रविवार, 6 अक्तूबर 2013

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 8 - त्याग

8. त्याग

त्याग के आयाम बहुमुखी हैं। इसी कारण इसके अर्थ एवं भाव भी अनेक हैं। लौकिक दृष्टि से त्याग का प्रयोग किसी व्यक्ति के द्वारा अपनी वस्तु का दान करने के सन्दर्भ में होता है। जब हम दान एवं त्याग के अर्थों में अन्तर करते हैं तो दान बाह्य क्रिया का वाचक अधिक है, जबकि ‘त्याग’ में व्यक्ति की मानसिक स्थिति एवं आंतरिक प्रक्रिया पर बल है।

आध्यात्मिक दृष्टि से साधना की अवस्था में ‘त्याग’ का अर्थ भोगों का एवं परिग्रहों का त्याग है। सिद्धि की अवस्था में ‘त्याग’ आत्मा का स्वभाव है।

परद्रव्यों के प्रति ममत्व के त्याग के कारण साधक भोगों से उदासीन हो जाता है। इस दृष्टि से त्याग का अर्थ दान मूलक न होकर ‘परित्यक्ति मूलक’ है। इस धरातल पर त्याग करनेवाला अपने पास से संचित वस्तु, पदार्थ, औषधि, ज्ञान का कुछ अंश दूसरों को दान में देकर ही सतुष्ट नहीं हो जाता, प्रत्युत वह लोभ, मोह आदि विकारों अर्थात आभ्यन्तर-परिग्रहों का त्याग करता है। इस दृष्टि से तप की अग्नि में विकारों को जलाना ‘त्याग’ है। त्याग आत्मविजय की आभ्यन्तर क्रिया है। तप से आत्मप्रकाश ज्योतित होता हैं। त्याग से पर को छोड़ने की भावना उत्पन्न होती है। त्याग का सम्बन्ध व्यक्ति की मानसिकता से है, जिससे उसका पर-द्रव्यों के प्रति मोह नहीं रह जाता। गीता में जिस ‘निष्काम-कर्मयोग’ का प्रतिपादन है, वह त्याग की इस अर्थवत्ता के निकट है। इसी कारण गीताकार ने कर्मों में होने वाली ‘फलासक्ति’ के त्याग को ‘त्याग’ माना है।

साधना की अवस्था में त्याग की अंतिम मंजिल आत्मदर्शन है। चेतना या आत्मा स्वभाव से त्याग स्वरूप है। वह आत्मा के अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थो को अनात्मा मानता है। इस कारण जब साधक ‘सिद्ध’ होता है तो ‘पर’ का त्याग कर चुका होता है। इस स्थिति में ‘त्याग’ क्रिया नहीं रह जाती, स्वभाव बन जाता है। मोक्ष का अर्थ है - अकर्मा होना।

त्याग का विरोधी भाव लौकिक दृष्टि से वस्तुओं का संग्रह तथा आत्मिक दृष्टि से लोभ एवं मोह के कारण विकार-मूलक परिग्रहों के प्रति आसक्ति है।

इस जीवन में व्यक्ति इन्द्रियों द्वारा भोगों को प्राप्त करना चाहता है। इस कारण वह भोग की सामग्रियों का संग्रह करता है। संग्रहवृत्ति के कारण उसके मन में वस्तुओं के प्रति आसक्ति बढ़ती है। इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होतीं। इस कारण तृष्णा पैदा होती है। तृष्णा के अनुरूप जब वह वस्तुओं का संग्रह नहीं कर पाता तो असन्तोष एवं निराशा होती है। इस प्रकार त्याग की विरोधी स्थिति में तृष्णा, आसक्ति, असन्तोष एवं निराशा के भाव विकसित होते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से कर्म-पुद्गलों के भार से लदा मानव आत्म-ज्योति की मंजिल तक पहुँचने में असमर्थ होता है। ‘पर’ को ही अपना समझने के कारण उसमें आत्म-संकोच होता है। परिणामस्वरूप कषायों का निर्माण होता है। वह कर्म-बन्धन में बन्ध जाता है। संक्षेप में कर्मबन्धन के कारण दो हैं: (1) कषाय (2) योग। संसारी जीव योग एवं कषाय के द्वारा कर्म का बंध करता है। इनमें भी यदि जीव कषाय रहित हो जाता है, आत्म परिणामों में हुई मलिनता को समूल नष्ट कर शुद्ध चैतन्य स्वरूप हो जाता है तो ‘योग’ की प्रक्रिया तो होती है किन्तु नये कर्म का बन्ध नहीं होता है। ‘ जो आत्मा अपने भीतर में राग-द्वेष रूप भाव कर्म नहीं करता उसे नये कर्म का बन्ध नहीं होता’ (अकुव्वओ णवं णत्थि।) (सूत्र कृतांग, 1/15/7)

‘बंध के कारण मूल में जीव के राग द्वेष आदि विकार भाव होते हैं। जब राग द्वेष आदि विकार भाव नष्ट हो जाते हैं तब वीतरागी एवं सम्यग् दृष्टि वाले जीव के बंध नहीं होता। केवल योग जन्य आस्रव भाव होता है। (आचार्य कुंदकुंदः समयसार, गाथा 171-172)

त्याग के लिए आत्मा एवं अनात्मा के भेद का ज्ञान आवश्यक है। इस ज्ञान के कारण मन में पर-पदार्थों के प्रति वैराग्य भावना उत्पन्न होती है। पदार्थों के प्रति विरक्ति से त्याग भाव की उत्पत्ति होती है।

सामाजिक दृष्टि से त्याग की उत्पत्ति के लिए प्रेम, दया एवं करुणा का महत्व है। त्याग के विकास के लिए मन की उदात्ता एवं उदारता आवश्यक है। ऐसी स्थिति में किसी की पीड़ा को देखकर हृदय में करुणा एवं दया के भाव उत्पन्न होते है तथा हम धन से, वस्तु से, पदार्थ से, उसकी सहायता करते है। करुणा एवं दया के अतिरिक्त प्रेम सम्बन्धों में व्यक्ति अपने पास की वस्तु को अपने साथी को प्रदान करता है। उसके जीवन में उत्सर्ग की भावना विकसित होती है। प्रेम में हमारा आकर्षण वस्तु की अपेक्षा प्रिय से हो जाता है। उदाहरणार्थ, प्रसाद ने अपने एक पात्र से कहलवाया है- ‘प्रत्येक हृदय में एक बार प्रेम की दीपावली जलती है जिसमें हृदय हृदय को पहचानने का प्रयत्न करता है, उदार बनता है और सर्वस्व अर्पण करने की भावना रखता है’। (देखें – ध्रुवस्वामिनी)

त्याग-भाव के विकास में मार्दव, शौच एवं संयम सहायक होते हैं। मार्दव से व्यक्ति का अहंकार समाप्त होता है। उसकी दृष्टि व्यापक बनती है। आत्मतुल्यता की चेतना का विकास होता है। शौच के कारण लोभ की प्रवृत्ति का अन्त हो जाता है जिससे त्याग की भावना का विकास होता है।संयम द्वारा व्यक्ति जोड़ने की प्रवृत्ति को सीमित करता है। पदार्थों के प्रति आसक्ति भाव को नियंत्रित करता है। त्याग में वह अपने पास के पदार्थों को दूसरों को प्रदान करता है। संयम के द्वारा त्याग की भावना का विकास होता है तथा त्याग के कारण संयम की साधना बलवती एवं दृढ़ होती है।

तप एवं त्याग का गहरा सम्बन्ध है। तप में व्यक्ति पूर्व-संचित कर्मों का क्षय करता है। पर के प्रति आसक्ति ही कर्मों के आस्रव का मूल कारण है। जब तप के द्वारा आसक्तियों का अन्त होता है तो त्याग की भावना का परिपाक होता है। जब पर-पदार्थों के त्याग की भावना का संचार होता है तो उनके प्रति मन में आसक्ति के अंशों का नाश होता है। तप की साधना में त्याग-भाव की इसी कारण प्रधानता है। वस्तुतः

आध्यात्मिक दृष्टि से ‘त्याग’ तप की और ‘आकिंचन्य’ त्याग की ऊर्ध्वगामी स्थितियाँ हैं।

इस प्रकार ‘त्याग’ तप एवं आकिंचन्य की मध्यस्थ स्थिति है। तप के द्वारा राग-द्वेषों से शून्यता होती है। त्याग के द्वारा आत्मा अपरिग्रह से संवलित होती है। पूर्ण आकिंचन्य की स्थिति में पहुँच कर तन, मन, धन किसी के प्रति कोई मोह शेष नहीं रह जाता।

त्याग एवं अपरिग्रह परस्पर पूरक हैं। अपरिग्रह में परिग्रह का निषेध है। त्याग में अपनी वस्तु को दूसरों को दान करने की सामाजिक चेतना भी है। व्यक्ति त्याग के द्वारा परिग्रह का नाश करता है एवं अपरिग्रह का पालन करता है। आध्यात्मिक दृष्टि से त्याग अपरिग्रह तक पहुँचने का साधन है। त्याग से ही व्यक्ति में समाज के अन्य सदस्यों के लिए उत्सर्ग भाव का उदय होता है।

त्याग के पालन से आत्मदृष्टि का विकास होता है। वैराग्य, ममत्वहीनता, रागशून्यता एवं अपरिग्रह की वृतियाँ पनपती हैं। सामाजिक दृष्टि से त्याग से सामाजिक वृत्ति का उन्मेष होता है। पर हित की भावना का विकास होता है जिसे तुलसीदास धर्म मानते हैं : ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई।’

इस दृष्टि से त्याग की विशिष्ट भूमिका है। क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, आकिंचन्य एवं ब्रहाचर्य, इन सबके द्वारा व्यक्ति आत्म-संशोधन एवं साक्षात आत्म कल्याण करता है, अप्रत्यक्ष रूप में पर कल्याण का निमित्त भी बनता है, जबकि त्याग में प्रत्यक्ष रूप से दूसरों को देने की भावना निहित है। समभाव की साधना तभी विकसित हो सकती है जब व्यक्ति दूसरों को अपने जैसा समझता है। त्याग के द्वारा करुणा का विस्तार होता है। दूसरों जीवों को आत्मतुल्य समझने के कारण व्यक्ति हिंसा का त्याग करता है और अहिंसा का पालन करता है। वह यह मानता है कि प्राणी मात्र जीवित रहने की कामना रखता है। मुझे अपना जीवन प्रिय है, दूसरों को भी अपना जीवन प्रिय है। मुझे दुःख अप्रिय है, दूसरों को भी दुःख अप्रिय है। इस प्रकार समभाव एवं आत्मतुल्यता की चेतना का विकास होने पर व्यक्ति अहिंसक होता है। त्याग उसका स्वभाव हो जाता है।

सामाजिक दृष्टि से त्याग के पालन से व्यक्ति के जीवन में सन्तोष एवं शान्ति का पोषण होता है। दया एवं सेवा की भावना का विकास होता है। उसका चित्त उदार बनता है। सहिष्णुता की भावना विकसित होती है।

सामाजिक जीवन की दृष्टि से त्याग की तीन प्रमुख कोटियाँ हैं:

1. अधम, 2. मध्यम, 3. उत्तम।

जब कोई व्यक्ति किसी भय के द्वारा अथवा स्वार्थ की भावना के कारण अपनी वस्तु का दान करता है, तो वह अधम त्याग है। यह धर्म नहीं है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति तस्करी का माल ला रहा है। उसे पता चलता है कि पुलिस के द्वारा उसकी तलाशी ली जाने वाली है। भय के कारण वह तस्करी के माल को अपने से अलग कर देता है या किसी दूसरे को दे देता है। इसमें वस्तु को अपने पास से अलग करने की अथवा दूसरे को दे देने की प्रकिया तो है, किन्तु यह कार्य उसने भय की भावना तथा पुलिस से अपने को बचाने के उद्देश्य से किया है। इस कारण यह अधम कोटि का त्याग है। इस प्रकार का त्याग नैतिक दृष्टि से कोई मूल्य नहीं रखता। इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति अपनी लोक प्रसिद्धि या किसी कामना की पूर्ति को ध्यान में रखकर दान देता है वह भी इसी कोटि के अन्तर्गत आता है।

जब व्यक्ति किसी दूसरे के दुःख को देखकर विचलित हो जाता है तथा अपनी वस्तु का दान कर देता है तो इस प्रकार का त्याग मध्यम कोटि का है। इसमें व्यक्ति करुणा, प्रेम अथवा दया के भावों से प्रेरित होकर त्याग करता है।

मन की सहज भावना से प्रेरित होकर किए जाने वाला त्याग उत्तम त्याग है। इसमें त्याग करना जीवन का स्वभाव बन जाता है।

उत्तम त्याग में व्यक्ति अपनी कीर्ति, प्रशंसा एवं यश की कामना नहीं करता। इसीलिए यह कहा गया है ‘पूयणट्ठी जसोकाम, माण संमाण कामए। बहुं पसवई पावं माया सल्लं च कुव्वइ - ‘जो साधक पूजा-प्रतिष्ठा के चक्कर में पड़ा है, यश का कामी है, मान-सम्मान का पिपासु है, वह अनेक प्रकार का दम्भ रचता हुआ बहुत पाप कर्म का संचय करता है। (दशवैकालिक, 5/2/35)।

मुनि जीवन में व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का परित्याग कर चुका होता है। भौतिक पदार्थों को छोड़ने के बाद उसकी आध्यात्मिक साधना का आरम्भ होता है। इस धरातल पर त्याग के दो स्वरूप हैं: (1) बाह्य त्याग (2) आभ्यंतर त्याग। साधक समय की अवधि निर्धारित कर भोजन का त्याग करता है, भोजन की मात्रा घटाता है तथा भोजन में अनेक रसों का त्याग कर देता है। इसे कायिक बाह्य त्याग कहा जा सकता है। साधक असत्य वचन, तिरस्कारमय वचन, दूसरों को अप्रिय लगनेवाले वचन, कर्कश कठोर वचन, अविचारपूर्ण वचन, शांत हुए कलह को बढ़ाने वाले वचन- ऐसे सभी वचनों का परित्याग कर देता है। वाचालता को त्याग देता है। इसे वाचिक बाह्य त्याग कह सकते हैं।

आभ्यंतर त्याग में साधना के आरम्भ में व्यक्ति पहले लोभ, मोह आदि विकार मूलक परिग्रहों का परित्याग करता है। इसके बाद वह बाह्य ध्येयों से दृष्टि को हटाकर अन्त में शरीर से चेष्टाओं का त्याग, वाणी से वचनों का त्याग, तथा मन से चितवन का त्याग कर आत्मा में निरत हो जाता है।

त्याग का महत्व सभी धर्म एवं दर्शन परम्पराओं में मान्य है। दुखों का मूल इच्छा है। इच्छाओं का त्याग ही वास्तविक त्याग है। किसी ने इच्छा को तृष्णा, किसी ने माया, किसी ने वासना, किसी ने अज्ञान तथा किसी ने कर्म पुद्गलों के आस्रव का कारण माना है। बौद्ध दर्शन में भव चक्र की बाह्य श्रृंखलाओ में इच्छा को प्रथम माना गया है। योगियों ने उन्मनी भाव को आत्म-दर्शन का सर्वोच्च पथ माना है। उन्मनी भाव का अर्थ है मन या इच्छा का उन्मूलन। मन या इच्छा के विनाश से सृष्टि का विनाश होता है। इसलिए मन को ही बन्धन और मुक्ति दोनों का हेतु माना गया है। मन की कामनाओं का त्याग ही योगियों की दृष्टि में सबसे महान त्याग है। ईसा के वचन ‘अपना निषेध करो’ का भावार्थ भी ‘अहंकार’ का ही त्याग है।

भक्ति साधना में भी त्याग को साधना का अनिवार्य अंग माना गया है। अभिमान, दंभ, सुख-दुख, इच्छा, लाभ-हानि, कामना आदि का त्याग साधना पथ में अनिवार्य है।

गीता में त्याग को ‘दैवी संपदा’ कहा गया है। जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने भी स्वीकार किया है कि ‘इच्छाओं का त्याग ही सत्य का प्रवेश द्वार है’। यह तत्व दर्शन का वास्तविक मार्ग है। इसी कारण आध्यात्मिक साधना के समस्त सन्तों ने त्याग पर बहुत बल दिया है। सत्य के साधक को बार-बार बाहरी प्रभोलन अभिभूत करते हैं। इसी कारण सन्तों ने कामनाओं का सर्वथा त्याग करके मुक्ति पथ पर बढ़ने के लिए कहा है: ‘अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि’। (कबीर ग्रंथावली, साखी 668)।

त्याग ही सृष्टि अथवा सम्पूर्ण सृजन का आधार है। प्रकृति का विधान त्याग पर ही आधारित है। सूर्य प्रकाश देता है, पुष्प सुगंध देते हैं, वृक्ष फल देते हैं, नदियाँ जल प्रदान करती हैं तथा पृथ्वी अन्न देती है। प्रकृति का त्याग निष्काम है। कवीन्द्र रवीन्द्र ने इसी को ध्यान में रखकर कहा है: ‘हे प्रभु, तुम इस विनाशशील पात्र को बार-बार खाली करते हो एवं पुनः नये-नये जीवन से भर देते हो।’

समाज विद्वान का आदर करता है, त्यागी की पूजा करता है। महावीर, बुद्ध, राम, सुकरात, ईसा की पूजा उनकी त्यागमयी साधना के कारण की जाती है।

त्याग से मानवीयता का विकास होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्ति को मानसिक शान्ति प्राप्त होती है। उसके हृदय में दूसरों के लिए कोमल भावना का संचार होता है। स्वार्थ वृत्ति के स्थान पर परहित की भावना का विकास होता है। सामाजिक दृष्टि से त्याग वृत्ति के कारण अनेक सामाजिक कार्य सम्पन्न होते हैं। जब समाज के व्यक्तियों में त्याग की भावना रहती है तो समष्टिगत कल्याण की अनेक योजनाएँ बिना राज्य शक्ति की सहायता से सम्पन्न हो जाती हैं। समाज के सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा त्याग करते रहने के कारण दीन-दुखी वर्ग को सहायता मिलती है, उनकी समस्याएँ कम होती हैं तथा आर्थिक विषमतायें कम होती हैं।

त्याग करते रहना आवश्यक है। यदि नदी संचय ही करती रहे तथा त्याग न करे तो उसका परिणाम क्या होगा? उसके तटों की सीमाएँ टूट जायेंगी। व्यक्ति संग्रह ही करता रहे तथा त्याग न करे तो उसका परिणाम क्या होगा। संयम एवं सन्तोष के तटों की सीमाएँ टूट जायेंगी। तृष्णा-वृत्ति बढ़ती जायेगी। उदारता एवं सहिष्णुता की प्रवृत्तियाँ निर्मूल हो जायेंगी। जिस व्यक्ति की आदत केवल जोड़ते रहने की हो जाएगी उसकी लालसा बढ़ती जाएगी। कामनाओं का चूँकि कोई अंत नहीं है, इस कारण ऐसा व्यक्ति हमेशा अतृप्ति का अनुभव करेगा। अतृप्ति के विकास से उसमें अनेक मानसिक कुंठाएँ उत्पन्न होंगी। जिस समाज के बहुसंख्यक सदस्यों में यह प्रवृत्ति बढ़ जाएगी, उस समाज में आर्थिक वैषम्य अपनी चरम सीमा पर पहुँच जायेगा।

आधुनिक जीवन में त्याग का महत्व पहले की अपेक्षा अधिक है। पहले के व्यक्ति और आज के व्यक्ति की विचारधारा में अन्तर है। पहले का व्यक्ति अपने वर्तमान जीवन के अभावों को विगत जीवन के कर्मां का परिणाम मानकर सन्तुष्ट हो जाता था। आज का व्यक्ति इसी जीवन में साधनों के उपभोग की माँग कर रहा है। अब वह भाग्य के सहारे अभावों की जिन्दगी जीने के लिए तैयार नहीं है। वह समाज से अपनी सत्ता की स्वीकृति चाहता है, अस्तित्व के लिए साधनों की माँग कर रहा है। इस कारण आज आर्थिक विषमताओं को कम करना सामाजिक शान्ति एवं व्यवस्था की दृष्टि से आवश्यक है।

साधन-सम्पन्न व्यक्ति यदि त्याग वृत्ति के द्वारा यह कार्य सम्पन्न नहीं कर पायेंगे तो जो वर्ग साधनों से विहीन है, जिस वर्ग के पास रहने के लिए मकान नहीं है, खाने के लिए रोटी नहीं है, वह शान्त नहीं बना रह सकता। वह आज पुराने युग के आदमी की भाँति धैर्य धारण नहीं करेगा, विद्रोह करेगा। वह सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास करेगा। हिंसा का सहारा लेगा। सामाजिक जीवन में संघर्ष बढ़ेगा। ऐसी स्थितियों में नक्सलवाद आसानी से अपने पैर पसारने लगता है अपने आप किसी वस्तु को देने से मन में सन्तोष होता है। दूसरों के द्वारा वस्तु को बलपूर्वक छीन लिए जाने से दुःख, आक्रोश, एवं अपमान-बोध होता है।

इस प्रकार त्याग व्यष्टिजन्य स्वार्थ को तिरोहित कर, आत्मज्योति को तो प्रदीप्त करता ही है, परार्थ की वृत्ति का उन्मेष कर, सामाजिक समस्याओं का अहिंसात्मक समाधान भी प्रस्तुत करता है। ------------------------------------------------------------------

कहं न कुज्जा सामण्णं, जो कामे न निवारए।

जो अपनी कामनाओं का निवारण नहीं कर पाता, वह साधना कैसे कर सकता है।

विणीय तण्हो विहरे। (मुमुक्षु तृष्णा रहित होकर विचरण करे)।

कामे कमाहि कमियं खु दुक्खं। (कामनाओं को दूर करो, दुख दूर हो जाएँगे)।

साहीणे चयइ भोए, से हु चाह त्ति वुच्चई।

स्वाधीनतापूर्वक भोगों का त्याग करने वाला त्यागी कहलाता है।

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