रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - नयी माँ

सिन्धी कहानी

नयी माँ

clip_image002 -देवी नागरानी

एक ही रात में वह माँ बन गई। सौतेली ही सही, पर पदाधिकारिणी हुई वह दो बेटियों की। यह वरदान उसे विरासत में मिला। ममता कैसे झोलियाँ भरती है, बच्चे की किलकारियाँ क्या होती है, छाती से दूध की धारें किस तरह छलकती है, कुछ भी जाने बिना वह माँ बन गई। नियति का वरदान !

बड़ी बेटी रचना अपनी नई माँ के मनोभाव समझ पा रही थी, जो इस महाद्वंद्व के पाटों के बीच कशमकश के दौर से गुज़र रही थी। कला, हाँ कला ही उसकी नई माँ का नाम था। सुगठित बदन, गोरा रंग, तीखे नयन-नक्श, एक कलात्मक मूर्ति की छटा व आभा लिये हुए वह अंधेरों में उजाला भरने की क्षमता रखने वाली एक अधखिली नवयुवती, जो उम्र में उससे आठ साल छोटी और उसकी बहन कमल की उम्र से आठ साल बड़ी।

रचना घर की बड़ी बेटी होने के नाते संबंधों केा जानती थी, रिश्तों के बीच के रख-रखाव को पहचानती थी। सगी माँ बीमार थी, इलाज किया गया, पैसा पानी की तरह बहाया गया। पर पैसा जीवनदान कहाँ दे पाता है ? संसार में तमाम साधन जुटाने में पैसा सहयोग देता है। उसी पैसे के ज़ोर पर पुरानी माँ की मौत के कुछ अरसे बाद ही नई माँ आ गई। पिता ने नई माँ को लाने में जितनी जल्दी की, अपनी बच्चियों के साथ संबंध जोड़ने में उतनी ही देर लगा दी। वह मर्यादा जो रिश्तों को जोड़ती है, वही शायद पिता के जीवन का हिस्सा न बन सकी। रिश्तों का टूटना और जुड़ना एक व्यावहारिक चलन-सा बन गया उनके लिये। रिश्तों का निबाह और निर्वाह क्या है, यह उनकी फ़ितरत में शामिल ही न था। था तो बस लोकलाज, बैठकों में मान-मर्यादा, दिखावे की चमक-दमक और हर वह साधन, जो उनके निजी सुखों में बढ़ोत्तरी ला सके।

‘‘रचना कभी-कभी अपनी नई माँ का काम में हाथ बंटा दिया करो, उसे थोड़ा वक़्त लगेगा सीखने में... और तुम...।’ पिता का आदेश था प्यार-रहित, अपनेपन से खाली। वह आदेश कम, एक हुकुमनामा था जो न जाने किस रवायत की तहत वे परिवार के सदस्यों पर थोपते रहे, हमेशा की तरह... जैसे वे नई माँ के पहले सगी माँ को भी आदेश स्वरूप दिया करते थे।

‘‘आप अपनी नई बीवी की बात कर रहे हैं?’’ रचना ने करारे कटाक्ष के साथ वार किया। वातावरण में जितनी भी वह तब्दीलियाँ देखती उतनी ही उसकी बाग़ी सोच प्रतिक्रिया में पेश करती।

‘‘हाँ तुम्हारी नई माँ की ही बात कर रहा हूँ। अच्छा होगा जो तुम इस नए और पुराने रिश्ते की झीनी दीवार तोड़कर उसे माँ कहकर संबोधित करो।’’ पिता ने अपने गर्म तेवर ज़ाहिर करते हुए कहा।

‘‘पर मैं उसे न माँ मानती हूँ, और न उसे माँ कहकर पुकार सकती हूँ। वह तो उम्र में भी मुझसे आठ साल छोटी है। खूंटे से बांधकर आपने बस उस के साथ एक रिश्ता जोड़ लिया, एक नाम दे दिया - जाने किस स्वार्थ के कारण...!’’

‘‘रचना, अपनी सोच को भटकने न दो...।’’ पिता ने अस्पष्ट शब्दों में विरोध किया।

‘‘रिश्ता जोड़ना एक बात है, उसे निभाना एक और बात... और उसे परिपूर्ण करने के लिये आपको अपने बच्चों का सहयोग लेना पड़े, यह न तो उचित है और न ही शिष्टाचार के लिहाज़ से सही।’’ कहकर रचना बेरुख़ी से चलने को हुई।

‘‘रुको... तुम माँ को माँ नहीं मानती, क्या यही कहना चाहती हो तुम।’’

‘‘नहीं, कहना तो नहीं चाहती, पर कहे बिना रह भी नहीं सकती। आप मुझे यह अहसास दिलाने की कोशिश न करें कि जो रिश्ते आप मुझ पर थोपेंगे, वो मुझे या कमल को मान्य होंगे ? मुझे अच्छे-बुरे की पहचान है, भले-बुरे में फ़र्क समझती हूँ। इस घर की बेटी की उम्र से छोटी उम्र वाली किसी और घर की बेटी को आप ब्याह कर लाए है और अब आप मुझे इस बात के लिये किसी तनावपूर्ण स्थिति में न डालें तो बेहतर होगा। उन नवव्याहता लड़की का अपनी सोच पर पूरा अधिकार होना चाहिए, मैं उसके दायरे में अपनी सोच से दख़ल नहीं देना चाहती।’’

परिपक्व सोच की मालकिन रचना अभी तक उस सच को स्वीकार नहीं पा रही थी। प्यार और मजबूरी, न्याय और अन्याय का हर सफ़्आ अपनी कहानी कह रहा था। औरत अपनी सत्ता का प्रमाण कब तक देती रहेगी ? क्या उसकी मर्ज़ी मर्दों की मनमानियों की डगर पर सर फोड़कर रह जाएगी ? क्या उसकी चाहत पुरुषवादी सत्ता की दलदल में धंसती रहेगी ?

माँ की मौत ने रचना के मन को गहरी चोट पहुँचाई और थोड़े ही वक्त में पिता का नई माँ को ले आना एक और वार रहा। चोट दर्द का अहसास दे जाती है और यही अहसास बहुत कुछ समय के पहले सिखा भी देता है - प्यार, नफरत, ईर्ष्या, स्नेह, घृणा, ममत्व। जहाँ हर चेहरा बेनक़ाब-सा हो जाता है। समझौते के नाम पर रिश्ते नंगे हो जाते हैं। यही बाग़ी सोच रचना के भीतर बवंडर बनकर रवां हो रही थी। अब संवेदना दिल को कहाँ ढांढस बंधा पाती है। एक समाधान की जांच-पड़ताल यादों में अधूरी ही रहती है तो दूसरी घटना संपूर्ण हो जाती है। एक कांड के पीछे एक और कांड इस रफ़्तार से सामने आते हैं कि हल अधूरे के अधूरे समाधानों के अंधेरे में खो जाते हैं।

‘‘आपकी चाय लाई हूँ’’ विनम्र सुलझा हुआ स्वर सुना। सोच से पैदा हुई मन की कड़वाहट, गर्म चाय की भाप की तरह रफ़ूचक्कर हो गई। देखा, कला चाय पास वाली तिपाई पर रखकर जाने को मुड़ी।

‘‘सुनो’’ और आगे रचना कुछ कह न पाई।

‘‘जी’’ यह कला का स्वर था, जो अपने अंतर्द्वन्द्व में उलझी हुई थी कि रचना को वह कैसे संबोधित करे। कैसे बात करे ? कैसे उसे विश्वास दिलाए कि वह उसकी और कमल की मानसिक स्थिति से वाक़िफ़ है, मन के विचारों की उलझन जानती है, उनका दुख-दर्द बाँट सकती है, उनकी सखी बन सकती है। पर नयी माँ के रूप में शायद उनकी आशाओं पर पूरी उतरने में सफ़ल न हो पाए।

कला का बचपन बीतने पर, जवानी बिना आहट आई और बहार आने के पहले पतझड़ साथ लाई।

‘‘बेटी अब तू स्कूल न जाया कर, घर का कामकाज सीख ले, आगे काम आएगा। ’’ - माँ ने कहा था।

‘‘पढ़ना भी तो काम आएगा कि नहीं माँ ? घर का काम तो औरत को ता-उम्र करना होता है और हर लड़की जब औरत बनती है तो वह सहज ही उसे अपनी ज़रूरतों के आधार पर सीख लेती है। ’’ - कहकर कला ने पुस्तकें उठाईं और छत पर पढ़ने के लिए क़दम आगे बढ़ाया।

‘‘अरी सुन, अनसुना न किया कर ! तेरे बाबूजी कहीं बातचीत चला रहे हैं। अच्छे घर का आदमी है।’’

‘‘आदमी...!’’ और कला की चुप्पी में अनगिनत सवालों ने दम तोड़ दिया।

‘‘अरे हाँ, वह सेठ दयालराय जिसकी पत्नी दो माह पहले गुज़र गई। इतना बड़ा कारोबार, हाट-हवेली, दो बेटियाँ हैं पर घर का वारिस नहीं है। कोई तो हो जो इस सारे विस्तार की बागडोर संभाल ले। ऐसे ही तो नहीं बीतेगा यह अस्त-व्यस्त जीवन। अगर तेरी बात वहाँ पक्की हो जाए, तो फिर तेरे वारे-न्यारे हो जाएँगे और हम भी सुख की सांस ले पाएँगे। तेरे पीछे दो बहनें और भी तो है। मुझे विश्वास है यह रिश्ता उनके लिये भी स्वर्ग का द्वार खोल देगा।’’ कहकर माँ ने दोनों हाथ जोड़कर न जाने मन में कौन-सी मन्नत माँगी।

छत की ओर जाती सीढ़ी पर पांव धरा ही न था कि ठिठक कर रुक गई कला, कलावती कमलाप्रसाद - यही नाम उसके स्कूल के दाख़िले के वक़्त रजिस्टर में दर्ज हुआ था। यादों की दीवारें शीशों की होती है। झीनी-झीनी-सी नाज़ुक वे यादें कभी बिना चोट के चूर-चूर होने की तबीयत रखती है, बेआवाज़ ही भरभरा कर रह जाती है। माँ की ओर देखते हुए कला सोचती रही। नाम की पहचान क्या सिर्फ़ पिता के नाम से होती है, जन्मदातिनी माँ क्या सिर्फ़ नाम की माँ होती है, जो बच्चों पर अपना सर्वस्व तो लुटाती है, पर अपना नाम तक नहीं दे पाती। उनकी पहचान नहीं बन सकती। यह कैसी धारणा है, कैसी रीति है कि मर्द, सिर्फ़ मर्द ही हर लड़की की पहचान का बाइज़ हो... कभी पिता, कभी भाई, कभी बेटा और कभी पति बनकर।

“माँ क्या औरत की पहचान का कोई वजूद नहीं है?”। कहना चाहकर भी कला कह न पाई। सीढ़ी पर पांव धरते ही सोचा हर औरत को अपनी पहचान बनाने का, खुद का जीवन सजाने-संवारने का पूरा अख्तियार होना चाहिए। पर क्या पुरुष प्रधान समाज में औरत अपनी कोई पहचान नहीं पाती ? नारी की संपूर्णता माँ होने में है और वह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। यही मातृत्व ही तो उसे अपनी पहचान और परिपूर्णता देता है। अपनी निर्णयात्मक सोच पर और भावनाओं पर उसका पूरा अधिकार होना चाहिए। ‘‘अरे भाग्यवान सुनती हो। कल शाम कला का रिश्ता सेठ दयालराय जी के साथ शगुन के साथ तय होगा। वे शगुन लेकर पाँच बजे आएँगे। देखना स्वागत में कोई कमी कसर न रहे।’’ कहते हुए कमला प्रसाद अपनी धोती का पल्लू संभालते हुए अपने कमरे की ओर गए और कला के पांव आगे बढ़ने के बजाय जाने कितनी सीढ़ियाँ पीछे की तरफ लांघ आए।

कुछ टूटकर बिखरा। वो क्या था ये नहीं जाना। जो कुछ भी हुआ वो न जाना पहचाना अहसास था, न अपना ! दिल अपने भीतर के खालीपन में डूबता चला गया और तीरगी के साये पल-पल गहरे होते रहे। ज़िन्दगी की रौनकें पल में फीकी पड़ गईं। बुझे चराग़ों की तरह इच्छाओं की आहटें सहम गई , दिल पर दस्तक देना भूल गई। फूल खिलने के पहले मुरझाने लगे, अनसुनी रह गई राग की बांसुरी, अनछुई रह गई फूल की पांखुरी। खामोश दर्द की सिसकियाँ कौन सुनता ? इन रिश्तों के बाज़ार में लेने-देने के सिलसिलों में पिस जाती है बेटियाँ, उनका समस्त अस्तित्व, उनकी ज़िन्दगी की पहचान एक विवाद पर आकर ठहर जाती है।

‘‘आप भी अपनी चाय यहीं ले आएँ, साथ में पिएँगे !’’

यह रचना का कोमल स्वर था। जब रिश्ते जुड़ जाते हैं तो चाहकर भी उन्हें तोड़ा नहीं जाता, बस निभाने की रवायतें अपनानी पड़ती है। वैसे भी स्त्री की लड़ाई उसके अपने आसपास की परिस्थितियों के कुचक्र में फँसी रहती है, जिससे वह मुक्ति पाना चाहती है। हालात की समूची चुनौतियों को स्वीकारना शायद अपनी नियति समझ बैठी है।

कला को लगा जैसे वह घुटन के चक्रव्यूह से आज़ाद हो गई हो। मन के वाद-विवाद की क़ैद से निकलकर आज़ाद माहौल में आ गई और मुक्ति का द्वार उसे आलिंगन में लेने को आतुर था। क्षण भर में वह ‘नयी ’ न रहकर पुरानी हो गई।

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