तुलसीकृत राम चरितमानस की दोहा-चौपाइयों के आधार पर राम के तात्विक स्वरूप का निरूपण करना चाहता हूँ।

तत्त्व अद्वैत एवं परमार्थ रूप है। जीव और जगत उस एक तत्व 'ब्रह्म' के विभाव मात्र हैं। अध्यात्म एवं धर्म के आराध्य राम तत्व हैं, अद्वैत एवं परमार्थ रूप हैं-
राम ब्रह्म परमार्थ रूपा।
इसी कारण राम के लिए तुलसीदास ने बार-बार कहा है-

' ब्यापकु अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप ।΄

अध्यात्म के मूल्य शाश्वत होते हैं। राजनीति के मूल्य शाश्वत नहीं होते। राजनीति में यदि मूल्य होते भी हैं तो वे तात्कालिक होते हैं। राजनीति में मूल्यविहीनता चिंता का विषय बन गई है। राजनीति में अपराधियों की संख्या में इतनी वृद्धि हो गई है कि देश के उच्चतम न्यायालय को राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कदम उठाना पड़ा है।   राजनीतिज्ञों के लिए भगवान राम साध्य नहीं रह जाते, आराध्य नहीं रह जाते; “ब्यापकु ब्रह्म अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी” नहीं रह जाते; परमार्थ रूप नहीं रह जाते। राजनीतिज्ञों के लिए भगवान राम चुनावों में विजयश्री प्राप्ति के लिए एक साधन हो जाते हैं, उनके नाम पर भोली-भाली जनता से पैसा वसूलकर अपनी तिजोरी भरने का जरिया हो जाते हैं; दूसरों के उपासना केन्द्र के विध्वंस एवं तत्पश्चात विनाश, तबाही, बर्बादी के उत्प्रेरक हो जाते हैं। अध्यात्म के साधक एवं धर्म के आराधक के लिए तो राम त्याग, तपस्या एवं साधना के प्रेरणास्रोत होते हैं; राजनीति के कुटिल, चालबाज, धोखेबाज नेताओं के लिए राम  ́शिलापूजन΄ के नाम से करोड़ों-करोड़ों की धनराशि वसूलने के लिए एक जरिया हो जाते हैं। अध्यात्म के साधक एवं धर्म के आराधक के लिए तो राम  ́अजित अमोघ शक्ति करुणामय΄ हैं, सर्वव्यापक हैं, इन्द्रियों से अगोचर हैं, चिदानन्द स्वरूप हैं, निर्गुण हैं, कूटस्थ एकरस हैं, सभी के हृदयों में निवास करने वाले प्रभु हैं, ́ब्यापक ब्यापि अखंड अनन्ता΄ हैं। राजनीति के कुटिल, चालबाज, धोखेबाज नेताओं के लिए सच्चिदानन्दस्वरूपा राम समाज के वर्गों में वैमनस्य, घृणा, कलह, तनाव, दुश्मनी, विनाश के कारक एवं प्रेरक हो जाते हैं।

राजनीति की कुटिलता, चालबाजी, धोखेबाजी का इससे बड़ा प्रतिमान और क्या हो सकता है कि सत्ता प्राप्ति के पूर्व जिन नेताओं ने राम के नाम की कसमें खाई थीं, सौगंध खा-खाकर बार-बार कहा था- ́सौगंध राम की खाते हैं, मन्दिर यहीं बनाएँगे΄, जन-जन को भावना रूपी सागर की उमगाव एवं उछाव रूपी लहरों से आप्लावित कर दिया था- ́बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का΄ मगर जब राम के नाम के सहारे सत्ता प्राप्त कर ली तो फिर उन राजनेताओं को राम से कोई मतलब नहीं रहा, राम से कोई प्रयोजन नहीं रहा, राम से कोई वास्ता नहीं रहा। राजा दशरथ ने तो राम कथा में राम को वनवास दिया था; राजनीति के इन नेताओं ने तो राम को ही अपने एजेंडे से निकाल फेंका। आखिर क्या कारण है कि जब चुनाव निकट आते हैं तो इन नेताओं को राम के किसी प्रतीक के सहारे अपनी वैतरणी पार करने की सूझती है। देश की जनता से मेरी विनय है कि भगवान राम को राजनीति में सत्ता-प्राप्ति का साधन न बनने दें। भगवान राम साधन नहीं हैं; वे जन जन के लिए साध्य हैं। वे समाज में विनाश के कारक नहीं हैं; वे अखिल लोक के मंगल के कारक हैं। स्वयं तुलसीदास ने भगवान राम के तात्त्विक स्वरूप को अपने ग्रंथ रामचरितमानस में इन शब्दों में व्यक्त किया हैः


भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥
जथा अनेक वेष धरि नृत्य करई नट कोई।
सोई सोई भाव दिखावअइ आपनु होई न सोई।

तुलसीदास की मान्यता है कि निर्गुण ब्रह्म राम भक्त के प्रेम के कारण मनुष्य शरीर धारण कर लौकिक पुरुष के अनुरूप विभिन्न भावों का प्रदर्शन करते हैं।  नाटक में एक नट अर्थात् अभिनेता अनेक पात्रों का अभिनय करते हुए उनके अनुरूप वेशभूषा पहन लेता है तथा अनेक पात्रों अर्थात् चरितों का अभिनय करता है। जिस प्रकार वह नट नाटक में अनेक पात्रों के अनुरूप वेष धारण करने तथा उनका अभिनय करने से वह पात्र नहीं हो जाता; नट ही रहता है उसी प्रकार राम चरितमानस में भगवान राम ने लौकिक मनुष्य के अनुरूप जो विविध लीलाएँ की हैं उससे भगवान राम तत्वतः वही नहीं हो जाते; राम तत्वतः निर्गुण ब्रह्म ही हैं। तुलसीदास ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है कि उनकी इस लीला के रहस्य को बुद्धिहीन लोग नहीं समझ पाते तथा मोहमुग्ध होकर लीला रूप को ही वास्तविक समझ लेते हैं।

आवश्यकता तुलसीदास के अनुरूप राम के वास्तविक एवं तात्विक रूप को आत्मसात करने की है।

भारत के रामभक्त एवं भारतीय समाज के समस्त प्रबुद्धजन स्वयं निर्णय करें कि वास्तविक एवं तात्त्विक महत्व किसमें निहित है- राम की लौकिक कथा से जुड़े प्रसंगों को राजनीति का मुद्दा बनाकर राम के नाम पर सत्ता के सिंहासन को प्राप्त करने की जुगाड़ भिड़ाने वाले कुटिल, चालबाज, धोखेबाज नेताओं के बहकावे में आने की अथवा भगवान राम के वास्तविक एवं तात्त्विक रूप को पहचानने की, उनको आत्मसात करने की, उनकी उपासना करने की, उनकी लोक मंगलकारी जीवन दृष्टि एवं मूल्यों को अपने जीवन में उतारने की।


परहित सरिस धरम नहीं भाई। परपीड़ा सम नहीं अधमाई।।

 


प्रोफेसर महावीर सरन जैन
(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)
123, हरि एन्कलेव
चाँदपुर रोड
बुलन्द शहर 203 001
mahavirsaranjain@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. ---एक हे बात सही है---
    उनकी लोक मंगलकारी जीवन दृष्टि एवं मूल्यों को अपने जीवन में उतारने की।

    - अन्यथा बाके सारा आलेख राजनैतिक कथ्य ही है ..लेखक क्या कहना चाहता है स्पष्ट नहीं है...




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