रविवार, 6 अक्तूबर 2013

शक्ति प्रसंग - दुर्गा सप्तशती के नौ पाठ

शक्‍ति प्रसंग

दुर्गा सप्‍तशती के नौ पाठ

मनोज कुमार श्रीवास्‍तव

क्रम

स्त्री लोरी भी है, प्रभाती भी/

स्त्री दिव्यांशों का समुच्चय/

स्त्री पदार्थ नहीं/

सरस्वती/

प्रकृति/

युद्ध और स्त्री/

स्त्री और कला/

सत्ता/

विविधा/

शक्‍ति-प्रसंग

दुर्गा सप्‍तशती के नौ पाठ

मनोज कुमार श्रीवास्‍तव

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स्त्री लोरी भी है, प्रभाती भी
महाकवि निराला ने जब राम की शक्ति-पूजा लिखी तो उन्होंने जाम्बवान, जो हमेशा से ही प्रबोधन और जागरण के, चैतन्य और नवोन्मेष के प्रतीक पुरुष रहे हैं, से कहलवाया कि हे रघुनन्दन! तुम शक्ति की मौलिक कल्पना करो। निराला के राम यह कल्पना कर पाते हैं लेकिन हमारे समय में भी ऐसी ही मौलिक कल्पना की जरूरत शक्ति के संदर्भ में है। यह भ्रूण हत्या का समय है इस समय की आधुनिकता बस इसमें है कि इसने विलियम बेंटिक के समय की शिशु-हत्या को भ्रूण-हत्या में बदल दिया है रक्तबीज को मारने वाली दुर्गा के सामने बीजों का रक्त है। ऐसे में शक्ति की मौलिक कल्पना करने वाले निराला हमारे लिए बहुत ही जरूरी संदर्भ हो जाते हैं। भारत भाग्यशाली है कि इसे उत्तर अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में 1970 के दशक में चले ‘गॉडेस आंदोलन’ की तरह कोई देवी-आंदोलन नहीं चलाना है। इसे इतनी शताब्दियों बाद जाकर ऐलिजाबेथ केडी स्टेन्टन की तरह कोई ‘द वीमेन्स बाइबल’ नहीं लिखनी है, इसे माटिल्डा जोस्लिन गेज की तरह ‘स्त्री ईश्वर’ का विचार अब प्रवर्तित नहीं करना है। इसके पास ‘शक्ति’ है, दुर्गा सप्तशती है और इसमें श्रद्धा किसी तरह के फेमिनिज्म के द्वारा कारित नहीं है, वह श्रद्धा के भारतीय ग्लोब का अनिवार्य प्रांतर है। निराला का आग्रह किसी फेमिनिस्ट का आग्रह नहीं है। वे तो कहते हैं : ‘‘हे पुरुष सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण’’ वे जब ऐसा आव्हान करते हैं तो स्त्री को सहायता देने के लिए नहीं, पुरुष को धैर्य और सम्बल देने के लिये। शक्ति की हमारी संकल्पना इसी कारण किसी तरह का रिलीजस फेमिनिज्म नहीं है। यह पुरुष की अंतर्भूत ऊर्जा है और इसे गाढ़े में से निकालने वाली। इसी कारण स्त्री-शक्ति का भारतीय मानस में अविरोधी स्वीकार हुआ। वीमेन-लिब आंदोलन के बिना। यहाँ स्त्री की मुक्ति नहीं, मुक्ति की स्त्री थी। वह जो हमें महानिद्रा से मुक्त करती है, वह जो इस विश्व को आसुरी शक्तियों से मुक्त करती है और वह जो कैवल्य प्रदान करती है


मुझे याद है कि जिस तरह से महामाया के रूप में दुर्गा सप्तशती का शुरुआती चरित्र है, उसी तरह से निराला की शुरुआती कविताओं में भी ‘माया’ का बहुत चित्रण हुआ। ‘माया’ नाम इस कविता में निराला कहते हैं :-
            तू किसी भूले हुए की भ्रांति है
            शांति पथ पर या किसी की गम्यता
            शीत की नीरस निठुर तू यामिनी
            या वसन्त विभावरी की रम्यता
            सृष्टि के अन्तःकरण में तू बसी
            है किस के भोग-भ्रम की साधना
            या कि लेकर सिद्धि तू आगे खड़ी
            त्यागियों के त्याग की आराधना


स्त्री की जिस भूमिका को दुर्गा सप्तशती के प्रथम चरित्र में रेखांकित किया है, वह है मोहनिद्रा से जगाने वाली भूमिका। भ्रम में भटक जाने के प्रति जिस तरह की अपराध-भावना, आत्मग्लानि और कुंठा विकसित हो जाती है, प्रथम चरित्र उसके खिलाफ एक आश्वासनकारी भूमिका का निर्वाह करते हुए जागरण का एक रूपक रचता है। यहाँ स्त्री सिर्फ थपकी ही नहीं है, जागृति भी। कल्प के अंत में जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव में निमग्न हो रहा था, सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे - ‘योगनिद्रा यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते / आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान प्रभुः।’

भगवान के जागे रहते जब इतनी गड़बड़ियाँ हो जाती हैं तो भगवान के सो जाने पर प्रलय तो होगा ही, कल्पान्त तो होगा ही। और भगवान की निद्रा आसुरी शक्तियों को मौका भी देगी। उन्हें प्रबल होने का, सृजन को आक्रान्त करने का अवसर भी उपलब्ध करायेगी। एडगर एलन पो और हेनरी वर्ड्सवर्थ लांग फैलो दोनों ने निद्रा को ‘दोज़ लिटिल स्लाइसेज़ ऑफ डेथ’ के रूप में पहचाना है। लेकिन दुर्गा सप्तशती में महानिद्रा को ‘मौत का छोटा टुकड़ा’ नहीं कहा गया बल्कि ‘निद्रा भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः’ - ‘तेजःस्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति भगवती निद्रादेवी’ कहा गया। निद्रा शरीर का पोषण (नरिशमेंट) करती है, वह उसे ताज़ादम बनाती है। ज़ॉन स्टीनबैक ने उस आम अनुभव का जिक्र किया है जिसके तरह रात को कठिन लगने वाली समस्या सुबह सुलझ जाती है क्योंकि ‘नींद की समिति’ ने रात भर उस पर काम किया होता है। ई. जोसेफ कॉसमैन ने नींद को निराशा और आशा के बीच सर्वोत्तम पुल कहा है। निद्रा अवचेतन पावर्स के विकसित होने में उर्वरक का काम करती है।


भारत में इसीलिये वैदिक काल से ही रात्रि को बड़ा दिव्य माना गया है। ऋग्वेद का रात्रिसूक्तम् ऐसा ही है : वे रात्रिदेवी मुझ पर प्रसन्न हों जिनके आने पर हम लोग अपने घरों में सुख से सोते हैं। सामवेद इसे ‘‘अभूद्भद्रा निवेशनी विश्वस्य जगतो रात्री’’ कहता है- सब जगत को विश्राम देने वाली यह रात्रि कल्याण करने वाली है। ऋग्वेद इस रात्रिदेवी को ‘दूध देने वाली गौ के समान’ कहता है। विलियम वर्ड्सवर्थ अपनी कविता ‘टु स्लीप’ में इसे ‘ताजा विचारों और प्रमुदित स्वास्थ्य की माँ’ के रूप में जब सम्बोधित करते हैं तो वे निद्रा की इसी देवी-मातृक रूप को ही स्वीकार करते हैं। भास ने जब ‘गर्भस्था इव मोहमभ्युपगताः सर्वा प्रजा निद्रया’ लिखा- इस समय सारी जनता गर्भस्थ शिशु की भाँति निद्रा में मुग्ध हो रही है- तो वे रात्रि को माँ कहने से पहले जन को शिशु कह रहे थे। यदि दुर्गा सप्तशती के प्रथम चरित्र में पृथ्वी निमग्न बताई गई है तो उसका कारण भास के रात्रि-वर्णन से ज्यादा समझ में आता है :- ‘‘इस जगत का रूप छिप गया है, मानो वह अन्तर्धान को प्राप्त हो रहा हो।’’ (अन्तर्धानिमिवोपयाति सकलं प्रच्छन्नरूपं जगत्)।


रात्रि शक्ति-संचय के लिये है। यही नहीं, रात्रि शक्ति है। जेम्स रसेल लावेल अपनी कविता ‘मिडनाइट’ में इस भारतीय दृष्टि के निकटतम पहुँचा था जब उसने लिखा कि ‘ओ वाइल्ड एंड वंडरस मिडनाइट देअर इज़ अ माइट इन दी’ कि यह ‘माइट’ या ‘शक्ति’ ऐसी है जिसमें अमरता की कुछ हल्की-सी झलक मिलती है। आखिरकार रात्रि में ही तो मन को अपनी प्रवृत्तियों और अनुभूतियों की विशालकाय विरासत में से कुछ को रिलीज़ करने का मौका मिलता है, वह समय जब आत्मा (‘पिंड’) की इनफिनिटी या अनन्त का अंतरिक्ष (ब्रह्मांड) की इनफिनिटी से संवाद होता है, कार्य व्यापार होता है, कि जिसके कारण सुबह एक नये-खुले फूल की तरह खिलती है। वेद कहता है : सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्ष्महि/वृक्षे न वसतिं वयः - कि जैसे रात्रि के समय पक्षी वृक्षों पर बनाए गए अपने घोंसलों में सुखपूर्वक शयन करते हैं, वैसे ही रात्रि देवी की प्रसन्नता हमारे शयन के लिये याचित और अपेक्षित हैं। रात्रि की सृजनशीलता का एक दूसरा ही आयाम है। तब अवचेतन की सक्रियता है और यह हमें अलग तरह से पुष्ट करती है।


रात्रि का एक तरह का वल्गर भय फैलाया जाता रहा है, ऐसा कि जिसके चलते कोई नास्तिक भी आधी रात होते-होते ईश्वर में आधा विश्वास करने लगता है, कि कहते हैं भूत/प्रेतों की रचना तब हुई होगी जब प्रथम मनुष्य की आँख आधी रात को खुली होगी, सोमरसेट मॉम को गाँवों की रात तो मित्रवत और परिचित लगती थी लेकिन शहरों में जहाँ लाइटों की बहुत चकाचौंध है, उसे यही रात बड़ी असहज, द्वेषपूर्ण और भीषण लगती थी - किसी दुष्ट गिद्ध की तरह अपने ‘वक्त’ का इंतज़ार करते छाई हुई। कॉलरिज को तो प्रतिदिन अफ़ीम की एक टिंक्चर लेनी पड़ती थी, इसलिए उनकी नींद तो बहुत अशांत होती थी जिसमें वे रातों को चीख-चीख उठते थे। उसकी प्रसिद्ध कविता ‘‘नींद की वेदनाएँ’’ (द पेंस ऑफ स्लीप) ऐसी ही कविता है जिसमें वे बीच में नींद के दुःस्वप्न से उठकर बच्चों की तरह रोना कबूल करते हैं।


लेकिन दुर्गा सप्तशती निद्रा को दुर्गा का रूप बताकर प्रणाम करना सिखाती है : या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। भारतीय जीवन दृष्टि की व्यापकता यदि देखनी है तो यहाँ देखें। यहीं थोड़ी ही देर पहले ‘‘या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते’’ कहते हुये उस देवी को बारंबार नमन किया जा चुका है जो सभी प्राणियों में चेतना कहलाती है और अब उसे जो सब प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित है। यह भारतीय स्वीकृति के विस्तार भाव और समावेशिता का सूचक है। हजारी प्रसाद द्विवेदीजी ने पुनर्नवा में इसे यों स्पष्ट किया : ‘‘भगवती महामाया का निद्रा-रूप बड़ा शामक है। वह शरीर और मन की थकान पर सुधालेप करता है। वह जीवनी शक्ति को सहलावा देता है और प्राणों को नये सिरे से ताजगी देता है।’’


आज 10 करोड़ अमेरिकी ‘निद्रा-वंचित’ हैं। इसका असर उनके चिंतन, निष्पादन और आयु तीनों पर पड़ रहा है। आज हम एक 24 घंटा समय में रह रहे हैं। इस ‘चूहा-दौड़’ के समय में नींद का मूल्य सही तरह से आंका नहीं जा रहा। आज जब ‘एस्ट्रोफेल एवं स्टेला’ कविता लिखने वाले सर फिलिप सिडनी ये पंक्तियाँ : ‘कम, स्लीप!, ओ स्लीप, द सर्टेन नॉट ऑफ पीस, द बेटिंग-प्लेस ऑफ विट, द बॉम ऑफ वो, द पुअर मेन्स वेल्थ, द प्रिज़नर्स रिलीज़, द इन्डिफ्रेंट जज बिटवीन द हाई एंड लो’ लिखते हैं तो उनके स्वर में वही प्रतिध्वनि है जो मधु-कैटभ नामक दैत्यों को सामने पाकर चिंतित हुए ब्रह्मा के द्वारा भगवती निद्रादेवी की स्तुति में थी : ‘देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो, लज्जा, पुष्टि, तुष्टि शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो।’ आधुनिक समय में डॉ. जेम्स बी. मॉस जैसे लोग बहुत सफल हो रहे हैं जो ‘पावर स्लीप’ की सैद्धान्तिकी लेकर आए हैं। अतः भगवती निद्रादेवी को महाविद्या, महामेधा, महास्मृति कहने वाले दुर्गा सप्तशती के ब्रह्मा गलत नहीं हैं। निद्रा से स्थानिक (spatial) और प्रक्रियात्मक (Procedural) स्मृति बढ़ती है। खासकर दीर्घस्थाई स्मृति के अवधारण के लिए निद्रा बहुत जरूरी है। (झांग, 2004)। वेनिंगटन और फ्रैंक (2003) बताते हैं कि निद्रा मेधा-लोच (ब्रेन प्लास्टिसिटी) बढ़ाती है। यह ध्यान रखना चाहिए कि सप्तशती निद्रा का नहीं, पॉवर स्लीप का नहीं बल्कि योगनिद्रा का वर्णन करती है।


लेकिन महानिद्रा या महामाया को देवी के रूप में प्रदर्शित करने को सही तरह से न समझ पाने के कारण ही स्त्री के सशक्तीकरण पर कुछ विपरीत प्रभाव भी हुए। स्त्री को भर्तृहरि ने ‘समस्त भावैः खलु बन्धनं स्त्रियः’ कहा। कबीर कहना शुरू हुए ‘माया महाठगिनि हम जानी’ और पहुँच गए ‘जा तन की झाईं परत’ वाली साखी पर, ‘मधुमालती’ लिखने वाले मंझन ‘तिरिया चरित माहि राकसिनी’ लिखने लगे। सेंट क्रिसोस्टम का तो कहना था कि ‘‘स्त्री एक अनिवार्य ‘ईविल’, स्वाभाविक मोह, वांछनीय विपदा, घरेलू खतरा, प्राणघातक आकर्षण, बाहर से मीठी और भीतर से विषरस भरे कनक घट के समान है।’’ तुलसी को लगा ‘नारि विवस सकल गोसांर्ई/नाचहिं नर मर्कट की नाईं’ लेकिन दुर्गा सप्तशती में जो भगवती निद्रा देवी हैं, वे भगवान के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्षःस्थल से निकलकर अव्यक्त जन्मा ब्रह्मा की दृष्टि के समक्ष खड़ी हो जाती हैं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत के स्वामी भगवान जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठते हैं। यानी वे जागरण की देवी भी हैं। यह जागरण का रूपक निराला की कविताओं में बार-बार आया है। जयशंकर प्रसाद के ‘बीती विभावरी, जाग री’ से भी कहीं स्पष्ट स्वरों में निराला कहते हैं : ‘जागो फिर एक बार’ अपनी एक अन्य कविता प्रभाती में वे लिखते हैं : ‘‘जीवन-प्रसून वह वृन्त-हीन। खुल गया उषा-नभ में नवीन/धाराएँ ज्योति-सुरभि डर भर/वह चलीं चतुर्दिक कर्म-लीन। तुम भी निज तरुण-तरंग खोल/नव-अरुण संग हो लो/मुद्रित दृग खोलो।’’ यह आव्हान वैसा ही है जैसे विष्णु अपने मुद्रित दृग खोल रहे हों। उन्होंने ‘जागरण’ पाक्षिक में ‘‘खोलो दृगों के द्वय द्वार/मृत्यु जीवन ज्ञान तम के करण, कारण पार’’ नामक गीत लिखा जो, लगता है, योग निद्रा का आश्रय ले सो रहे विष्णु का ही आव्हान है।

विष्णु की आँख खुलने पर क्या होता है, निराला के शब्द ज्यादा बेहतर चित्र खींचते हैं : ‘‘खिला सकल जीवन, कल मन/पलकों का अपलक उन्मन/तनिमा ने हर लिया तिमिर/अंगों में लहरी फिर-फिर’’ या ‘‘अमरण भर वरण-गान/वन-वन उपवन-उपवन/जागी छवि, खुले प्राण’’; एक अन्य कविता में- ‘‘जागा दिशा-ज्ञान/उगा रवि पूर्व का गगन में, नव यान!/खुले, जो पलक तम में हुए थे अचल/चेतनाहत हुई दृष्टि चपल/स्नेह से फुल्ल आयी उमड़ मुस्कान/बंद वह विश्व में गूंजा विजय-गान’’; ये सब पंक्तियाँ दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में विष्णु के जागरण और उनकी विजय को चरितार्थ करती लगती हैं। विष्णु के नेत्र क्या खुलते हैं : ‘‘खुले नयन नवल रे/ऋतु के-से भिन्न सुमन/करते ज्यों विश्व स्तवन।’’ जागना क्या है? जयशंकर प्रसाद कहते हैं : ‘‘जागरण का अर्थ है कर्म क्षेत्र में अवतीर्ण होना और कर्म क्षेत्र क्या है? जीवन संग्राम।’’ लिहाजा भगवान श्री हरि भी उठते ही संग्राम में कूद पड़ते हैं : ‘‘समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरि!’’ ‘‘और वे मधु और कैटभ दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहुयुद्ध करते हैं।’’ परिणाम होता है विष्णु भगवान की जीत। निराला की ‘जागरण’ कविता की कुछ पंक्तियों से यह स्थिति बेहतर वर्णित होती है : ‘‘प्रथम विजय थी वह/भेदकर मायावरण/दुस्तर तिमिर घोर-जड़ावर्त/अगणित तरंग-भंग।’’ दुर्गा सप्तशती का यह प्रथमोध्याय इसलिए महत्वपूर्ण है।

मध्यम और उत्तर चरित्र में दुर्गा स्वयं ‘काम्बेट’ में है, किन्तु प्रथम चरित्र में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका न होकर प्रेरक भूमिका है, कहें कि सामर्थ्यकारी भूमिका है। शक्ति सिर्फ शक्ति में नहीं है, शक्ति के संचार में भी है। इस बात की स्थापना प्रथम चरित्र में है। यदि ब्रह्मा जन्म, विष्णु जीवन और शिव संहार के प्रतीक हैं तो यह कहा जा सकता है कि जीवन में स्फुरण संचरित करने का महत्कार्य करने का दायित्व स्त्री निभाती है।
दुर्गा सप्तशती के तीनों चरित्रों में जो एक बात ध्यान खींचती ही है, वह यह कि ये तीनों चरित्र मातृमूलक नहीं है। प्रायः हमेशा उनकी याद देवी की तरह की गई है, माँ की तरह नहीं। सिर्फ अपवादस्वरूप तीनों चरित्रों में एक आध बार माँ के रूप का अति संक्षिप्त उल्लेख है। पहले मैं ‘त्वं देवि जननी परा’ (तुम परम जननी हो)। दूसरे में है ही नहीं। तीसरे में ‘या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता’ और ‘मातर्जगतोडखिलस्य’ के अलावा कुछ नहीं है। क्या यह स्त्री-विमर्श को ‘माँ-ग्रंथि’ से मुक्त करने के लिये साशय किया गया? माँ के रूप को बहुत ज्यादा रोमांटिकीकृत करने के चक्कर में बहुत ज्यादा अन्याय भी हुए हैं। उदाहरण के लिए केलीफोर्निया के मनोवैज्ञानिक आयरलैंड का यह कथन कि It is practically impossible to think of the woman who is not a mother without thinking of something absent, lacking or missing. दुर्गा सप्तशती स्त्री की पहचान को मातृत्व से नहीं जोड़ती। स्त्री का दिव्यत्व स्त्री के मातृत्व के बिना भी संभव है।

दूसरी ओर, वह आजकल के फेमिनिस्टों की तरह मातृत्व को स्त्री की पहचान के विरोध में नहीं आंकती। केट मिलेट ने अपनी पुस्तक ‘सेक्सुअल पॉलिटक्स’ में फ्रेडरिक एंजेल्स के नारे को उद्धृत किया है : ‘द फेमिली मस्ट गो’ लेकिन दुर्गा सप्तशती परिवार के विरोध में नहीं खड़ी है। वह स्त्रीवादियों की तरह मातृत्व को ‘अनवर्दी एंडीवर’ नहीं कह रही है, लेकिन उसी के साथ-साथ स्त्री के तीनों चरित्रों में परिवार और मातृत्व की विशेष चर्चा न कर यह भी जता रही है कि स्त्री की अस्मिता इनसे कहीं अधिक है। जो लोग मेट्रिआर्की या मातृसत्तात्मकता के चालू जुमलों में दुर्गा सप्तशती को परिभाषित करना चाहेंगे, उन्हें इसी कारण निराशा हाथ लगेगी। स्त्री को परम जननी कहना या सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता या मार्तजगतोडखिलस्य कहना उसे किसी विशिष्ट मातृत्व पर निर्भरता के एकांत से मुक्त करना भी है। स्त्री होने का आशय गर्भाशय मात्र नहीं है, दुर्गा सप्तशती फ्रायड की तरह स्त्री की लिंग-ईर्ष्या या करेन होर्नी की तरह कुक्षि-ईर्ष्या की बात नहीं करती। स्त्री होने का सीमित प्रकल्प भी दुर्गा सप्तशती में लक्ष्य बनकर सामने नहीं आया है। दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय में जब देवगण देवी की स्तुति करते हुए उन्हें बार-बार नमन कर रहे हैं तो देखें कि वे देवी के 23 रूपों को प्रणति अर्पित कर रहे हैं। ये रूप माया, चेतना, बुद्धि, नींद, भूख, परछाईं, शक्ति, प्यास, क्षमा, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, कांति, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, संतोष, मातृ, भ्रांति, व्याप्ति, चिति हैं। ये रूप हैं कि वृत्ति हैं? मुझे इसे पढ़ते हुए अक्सर जयशंकर प्रसाद की कामायनी की याद आई है जिन्होंने अपने महाकाव्य के सर्गों का नामकरण भी वृत्तियों के आधार पर किया है।

ये वृत्तियाँ जहाँ चेतना, बुद्धि, श्रद्धा, दया, तुष्टि, चिति जैसी हैं तो नींद, भूख, भ्रांति, प्यास जैसी भी हैं। इन्हें सिर्फ ‘वृत्ति’ कहना काफी नहीं है क्योंकि ‘वृत्ति’ को भी 22 अन्य रूपों की तरह परिगणित किया गया है। इसके ठीक पहले देवी, प्रकृति, भद्रा, रौद्रा, शिवा, जगदंबा, गौरी, धात्री, चन्द्ररूपिणी, वृद्धि, सिद्धि, नैब्रदृती, भूभृता लक्ष्मी, शर्वाणी, दुर्गा, दुर्गपारा, सारा, सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा, ध्रूम्रा, अतिसौम्यातिरौद्रा, कृति को भी नमस्कार किया गया है। इसमें ‘‘नमो नमः’’ का क्रम है जबकि पूर्व की प्रवृत्तियों में ‘‘नमस्तस्यै’’ को तीन बार दुहराकर प्रणति अर्पित की गई है। देवी की विभिन्न मूर्तियों में तो शक्ति होती ही है, उन 23 प्रवृत्तियों में एक अपनी ‘शक्ति’, ड्राइव या फोर्स है। निद्रा में भी ड्राइव है और चेतना में भी। भारतीय जीवन दृष्टि में तो मृत्यु भी निद्रा का ही एक प्रकार है। ‘प्रसाद’ के शब्दों में ‘मृत्यु अरी चिरनिद्रे तेरा अङ्क हिमानी सा शीतल।’ बारबार ‘‘सर्वभूतेषु’’ कहकर जाति, संप्रदाय, मजहब, आर्थिक वर्ग, राष्ट्रसीमादि ‘सीमाओं’ और विभाजनों का निषेध किया गया है। बार-बार ‘‘संस्थिता’’ शब्द का प्रयोग है। यह ‘‘संस्थिता’’ धर्म के उसी अर्थ में है जहाँ उसे ‘धारण करने’ के रूप में देखा जाता है। यह ‘संस्थिति’ मात्र ‘स्थिति’ से कुछ विशिष्ट भी है और एक पारिभाषिक शब्द-सा है। यह ‘भाव’ में तो है ही, ‘अभाव’ में भी है- भूख-प्यास में भी है। दुनिया ने बहुत सी क्रांतियों का सूत्रपात अभावों से होते देखा है।
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स्त्री दिव्यांशों का समुच्चय
दुर्गा सप्तशती का एक ऐतिहासिक फंक्शन यह रहा कि उसने स्त्री को पाँवों की जूती, मलिन और इस धरती की कोई पार्थिव वस्तु समझने की जगह उसे दिव्यांशों का समुच्चय बताया। जिस समय एथेंस में हर स्त्री को अनिवार्यतः एक पुरुष अंगरक्षक (काईरिओस) रखना पड़ता था, उस समय भारत में देवताओं तक की रक्षा के लिए भी देवी की अवधारणा चल रही थी। यह ध्यान देने की बात है कि जिस समय भारतीय काव्यों में प्रेम के अद्भुत प्रसंग और कथाएँ चल रही थीं, उस समय प्राचीन रोम में रोमांस शादी के लिये शायद ही कभी कोई कारक बनता था और प्रचलन आयोजित विवाहों का ही था। एथेंस में रजस्वला होते ही लड़की को ब्याह दिया जाता था। एथेनियन शादी में प्यार या स्नेह जैसी चीजों की कोई भूमिका नहीं होती थी। ग्रीको-रोमन समय में स्त्री की आयु गणना की शुरुआत ही विवाह के दिन से जाती थी। भारत में उस समय पार्वती अपने परिवार की भावनाओं के विपरीत जाकर अपर्णा होकर अपने मनपसंद वर के लिए तपस्या करती और उसे जीतती दिखाई जाती थीं। दुर्गा सप्तशती के उत्तर चरित्र में पार्वती की झलक के अर्थ हैं और उस आत्मविश्वास के भी जिसके तहत देवी स्वयं शिव को दूत के कार्य में नियुक्त करती हैं। प्रसिद्ध असमिया कवयित्री नलिनीबाला देवी की स्त्री पर लिखी एक कविता में यह कहा गया है कि ‘‘जगते विचरा नाइ/तोमार बाहुर शक्ति/बिचारिछे नीरव आश्वास/सुकुमार हृदयर/शक्ति उत्स नीरव विश्वास’’ कि विश्व तुम्हारा बाहुबल नहीं, बल्कि नीरव आश्वासन और सुकुमार हृदय की शक्ति का निर्झर विश्वास ही चाहता है। लेकिन दुर्गा सप्तशती के अंतिम दो चरित्र स्त्री के भौतिक बल को भी बताते प्रतीत होते हैं। वह इसलिए कि स्त्री को किसी भी चीज के निषेध के फ्रेम में क्यों देखा जाए। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी के लज्जा सर्ग में कहा कि यह आज समझ तो पायी हूँ/मैं दुर्बलता में नारी हूँ/अवयव की सुंदर कोमलता/लेकर मैं सबसे हारी हूँ। लेकिन दुर्गा सप्तशती दुर्बलता में नारी को परिभाषित नहीं करती। शेक्सपीयर यदि ‘फ्रेलटी, दाई नेम इज़ वूमेन’ कहते हैं कि दुर्बलता, तेरा ही नाम स्त्री है- तो दुर्गा सप्तशती इसका स्पष्ट प्रत्याख्यान करती है। शताब्दियों तक पाश्चात्य परंपरा स्त्री को ‘वीकर सेक्स’ के रूप में जताती-बताती आई। दुर्गा सप्तशती के सामने इस परंपरा के आग्रहों का खोखलापन नज़र आता है। कहीं भी दुर्गा ‘डेडी’ज़’ गर्ल नहीं हैं। वे अपने बूते पर खड़ी हुई हैं।


लेकिन अपने बूते पर होना अकेले होना नहीं है। दुर्गा सप्तशती देवी को शुभ-शक्तियों के एकत्र होकर एक ही रूप में ढलजाने की तरह देखती है। ये दिव्य शक्तियाँ न केवल शक्ति का एकात्म स्वरूप बनती हैं, बल्कि रण-सज्जित करने के लिए उसे सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र भी उपलब्ध करवाती हैं। कहाँ तो एक जगह नीत्शे स्वयं कहते हैं कि स्त्री ईश्वर की दूसरी गलती है, या कहाँ ख्रिस्ती मत है कि भगवान ने आदमी को अपनी इमेज में बनाया और स्त्री को आदमी की इमेज में, और कहाँ दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र में महिषासुर मर्दिनी का रूप सभी देवताओं के अलग-अलग तत्वों से आकार लेता हुआ। दुर्गा सप्तशती दुर्गा को जब देवताओं के तेजःपुंज के पर्वत के रूप में वर्णित करती है- ‘अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम्।’ सप्तशती का कहना है कि यह अतुलनीय तेज सम्पूर्ण देवताओं के शरीर से प्रकट हुआ था- अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्- और ‘एकत्रित होने पर’ वह एक नारी के रूप में परिणत हो गया था : ‘एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा।’ इस प्रसंग में दो कुंजी-शब्द हैं : ‘सर्वदेवशरीरजं’ और ‘एकस्थं।’ मात्र एक या दो देवताओं के तेज का योगदान नहीं है शक्ति की विनिर्मिति में सभी देवताओं का योगदान है।

शंकर का तेज मुख के प्राकट्य में काम आता है। शंकर का तेज जिस तरह से कल्याणकारी है, उसी तरह से देवी का मुखदर्शन। यमराज के तेज से केश मिलते हैं- देवी की केश-कालिमा के पीछे यम का होना स्वाभाविक ही है। ‘बाहवो विष्णुतेजसा’ - श्री विष्णु भगवान के तेज से उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुईं। चतुर्भुज विष्णु के तेज से ऐसा होना सहज ही प्रतीत होता है। चन्द्रमा, इन्द्र, वरुण, पृथ्वी, ब्रह्मा, सूर्य, वसु, प्रजापति, कुबेर, प्रजापति, अग्नि, संध्या, वायु सभी ने अपना अलग-अलग योगदान किया जिससे देवी ‘संभव’ हुई :- ‘‘सम्भवस्तेजसां शिवा।’’ दूसरा कुंजी शब्द है - एकस्थं। यह बताता है तेजों के संगठन का महत्व।


देवता का अर्थ, एक पल को सहज सरल देसी भाषा में लें तो, होता है भला आदमी।  अब भले आदमियों की कमजोरी यही है कि वे एक नहीं होते, एकत्र नहीं होते। चोर-चोर मौसेरे भाई होते हैं लेकिन सद्गुणी वृत्ति के लोगों में ऐसी एकता देखने में नहीं आती। जबकि (सद्गुणियों की) एकता ही शक्ति है। पश्चिमी परम्परा कहती है :- यूनिटी इज़ स्ट्रेंथ। दुर्गा सप्तशती में एकता के जरिए शक्ति है, शक्ति के जरिए एकता नहीं। यह बिस्मार्क की तरह लाई हुई एकता नहीं है बल्कि यह इस सोच पर आधारित है कि सत्य की शक्तियों का बिखराव ही असुरों की उन्नति का कारण है। सच्चा आदमी द्वीप बनकर क्यों रहता है जबकि वह तो इस सत्य के महाद्वीप का अंग है। सिंधी के कवि किशनचन्द बेबस की कविता है :
        एकता जा देविता ! तुहिंजी लहां मन्दर किथे?
        जंहिमें इतिहादी उजालो आहि सो अन्दर किथे?


अर्थात हे एकता के देवता! मैं तुम्हारा मंदिर कहाँ पाऊँ! वह हृदय कहाँ पाऊँ! वह हृदय कहाँ है जिसके अंदर एकता का प्रकाश है?


तेलुगू कवि वेमना की पंक्ति ‘गड्डिवेंटि बट्टि कट्टा येनुगु’ भी यही कहती है कि क्या तुच्छ फूस के तिनकों से बनी रस्सी में प्रबल हाथी को बँधते हम नहीं देखते हैं? एक ऐसे वक्त आसुरी शक्तियाँ ताण्डव मचा रही हों, सत्प्रवृत्तिधारकों की एकता में ही बल है।


ध्यान देने की बात यह है कि देवताओं की पराजय के बाद, देवता देवी की शरण में जाते हैं और फिर देवी-माहात्म्य स्थापित होता है। इसकी तुलना में ओल्ड टेस्टामेंट से बाइबल पौराणिकी तक आ गए परिवर्तनों को देखें। मातृत्व देवियों के ऊपर पुरुषसत्तात्मक देवताओं की विजय-सी हुई लगती है। प्रायः सभी देवियाँ समाप्त कर दी गई लगती हैं, बल्कि ईश्वर स्त्री को शापित करता है कि भविष्य में यह पीड़ा में ही गर्भधारण करेगी और अपने पति के अधीन रहेगी। इसी शाम के साथ संभवतः पश्चिमी समाजों में पितृसत्तात्मकता का उदय हुआ। अन्यथा जैसा कि सर आर्थर ईवांस - जिन्हें क्रेटन सभ्यता की पुनर्खोज का श्रेय है- अपनी छः जिल्दों की भारी भरकम रपट में कहते हैं - रपट का नाम है ‘द पैलेस आफ माइनोस’ - कि यह सभ्यता मातृसत्तात्मक थी क्योंकि उसमें असंख्य देवी मूर्तियाँ हैं। ‘हिस्ट्री ऑफ ग्रीक रिलीजंस’ जैसे अद्भुत ग्रंथ के रचयिता प्रो. मार्टिन पी. नील्सन वहां मिली जिन देवी मूर्तियों का उल्लेख करते हैं, उनका वर्णन पूर्णतः पार्वती माँ की याद दिलाता है :-


The goddess with spear in hand, who stands on the mountain symmetrically flanked by two lions indeed resembles the beweaponed Lady of the Beasts. Moreover , thr representation of the mountain compellingly suggests the - "The Mountain Mother", accompanied by lions. क्या भारत के पुरातत्व शास्त्री क्रेट सभ्यता की इन मूर्तियों को देखने जाने का कष्ट उठाएँगे जो इस पुस्तकीय वर्णन में शुद्धतः पार्वती या दुर्गा के चित्र सदृश प्रतीत होता है?


जिस तरह से दुर्गा सप्तशती में देवता कातर स्वर में प्रार्थना करते हैं, उसी तरह निराला की देवी-अभ्यर्थना हमें यह स्मरण कराती है कि निराला उस युग के देवता थे :-
        स्वयं बढ़ा दो ना तुम करूणा-प्रेरित अपने हाथ
        अन्धकार उर को कर दो रवि-किरणों का प्लुत-प्रात
        पहनो यह माला मा, उर में मेरे ये संगीत
        खेलें उज्जवल, जिनसे प्रतिपल थी जनता भयभीत
        क्या मैं इसे बढ़ा दूं
        और तुम्हें मैं क्या दूं
        देवि, तुम्हें मैं क्या दूं


जिस तरह से कैटभ, महिषासुर, शुंभ निशुंभ से ‘प्रतिपल भयभीत’ देवतागण और पृथ्वीवासी थे, उसी तरह से इस कलियुग की वर्तमान जनता भी संत्रास और आतंक के उसी अनुभव से गुज़र रही है। ‘तुलसीदास’ में तो निराला बहुत स्पष्ट होकर इसे सूचित करते हैं : ‘‘फिर असुरों से होती क्षण क्षण/स्मृति की पृथ्वी यह, दलित चरण। राम की शक्तिपूजा में भी यही बिम्ब आता है : राक्षस पदतल/पृथ्वी टलमल’’। ऐसे में शक्ति की मौलिक कल्पना की चुनौती भी है और यह भी कि माँ जगदम्बा स्वयं यह दुर्दशा अपनी आँखों से देख लें। इसलिए एक दूसरी कविता में ‘माँ’ से वे कहते हैं :-
        बाधाएँ आयें तन पर
        देखूँ, तुझे नयन-मन भर
        मुझे देख तू सजल दृगों से
        अपलक, उर के शतदल पर


माँ के कोमल दृष्टिपात् की यही आकांक्षा असुर-प्रपीड़ित देवों की है।
महिषासुर मर्दिनी का मध्यम चरित्र इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह एकमात्र ऐसा चरित्र है जो देवी की गढ़न को बताता है, शक्ति के शिल्प को। भारतीय पौराणिकी में ऐसा कोई चरित्र नहीं है जिसकी ऐसी विरचना हुई हो। जिस पर सृष्टि की रचना का भार आने वाला हो, स्वयं उसकी संसृष्टि होती है। देवी का यह टैक्शचर वस्तुतः तेजस्विता का ताना बाना है। द्युति का वर्चस्व। सुषमा का यह संघटन है रोशनी और रौनक का। यह एक नूर ते सब जग उपज्या जैसा ही कुछ है। तेज शब्द प्रतिभा का भी पर्याय है। देवी प्रतिभा की पुंज है। सुदीप्ति का समुदाय। एक ऐसे वक्त जब दुनिया का वर्तमान तमोमय और निष्प्रभ हो, सहसा देवी की दैदीप्यमान उपस्थिति जैसे सारा कलुष समाप्त कर डालेगी। यह कोई खिचड़ी गठजोड़ नहीं है। यह कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जुटा लेने की बात नहीं है। यह एक समग्रीभूत एकत्रीभवन है, एकत्रीकरण नहीं। यह सूचक है कि देवशक्तियाँ अब एकजुट हो गई हैं। ‘समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम्’ दूसरे, तेज एक तरह का अमूर्तन है, देवी के रूप में जैसे उसे Substantialize किया गया है। आलोक तो वैदेहिक था, उसे सवपु करके-शरीरीय करके-ही नहीं दिखाया गया बल्कि देवताओं ने खुद को देवी के इन्द्रियायतन में पुनर्गठित (Reorganize) भी किया।
लेकिन सिर्फ यही बात नहीं है बल्कि यह भी है कि स्त्री जब ‘‘निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या’’ है तो वह स्वयं को हीन क्यों समझे। ‘‘वह तोड़ती पत्थर’’ वाली स्त्री या कोई तत्कथित आम स्त्री भी। यदि दुर्गा सप्तशती की स्थापना यह है कि जगत में जितनी भी स्त्रियाँ हैं, वह देवी की ही मूर्तियाँ हैं तो जरूरत उस विनम्रता की नहीं है जिसके तहत आज की स्त्री यह कह रही है-
        न पुण्य यज्ञकारिणी न ज्ञानदीपधारिणी
        न लोकशोक भक्षिणी न सर्वलोकरक्षिणी
        न गीतगुंजमाधुरी न रक्तवस्त्रसुंदरी
        न पुष्पदीपदायिनी न दुःखदर्पमायिनी
        न बुद्धिदा न सिद्धिदा न भक्तिदा न शुद्धिदा
        न बुद्धिदा न मुक्तिदा न पुण्यदा न धान्यदा
        अहं न चैव शाश्वता न भाग्यदोषविस्मिता
        तथापि रुक्मिणी श्रिये रमे सुधे सुरक्ष मे


बल्कि एक आत्म-संज्ञान की है। देवी की यह शरीर रचना स्त्रीवादियों के देह-विमर्श व उनकी ब्रा बर्निंग क्रांतिधर्मिता के भी विपरीत है और कास्मेटिक सर्जरी, स्ट्रिपटीज और एनोरक्सिया वाली दुनिया के भी विपरीत। देवी की इस शरीर रचना और आधुनिक नारी का शरीर के प्रति आब्सेशन तुलना करने योग्य है। यहाँ दुर्गा सप्तशती में स्त्री का कोई असेम्बली लाइन विनिर्माण नहीं है। बल्कि जिन्होंने नारी देह का वह बाजारूकरण किया है जिसके कारण आधुनिकाएँ लगातार देह-सुधार में- बॉडी माडिफिकेशन में - लगी हुई हैं, उनके सामने यह चमड़ी की जगह तेज के तथ्य को रखता है। आजकल की प्रचार और पैसा पाने को अतिआतुरा नायिकाओं की तरह यहाँ किसी तरह का संपादित शरीर नहीं है बल्कि स्त्री की पहचान यह एक तेजोवलय के रूप में कराता है। फ्रायड जैसे मानुष कहते थे कि : ‘एनॉटामी इज़ डेस्टिनी’, (तन नियति है)। लेकिन नारी तन को तेजोवलय के रूप में दर्शाकर इस नियति को भी उत्तीर्ण करने की कोशिश दुर्गासप्तशती में की गई है।
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स्त्री पदार्थ नहीं
दुर्गा सप्तशती का उत्तर चरित्र वस्तुतः स्त्री को वस्तु समझने की मानसिकता के लोगों के राक्षसीपन को उजागर करता है। शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षसों के देवी के हाथों मारे जाने की यह सरल सी दिखने वाली कथा बहुत से ऐसे संकेत लिए है जिससे स्पष्ट होता है कि मूलतः यह कहानी स्त्री के कमोडिफिकेशन के विरुद्ध रची गई कहानी है। शक्ति की भारतीय संकल्पना की बुनियादी आपत्ति ही इस बात पर थी कि स्त्री को धड़कती हुई जीवन्त सत्ता मानने की जगह एक चीज माना जा रहा था। स्त्री को संपदा की तरह देखने की प्रवृत्ति के खिलाफ उत्तर चरित्र एक प्रबल आवाज़ खड़ी करता है। स्त्री को ‘वूमेन एज़ प्रापर्टी’ की जगह ‘वूमेन ऑफ प्रापर्टी’ मानना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र का कुल जमा संदेश यही है।


अभी कुछ दिनों पहले - 22 फरवरी 2007 को पाकिस्तान से दो खबरें थीं। एक खबर यह बताती थी कि पाकिस्तान के मुल्तान में एक पति ने अपनी पत्नी की सहमति लिए बगैर उसकी किडनी बेच दी और ट्रेक्टर खरीद लिया। दक्षिणी पाकिस्तान में एक अन्य घटना सामने आयी जब पोकर के खेल में एक पिता अपनी बेटी को हार बैठा। ऐसी घटनाएँ भारत में भी मिल जाएँगी। द्रौपदी का उदाहरण तो है ही। स्त्री को अपनी सम्पत्ति-मात्र समझना शुंभ होना है।


सबसे पहले हम शुंभ-निशुंभ प्रसंग पढ़ लें। उनके भृत्यों ने जब अम्बिका देवी को देखा तो शुंभ को आकर उनका परिचय ‘रत्न’ के रूप में दिया। दैत्यराज को वे कहते हैं कि ‘‘प्रभो! तीनों लोकों में मणि, हाथी और घोड़े आदि जितने भी रत्न हैं, वे सब इस समय आपके घर में शोभा पाते हैं। हाथियों में रत्नभूत ऐरावत, यह पारिजात का वृक्ष और यह उच्चैः श्रवा घोड़ा- यह सब आपने इंद्र से ले लिया है। हंसों से जुता हुआ यह विमान भी आपके आँगन में शोभा पाता है। यह रत्नभूत अद्भुत विमान, जो पहले ब्रह्मा जी के पास था, अब आपके यहाँ लाया गया है। यह महापद्म नामक निधि आप कुबेर से छीन लाये हैं। समुद्र ने भी आपको किंजल्किनी नाम की माला भेंट की है जो केसरों से सुशोभित है और जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं हैं। सुवर्ण की वर्षा करने वाला वरुण का छत्र भी आपके घर में शोभा पाता है तथा यह श्रेष्ठ रथ, जो पहले प्रजापति के अधिकार में था, अब आपके पास मौजूद है। दैत्येश्वर ! मृत्यु की उत्क्रांतिदा नाम वाली शक्ति भी आपने छीन ली है तथा वरुण का पाश और समुद्र में होने वाले सब प्रकार के रत्न आपके भाई निशुंभ के अधिकार में हैं। अग्नि ने भी स्वतः शुद्ध किए हुए दो वस्त्र आपकी सेवा में अर्पित किए हैं। दैत्यराज ! इस प्रकार सभी रत्न आपने एकत्र कर लिए हैं। फिर यह जो स्त्रियों में रत्नरूप देवी है, इसे आप क्यों नहीं अधिकार में कर लेते हैं।’’

करीब दस श्लोकों वाला यह विस्तृत कथन सबसे पहले तो हमारा ध्यान इसी बात पर खींचता है कि इस ‘रत्न’ वाली बात को इतना लम्बा क्यों खींचा जा रहा है। यदि इसके पीछे कोई विशेष प्रयोजन नहीं है तो इसे इतनी विस्तृति देना सर्वथा अनावश्यक होना चाहिए था। लेकिन यह निरुद्देश्य नहीं है बल्कि इस पूरे विवरण में जीत, अधिकार, छीनने, भेंट पाने और समर्पण के बिम्ब हैं। ये सब रत्न नियंत्रण और पजेशन का मनोविज्ञान बताते हैं। जिस तरह से उन पर कब्जा किया है, उसी तरह से स्त्री पर भी कब्जा कर लो। आखिरकार है तो वह एक संपत्ति ही। संपदा अधिनियमों में कब्जा एक सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण तत्व है। वह न केवल स्वत्व का साक्ष्य है बल्कि वह अपने आप में एक प्रापर्टी राइट (एक संपदा अधिकार) है। दैत्यों के सेवकों द्वारा कहा यह जा रहा है कि चूंकि इतने सारे रत्न आपने ले ही लिये हैं, तो यह रत्न क्यों छूटे ? संचय की, जमाखोरी की यह एक कंपल्सिव स्थिति है। यहाँ आब्सेशन रत्नों से है, स्त्री से नहीं। सब कुछ इकट्ठा कर लिया है पूंजीपति ने, तो यह कैसे छोड़े। आज मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि कुछ लोगों में कंपल्सिव होर्डिंग की विकृति होती है जो दिमाग की किसी सर्किट्री के डिस्आर्डर से होती है। यहाँ तर्क यह नहीं है कि स्त्री को अपना ‘कलेक्शन’ दिखलाएँगे, कि हमारे पास कितना पैसा-प्रापर्टी है; बल्कि यह है कि स्त्री स्वयं कलेक्शन के लिये एक आइटम है। यहाँ यूरेशिया और अफ्रीका के शुष्क और चट्टानी इलाकों में पाये जाने वाले नर कृष्ण पक्षी व्हीटीयर्स का-सा मासूम प्रेम निवेदन नहीं है जो अपनी ‘ऋतु’ आने से पहले काफी बड़े-बड़े पत्थर इकट्ठे कर लेता है और जिसका ढेर जितना बड़ा हो जाये, उस नर की ‘सफलता’ के अवसर उतने बढ़ जाते हैं। यहाँ तो स्त्री को ही पत्थरों की ढेरी का एक और पत्थर कहा जा रहा है।


कार्ल मार्क्स कहता था कि जमाखोरी का विनिर्माण (होर्ड फार्मेशन) पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया की आवश्यक प्रवृत्ति है। दुर्गा सप्तशती बताती है कि जमाखोरी दानवीकरण की भी प्रवृत्ति है। जयशंकर प्रसाद के शब्दों में, ‘‘सब कुछ अपने में भरकर कैसे व्यक्ति विकास करेगा/यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।’’ शुंभ देवी के पास क्या संदेश भिजवाता है? ‘‘सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकार में है। देवता भी मेरी आज्ञा के अधीन चलते हैं। संपूर्ण यज्ञों के भागों को मैं ही पृथक-पृथक भोगता हूँ। तीनों लोकों में जितने श्रेष्ठ रत्न हैं वे सब मेरे अधिकार में हैं। देवराज इन्द्र का वाहन ऐरावत, जो हाथियों में रत्न के समान है, मैंने छीन लिया है। क्षीरसागर का मंथन करने से जो अश्वरत्न उच्चैःश्रवा प्रकट हुआ था, उसे देवताओं ने मेरे पैरों पर पड़कर समर्पित किया है। सुंदरी! उनके सिवा और भी जितने रत्नभूत पदार्थ देवताओं, गंधर्वों और नागों के पास थे, वे सब मेरे ही पास आ गये हैं। देवी ! हम लोग तुम्हें संसार की स्त्रियों में रत्न मानते हैं अतः तुम हमारे पास आ जाओ क्योंकि रत्नों का उपभोग करनेवाले हम ही हैं। चंचल कटाक्षों वाली सुंदरी ! तुम मेरी या मेरे भाई महापराक्रमी निशुंभ की सेवा में आ जाओ क्योंकि तुम रत्नस्वरूपा हो।’’


फिर ‘रत्नभूतानि भूतानि’ की वही बात दोहरायी गयी है। फिर स्त्री को पदार्थ की तरह देखा गया है। फिर रत्नों की मोनोपली की बात है। वे कितना कुछ धारण करते हैं, अब रत्न की तरह ही स्त्री को भी धारण करना चाहते हैं। लेकिन स्त्री क्या इस तरह से धारण की जाएगी? वह स्त्री जो इस जगत को धारण करती है। इसलिए शुंभ के संदेश के तत्काल बाद का श्लोक यह कहता है- ‘‘दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत्’’ - ‘‘कल्याणमयी भगवती दुर्गा देवी जो इस जगत को धारण करती है।’’ मुझे इस शुंभ - संदेश से जॉन पी. ज़ामचिक का ‘‘18वीं सदी के अंग्रेजी उपन्यासों में परिवार और विधि’’ विषय में किये गये अध्ययन की पंक्तियाँ याद आती हैं : "She possesses value as a desirable commodity in the concupiscent marketplace .... representing both the economization of sex and the sexualization of the economy." प्रत्यक्ष में भले ही लग रहा हो कि शुंभ उन्हें ‘रत्न’ कहकर सम्मान दे रहा हो लेकिन यदि स्त्री रत्न है तो एक दिन उसकी ट्रेफिकिंग होगी ही। विधिक रूप से या गैरविधिक रूप से। कभी विज्ञापनों में, कभी वेश्यावृत्ति में- हर जगह उसे एक वस्तु की ही तरह बरता जाएगा। दुर्गा सप्तशती इसी जेंडर सिस्टम के विरुद्ध विद्रोह है जिसमें स्त्री ‘सेवा’ में ही मांगी जाएगी- क्योंकि तुम रत्नस्वरूपा हो तो मेरी या मेरे भाई महापराक्रमी निशुंभ की सेवा में आ जाओ। इसी मानसिकता का परिणाम है कि 4 जून 2003 को एक अमेरिकी वेश्यालय ने घोषणा की कि अमेरिकी सैनिकों को- जिन्होंने इराक के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया - फ्री सेक्स सेशन दिया जाएगा। लड़कियाँ सैनिकों की सेवा में। बाद में आने वालों को डिस्काउंट भी। रिचर्ड जेआर्नसन तो ‘कमोडिफिकेशन एंड कमर्शियल सरोगेसी’ नामक अपनी कृति में यह बताते हैं कि किस तरह मातृत्व तक का वाणिज्यीकरण हुआ है। वह दौर है जब माँ की कोख भी कमीशन की जा रही है। लेबर पेन अब सही अर्थों में लेबर या श्रम का विषय हो गया है। कुक्षि के बाजार बन गए हैं।


दुर्गा सप्तशती की देवी इसलिए आज और ज्यादा प्रासंगिक लगती है। पता नहीं इसकी रचना आज से कितने युगों पूर्व हुई होगी, लेकिन आज यह ज्यादा मौजूं लगती है। इस सप्तशती में स्त्री का जो आदर्श रखा गया है, वह तत्कालीन पुराने समाजों की तुलना में बहुत आगे है। जिस समय ग्रीस में लिसिस्ट्राटा जैसे नाटक स्त्री देह का वितरण-पुनर्वितरण कर रहे थे, जिस समय प्लेटो यह बता रहे थे कि स्त्री का मुख्य कार्य बच्चे, वह भी लड़के, पैदा करना है, और ग्रीस में पत्नी अपने घर में भी आदमियों की सोशल गेदरिंग में हिस्सा नहीं ले सकती थी, बाजार नहीं जा सकती थी, जब प्लेटो के विचार से सिर्फ पुरुष ही सीधे भगवान के द्वारा बनाए गये थे और सिर्फ उन्हीं के पास आत्मा थी, जब अरस्तू ‘स्त्री को स्वभाव से ही डिफेक्टिव’ बता रहे थे और स्त्री की परिभाषा ‘अपूर्ण पुरुष’ के रूप में कर रहे थे- कि आदमी किसी खास सामर्थ्य के चलते आदमी है जबकि स्त्री किसी खास असामर्थ्य के चलते स्त्री है, कि आदमी औरत के ऊपर ठीक ही चार्ज ले लेता है, कि पुरुष शासन करता है और स्त्री शासित होती है, कि इतना सब कहने के साथ अरस्तू स्त्री को ‘पालतू पशु’ मानते थे, कि वे न तो बिशप बन सकती थीं, न प्रीस्ट - उस समय भारत में दुर्गा के जरिए स्त्री का ‘शक्ति’ के रूप में आदर्श रखा जा चुका था।

दुर्गा के तीनों चरित्रों - प्रथम, मध्यम और उत्तर - में से एक में भी स्त्री का गतानुगतिक चाइल्ड बिअरिंग वाला चित्रण नहीं है। शुंभ जब देवी को सिर्फ रत्न के रूप में देखता है तो वह प्लेटो के उस विचार के अनुरूप है कि स्त्री के पास आत्मा नहीं होती, कि जब वह इस रत्न पर अधिकार की बात कहता है तो वह उस अरस्तू को प्रतिध्वनित करता है कि जिसके अनुसार आदमी औरत के ऊपर ठीक ही चार्ज ले लेता है, कि स्त्री पुरुष के द्वारा शासित होने के लिए है। अरस्तू स्त्री की पारिभाषिक असामर्थ्य की चर्चा कर रहे थे जबकि सप्तशती स्त्री की ‘शक्ति’ और सामर्थ्य की स्थापना कर रही थी। वह तो अच्छा है कि दुर्गा सप्तशती की रचना-तिथि प्लेटो-अरस्तू के समकालीन नहीं है अन्यथा शुंभ-निशुंभ के स्वर उनसे काफी मिलते-जुलते लगते हैं। प्लेटो के अनुसार सिर्फ पुरुषों को ही देवताओं ने सीधे रचा और उन्हें आत्मा दी। स्त्रियों के बारे में तो प्लेटो की थियरी और विचित्र है। उसके अनुसार जो पुरुष कायर या अपवित्र हैं, वे अगली पीढ़ी में स्त्री बन जाते हैं। केवल पुरुष ही पूर्ण मानव हैं। अरस्तू की नजर में स्त्रियाँ स्वभावतः ‘डिफेक्टिव’ हैं। जब स्त्री/पुरुष संसर्ग करते हैं तो पुरुष मानव के ‘तत्व’ की आपूर्ति करता है, स्त्री सिर्फ पोषण करती है। अरस्तू की नजर में स्त्री एक अनुपजाऊ  पुरुष है। आदमी किसी खास योग्यता के चलते आदमी है, स्त्री किसी खास अयोग्यता के चलते स्त्री है। वह किसी चीज का स्वत्व नहीं रखती और कोई निर्णय नहीं ले सकती। आनंदोपभोग और खुशी में उसका किस्सा नहीं है और वह समुदाय की सदस्य नहीं है। उस समय का एथेनियन लेखक लिखते है कि सबसे अच्छी स्त्री वह हैं जिसके बारे में सबसे कम सुना जाए। जिस स्त्री के बारे में दुर्गा सप्तशती यह लिख रही थी कि ‘यस्याः प्रभावमतुलं भगवानन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलंच’, उस स्त्री के बारे में उस समय पश्चिमी विचारों का स्तर यह था।


दुनिया भर की सभी पुरानी सभ्यताओं में ग्रीस की सभ्यता ऐसी थी जिसने अपनी औरतों के साथ सबसे खराब व्यवहार किया। उस दौर के एक ग्रीक कानून के मुताबिकपुरुष को अपनी पत्नी, माँ, पुत्री, बहन या रखैल के साथ सेक्स करते हुए पकड़े जाने वाले पुरुष की हत्या करने की छूट थी। महिला कोई कारोबार नहीं कर सकती थी यदि पण्य वस्तु की कीमत पाँच-छः दिन के भोजन की कीमत से ज्यादा हो। दहेज प्रथा आम थी और बाल विवाह भी। स्पार्टा स्त्रियों के मामले में ग्रीस से बेहतर था लेकिन वहाँ भी औरतें सभा में मत नहीं दे सकती थीं। एथेनियन पुरुष तो एक नागरिक दायित्व के तहत शादी करता था और तब तक नहीं करता था तब तक कि 30 साल या अधिक न हो जाए। शादी भी वह अपने से आधी उमर की लड़की से करता था ताकि उस पर आसानी से ‘नियंत्रण’ हो जाए। उनसे बेहतर तो इजिप्ट की सभ्यता थी जहाँ भले ही विवाहोत्सव जैसी कोई चीज न भी हो तो प्रेम और स्नेह-साहचर्य को शादी का आधार माना जाता था और शादी को ‘नागरिक’ नहीं, ‘प्राकृतिक’ माना जाता था। देवदासी जैसी प्रथा तो बहुत परवर्ती है लेकिन उसके काफी पहले रोम के मंदिरों में ‘वेस्टल वर्जिन्स’ होती थीं और घरों में महिला दासियाँ, जो पूरी तरह से ‘शिकारी स्वामियों’ की दया पर गुजर करती थीं। जबकि भारत में देवी की प्रसन्नता की याचना की जाती थी - ‘देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मार्तजगतोऽखिलस्य।’ दुर्गा सप्तशती में तो विश्वव्यापी विपत्तियों के नाशार्थ स्त्री की प्रसन्नता के लिए प्रार्थना की गई कि ‘प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य’।


दुर्गा सप्तशती स्त्री के मूल्यांकन के सतहीपन के विरुद्ध भी एक घोष है। जिसे आजकल लुकिज़्म कहा जाता है, कि आप कैसे दिखते हैं- और जो एक सर्वेक्षित तथ्य की तरह सामने आया है कि अच्छे दिखने वाले बच्चों को शिक्षिका ज्यादा अंक देती है, कि आकर्षक लोगों के साथ पुलिस भी मुलायम तरीके से पेश आती है, कि अच्छे दिखने वाले अभियुक्तों को ज्यादा अनुकूल इंसाफ मिलता है; दुर्गा सप्तशती में उस वृत्ति का भी विरोध और अस्वीकार है। शुंभ-निशुंभ के भृत्य कहते हैं : ‘‘नैव ताट्टक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदत्तमम्’’ - ‘‘वैसा उत्तम रूप किसी ने भी कहीं नहीं देखा होगा’’। शुंभ के संदेश में भी उन्हें ‘चंचल कटाक्षों वाली सुंदरी’ ही कहा गया है - चञ्चलापांङ्गि। डॉ. नैंसी एटकॉफ ने ‘सर्वाइवल ऑफ द प्रेटीएस्ट’ नामक अपनी पुस्तक में ‘दिखने’ की इस विशेषता पर काफी रोचक टिप्पणियाँ की हैं। सातवें अध्याय के चौथे श्लोक में ‘‘ते दृष्ट्वा तां’’ शब्दों के जरिए फिर दैत्यों द्वारा उन्हें देखने का उल्लेख है। किन्तु यह अपीयरेंस तो भ्रम है, इसलिए अगले ही श्लोकों में उन्हीं अम्बिका की भौहों से ‘विकरालमुखी काली’ (काली करालवदना) प्रकट हुईं। लोग फ्लेश के, मांस के मोह और व्यापार में उलझे रहते हैं। टेस्टोमेंट के अनुसार ‘लस्ट ऑफ द फ्लेश’ में; मांस की वासना में। ईश्वर विमुख मनुष्य की जो वासना- त्रयी जॉन ने टेस्टामेंट में बतायी, उसमें से पहली यह है ‘लस्ट ऑफ द फ्लेश’ और दूसरी है ‘लस्ट ऑफ द आइज़’ - आँखों की वासना। काली करालवदना का प्राकट्य होता है तो मांस की इसी वासना के विपरीत। वे ‘शुष्कमांसातिभैरवा’ हैं। ‘उनके शरीर का मांस सूख गया था, केवल हड्डियों का ढांचा था।’ यह दृश्य-परिवर्तन जितना आकस्मिक दैत्यों के साथ है उतना ही अचानक इसी उत्तर-चरित्र में देवताओं के साथ भी। देवताओं के सामने कौशिकी के प्रकट होने पर पार्वतीदेवी का शरीर काले रंग का हो गया- कृष्णाभूत्सापि पार्वती। (पांचवाँ अध्याय)।

उपनिवेशवाद के कारण दुनिया में यह हादसा घटा कि जितने जिसके फीचर्स योरोपीय मानकों के नज़दीक थे, उतना उसका सामाजिक महत्व ज्यादा माना गया। लेकिन दुर्गा सप्तशती का यह तृतीय चरित्र रूप- परिवर्तन की इस त्वरा को देवों और दैत्यों दोनों के सामने प्रत्यक्ष कर हमें सतह और खोखल के बारे में सावधान करता है। अफ्रो-सेंट्रिक सौंदर्य का अपना भी स्थान है। पुराने समय में कृष्ण स्त्रियों को उनके सौंदर्य और सत्ता पर उनके नियंत्रण के लिए जाना जाता था। नेफरीटी, क्लीयोपेट्रा, कृष्णा आदि सभी का वर्ण काला था। आज जूडी पेस, विन्फ्रे ओपराह, हेली बेरी, टेयाना टेलर जैसी काली औरतें स्वयं अपनी सफलता के मानदंड रच रही हैं। लेकिन दैत्य मानसिकता तो गोरे अंगों की चकाचौंध में ही भ्रमित हो जाती है - ‘द्योतयन्ती दिशस्त्विषा’ - अपने श्रीअंगों की प्रभा से सम्पूर्ण दिशाओं में प्रकाश फैला रही है। दुर्गा सप्तशती का तृतीय चरित्र स्किन-डीप सौंदर्य-बोध को जानबूझकर झटके देता है। स्किन तक सीमित रहने वालों को वह दिव्यता देखनी है, जो ‘शुष्कमांसातिभैरवा’ में है। यह मांस सुखाने की बात जानबूझकर कही गई है - यह उनके लिए है जिन्हें कास्मेटिक्स की क्षमताओं पर बहुत यकीन है।


कुछ लोगों को यदि यह लगता हो कि दुर्गा एक विशिष्ट देवी हैं और स्त्री की प्रतिनिधि नहीं हैं तो वे इसी तृतीय चरित्र में देवताओं द्वारा की गई वह स्तुति पुनः सुनें जिसमें एकदम स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं :- स्त्रियः समस्ताः सकला जगस्तु त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्- इसका अर्थ यह है कि सप्तशती एक ‘यूनिवर्सल सिस्टरहुड ऑफ वीमेन’ स्थापित कर रही थी। स्त्रियों का एक सार्वभौम बहिन-बोध। सप्तशती का संदेश यह है कि स्त्री का आब्जेक्टिफिकेशन मत करो। स्त्री मेधा, सरस्वती, वरा, भूति, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, नियता, ईशा आदि आदि न जाने क्या-क्या है ? लेकिन उसे एक मूल्यवान वस्तु की तरह देखना उसके व्यक्तित्व की विविधता और समृद्धि से इंकार करना है। मुझे पंचम अध्याय में देवी की यह घोषणा ‘यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति’ बहुत महत्वपूर्ण लगती है। इसका हिन्दी अनुवाद ‘मेरे समान बलवान’ किया गया है जो एक अक्षम अनुवाद है। प्रतिबल शारीरिक ताकत की अवधारणा नहीं है। एक गलत अनुवाद के चलते ऐसी अद्भुत चीज सहसा ‘‘मैरिज बाई कैप्चर’’ जैसी सामंती मनोेवृत्ति को प्रोत्साहित करती लगेगी। मुझे एक सेल्टिक पुराकथा याद आती है जिसमें क्वीन मीव ऑफ कन्नॉट कहती है : I was she that required a strange bride gift, such as no woman had ever demanded from any man ..., namely that my husband should be a man not the least niggardly, without jealousy and without fear ............ For should the man that I had be niggardly, that were not well, since I alone should have the victory in battles, contests and affrays. And were he jealous, neither would that be well; for I have never been without one man in the shadow of anoter.

दुर्गा सप्तशती में देवी माँ बहुपतित्व का वैसा कोई संकेत नहीं करतीं जैसा इस पुराकथा में मीव करती है : One man in the shadow of another. लेकिन रानी मीव की तुलना में उनका एक ही शब्द ‘प्रतिबल’ बहुत सारे अर्थायामों को सामने लाता है। यह विवाह का एक निकष स्थापित करता है। यहाँ अपने जीवनसाथी के चयन पर पारिवारिक नियंत्रण नहीं है। यहाँ ‘अरेंज्ड विवाह’ नहीं है, यहाँ कोई मैचमेकिंग एजेंट नहीं है, यहाँ कोई विश्वस्त थर्ड पार्टी नहीं है। यहाँ वह विकृति भी नहीं है कि अरेंज्ड मैरिज की आड़ में ‘फोर्स्ड मैरिज’ हो रही है बल्कि यह ‘फोर्स’ के, दबाव के विरुद्ध खड़ी की गई कसौटी है। यह किसी तरह की ‘शॉटगन शादी’ नहीं हैं। आज ब्रिटेन आदि कई देशों में जबरिया विवाह आप्रवासी कर रहे हैं और वहाँ फोर्स्ड मैरिज (सिविल प्रोटेक्शन) एक्ट 2007 अभी हाल में पारित हुआ है। मानवाधिकारों की सार्वभौम उद्घोषणा [अनुच्छेद 16 (21)] में कहा गया था कि Marriage shall be entered into only with the free and full consent of the intending spouses.

यह भी ध्यान दीजिए कि दुर्गा सप्तशती के इस प्रसंग में कोई बाल विवाह नहीं है और न ही राजन्य विवाहों की तरह कन्या किसी सामरिक शतरंज पर एक प्यादे की तरह इस्तेमाल की जा रही है और न ताइवानी शिम्पुआ शादियों की तरह किसी आर्थिक सौदे में इस्तेमाल हो रही है। उस यूनीवर्सल डिक्लेरेशन से बहुत पहले दुर्गा ने यह एक घोषणा की - यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति - यह शादी के लिए नौकरी, पारिवारिक प्रतिष्ठा, लंबाई, जाति, ग्रह-मिलान, भोजन-आदतों, आयु, शिक्षा आदि के नार्म्स न प्रस्तुत कर सिर्फ एक नार्म रखती है : प्रतिबल। पुरुष स्त्री की काउंटरवेलिंग फोर्स के रूप में? जहाँ व्यक्ति की अपनी संस्वीकृति ही निर्धारक हो, न कि अभिभावकीय अरेंजमेंट, तो ऐसा समाज युवाओं को सशक्तीकृत करने वाला समाज होगा- जहाँ संसाधन युवाओं के हाथ में हों, जहाँ बच्चे माँ बाप के द्वारा उत्पादित ऐसा आउटपुट या प्रापर्टी नहीं हों जो मिल्कियत के माल की तरह ठिकाने लगाए जा सकें। प्रतिबल शब्द किसी तरह के गणितीय यथार्थ का नाम नहीं है चाहे वह गणित ग्रहों का हो या भौतिकी का। नाथानिएल हाथार्न की यह पंक्ति इस प्रतिबल शब्द के साथ मेरे मन में अक्सर गूंजी है : Let men tremble to win the hand of women, unless they win along with it the utmost passion of her heart.
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सरस्वती
कला, इतिहास और शिक्षा को लेकर खड़ी की गई बहसों के केन्द्र में हाल के दौर में सरस्वती रही हैं। श्री सरस्वती स्तोत्र में कहा भी गया था : ‘‘नित्यं प्रगल्भवाचालामुपतिष्ठे सरस्वतीम्’’- यानी प्रगल्भ और वाचाल हमेशा देवी सरस्वती के निकट रहे हैं। अब वो बात कितनी सच है, कौन जाने लेकिन सरस्वती को जबानदराजों ने घेर रखा है। सप्तशती ‘‘महाविद्या महावाणी भारतीवाक् सरस्वती/आर्या ब्राह्मी कामधेनु वेदगर्भा च धीश्वरी’’ जैसे कई रूपों में महासरस्वती का साक्षात कर रही है। वहाँ शुंभासुरप्रमथिनी शुभदा स्वरात्मिका रक्तबीज विहंन्नी मुंडकाय प्रहरणा ध्रूमलोचनमर्दना महासरस्वती का यश है। सरस्वती कला और विद्या की देवी तो हैं ही वे एक नदी का मानवीकरण भी रही हैं। लेकिन जिस तरह से नदी सरस्वती सूख गई, उस तरह से कला में सरस्वती को विवस्त्र करने और विद्या से उन्हें खदेड़ देने की कोशिशें भी आकार लेने लगीं। बात सरस्वती के ‘नकार’ पर कई तरह से केन्द्रित हो गई। इरफान हबीब जैसे इतिहासकार यह कहने लगे कि सरस्वती (नदी) कभी अस्तित्व में ही नहीं थी। रोमिला थापर बड़ी मुश्किल से मानीं लेकिन वे सरस्वती का सूखना 1000 ई.पू. के करीब बताने लगीं। विज्ञान के द्वारा सुनिश्चित तिथि से कम से कम एक हजार वर्ष बाद। सरस्वती नदी का विचार मात्र ही इतिहास के ‘प्रतिष्ठान’ पर हावी कुछ सज्जनों को विचलित करता है, इसलिए उनके विचलन की व्यथा से सहानुभुति रखते हुए सरस्वती शोध प्रकल्प अब नहीं चलता। सरस्वती को इतिहास और पुरातत्व में जगह नहीं है, सरस्वती को शिक्षा और विद्या में जगह नहीं है और सरस्वती को कला में विवृत्त और विकृत करना इन दिनों एक फैशनेबल ट्रेंड की तरह उभर रहा है। स्तोत्र कहता है कि ‘‘तद्दिव्यमव्ययं धाम सारस्वतमुपास्महे/यत्प्रसादात्प्रलीयन्ते मोहान्धतमसश्छटाः’’ कि सरस्वती की शाश्वत और दिव्य प्रभा मोह और अज्ञान का अंधकार समाप्त कर देती है।


सरस्वती, जो स्वयं ब्रह्मा की दुनिया में प्रथम सत्ता थीं, नवप्रस्थान के लिए हमेशा से एक जरूरी संदर्भ रही हैं। आज से शताधिक सालों पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने जब हिंदी की सर्जनात्मकता को एक आकार देना चाहा तो उनकी पत्रिका का नाम सरस्वती इतिहास के किसी संयोग से नहीं हो गया था, इतिहास की किसी इच्छा से ही हुआ था। उससे भी बहुत पहले जब भारतीय अस्मिता को आत्मविश्वास देने का सवाल आया था तो स्वामी दयानंद सरस्वती ही सामने आए थे। सरस्वती सृजन की निरंतर प्रेरणा रही है। भारत की इस अन्यतम पहचान भारती है। सरस्वती के सहारे ही भारत दुनिया भर में पहुँचा है। साइबेरिया की एगन्स्किी मोनास्ट्री में भी सरस्वती चित्रित हैं - भले ही वहाँ उनके फीचर्स थोड़े यूरोपीय हो गए हों - और जापान के मंदिरों - चिकुबू शिमा, इत्सुकू शिमा, इनो शिया, तेनकावा और किकासा - में भी वे ‘बेन जेई तेन’ के नाम से प्रतिष्ठित हैं। स्तोत्र कहता है कि हे देवी हमारी वैसी ही रक्षा कर जैसे संभाषण (verbal discourse) विमर्श ज्ञानी को अज्ञानी से पृथक कर देता है : प्राज्ञेतर परिच्छेदं विधन्ते वचसैव वा। लेकिन आजकल के संभाषण?


कुछ उलटपंथी इतिहासकार नदियों तक को सांप्रदायिक रूप से वर्गीकृत करने में लगे हैं। एक ऐसे ही इतिहासकार श्री आर.एस. शर्मा आरोप लगाते हैं कि सरस्वती हिंदुत्ववादियों को इसलिए प्रिय है क्योंकि सिंधु पाकिस्तान में है। वे न तो प्रतिवर्ष काश्मीर में आयोजित कराए जाने वाले सिंधु-दर्शन कार्यक्रम के बारे में जानना चाहेंगे, न यह कि सरस्वती का पहला मैप सन् 1881 के एक फ्रेंच एन्साइक्लोपीडिया में था - तब जबकि पाकिस्तान की संकल्पना तक का अता-पता न था। ज्ञान की अनन्त जिज्ञासा और अन्वेषणात्मकता शोध प्रकल्पों को बंद करने वाली शुतुर्मुर्गी मानसिकता का परिचय नहीं देती। दरअसल सरस्वती बहुत से स्थापित दुराग्रहों के सामने एक चुनौती की तरह सामने आती हैं और कुछ दिक्कतें पैदा करने वाले सवाल खड़े करती हैं। इतिहास के अधिष्ठाता इतिहासकारों के प्रतिद्वंद्वी समुदाय के विचार का उत्तर तो दे सकते हैं - विज्ञान का उत्तर कैसे दें? भू-भौतिकी का? हिमानी तंत्र विज्ञान का? दूरसंवेदी विज्ञान का? खगोल विज्ञान का? प्लेनेटेरियम कम्प्यूटर साफ्टवेअर का? हाइड्रोलाजी का? समुद्र विज्ञान का? कार्बन डेटिंग का? आण्विक भौतिकी का? वैसे भी सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में देवी को ‘‘सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते’’ कहा गया।

बुद्धिरूप से सब लोगों के हृदय में स्थित रहने वाली। जो बात देवी सरस्वती के बारे में है, वही उस अदृश्य स्रोतस्विनी के बारे में भी। बुद्धि विज्ञान के इन विभिन्न अनुशासनों में है। इतिहास जब तक कला या ह्युमेनिटीज़ था, भाई लोगों ने खूब कलाकारी दिखाई। जिन मिल, मार्क्स और मैक्समूलर ने एक बार भी भारत आने की जहमत नहीं उठाई, भारत के इतिहास पर उनके वचन प्रमाणवाक्य हो गए। जिन मोहतरमा को न संस्कृत की थाप पता थी, न अवेस्तन भाषा की - वे वैदिक ज्ञानपरंपरा को अवेस्ता से उद्भूत बताने लगीं। पाठ्यपुस्तकों में सैंधव-सभ्यता तो चित्रित हुई (जबकि उस नदी के किनारे 600 पुरातात्विक स्थल हैं) लेकिन सारस्वत सभ्यता को निष्कासित कर दिया गया (जबकि उस नदी के किनारे 2000 से अधिक पुरातात्विक स्थल पाए गए)। सरस्वती सभ्यता वस्तुतः इतिहास लेखन की उस मान्यता के विरुद्ध है कि सभ्यता का प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर हुआ, वह मान्यता जो मैक्समूलर जैसों के द्वारा यूरोपीयन पॉलिटिक्स में जर्मन राष्ट्रवाद के उभार के लिए स्थापित की गई। सरस्वती सभ्यता आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत के भी विरुद्ध पड़ती है जिसके जरिए आक्रमणकारी यूरोपीयों ने अपने उपनिवेशवाद को जस्टिफाई करना चाहा। इसलिए यह भुला देना ही बेहतर था कि ऋग्वेद में सरस्वती नदी के 72 उल्लेख हैं जबकि सिंधु नदी के बहुत ही कम। च्यवन, कपिल, वशिष्ठ, मार्कण्डेय, याज्ञवल्क्य, शौनक, विश्वामित्र आदि के आश्रम सरस्वती नदी बेसिन में स्थित बताए जाते हैं और लोकपरंपरा आज भी मेलों के रूप में इन आश्रमों की सारस्वत स्मृतियों को जिंदा रखे हुए है। वैदिक सरस्वती एक अत्यंत शक्तिशाली नदी है जो 1600 कि.मी. के विराट क्षेत्र में फैली हुई है, जिसको ‘सप्ताही’- सात धाराओं वाली - कहा गया है और शतुद्रि (सतलज) यमुना जैसी नदियाँ जिसकी सहायक नदियाँ हैं, जिसका घोष वेदव्यास तक को अस्थिर कर देता है।

 
वही सरस्वती अब मूक बना दी गई है। जिस सरस्वती को श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम् कहा गया, उसके बारे में ऐसी कर्कशता? सरस्वती वंदना का विरोध भी कुछ ऐसा ही है। वह हमें ‘शिक्षा के धर्म’ के बारे में सोचने पर विवश करता है। सप्तशती महासरस्वती वाले तेरहवें अध्याय में कहती है कि ‘‘विद्या तथैव क्रियते’’ कि वे ही विद्या (ज्ञान) उत्पन्न करती हैं लेकिन अब उसी सरस्वती को विद्या के क्षेत्र से खारिज करने की बहस चल रही है। जिसे ‘‘विद्यारूपा विशालाक्षी’’ कहा गया था, उसके संबंध में यह लघुदृष्टि? यह अंधता? क्या शिक्षा ‘ग’ गधे का पढ़ाने पर अधिक सेकुलर हो जाएगी? केंद्र सरकार के मानव संसाधन विभाग के जिस कार्यक्रम में सरस्वती-वंदना का विरोध हुआ, यदि वहाँ ‘इन द बिगिनिंग वाज़ द वर्ड’ जैसा कोई टेस्टामेंट सूक्त सुनाया जा रहा होता तो क्या उसका विरोध होता? क्या तब उसे शिक्षा की सांप्रदायिकता कहा जाता? भारती का गान भारत में न होगा तो कहाँ होगा? लेकिन ऐसा विरोध शिक्षा को सेकुलर बनाने के चक्कर में उसे संदर्भ-च्युत बना देता है। मिखाईल बाख्तिन जैसे वामपंथी सिद्धांतकारों ने शिक्षा, शासन और सार्वजनिक जीवन में सांस्कृतिक पूंजी के इस्तेमाल के निर्देश दिए थे लेकिन भारत में शिक्षा क्या सांस्कृतिक जीवन के दमन पर ही शिक्षा हो सकेगी? एक अमेरिकन कवि ने कहा था : ‘‘हिअर आई बो माई हेड टु प्रे/बट नॉट टु माई गॉड, आई एम अशेम्ड टु से/फॉर ही इज़ नाट सैंक्शंड बाई ट स्टेट/सो सम अदर प्रेयर आई मस्ट मेक।’’ लेकिन शताब्दियों से चली आई विद्याध्ययन के पूर्व वीणावादिनी की वंदन-परंपरा सहसा क्यों घातक लगने लगी? क्या यह राज्य और समाज के बीच बढ़ते हुए फर्क, फांक और फासले का पता देती है? क्या इसके चलते अब राज्य शिक्षक दिवस मनाता है और समाज गुरू पूर्णिमा?

राज्य को समाज के ‘बीच’ लोकेट करना इतना आपराधिक क्यों बना दिया जाना चाहिए? पश्चिम बंगाल के जो बंधु दिल्ली की उस सरस्वती-वंदना का इतना विरोध कर रहे थे, कुछ दिनों बाद अखबारों ने रिपोर्ट किया कि वे पश्चिम बंगाल के एक विद्यालयीन कार्यक्रम में सरस्वती-वंदना रुचिपूर्वक सुनते रहे। क्या फर्क इसका था कि दिल्ली में वे मुख्य अतिथि नहीं थे, हालांकि दोनों ही जगह शैक्षणिक कार्यक्रम की शुरूआत सरस्वती वंदना से हुई थी? क्या शिक्षा में सरस्वती-वंदना का विरोध धर्म के समाज शास्त्र का विरोध है? क्या शिक्षा में सरस्वती-वंदना का विरोध शिक्षा में देश की आध्यात्मिक विरासत को प्रवेश करने से मना करना है? क्या एक तत्कथित धार्मिक प्रतीक का उल्लेख आवश्यक तौर पर दूसरे मज़हबों की ‘इंसल्ट’ है? क्या शिक्षा सहिष्णुता की सरहदें तय करने के लिए है या उसे निःसीम बनाने के लिए? क्या ड्रग्स, हिंसा, किशोर यौनाचार, परीक्षा के तनावों और मनस्तापों के समकक्ष सरस्वती एक प्रत्यौषधि का मानक नहीं है? क्या चर्च को स्टेट से पृथक कर किशोरी गर्भधारण और स्कूल शूटिंग के पारितोषिक प्राप्त करना वाकई स्पृहणीय है? क्या सरस्वती के आइकॉन की धर्मेतर और शिक्षण-विशिष्ट व्याख्याएँ संभव ही नहीं हैं? क्या सरस्वती की पहचान ‘‘कुमतिध्वंसकारिणीम्’’ के रूप में नहीं है? क्या उसे ‘‘ज्ञानाकरां’’ नहीं कहा गया? सरस्वती का आइकॉन अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक लिए हुए है। अंकुश क्या अनुशासन का प्रतीक है? अंग्रेजी शब्द ‘डिसाइपल’ (छात्र) और ‘डिसिप्लिन’ क्या इसीलिए एक ही मूल के हैं? लेकिन सिर्फ अनुशासन की बात ही नहीं है।

क्या एक हाथ में वीणा और दूसरे हाथ में किताब लिए यह ‘आइकॉन हमें यह कहता प्रतीत नहीं होता कि शिक्षा में थोड़ी सांगीतिकता भी होनी चाहिए? स्कूल की दीवार में दरवाजे भी रखिए/फिर लौट के बचपन जमाने नहीं आते। इसीलिए सरस्वती प्रार्थना में ‘वीणापुस्तकधारिणीं’ एक साथ ही कहा गया। इसीलिए सरस्वती स्तोत्र में कहा गया : ‘‘सरस्वती नमस्यामि चेतनां हृदि संस्थिताम्/कंठस्थां पद्मयोनिं त्वां हृीकारां सुप्रियां सदा।’’ यहाँ सरस्वती को हृदय में स्थित चेतना और कंठ में निवास करने वाली दोनों रूपों में देखा गया। उसे ‘‘कवित्वं मत्प्रसादेन प्राप्नुवंति मनोगतं’’ कहा गया। कविता करने की संवेदना पैदा करने वाली।


सरस्वती कला के इस दौर में कलात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के प्रश्न भी पैदा करती है क्योंकि हमारे समय के एक बड़े चित्रकार ने सरस्वती को नग्न चित्रित किया। इस घटना के बाद हुई व्यापक प्रतिक्रिया ने कला जगत में एक अनूठी विचारोत्तेजना पैदा की। उस कलाकार ने सरस्वती के कुछ संयत चित्र भी बनाए। तब उस से अलग हटकर वह कलाकार इस तरह के नए चित्रण के माध्यम से क्या संप्रेषित करना चाह रहा था? कि ये वह दौर है जब विद्या और कला को बेपर्दा किया जा रहा है? कि देश की देवियाँ जिस राह का वरण कर रही हैं वहाँ कोई आवरण नहीं है? कि जो शुभ्रवस्त्रावृत्ता थी वह आज किस नंगे तरह से बाजार और पूंजी के हक में इस्तेमाल हो रही है? कि इस युग में दिव्यत्व भी देहत्व हो चला है? कि जहाँ देवियाँ भी फाश होने से नहीं बच पा रही हैं, हमारे शहर और गाँवों की औरतें कितनी सुरक्षित हैं? कलाकार ने भले ही इनमें से किसी भी अर्थ का पक्ष-पोषण नहीं किया, लेकिन कलाकार को यह अधिकार है कि वह अपनी कृति के इतर कोई वक्तव्य नहीं दे। कृति एक स्वतः प्रामाण्य है।

लेकिन इसके समानान्तर एक दूसरा सवाल - संसार है और उसके प्रश्न भी कला से इतर प्रश्न नहीं हैं। ‘आइकोनोग्राफी’ और कला के रिश्ते क्या हैं? क्या आइकॉन अपने साथ ही कुछ अपरिहार्यताएँ लेकर कला में नहीं आते? क्या कला में आइकॉन आईकॉन नहीं रहता, सिर्फ एक पदार्थ हो जाता है जिसे कलाकार मनचाहा मैनीपुलेट कर सकता है? क्या कलाकार जिसके आशीर्वाद की साधना करता है, उसे साधनमात्र के रूप में अपघटित भी कर सकता है? साधना से साधन के बीच की जो दूरी है, उसे तय करते वक्त कलाकार किन असंवेदनशीलताओं से गुजरता है? आइकॉन सिर्फ एक छवि नहीं है, पवित्र छवि है। यदि उन चित्रकार महोदय ने ईसाइयत में आइकोनोग्राफी के नियम पढ़े होते तो उन्हें पता लगता कि वे नियम चित्रकार के सामने कितने कठोर अनुशासन को आरोपित करते हैं। वहाँ पेंट करने से पहले अपनी आत्मा को प्रशांत करना होता है, स्वयं को ईश्वर के सामने समर्पित करना होता है। प्रार्थना और व्रत करना होता है। आइकॉन की चित्रकला कल्पनाधारित नहीं हो सकती। उसमें पारंपरिक व विहित शासन और शैली का ही उपयोग करना होता है। सिंडी एग्ली कहती है कि ‘आइकॉन की रचना परम्परा से परिभाषित होती है।’ ये स्वनामधन्य चित्रकार आइकॉन चित्रण और उनके प्रसिद्ध घोड़ों के चित्रांकन में फर्क ही नहीं करते। आइकॉन की अपनी एक टाइपोलॉजी होती है लेकिन ये सज्जन सरस्वती का व्यक्ति-चित्र खींचते हैं। एक आइक़ॉन का चित्र घर में होना ऐसा है जैसे घर में देवी का मौजूद होना।

क्या उस तपःपूत मन से इन चित्रकार ने चित्र बनाया है ? आइकॉन के चित्र का स्थैर्य मन में एक गंभीर शांति का सृजन करता है, लेकिन यहाँ तो चित्र ने पूरे भारत में अशान्ति निर्मित कर दी। सेंट ल्यूक ने वर्जिन मेरी की पहली पेंटिंग बनाई थी। वह उनका प्रतिनिधि चित्र हो गई। बाद के सभी चित्रकारों ने उसका अनुसरण किया। वहाँ वर्जिन मेरी को किसी ने बंदर की पूँछ पर नहीं बिठाया, या उनके निजी अंगों के द्वार से पूँछ निकलते नहीं दिखाई, आइकॉन किसी तरह के भौतिक यथार्थ को नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक यथार्थ को प्रदर्शित करता है। तब पूछा जा सकता है कि क्या वह कला कला है जो आइकॉन की ग्रेस को जानबूझकर खत्म करती है? यह संवेदनशीलता मेविस गेवान्त, हीडी रौहट, पीटर वेल्टवर्डे जैसे कई यूरोपीय चित्रकारों ने दिखाई है और सरस्वती को उनकी पूरी गरिमा, प्रतिष्ठा और पवित्रता के साथ चित्रित किया है। तब भारतीय संवेदना के साथ तदाकार होने की ज्यादा सुविधा जिन्हें उपलब्ध है, वे क्यों मन का सत्व नहीं दिखा सके? सरस्वती तो ‘‘लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा धृतिः’’ जैसी अष्टनिधियों को देने वाली है, उसका चित्रण इन सबके साथ हो तब ही पूर्ण होगा।


    यह सरस्वती ‘वाक्’ की देवी है। इसे ‘वाक्’ रूप में दुर्गा सप्तशती में भी देखा गया है। मुझे द्वितीय अध्याय में देवी के ‘नाद’ की याद आती है जो कहीं न समा सका, आकाश जिसके सामने लघु प्रतीत होने लगा : ‘‘तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः यह ‘शब्द’ प्रतिशब्द को पैदा करता है जो संपूर्ण विश्व में हलचल मचा देता है और जिससे समुद्र काँपने लगता है, पृथ्वी डोलने लगती है, पर्वत हिलने लगते हैं। क्या यह अतिशयोक्ति है या यह शब्द कारित गति है, अस्तित्व की स्ट्रिंग थियरी? सरस्वती की वीणा की स्ट्रिंग्स से भी क्या हमें कोई इंगित नहीं मिलता? भौतिकी की एम-थियरी के स्वनन को क्या इस जागतिक देवी के घंटे में चीन्हा जा सकता है? घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिः स्वनेन च। हमारे शास्त्रों में नादस्फोट की चर्चा है। वह बिग बैंग क्या है? वह क्या है जो समस्त दिङ्मुख को भर देता है। नादापूरितदिङ्मुखा नाद वह जो संपूर्ण दिशाओं और अम्बर को भर देता है। नादापूर्णदिगंबरा (8/37) कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि हमारे महान चित्रकार इस दिगम्बरा को वह दिगंबरा समझ बैठे? शब्द की सतह अक्सर फिसलन भरी होती है।

यह क्यों हुआ कि हुसैन के आर्ट पर नज़्म लिखते हुए सिकंदर अली ‘वज्द’ को सबसे पहले ‘‘बेहिजाव तस्वीरें’’ (बेपर्दा चित्र) ही याद आई। जगन्नाथ ‘खुश्तर’ ने जब सरस्वती का वर्णन किया तो उन्होंने लिखाः ‘‘ख़जिल नूरे-जहाँ नूरे-जबीं से/बनी क़ौसेक़ुज़ह अबरू की चीं से।’’ अर्थात संसार का प्रकाश उसके ललाट के प्रकाश के सामने शर्मिंदा होता है। यह इन्द्रधनुष उन्हीं के भौहों की सिलवट है। मुझे बौद्ध ग्रंथों की याद आती है जो एक ध्वन्यालोक (Sonorous Light) या प्रज्वलध्वनि (Flaming Sound) की चर्चा करते हैं। सरस्वती की इस वाक-विभा को पकड़े बिना उन पर रेखाएँ खींचना, उन्हें शिक्षादि से बाहर करना सिर्फ यह सूचित करता है कि इन सज्जनों के पास न शब्द की ज्योति है, न ज्योति का शब्द है। जिस शब्दालोकमयी देवी का फलक इतना व्यापक हो, उसका चित्रण बहुत-सी संकीर्णताओं के चलते कैसे सार्थक होगा?
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प्रकृति
दुर्गा सप्तशती में प्रकृति का भी एक बिम्ब है। प्रथम अध्याय में देवी को ‘प्रकृतिस्त्वं’ कहा ही गया था। भारत की ‘प्रकृति’ पश्चिमी ‘नेचर’ से भिन्न है। वहाँ नेचर वह है जो सुपरनेचुरल नहीं है, जो भौतिक और पार्थिव है जबकि भारत में दुर्गा सप्तशती के प्रमाण से हम कह सकते हैं कि प्रकृति माँ दुर्गा की ही सुषमा है। चतुर्थ अध्याय में देवी की परिभाषा करते हुए इसीलिए लिखा गया : आप सबकी आदिभूत अव्याकृता परा प्रकृति हैं : अव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्तरमाद्या। यही फर्क है। प्रकृति में एक ‘स्पिरिट’ का दर्शन ही नहीं, प्रकृति में एक ‘ही’ स्पिरिट का दर्शन। प्रकृति के प्रति एक उपयोगितावादी दृष्टिकोण पश्चिम में पनपा और प्रकृति चूँकि पदार्थ से अधिक नहीं समझी गई, इसलिए अवशोषण का एक मानस लगातार चला आया। दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय में ‘‘नमः प्रकृत्यै भद्रायै’’ कहकर प्रकृति को नमस्कार किया गया। यह प्रणति तभी संभव है जब प्रकृति को देवी कहा गया हो, समझा गया हो। यह फर्क कई मौकों पर दिखाई देता है। भारत में एवरेस्ट को गौरीशंकर कहा गया। लेकिन एडमंड हिलेरी जब एवरेस्ट पहुँचा तो उसका उद्गार था : ‘आई नॉक्ड द बास्टर्ड ऑफ’ (मैंने उस हरामी को ठिकाने लगा दिया) मैंने किसी को यह मजाक उड़ाते भी सुना कि जहाँ सूर्य की पूजा होती हो, वहाँ ऊष्मा-विज्ञान कैसे पनपता? लेकिन मैंने देखा कि सूर्याराधना वाले देश में सूर्य-सैद्धान्तिकी भी पनपी। सूर्यतंत्र विज्ञान भी पनपा जिसे भले ही आधुनिक लोग ‘वीक साइंस’ कहते रहे हों, लेकिन विज्ञान तो वह है ही। प्रकृति में एक ‘स्पिरिट’ का स्वीकार उसके विज्ञान का अस्वीकार नहीं है। ठीक उसी तरह से जैसे मनुष्य में ‘स्पिरिट’ का स्वीकार मनोविज्ञान का अस्वीकार नहीं है।


इंका, असीरियन, बेबीलोनियन, रोमन, ग्रीक, स्लोवोनिक, प्रोटो-इंडो-यूरोपीयन पौराणिकियों में प्रकृति माता की कल्पना किसी न किसी रूप में रही ही। प्रकृति-माँ एक तरह से प्रकृति की जीवनदायी और पोषक तत्वों का ही एंथ्रोपोमाइज्ड चित्रण है। प्रकृति के लिए अंग्रेजी शब्द नेचर जिस लैटिन शब्द ‘‘नेचुरा’’ से आया है, उसका एक अर्थ है चरित्र। दुर्गा चरित्र भी- चाहे वे प्रथम हों, मध्यम हों या उत्तर-इसी संगति में हैं। अरस्तू के यहाँ प्रकृति किंचित संकुचित होने पर भी एक पर्सोनिफाइड देवी है। मध्यकालीन यूरोप में प्रकृति-माता एक पर्सोनिफिकेशन भर रह गई थीं, उसका दिव्यत्व क्षीण हो गया था। ग्रीक पौराणिकी में पृथ्वी-माता डिमीटर है। रोमन मिथक शास्त्र में टेरा मेटर या टेलुस नामक देवी पृथ्वी का व्यक्तित्वांकन ही है। वहाँ भी टेलुस पृथ्वी की संरक्षिका देवी है। पुराने ग्रीस में गीया के नाम से उठाई गई सौगंध सबसे ज्यादा बंधनकारी मानी जाती थी। नवपैगन तो गीया को न सिर्फ पृथ्वी बल्कि संपूर्ण विश्व को रूपायित करने वाली देवी मानते हैं। दुर्गा सप्तशती भी उन्हें विश्वेश्वरी त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वं के रूप में व्यक्त करती है। जावानीज, बालिनीज और इंडोनेशिया के ही सूडानीज लोगों में देवी श्री की एक अवधारणा है।


दुर्गा सप्तशती में प्रकृति का मातृत्व है और मातृत्व की प्रकृति है। उसके विभिन्न रूप हैं। उसमें बार अट्टहास करती हुई शिवदूती को पढ़कर मुझे अक्सर विलियम ब्रायंट की कविता याद हो आई है :
Is this a time to be cloudy and sad/ When our Mother Nature laughs around /When even the deep blue heavens look glad /And gladness breathes from the blossoming ground.

प्रकृति दुर्गा सप्तशती में संकट में है। द्वितीय अध्याय में जहाँ यह कहा गया है कि महिषासुर सूर्य, इंद्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओं के भी अधिकार छीनकर स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बन बैठा है- वहाँ इस संकट का प्रथम वर्णन मिलता है। इस संकट को उत्तर चरित्र में शुंभ निशुंभ द्वारा प्रकृति की शक्तियों की लूट के सिलसिलेवार वर्णन के रूप में फिर बतलाया गया है। उन्होंने वरुण से तीन चीजें छीनी हैं- एक सुवर्ण की वर्षा करने वाला छात्र, पाश और समुद्र में होने वाले रत्न। उन्होंने समुद्र की किंजल्किनी नामक माला छीनी जो केसरों से सुशोभित है और जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं, उन्होंने अग्नि के वस्त्र छीने हैं। मृत्यु की उत्क्रांतिदा नाम वाली शक्ति छीनी है। उन्होंने इन्द्र से भी तीन चीजें छीनी हैं - ऐरावत, पारिजात वृक्ष और उच्चैःश्रवा घोड़ा। प्राकृतिक सम्पदा की यह पाशविक लूट महिषासुर के द्वारा चित्रित की गई है। एक तरह की एनीमलिस्टिक लस्ट। मनुष्य और पशु की संयुक्ति का आदर्श यदि नृसिंह, गणेश और हनुमान हैं तो विकृति का प्रतिमान महिषासुर है।  ग्रीक पौराणिकी में किमेरा नामक एक नृशंस प्राणी है जिसका सिर सिंह का है, शरीर बकरी का और पूँछ सर्प की। एक दूसरा दैत्य ग्रीक मिथकों में सेंटोर का है जिसका शरीर और टाँगें घोड़े की हैं और सर तथा बाँहें मनुष्य जैसी। एक अन्य दैत्य एनफील्ड का है जिसका शरीर ग्रेहाउंड का है, सर फॉक्स का, आगे के अंग ईगल के और पीछे के वोल्फ के।


पशु मानवीय अनुभव और फैंटेसी के विभिन्न पहलुओं को प्रतीकायित करने, प्रकाशित करने और नाट्यीकृत करने के काम में अनुसूचित होते रहे हैं। लौटेन डास्टन और ग्रैग मिटमेन की पुस्तक ‘थिंकिंग विद एनीमल्स : न्यू पर्सपेक्टिब्स ऑन एंथ्रोमार्फिज्म’ इस तरह के अनेक उदाहरण देते हैं। फाउस्ट के चित्रण में गोएथे ने मेफिस्टोफिलिज नामक डेविल का चित्रण किया है। इस ग्रीक शब्द का अर्थ हुआ - ‘वह जो प्रकाश का प्रेमी नहीं है। महिषासुर भी अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाली देवी की ओर क्रोध में भरकर दौड़ता है- देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषं। ग्रीक पौराणिकी में मिनोटार एक ऐसा ही दैत्य है जो आधा मनुष्य और आधा महिष बल्कि सांड है। पाब्लो पिकासो अपने चित्रों में ऐसे दैत्य का चित्रण बार-बार किया है जो महिषासुर जैसा है और जो रेप भी करता है और हत्या भी। मेसोपोटामिअन पौराणिक में शेदु है जिसका शरीर महिष का और सिर आदमी का है। जापानी लोककथाओं में उशी-जोनी नामक दैत्य है जिसका महिष जैसा सिर है।


बहरहाल हम बात कर रहे थे प्रकृति की? शक्तियों और संसाधनों की लूट की। पाँचवे अध्याय में कहा गया है कि : ‘‘जावे सूर्यतां तद्वाधिकारं तथैन्दवम। कौवेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च // तावेव पवनर्द्विं च चक्रतुर्वहिकम च -- कि शुभं निशुंभ सूर्य, चंद्रमा, कुबेर, यम और वरुण के अधिकार का भी उपयोग करने लगे। वायु और अग्नि का कार्य भी वे ही करने लगे - वैसे तो अधिकांशतः छीनने और स्नैच करने के विवरण हैं, लेकिन कहीं-कहीं ये विवरण भेंट करने के भी हैं जैसे ‘‘समुद्र ने भी आपको किंजल्किनी नाम की माला भेंट की है या ‘‘अग्नि ने भी स्वतःशुद्ध किए हुए दो वस्त्र आपकी सेवा में अर्पित किये हैं।’’ लेकिन यहाँ भेंट और अर्पण से भ्रमित होने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह अधिकाधिक यही सिद्ध करता है कि ‘पब्लिक गुड्स’ अब ‘प्राइव्हेट गिफ्ट्स’ में बदल गए हैं और यह बात भी उतनी ही आपत्तिजनक है जितना लूटपाट और डकैती। इस भेंट में कोई प्रतिदान नहीं है, बल्कि एक तरह की negative reciprocity हैं। औपनिवेशिक अमेरिका में एक शब्द चलता था- ‘भारतीय भेंट’ (इंडियन गिफ्ट) जिसका अर्थ होता था ऐसा उपहार जिसके बदले में बराबर का प्रतिदान मिले। लेकिन इन दैत्यों के यहाँ भेंट एक तरह का फ्री लंच था जिसमें पारस्पर्य नहीं था।


समुद्र को जीत लेने का अर्थ क्या है? समुद्र की पराजय कैसे होती है? जब समुद्र ऑइल स्पिल्स से, विषैले कचरे से और अन्य क्षतिकारी सामानों की डंपिंग से ग्रस्त हो तो समुद्र की पराजय है जो समुद्र के जानवरों और वनस्पतियों को प्रभावित करती है और अंततः सी फूड के रूप में खुद हमें। प्रतिवर्ष 760 मिलियन गैलन तेल समुद्रों में मिल रहा है। तेल सिर्फ टैंकर दुर्घटनाओं से ही नहीं फैलता। कोस्ट गार्ड्स का आकलन है कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के बाहर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से साल भर होने वाला शांत डिस्चार्ज टैंकरों से फैलने वाले तेल से दुगुना है। आज लुइसियाना और टैक्सास के तट के पास 4000 वर्गमील का बॉटम एरिया ‘डेड जोन’ के रूप में जाना जाता है जहाँ मत्स्य जीवन ही नहीं रह गया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2004 तक दुनिया में ऐसे 146 डेड जोन हो चुके थे। सबसे कुख्यात डेड जोन मैक्सिको खाड़ी में है जो 2200 वर्ग किमी तक फैला हुआ है। विश्व के 109 देशों में कोरल रीफ हैं, उनमें से 90 की कोरल रीफ क्षतिग्रस्त हो गई हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन का आकलन है कि विश्व के 17 बड़े मत्स्याखेट क्षेत्रों में से 4 खलास हो गए हैं और बाकी 13 या तो अपनी क्षमता से ज्यादा आखेट या अति-आखेट से ग्रस्त हैं। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की व्यावसायिक सामुद्रिक मत्स्याखेट में हर वर्ष 20 बिलियन पौंड ‘नॉन-टारगेट’ मछली पकड़ी जाती है जो इच्छित व्यावसायिक या मनोरंजनात्मक दोनों को मिलाकर होने वाले मत्स्याखेट के दुगुने से भी ज्यादा है। समुद्र का क्षारीकरण (Acidification) हो रहा है।


वरुण देवता को भी पराजित कर दिया गया है। वरुण जल के देवता है। पृथ्वी की सतह का 70 प्रतिशत जल है। लेकिन आज भी 1.1 बिलियन लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। 2.6 बिलियन लोगों के पास सैनिटेशन के लिये पर्याप्त पानी नहीं है। जल स्रोत इतने अशुद्ध भी हैं कि सभी बीमारियों में से 88 प्रतिशत तो गंदे पेयजल या अपर्याप्त हाइजीन और कमजोर सैनिटेशन के कारण ही होती हैं। जैवविविधता भी खतरे में पड़ गई है और कृषि उत्पादकता भी कम हो गई है। दुनिया की आधी अस्पताल शैयाएँ जलाधारित बीमारी से ग्रस्त लोगों ने कब्जा रखी हैं। दुनिया में प्रतिदिन 3900 बच्चे डायरिया मात्र से मर रहे हैं। दुनिया की 260 नदी प्रणालियाँ इन दिनों किसी न किसी बड़े झगड़े की जड़ है। 1992 में हंगरी-चेकोस्लोवाकिया के विवाद की जड़ में डैन्यूब नदी का जल था। दजला-फरात नदियों के पानी को लेकर ईरान-ईराक-सीरिया जब तक एक-दूसरे से युद्ध करने लगते हैं। सूडान, ईरान, वेनेजुएला, जिंबाव्वे, क्यूबा, ट्यूनीशिया, सीरिया आदि कई देश जलसंकटापन्न देश माने जा चुके हैं। इस्रायल, सिंगापुर, बर्मूडा जैसे देश तो पानी के अवलवणीकरण (desalination) पर उत्तर आए हैं। क्या उस समय भी जल संकट ऐसा ही था? क्यों वरुण ने पाश और शंख देवी को दिए? क्या पाश जल के संबंध में किसी किस्म के नियमन या अनुशासन का सूचक है? क्या शंख किसी किस्म की जन-जागृति अभियान या जल-जागृति उद्घोष का सूचक है?


और ऐसा भी नहीं है कि जिस वरुण के तेज से देवी की जंघा और पिंडली बनी, जिसने देवी को शंख और पाश दिए, परिणति का प्रभाव उस पर न पड़े। अतः दैत्य के मारे जाने पर सप्तशती बताती है कि नदियाँ भी ठीक मार्ग से बहने लगीं- सरितो मार्गबाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते।


द्वितीय चरित्र में महिषासुर वायु के अधिकार भी छीन लेता है (2/6)। ‘अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति’। उत्तर चरित्र के पाँचवे अध्याय में वायु के साथ यही बर्ताव शुंभ-निशुंभ करते हैं। ‘‘तावेव पवनर्द्धि’’ में यही बात कही गई है। (5/4) ध्यान रखें कि प्राचीन सुमेर में वायु देवता का नाम भी एनलिल था जो संभवतः संस्कृत ‘अनिल’ जैसा ही है। महिषासुर ‘अनिल’ के अधिकार भी छीनता है। क्या वायु का आसुरी स्वत्व वायु का दूषण नहीं है? वायु में पर्टिकुलेट मैटर की अधिकता? वायु में कार्बन डाइआक्साइड या मोनो आक्साइड के स्तर का या कैडमियम, कॉपर आदि जहरीली धातुओं के स्तर का अत्यधिक बढ़ जाना? विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रतिवर्ष वायु-प्रदूषण से जुड़े हुए कारणों से 24 लाख लोग मरते हैं। निश्चित ही सप्तशती का संबंध वायु-प्रदूषण से रहा होगा। इसीलिए दैत्यों के मारे जाने पर यह उल्लेख किया गया है कि पवित्र वायु बहने लगी- ‘‘ववुः पुण्यास्तथा वाताः’’।


दुर्गा सप्तशती कहती है कि प्रकृति की ही शक्तियाँ इसकी प्रतिरोधी सत्ता के तेज को सृजित करती हैं। चंद्रमा, इंद्र, वरुण, पृथ्वी, संध्या, वायु। ‘‘सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत्/वारुणेन च जङ्धोरू नितम्बत्तेजसा भुवः/भ्रुवौ च संध्योस्तेजः श्रवणावनिलस्य च’’ चंद्रमा के तेज से दोनों स्तनों का और इंद्र के तेज से मध्य भाग (कटि प्रदेश) का प्रार्दुभाव हुआ। वरुण के तेज से जंघा और पिंडली तथा पृथ्वी के तेज से नितंब भाग प्रकट हुआ। उसकी भौहें संध्या के और कान वायु के तेज से उत्पन्न हुए थे। पुनः प्रकृति की ही शक्तियाँ इस प्रतिरोधी सत्ता को  ाृंगारित व अस्त्र-शस्त्र से सुजज्जित करती हैं। वरुण शंख और पाश देता है, अग्नि शक्ति, वायु धनुष तथा बाण से भरे हुए दो तरकस, इंद्र वज्र से वज्र तथा घंटा, यमराजकाल दंड से दंड। सूर्य देवी के समस्त रोमकूपों में अपनी किरणों का तेज भर देता है। काल चमकती हुई ढाल और तलवार देता है। क्षीर समुद्र उज्ज्वल हार, कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट करता है। साथ ही दिव्य चूड़ामणि, दो कुंडल, कड़े, उज्ज्वल अर्धचंद्र, सब बाहुओं के लिये केथूर, दोनों चरणों के लिए निर्मल नुपूर, गले की सुंदर हँसली और सब अंगुलियों में पहनने के लिए रत्नों की बनी अंगूठियाँ भी दीं। जलधि ने उन्हें सुंदर कमल का फूल भेंट किया, हिमालय ने सवारी के लिए सिंह तथा भाँति-भाँति के रत्न समर्पित किए। सम्पूर्ण नागों के राजा शेष ने जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट दिया। पंचम अध्याय में जगत की आधारभूता कृति देवी को बारंबार नमस्कार कहा गया है और प्राकृतिक गुणों-चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, तृष्णा, छाया, वृत्ति, स्मृति, श्रद्धा, शक्ति आदि- को भी। इस स्तुति में की- वर्ड है - ‘सर्वभूतेषु’। यह बार-बार आया है और यह मनुष्यमात्र की नहीं बल्कि भूतमात्र की एकता को स्थापित करता है। देवी को विश्वेश्वरि, विश्वरूपा, विश्वात्मिकाः, विश्वार्तिहारिणी कहने का भी यही अर्थ है। यहाँ ‘सर्व’ या ‘विश्व’ की बात चयन की इंजीनियरिंग के नकार की बात है। यह स्तोत्र नेचुरल सेलेक्शन की सैद्धांतिकी के भी खिलाफ है और किसी किस्म की सोशल इंजीनियरिंग के भी खिलाफ।


यह चीज भी दुर्गा सप्तशती में हमारा ध्यान खींचती है कि प्रकृति की लूटपाट करने वाले राक्षसों के नाश के बाद प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ता है? दशमोध्याय में कहा गया है कि ‘‘तदनन्तर उस दुरात्मा के मारे जाने पर सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया तथा आकाश स्वच्छ दिखायी देने लगा।’’ ‘‘जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मल चाभवन्नथः’’ यहाँ महत्वपूर्ण और बहुत अत्याधुनिक शब्द है - ‘जगत्स्वास्थ्य’ हेल्थ ऑफ द वर्ल्ड। क्या प्रदूषण जगत का स्वास्थ्य नहीं बिगाड़ रहा? ऊपर हमने इस प्रदूषण के विविध रूपों के स्वास्थ्य प्रभावों की चर्चा की ही है। एक कारनेल वैज्ञानिक की रपट है कि दुनिया की 40 प्रतिशत मौतें जल, वायु और मृदा प्रदूषण से होती हैं। एसिड रेन जैसी घटनाएँ जब तब होने लगी हैं। इसलिए आसुरी सत्ता के नाश पर यह कहा गया कि ‘‘पहले जो उत्पात सूचक मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शांत हो गए’’ : ‘‘उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः’’। सूर्य की प्रभा उत्तम हो गई : सुप्रभोदभूद्दिवाकरः और यह भी कि अग्निशाला की बुझी हुई आग अपने आप प्रज्ज्वलित हो उठी- ‘‘जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः।’’ ये सब परिवर्तन बताते हैं कि देवी के इन संघर्षों की अंतिम फलश्रुति स्वच्छ पर्यावरण है।
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युद्ध और स्त्री
दुर्गा सप्तशती के तीनों चरित्रों में संघर्ष और युद्ध का कथानक है। प्रथम में महामाया स्वयं युद्ध नहीं करतीं बल्कि भगवान विष्णु को इस हेतु योग्य बनाती हैं। लेकिन मध्यम चरित्र और उत्तर चरित्र में वे स्वयं सैन्य-संघर्ष में उलझी हैं। जब वे महालक्ष्मी हैं तो सिर्फ एक रूप में हैं, लेकिन जब वे महासरस्वती हैं तो कई रूपों में युद्ध कर लेती हैं। वे स्त्रियों की ही एक सेना ही तैयार कर लेती हैं।


वैसे तो इतिहास में स्त्री द्वारा पुरुषों के साथ-साथ युद्ध में भाग लेने के कई उदाहरण हैं, लेकिन सप्तशती का तृतीय चरित्र स्त्री सेनापतियों को लेकर ही बना है। डाहोमी के पश्चिम अमेरिकी साम्राज्य की रण-वीरांगनाओं की सेना क्या ऐसी ही होती थी? प्रारंभिक अठारहवीं सदी में राजा एगाद्जा के द्वारा उन्हें एक सेना के रूप में गठित किया गया था। एक सदी बाद राजा गेज़ो ने उन्हें एक गंभीर लड़ाकू ताकत में तब्दील कर दिया। 1892 में सीसियों के सामने करारी हार होने के पहले की दो शताब्दियों तक डाहोमी की लड़ाकू स्त्रियों का आतंक पड़ोसी राज्यों पर छाया हुआ था। उनके बहुत बड़े चाकू प्रसिद्ध थे। उनकी रणनीति का मुख्य अंग था : सरप्राइज़। लेकिन वे दुर्गा सप्तशती की देवियों से इस रूप में फर्क थीं कि वे सब राजा की पत्नियाँ कही जाती थीं, एक तरह से वह हरम को रण में लड़ने बुलाना था, लेकिन दुर्गा सप्तशती की स्त्री देवियाँ किसी एक राजा की सेविकाएँ नहीं हैं। वे या तो स्वतंत्र हैं या किसी देवता की वास्तविक शक्तियाँ हैं।


युद्ध एक ऐसा क्षेत्र रहा है जिससे औरतों को विश्व के कई समाजों में विरत रखा जाता रहा। युद्ध ने ही दासता पैदा की जिसके महिलाओं पर सबसे घातक दुष्प्रभाव हुए। युद्ध ने पुरुष की छवि एक सैन्य प्रणी की तरह गढ़ी और जिसमें स्त्री का काम उसे रोली तिलक लगाकर रणभूमि पर भेजना रह गया था, या उसके विजयी होकर लौटने पर उसी तरह से उसका स्वागत करना। लेकिन युद्ध की मर्मान्तक क्षतियाँ स्त्रियों ने उठाईं। यही नहीं युद्ध स्त्री के सशक्तीकरण के विरुद्ध स्वयं एक बड़े तर्क की तरह उभरा, जनवरी 1915 में - प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ‘द इंग्लिशवूमैन’ नामक समाचार पत्र ने जो विस्तृत हवाले दिए थे, उनसे इस थियरी का हमेशा के लिए खंडन हो गया कि युद्ध से स्त्रियाँ ‘सुरक्षित’ रहती हैं। युद्ध ने एक एड्रोसेंट्रिक समाज बनाया। हर्बर्ट स्पेन्सर ने बहुत से समाजों और समुदायों का अध्ययन किया और पाया कि युद्धोन्मुखी जनजातियों और आधुनिक सैन्यगडी राष्ट्रों में औरतों की प्रतिष्ठा काफी कम है जबकि आदिम शांतिपूर्ण समुदायों में उनकी हैसियत बहुत ऊँची है।

उसे बोडो, संथाल, धीमाल, होडा, कोच्च, लेपचाओं, खासी सभी में यह बात देखने में आयी है। एस्किमो में युद्ध व्यवहारिक रूप से अज्ञात है, इसलिए यहाँ घर में स्त्री ही मुख्य प्राधिकारी है, जबकि युद्धरत समाजों ने विजयी होने पर विजित समुदायों की औरतों को यौन-दासी बनाया और बलात्कार किए। तथाकथित ‘प्यूरिटन’ न्यू इंग्लैंड में स्त्री दासियाँ मंत्रियों और मजिस्ट्रेटों के घर में भरी रहती थीं, बिना शादी के उनके बच्चे होते रहते थे, कोई उनके पिता के बारे में नहीं पूछता था और भेड़ों और सुअरों की ब्रीडिंग से ज्यादा उनकी चिंता नहीं होती थी।


दुर्गा सप्तशती में स्त्री युद्ध में अत्याचारों को निष्क्रिय रूप से अपने पर झेलने वाली नहीं है। वह सक्रिय है और उसके वेग को सह पाना असुरों के लिए संभव नहीं है : ‘‘सा वेगेनाभिपतिता छातयन्ती महासुरान/सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम। ‘बड़े वेग से’ शब्द गौर करने लायक है जो डाहोमी की स्त्री सेना के ‘सरप्राइज’ अनुतत्व की याद दिलाता है। दुर्गा सप्तशती की स्त्री युद्ध-निपुण है, यह बात ही नहीं है बल्कि वह युद्ध के कुफलों को, सैन्यवाद को स्त्री निर्बलीकरण में सफल होने का अवकाश नहीं देती, प्रोफेसर राबर्टसन स्मिथ का आरोप है कि इस्लाम के प्रवर्तन से पूर्व अरब स्त्रियों की समाज में एक ऊँची स्थिति थी और बुर्का व हरम जैसी प्रथाएँ पैगम्बर से पूर्व अज्ञात थीं। उसका आरोप यह है कि मोहम्मदनिज्म में निहित सैन्यवाद ने स्त्रियों की हालत बिगाड़ दी। वह मूरों का उदाहरण देता है जिनकी सेनाओं में युवा लड़कियाँ चिकन्स की तरह ठंसी रहती थीं। प्रो. स्मिथ के धर्मान्ध विचारों से सहमत होने की जरूरत नहीं है। लेकिन सैन्यवाद के स्त्री के विरुद्ध सक्रिय रहा चाहे वह ग्रीकोरोमन सम्राटों के समय का हो जिसमें स्त्री रखी ही ब्रीडिंग उद्देश्यों के लिए जाती थी। प्रोफेसर जे.ए. क्रैम्ब ऐसा ही आरोप हिब्रू पर लगाते हैं, जैसा स्मिथ इस्लाम पर लगाते हैं। उनके शब्द हैं : "If ever there were a race which seemed destined to found a world-empire by the sword, it is the hebrew' इसलिए किसी एक सभ्यता-विशेष या धर्म-विशेष पर सैन्यवादी होने का आरोप एकांतिक होगा। क्या मूसा ने विवाहित स्त्रियों का नरसंहार नहीं किया था या डेविड और जोआब ने उन्हें गाजर मूली की तरह नहीं काटा : Cut them with saws, with harrows of iron, and with axes. यह पुरुष मिलिट्री मॉरलिटी थी, लेकिन दुर्गा सप्तशती में तो रणक्षेत्र है।

युद्ध में एक अति-सक्रिय स्त्री जो किसी को तलवार के घाट उतारती है, किसी को खटवांग से पीटती है और कितने असुरों को दाँतों के अग्रभाग से कुचल देती है : ‘‘असिना निहताः केचित्केचित्खट्वांग्ताडिताः/ जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्थ’’ लेकिन जो यह असुरों के साथ करती है और जो यह युद्ध में करती है। ऐसा करते हुए जो कहीं यह संप्रेषित भी करती चलती है कि स्त्री युद्ध नहीं चाहती, लेकिन एक बार उसमें धकेल दिए जाने पर पूरी शिद्दत से मुँहतोड़ जवाब देती है।


क्या शक्ति का यह अहसास भारत की वीरांगनाओं के लिए सदैव प्रेरणा का विषय नहीं रहा? स्वाधीनता दुर्गा सप्तशती के इसी आदर्श के चलते भारतीय स्त्री के लिए न केवल एक राष्ट्रीय चेतना थी बल्कि एक शक्ति-चेतना भी थी। इसीलिए भारतीय वीरांगनाएँ, चाहे वो रानी लक्ष्मीबाई हों, या रानी दुर्गावती, रानी रजिया हो या चाँदबीबी, चाहे वो झलकारी बाई हो या अवन्ती बाई - ये सभी स्त्रियाँ सशक्त वैयक्तिकता से संपन्न भी रही हैं। इन्होंने अपने आदर्श तब स्थापित किए जब यूरोप में नेपोलियन का कोड परिवार की रचना भी एक मिलिट्री मॉडेल पर कर रहा था और स्त्री के कर्त्तव्यों में सेना को सैनिकों की आपूर्ति करना भी बता रहा था। नेपोलियन ने कहा था ‘किसी पति का अपनी पत्नी के कार्यों पर संपूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। उसे यह कहने का हक है कि मैडम, आप बाहर नहीं जाओगी या ‘मैडम आपके शरीर और आत्मा पर मेरा हक है’। लगभग वैसे ही शब्द जैसे शंभु और निशंभु के हैं। दुर्गा सप्तशती इसी अवधारणा को शताब्दियों पहले चुनौती दे चुकी थी।


जिन्हें यह दुर्गा सप्तशती का दोष लगता है कि बार बार वह सैन्य संग्राम का रूपक चुनती हैं, वह स्वयं देखें कि क्या उनकी स्वयं की यूरोपीय शिक्षा प्रणाली क्या खुद मिलिट्री प्रशासन से आब्सेस्ड नहीं है? क्यों बच्चों को पानीपत के तीनों युद्ध, वाटरलू, प्लासी, क्रीमिया, बक्सर, दोनों विश्व युद्ध रटवाए जाते हैं? एडमंड होम्स इस युद्धों के अंधे, निष्क्रिय और गैरबुद्धिमतापूर्ण आज्ञापालन को यह आधार मानता है, जिस पर पश्चिमी शिक्षा की पूरी प्रणाली टिकी हुई है, एक आधुनिक शिशु को युद्ध की जलवायु में पाला जाता है। उसके खिलौनों से लेकर सिकंदर महान से लेकर आइज़नहोवर तक युद्ध को निरंतर जीवन का एक जरूरी रूपक बना लिया गया। जब सं.रा. अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने 8 जनवरी 1964 के दिन राष्ट्र के नाम संदेश दिया तो गरीबी के खिलाफ युद्ध घोषित किया। 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने ‘‘कैंसर के विरुद्ध युद्ध’’ घोषित किया। राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने ‘‘ड्रग्स के विरुद्ध युद्ध’’ घोषित किया और राष्ट्रपति जार्ज बुश ने ‘‘आतंक के खिलाफ युद्ध’’ अभी 2001 में घोषित किया। इसमें संदेह नहीं कि युद्ध एक लोकप्रिय रूपक है। ऑस्ट्रेलिया में एक कामेडी  श्रृंखला इसीलिए चली कि हर चीज के खिलाफ लोग युद्ध घोषित कर देते हैं। ‘‘द चेसर्स वार ऑन एवरीथिंग।’’ इसलिए यदि दुर्गा सप्तशती ने संग्राम का रूपक चुना तो स्वाभाविक ही था। लेकिन जिस तरह का औसत युद्ध-विवरण होता है, उसकी तुलना में दुर्गा सप्तशती के संग्राम अर्थों की बहुत सी परतों से भरे पड़े हैं, जिनमें से कुछ को हमने इस पुस्तक में खोलने की कोशिश की है। दुर्गा सप्तशती इस अर्थ में असैन्यवादी है कि वह सैन्यवादियों की तरह यह नहीं करती कि Heaven is on the side of big battalions. महिषासुर से लड़ती हुई देवी के सामने कितनी विशाल सेना हैः-
युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरंग्बलान्वितः।
स्थानामयुतैः षड़भियदग्राख्यो महासवुरः।।
    आयुध्यातायुताना च सहस्त्रेण महाहनुः।
    पंच्चाशदभिश्त नियुतैरसिलोमा महासुरः।।
आयुतानां शतैः षड्भिर्वाकलो युयुधे रणे।
गजवाजिसहस्त्रोधैरनेकैः परिवारितः।।
    वृतो स्थानां कोटच्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत।
    बिडालाख्योडयुतानां च पच्चाशद्रभिरधायुतैः।।
युयुधे संयुगे तत्र स्थानां परिवारितः।
अन्ये च तत्रायुतशो स्थनागयैर्वृत्ताः।।
    युयुधः संयुगे देव्या सह सत्र महासुराः।
    कोटि कोटि सहस्त्रैस्तु स्थानां दन्तिनां तथा।।


‘‘अन्य दैत्यों की चतुरंगिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने लगा, साठ हजार रथियों के साथ आकर उदग्र नामक महादैत्य ने लोहा लिया। एक करोड़ रथियों को साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्ध करने लगा। जिसके रोएँ तलवार के समान तीखे थे, वह असिलोमा नाम का महादैत्य पाँच करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्ध में आ डटा। साठ लाख रथियों से घिरा हुआ वाष्कल नामक दैत्य भी उस युद्धभूमि में लड़ने लगा। परिवारित नामक राक्षस हाथी सवार और घुड़सवारों के अनेक दलों तथा एक करोड़ रथियों की सेना लेकर युद्ध करने लगा। बिडाल नामक दैत्य पाँच अरब रथियों से घिरकर लोहा लेने लगा। इसके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य रथ, हाथी और घोड़ों की सेना साथ लेकर वहाँ देवी के साथ युद्ध करने लगे। स्वयं महिषासुर उस रणभूमि में कोटि-कोटि सहस्त्र रथ, हाथी और घोड़ों की सेना से घिरा हुआ खड़ा था।’’


निश्चित ही इस वर्णन में संख्यातिशयोक्ति है, लेकिन जिस बात की स्थापना की जा रही है वह ‘बिग बटालियंस’ की बात है। सैन्यवादी लोग परिवार नियोजन के हमेशा विरोधी रहे क्योंकि उन्हें लगता था कि संख्या सेना को प्रबल बनाएगी लेकिन युद्ध में संख्या और सफलता के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। प्लासी और बक्सर के युद्ध अंग्रेजों ने कितनी संख्या में जीते थे? बाबर ने जब इब्राहीम लोदी को हराया तो इब्राहीम लोदी की सैन्य संख्या एक अनुपात दस की थी। फ्रांसिस्को पिज्जारो नामक स्पेनिश एडवेंचरर ने 106 पैदल सैनिकों और 62 मरियल घोड़ों और गनपाउडर की मदद से इंका का महान साम्राज्य जीत लिया था। 6 साल तक वार आफ इंडीपेंडेंस 13 कालोनियों में लड़ने वाले जार्ज वाशिंग्टन की कोंटिनेंटल आर्मी में कभी-कभी 22000 से ज्यादा सैनिक नहीं थे। इसलिए युद्ध में संख्या नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण है। दुर्गा सप्तशती में द्वितीय अध्याय में एक बहुत कीमती श्लोक है जो प्रकट में चमत्कार है, लेकिन व्यंजना में जो यह कहता है कि यदि जीवन की प्रत्येक श्वांस ही संग्राम-सन्नद्धता है तो युद्ध में आपकी ओर से लड़ने वाली चीज यही सन्नद्धता और यही प्रतिबद्धता है :
        निःश्वासन मुमुचे यांश्च युध्यामाना रणेडम्बिका।
        त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्त्रशः।।


कि ‘रणभूमि में दैत्यों के साथ युद्ध करती हुई अम्बिकादेवी ने जितने निःश्वास छोड़े, वे सभी तत्काल सैंकड़ों-हजारों गणों के रूप में प्रकट हो गए।’ यदि आप सचमुच लक्ष्य के प्रति एकाग्र हैं तो आप एक नहीं हैं। आपकी प्रत्येक साँस जैसे आपका सहचर है। गण देवी की युद्ध की ऊर्जा का ही रूपांतरण है। ‘चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता’ का आदर्श एक स्त्री ही दे सकती है। यह मातृ शक्ति आक्रान्ता नहीं है, रक्षक है। उसका प्रत्येक अस्त्र मानवता की रक्षा के प्रयोजन से उठता है। महिषासुर संग्राम के बाद देवताओं द्वारा देवी की स्तुति भी उनके रक्षा करने वाले स्वरूप को ही रेखांकित करती है : शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके/घण्टा स्वनने नः पाटि चापज्योनिः स्वनेन च।
बात सिर्फ युद्ध की एकाग्रता की नहीं है, युद्धोन्माद की भी है। दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में असुरों का युद्धोन्माद यह कहते हुए प्रदर्शित किया गया है कि कितने ही दैत्य मस्तक कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़ के ही रूप में अच्छे-अच्छे हथियार हाथ में ले देवी के साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्ध के बाजों की लय पर नाचते थे। कितने ही बिना सिर के धड़ हाथों में खड्ग शक्ति और ऋष्टि लिए दौड़ते थेः
        छिन्नेडपि चान्ये शिरसि पतिताः पुररुत्थिताः।
        कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीता परमायु धाः।।
            ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः।
            कबन्धारिछन्न शिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः।।


प्रथम दृष्ट्या यह अविश्वसनीय लगता है लेकिन प्राणि जगत में ऐसे उदाहरण हैं। कुछ कीड़े तो सर काट जाने के बाद भी एक वर्ष तक जिंदा रह लेते हैं और प्रकाश, ताप, आर्द्रता और अन्य उत्तेजकों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया करते रहते हैं। काकरोच भी यदि उसका सर इस तरह से काट लिया जाए कि उसका बहुत खून न निकले तो कई सप्ताह तक जिंदा रह जाता है। रेड स्पांज नामक प्राणी के तो हजारों छोटे छोटे टुकड़े रिअसेम्बल होकर पुराने आकार में वापस आ जाते हैं और उनका जीवनक्रम आगे शुरू हो जाता है। दुर्गा सप्तशती का कबन्ध-संदर्भ युद्ध की मानसिकता के गहराने का प्रतीक तो है ही, युद्ध के रहस्यपूर्ण होने का भी प्रतीक है।
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स्त्री और कला
क्या स्त्री होना मनुष्य होने के पहले है? क्या काया के वार्डरोब से पहले एक ‘आत्म’ है जो तमाम किस्म के संवेदनात्मक विभेदों और प्रभावों को अतिक्रान्त करते हुए अपनी तरह से सर्वभौम है? यदि ऐसा है भी तो भी क्या इस खगोलीय सर्वात्मा के अनन्तर जिज्ञासाओं और अनुसंधानों का कोई ऐसा मैदान है जो कला, कलाकार और सौंदर्यशास्त्रीय मूल्यों के बारे में विचारों की बुनावट को जेंडर के प्रभावों के मद्देनज़र आकलित करता है या कर सकता है? क्या स्त्री अस्मिता सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणाओं, अनुभवों और फैसलों को कतई प्रभावित नहीं करती? आस्वाद, अभिव्यक्ति, उदात्तता, प्रतिभा, रस, ध्वनि, अलंकार, तनाव, जेस्चर छाया, प्रकृति, प्रगति, विवक्षा क्या जेंडर से निरपेक्ष रहते हैं? दर्शन जीवन के पार देखने की सार्वभौमता है, पर कला तो जीवन में है- उसके हालात, उसके ख्वाबों, उसकी सहमतियों उसकी आपत्तियों और उसकी स्मृतियों में नारी होने को कब तक छुपाया जा सकता है, या छुपाया जाए ही क्यों? जब बिम्ब एक ऐन्द्रिक प्रत्यक्ष है और प्रतीक एक भौतिक निशानदेही- तो कला के इन्द्रियानुभवों में स्त्रीसाक्षात् कैसे न हो? कि जिसे सार्वभौमता के नाम पर धकाने की कोशिश की जा रही है, कहीं वह कोई आवृत्त पुरुषत्व ही तो नहीं? कि दर्शन भी जिसे ‘गाड’ कहता है, कहीं वो ‘गाडेस’ का ही एब्रीविएशन तो नहीं? कि ‘ही’ कहीं ‘शी’ का ही संक्षेप ही तो नहीं, कि एडम कभी ‘मैडम’ का ही ब्रीफ तो नहीं, कि वूमेन में मैन का अंतर्हित होना तो नहीं? क्यों दुर्गा सप्तशती में देवी ‘‘कलाकाष्ठादिरूपेण’’ याद की गई है? क्यों इसमें यह कहा गया कि ‘‘विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः’’- सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं?


भारत की उच्च शिक्षा अकादमियों में साहित्यालोचन के संदर्भ में नारीवादी सैद्धांतिकी का प्रवेश अभी कमतर ही है। रीतिकालीन साहित्य पढ़ाते समय नायिका भेद तो अभी भी बदस्तूर चर्चा का विषय बनता है, ‘मेल गेज’ पर कोई विमर्श नहीं होता कि दृष्टि कैसे अवमानवीकृत करती है। नखशिख सौंदर्य वर्णन में नायिका के कवि-कृत रीफिकेशन पर कोई टीप नहीं होती। बल्कि देखा जाए तो  ाृंगार रस या विरह-प्रसंगों आदि की घनघोर परंपरा के बावजूद काव्येतिहास में स्त्री का व्यक्तित्व वैसे कभी नहीं उभरता जैसे पवन करण की पुस्तक ‘स्त्री मेरे भीतर’ में उभरता है। क्या वहाँ किसी दमन को हृदयंगम कर लिया गया है? क्या वहाँ काया की कोई सामाजिक शक्ति नहीं है? धीरोदात्त नायक ही क्या महाकाव्य के लिए आवश्यक हुआ, धीरोदात्त नायिका क्यों नहीं? नायक शब्द से काव्यशास्त्र में एक कर्मवीर की छवि उभरती है, लेकिन नायिका शब्द से वहाँ जो स्त्रीभेद मिलता है, उसमें कर्मशीला या वर्किंग वूमन है कहाँ? मुग्धा, नवोढ़ा, प्रोषितपतिका या पद्मिनी, शंखिनी, चित्रिणी के मानकों में वह स्त्री कहाँ है जो दरिद्रता या भूख से संघर्ष कर रही है? इस स्त्री की भौगोलिकी कहाँ है- वह किस प्रांतर, किस अंचल की रहवासी है? भूगोल तो छोड़ें - काफी बड़ी हद तक यह स्त्री इतिहास में भी गैर मौजूद है। समय की तात्कालिकता का ताप उस तक पहुँचता ही नहीं लगता। दुर्गा सप्तशती तो देवियों को एंग्री यंग वूमैन के रूप में देखती है। ‘‘देव्यः क्रोधसमाकुलाः।’’ यह क्रोध कला और साहित्य की दुनिया में क्यों नहीं रहेगा?


इस बहुत प्रचलित साहित्यशास्त्रीय छवियों में तो रोटी गूंथने वाली स्त्री तक नहीं है। लेडी-पुरानी अंग्रेजी में जिसका अर्थ होता था : रोटी गूंथने वाली। सूरदास की यशोदा जरूर कहीं अपवाद की तरह आकर इस नियम की संपुष्टि करती है। उससे भी दिलचस्प है कला में पुरुष प्रिविलेज़ की गहराई और विस्तृति के चेहरों को चीन्हने की चेष्टा। नारीवादी अन्वीक्षा सहसा कला को इतनी जीवन्तता, संभावना और स्फूर्ति से भर देती है कि जो मानकों में स्त्री की नापजोख करने वालों के अंदेशे में कभी न थी। इस अन्वीक्षा का महत्व इसमें है कि इसके सहारे कला के सौंदर्यशास्त्रीय न्यौते और कलात्मक वेश्यावृत्ति के बीच का फर्क पकड़ा जा सकता है। सप्तशती देवी को ‘‘विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्वाद्येषु वाक्येषु’’ खोजती है। विद्याओं में, ज्ञान को प्रकाशित करने वाले शास्त्रों में तथा वाक्यों में। महामाहेश्वर आचार्य अभिनव गुप्त ने जगदाम्बिके को जब ‘‘सकलशब्दमयी किल ते तनुः’’ कहा था, तब वे कला/साहित्य में उनकी मूर्ति का शिल्पांकन ही कर रहे होंगे। लेकिन यह पश्चिमी तरह का फेमिनिज़्म नहीं था।


कला में नारीवादी प्रतिरोध के भी दो प्रचलित प्रकल्प या दो विकल्प हैं। क्या यह मुक्ति का नारीवाद है या शक्ति का नारीवाद? हम यहाँ इन लफ्ज़ों के माध्यम से विदेशी और अपने, पराये और सांदर्भिक का निर्वाचन नहीं मांग रहे। शायद मुक्ति का स्वप्न भी अपनी चरितार्थताओं में उतना ही अधूरा हो जितना शक्ति का स्वप्न रहा आया। लेकिन इन दो विकल्पों को आमने सामने इसलिए रखा जाना चाहिए क्योंकि कला में स्त्री का स्वर किसी एक ही परिप्रेक्ष्य से आए, यह जरूरी नहीं। शायद वह दोनों को ही अतिक्रांत कर दे। शायद उसकी आत्म-अवधारणा ऐसे बहुत से वर्गीकरणों को झुठलाकर आगे बढ़े।


यह सिर्फ ग्रीको-रोमन, एथेनियन-स्पार्टन सोच ही नहीं होगी कि जो स्त्री में ‘आत्मा’ होना ही नहीं मानती थी, बल्कि जब संत कवि कबीर ‘नारी की झांई परत अंधा होत भुजंग’ की बात कर रहे थे तो वे भी कहीं स्त्री की उस डार्क ग्रॉस मटीरियलिटी की ओर इशारा कर रहे होंगे। मुझे कई बार लगता है कि इन पंक्तियों को लिखते/कहते हुए क्या कबीर के सामने एक पल को भी जगज्योति दुर्गा का ‘मेटाफर’ नहीं कौंधा होगा? वह दुर्गा जिसे सप्तशती शब्दस्वरूपा भी कहती है और अत्यन्त निर्मल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा उद्गीथ के मनोहर पदों के पाठ से युक्त सामवेद का आधार भी कहती है : ‘शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधानमुद्गीथ रम्यपदपाठवतां च साम्नाम्।’ और कई बार मजाक भी करने का मन होता है कि वाह कबीर तेरा तपःपूत मन, नारी की छाया से वह ईरोटिक गेज नहीं पैदा होते दिखती, अंधा होना दिखता है। दृष्टि का यह ‘पौरुष’ क्या आदमियों को कला का आदर्श आब्जर्वर बनाता है या स्त्री सहृदय वर्णन या निरूपण में जेंडर पार्टनर होने का आत्मविश्वास देता है? क्या भारत की स्त्री-रचनाकार ऐतिहासिक-पौराणिक स्त्री-पात्रों का वैसा कोई नया भाष्य तैयार कर रही हैं जैसा हिल्डा डूलिटिल न हेलेन आफ ट्रॉय का किया? या वह एने सेक्सटन की तरह अपने गर्भाशय का उत्सव मनाने वाली कविता लिख रही हैं : इन सेलीब्रेशन ऑफ माई यूटरस? या आड्रे लोर्ड की तरह वे कोई ‘योद्धा कवयित्री’ हैं जिन्होंने अपने जीवशास्त्रीय सच को इतिहास और मिथक से मिलाकर ‘बायोमाइथोग्राफी’ की कविताएँ लिखीं हैंः नेवर टेक फायर फ्रॉम अ वूमैन।


फिर भी गौर करने की बात है कि भारत में कला में नारीवादी प्रतिरोध जुगुप्सा की उन वीभत्स हदों तक नहीं गया जिसमें अकविता के नाम पर कुछ पुरुष कवि पहुँच गए थे, या जिसमें केरोल श्नीमेन अपनी कृति ‘इंटीरियर स्क्रोल’ के जरिए पहुँच गई जब उनकी कलाकार दर्शकों के सामने नग्न होकर अपने निजी अंगों के द्वार से लंबा कागज निकालती है जिस पर कोई संदेश अंकित है। 60-70 के दशकों में हिन्दी में जानबूझकर ‘डर्टी’ शब्दों का इस्तेमाल कर अपनी खुरदुरी असहमति पेश करने का जो नज्जारा तत्कालीन कविता में पुरुष कवियों ने किया, वैसा हिन्दी कवयित्रियाँ नहीं कर पाईं। अलबत्ता कृष्णा सोबती अपने कथाक्रम में जरूर ऐसा कुछ कर गईं। ज्यादातर भारतीय स्त्री का प्रतिरोध संगीत पंक रॉक का नहीं रहा। वह रूढ़ियों की जंजीरों को तोड़कर मीरा की शक्ति में बाहर निकला भी तो वह प्रतिरोध की गरिमा और महिमा को स्थापित करने वाला था।


स्त्री सृजन की पर्याय है, आत्मा है। यदि वह कभी सृजनकर्त्री नहीं है, तब भी वह सृजन की प्रेरणा तो है ही। सप्तशती कवच तो उसे ऐसी योगिनी के रूप में याद करता है जो रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श में उपस्थित है- रसे रूपे च गंधे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। कविता के रस? कविता के बिम्ब? कविता की खुशबू? कविता के शब्द? कविता का ‘टच’? सभी जगह यह मौजूदगी है। देवी सरस्वती कला देवी और कादंबरी हैं। वे वैखरी भी हैं और वाङ्मयी भी हैं। वाचा भी और वागीशा भी। सृजन और कला की विधात्री है नारी। सप्तशती उसका स्मरण ‘जगत की आधारभूता कृति देवी’ के रूप में यों ही नहीं करती- नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः लेकिन फिर ऐसा क्या है कि जब भी बड़े रचनाकारों के नाम किसी विद्यार्थी से पूछे जाते हैं तो वह हमेशा पुरुष रचनाकारों के ही नाम लेता है? इस विषय पर बैटर्सबाइ से लेकर कूस तक जो अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन भी हुई हैं तो उनमें यह बात उभरकर सामने आई है कि प्रतिभा की संकल्पना को पुरुषत्व से इतिहास के हर दौर में कैसे जोड़ा जाता रहा। जबकि सच्चाई यह थी कि स्त्रियों ने कला को अपनी अस्मिता की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के लिए हर युग में लड़ाई लड़ी है। उन्हें कई बार निष्कासित किया गया है, इस तथाकथित वर्जित क्षेत्र में प्रवेश करने की चेष्टा पर। ईव का निष्कासन क्या था या पैंडोरा का? भारत में तो फिर भी वैदिक ऋषिकाएँ सृजन की पवित्र स्वतंत्रता की मधुरतम स्मृति हैं, पर कुल मिलाकर यहाँ भी क्या हम कला-इतिहास की टेक्स्ट बुकों में नारी-प्रतिभाओं को उनका वाजिब ‘स्पेस’ दिला पाये हैं? सी. फ्रैड (1966) का निष्कर्ष है कि ‘‘महिलाओं के बौद्धिक योगदान न केवल भुला दिये गये बल्कि उनका सचेत और सक्रिय दमन भी किया गया।’’

नोचलिन (1998) ने क्रोश स्तम्भी लेख लिखा, जिसका शीर्षक ही सब कुछ बता देता है : ‘‘क्यों कोई महान स्त्री कलाकार कभी नहीं हुए?’’
क्या हम अपनी स्मृति को निर्मित और संरक्षित करने वाले ‘तंत्र’ में कुछ ऐसा कर सकते हैं कि स्त्री रचनाकार भी हमारे रोल मॉडल के रूप में उभरें? कि लगे कि उनके पास एक प्रशंसनीय और अनुकरणीय वैयक्तिकता और व्यक्तित्व है, कि उसने आत्मसम्भवा अभिव्यक्ति के खतरे कम नहीं ज्यादा ही उठाये हैं और कई बार उस पर जीत हासिल भी की है, कि शास्त्रों की शास्तियों के सामने भी वह निर्भीक खड़ी रही है- भले ही उसके साथ अन्याय और अतिचार हुए हों? कि उसने अपनी अंधी नियति से भी पूरे मनोयोग के साथ मुठभेड़ की है। इतिहास से स्त्री रचनात्मकता की ‘रिकवरी’ की जानी होगी। कितनी आवाजें हैं जो इन खण्डहरों में खो गई हैं। हर बात में धर्म को दोष देकर निवृत्त हो लेने वाले कभी यह भी देखें कि दुनिया भर की सारी पौराणिकियों और मिथक शास्त्रों में कला की ‘देवियाँ’ ही मिलती हैं, देवता नहीं। देवी का अथर्वशीर्ष तो उन्हें ‘‘तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनी’’ कहता है। ज्ञान से जगमगाने वाली, दीप्तिमती। उसके अनुसार तो वह ‘कामधेनुतुल्य वाग्रूपिणी भगवती’ है। लेकिन प्लेटो, अरस्तू, पाइथोरोरस से लेकर लूथर तक जगह-जगह बुद्धिजीवी पुरुषों द्वारा स्त्री की कलाभिव्यक्ति की अवगणना की गई है। ऊपर हमने स्त्री को सृजन की आत्मा कहा लेकिन अरस्तू तो स्त्री में ‘आत्मा’ का न होना मानते थे। सृजन अपने आप में एक शुभ कर्म है, लेकिन पाइथोरोरस तो स्वयं स्त्री को ‘ईविल’ (बुराई) का प्रतीक-प्रतिनिधि मानते थे। हमने तुलसी के एक ‘जड़’ पात्र के द्वारा ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी/ये सब ताड़न के अधिकारी’ कहने पर तुलसी की तो खूब लानत-मलामत की लेकिन ‘अ वूमैन, अ डॉग एंड अ वालनट ट्री/द मोर यू बीट दैम द बैटर दे बी’’ कहने वालों को कभी उधार का उलाहना भी नहीं भेजा।


स्त्री सृजनकर्म क्या सिर्फ एक ‘व्यक्ति’ का स्व-स्थापन है या वह एक अपनी तरह का सामाजिक आंदोलन भी है और रहा है? क्या स्त्री कला व्यंजना अपने समय की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ताकतों की तंग होती गई गलियों से नहीं गुजरी और कल्पना के राजपथ पर किसी लाल गलीचे पर पाँव धरती हुई चली? क्या स्त्री-सृजन के भीतर समय और समाज के नक्शे पा किसी लेंस से लोकेट करने की जरूरत नहीं है? पुराने समय की स्त्री रचनात्मकता प्रकाशक की रॉयल्टी से किसी तरह की अभिप्रेरणा या आश्वासन नहीं प्राप्त करती थी- वहाँ जे.के. रौलिंग की तरह ‘फनी मनी’ प्राप्त होने की संभाव्यता नहीं थी, बल्कि मीरा, सहजोबाई, महादेवी जैसे लोगों में एक तरह की उपरामता या वीतरागिता है। लेकिन इसका मतलब कहीं यह नहीं है कि वहाँ कोई आत्म-भरित एकान्त फल-फूल रहा है जिसने दरवाजे पर ‘डोन्ट डिस्टर्ब’ की तख्ती लगा दी है। दूसरे, यदि वहाँ स्त्री-व्यक्तित्व की स्थापना भी है तो भी वह एक कीमती उपलब्धि है, क्योंकि जब इसे जिम्मेदारियों, जवाबदेहियों और रिश्तों की मधुर संज्ञाओं के नीचे कहीं झाड़-पोंछ दिया जाता रहा हो, तब यह व्यक्ति-विद्रोह तो और महत्वपूर्ण हो जाता है। निर्भरता की जलवायु में स्वायत्तता का मौसम।


स्त्री सृजनकर्म कसाइयों की उदारता के कारण इतिहास और समय की दौड़ में बचा नहीं रह गया है, वह रचना की अपनी शक्ति के कारण सामने आया है। ऐसे तो हर प्रबल रचना अपने समय में प्रबल विरोध को आमंत्रित करती रही है- लेकिन स्त्री सर्जना के साथ तो यह और भी विशेष रहा है। विरोध अगर रचना में एक बाधा पैदा करता है तो उसमें एक दीप्ति भी पैदा करता है।


स्त्री मानस का संघटन क्या कोई क्रिस्टलाइज्ड पैटर्न है, जिसमें जैविक लिंग भेदों के प्रभावों की एक तयशुदा निष्पत्ति है? या कि इन भेदों की परिणतियाँ अपनी-अपनी स्वतंत्र गतिकी लेकर चलती हैं, अलग-अलग तरह के फलित? इसलिए महासरस्वती का यह विमर्श स्त्री-सृजन को किन्हीं स्ट्रेट-जेकेट्स में अपघटित करने के लिए नहीं है, बल्कि उसकी समृद्धि और सम्पन्नता को मुखर करने के लिये है। यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना होगा कि स्त्री होने के पहले भी, उसके पूर्वोत्तर भी एक ‘आत्म’ है- रचना की बुनियादी प्रतिज्ञा का वह आत्म जो काया के वार्डरोब के पहले होता है, उस संस्कृति से पहले जो सैक्स को जेण्डर में बदलती है, उस प्रकृति के पहले जहाँ देह एक सीमा है, संभावना नहीं। कृति के इस आत्म का आदिस्तोत्र इस संस्कृति और प्रकृति से पहले था।


दुर्गा सप्तशती के नवें अध्याय में देवी के उस नाद का उल्लेख है जिससे पहले के सभी शब्द शांत हो गए-तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः इस अध्याय में जैसे शब्द-शब्द से लड़ता नज़र आता हैः ज्याशब्दंचापि धनुष्चकारातीव दुःसहम्/पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च/समस्त-दैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना। देवी का यह अत्यंत दुःसह शब्द, घंटे का वह शब्द जो समस्त दैत्ये सैनिकों के तेज को नष्ट करने वाला है तथा जो संपूर्ण दिशाओं को व्याप्त कर देता है, क्या है? क्या यह वही शब्द है जिसे पतंजलि ने स्फोट कहा था, वेदों ने श्रुति, उपनिषद् ने उद्गीथ (Song of the beyond),  प्लेटो ने ‘म्यूज़िक ऑफ द स्फीयर्स’ कहा था? क्या इस शब्द का भी एक प्रतिद्वन्द्वी शब्द है? शब्द का एक समानान्तर प्रतिकार? दुर्गा सप्तशती कहती है कि हाँ। नवें अध्याय का एक परवर्ती श्लोक इस प्रतिद्वन्द्वी शब्द की ताकत भी बताता है। यह प्रतिद्वन्द्वी शब्द शुंभ का सिंहनाद हैः ‘‘सिंहनादेन शुंभस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्/निर्घातनिःस्वनो घोरा जितवानवनीपते’’- उस समय शुंभ के सिंहनाद से तीनों लोक गूंज उठे उसकी प्रतिध्वनि से वज्रपात के समान भयानक शब्द हुआ जिसने अन्य सब शब्दों को जीत लिया। स्वन और निःस्वन के बीच यह युद्ध अन्त में देवी की उस विजय के साथ समाप्त होता है जिसमें संपूर्ण दिशाओं के भयंकर शब्द शांत हो जाते हैंः शांता दिग्जनितस्वनाः।


स्त्री के ‘शब्द’ को राक्षसों के ‘प्रतिशब्द’ का सामना करना ही है। इस संग्राम से बचा नहीं जा सकता। अंतिम विजय में जरूर कोई शक नहीं है, यही दुर्गा सप्तशती का आश्वासन है।
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सत्ता
यह देखना दिलचस्प है कि जब स्टीवन ल्यूक्स ने पावर : अ रेडिकल व्यू नामक किताब लिखी तो उसने भी शक्ति के तीन आयाम बताए। दुर्गा सप्तशती में भी ‘त्रयी’ है- प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तर चरित्र की। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की। समय, श्री और समझ की। टाइम इज़ पावर, मनी इज़ पावर, नॉलिज इज़ पावर। लेकिन सप्तशती में जो महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की अवधारणा है वह काल, धन और ज्ञान को अतिक्रान्त करने वाली धारणा है। महाकाली काल की अतिक्रांति है, महालक्ष्मी समृद्धि की अतिक्रांति है, महासरस्वती विद्या की अतिक्रांति है। देखें कि प्रथम-चरित्र में महामाया टाइम मैनेजमेंट नहीं पढ़ा रहीं, मध्यम-चरित्र में महालक्ष्मी धन-वर्षा नहीं कर रहीं और उत्तर-चरित्र में महासरस्वती किताब खोलकर नहीं बैठी हुई हैं।


फ्रेंच दार्शनिक मिशेल फूकाल्ट ने शक्ति-संज्ञान (पॉवर-नॉलिज) नामक अवधारणा विकसित की थी। तदनुसार सत्ता ज्ञानाधारित होती है और ज्ञान का इस्तेमाल करती है। दूसरी ओर, सत्ता ज्ञान का पुनरुत्पादन भी करती है। फूकाल्ट के बहुत-बहुत पहले दुर्गा सप्तशती में सत्ता और ज्ञान के अन्तःसंबंधों पर चर्चा हुई। दुर्गा सप्तशती का कहना यह है कि शक्ति शक्ति के प्राकट्य, प्रयोग और स्थापन में है। दुर्गा सप्तशती में वह जीवन-ऊर्जा अभिव्यक्त होती है और कभी वह प्राणों व स्फूर्ति का संचार करती है तो कभी अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित करती है। लेकिन जो सिद्धांत इसमें स्थापित हुआ-सा दिखता है वह यह कि शक्ति शक्ति के प्रयोग में निहित है। यदि व्यावहारिक जिंदगी में इसके बहुत सरल निष्कर्ष निकाले जाएँ तो वे ये होंगे कि कानून बना लेने से, नियम-उपनियम बना लेने से काम नहीं चलता, हमें उसे प्रवर्तित भी करना पड़ता है। प्रवर्तन के अभाव में शक्ति किसी तरह से मनुष्य या समाज को सस्पन्द नहीं करती। शक्ति किसी दिव्यत्व की सक्रिय ऊर्जा है। एक संवेग, एक इम्पल्स। यह ऊर्जा जब तक अक्रिय है, जब तक उसकी प्रभावना नहीं होती, जब तक इस प्रतिभा को स्वरूप और संक्रिया से आलोड़ित होने का अवसर नहीं मिलता तब तक चुनौतियों को जीता भी नहीं जा सकता। ग्रीक की साइकी, नॉस्टिक की सोफिया, कब्बालिस्ट की शेकिना सब ‘शक्ति’ की मूल अवधारणा से ही उपजी हैं।

रोमन ‘एनिमा’ या ‘न्यूमा’ वस्तुतः ‘अणिमा’ शक्ति होगी। लेकिन दुर्गा सप्तशती का तीसरा चरित्र यह भी स्थापित करता है कि शक्ति का प्राकट्य एकायामी नहीं है। स्त्री के लिये कैरियर भी कोई एक नहीं है। ब्रह्माणी की तरह अक्षसूत्र पढ़कर भी नकारात्मकताओं का नाश किया जा सकता है या माहेश्वरी की तरह त्रिशूल से भी। स्त्री को टाइपकास्ट करने के खिलाफ यहाँ आवाज है। पुराणों में आये देवी के सिर्फ नौ रूप- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, महागौरी, सिद्धिदात्री- ही नहीं हैं। वह कभी चामुंडा है तो कभी काली, कभी कौशिकी है तो कभी कौमारी। ये सब रूप अलग-अलग तरह की एक्सपर्ट सिस्टम्स हैं। स्त्री आज जिस तरह कभी कार चला सकती है तो कभी प्लेन भी, कभी कल्पना चावला हो सकती है तो कभी सुनीता विलियम्स- उसी तरह सप्तशती में कभी उसका वाहन सिंह है, कभी हाथी, कभी गरुड़ है, कभी वराह। औरतें दुनिया का 66 प्रतिशत काम करती हैं, लेकिन दुनिया की आय का केवल 11 प्रतिशत उनको मिलता है। दुर्गा सप्तशती स्त्री को किसी एक खास तरह का ‘जेंडर रोल’ नहीं देती। यह ज्ञान ही शोक से भर देता है कि जिस स्त्री (देवी) के लिए दुर्गा सप्तशती में ‘यवेदं धार्यते जगत्’ कहा गया था, उसके पास दुनिया की एक प्रतिशत भूमि ही है। लेकिन दुर्गा सप्तशती की खूबी यह है कि यहाँ स्त्री गृहकार्य में ही नहीं लगी है। यहाँ स्त्री घूंघट नहीं पहने हैं, यहाँ स्त्री स्टेनोटाइपिंग नहीं कर रही है। यहाँ वह पुरुष देवता का ही पर्सोनिफिकेशन है।

विष्णु, ब्रह्मा और महेश का ही नहीं बल्कि इन्द्र, कार्तिकेय आदि का भी। यहाँ वह कोई बच्चे जनने का कार्य नहीं कर रही है बल्कि रक्तबीजों को खत्म कर रही है। उसकी सैन्य भूमिकाएँ जो सप्तशती में दिखाई गई हैं, वे कोई बड़ा आश्चर्य नहीं। 1992 में अमेरिकी सेना में 2,11,000 महिलाएँ थीं। यहाँ जो बात ध्यान देने की है वह यह कि दर्शन की विभिन्न धाराओं में ‘डुअलिटी’ का एक सिद्धांत चलता है- तंत्रों में शिव-शक्ति, सांख्य में पुरुष-प्रकृति, वेदान्त में ब्रह्म-माया, वैष्णवों में विष्णु-लक्ष्मी, सीता-राम या राधा-कृष्ण, चीन में यिन-यांग, लाओत्से में ताओ-ती, लेकिन दुर्गा सप्तशती में यह ‘द्वैत’ नहीं है- वह तो देवता का ‘एसेंस’ या ‘कोर’ है- उसका मूल, उसकी अभिव्यंजना। यहाँ देवी देवताओं के वैशिष्टयों का समुच्चय ही नहीं हैं, वे उनका बहिरंगीकरण (exteriorization) भी हैं।


इस दृष्टि से देखा जाए तो एडलर-युग से बहुत पहले शक्ति को - शक्ति स्थापन को - जीवन की मूल प्रेरणा दुर्गा सप्तशती में कहा गया लेकिन पावर-लस्ट (शक्ति-वासना) शक्ति-पूजा नहीं है। फर्क यह है कि यह शक्ति किसी एनीमल इंस्टिंक्ट को, किसी पशु-प्रवृत्ति को समर्थन नहीं देती बल्कि यदि महिषासुर का दृष्टान्त कोई प्रमाण है तो वह पशु-प्रवृत्ति के संहार का प्रमाण है। यह ध्यान दीजिए कि महिषासुर का यह प्रसंग द्वितीय चरित्र में है। महालक्ष्मी के चरित्र में। यह भी ध्यान दीजिए कि आज भी लक्ष्मी ‘बुल’ और ‘बीअर’ के पशु-टर्म्स की साक्षी है। उसका चरित्र इन पर विजय पाने में खिलता है। महिषासुर क्या आदमी का जानवर हो जाना है?


चरित्रों की गणना से भी पहले जो दो कहानियाँ दुर्गा सप्तशती में बताई हैं- राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य वे दोनों ही कहानियाँ सत्ताच्युति की हैं। ‘‘सुरथो नाम राजा भूत्समस्ते क्षितिमंडले’’ उनका समस्त भूमंडल पर अधिकार था। वे प्रजा का अपने औरस पुत्रों की भांति सम्यक पालन करते थे तो भी उस समय कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गए। वस्तुतः सत्ता शत्रुता पैदा करती ही है, भले ही सम्यक प्रजापालन किया जाए। बल्कि तब तो शत्रुता के चांसेज बढ़ ही जाते हैं क्योंकि सत्ता का स्वभाव ही प्रतिस्पर्धी है। दण्डनीति के प्रबल होने पर भी सुरथ की पराजय पुनः यह स्पष्ट करने के लिए है कि सत्ता सिर्फ दंडनीति के सहारे स्थिर नहीं रह सकती। संख्या में कम होने पर भी कोला विध्वंसियों द्वारा राजा सुरथ को युद्ध में परास्त करना इस बात को भी स्पष्ट करता है कि सैन्य शक्ति मात्र संख्या से तय नहीं होती। पानीपत के युद्ध में बाबर और इब्राहीम लोदी की सैन्य संख्या एक अनुपात दस थी। लेकिन बाबर के पास गनपाउडर था। एक ज्यादा प्रभावी टेक्नोलाजी। प्लासी और बक्सर के समय अंग्रेज सेना ‘‘न्यूरैपि स तैर्युद्धे’’ से ज्यादा नहीं थी। पर्शियन युद्धों ने खासकर थर्मोपाइली के युद्ध ने यह सिद्ध किया कि एक बेहतर प्रशिक्षण और संसाधन संख्या के न्यून होने के नुकसान पर विजय पा लेते हैं।  थर्मोपाइली के युद्ध में स्पार्टा के राजा लिओनिडास ने पर्शिया के ज़ीरेक्स प्रथम की विशालकाय सेना को एक खास रास्ते पर रोककर हराया था। पर्शियन सैन्य संख्या हेरोदोतस के अनुसार 52 लाख 83 हजार 220 थी, जबकि रोमन्स की संख्या मात्र 6400 थी। इस युद्ध में रोमनो की संख्या बहुत कम थी, लेकिन बेहतर प्रशिक्षण के कारण वे जीते। एलीशिया के युद्ध में (52 ई.पू.) गॉल्स की संख्या रोमन्स की तुलना में एक अनुमान के अनुसार 5 गुनी थी और एक गणना के अनुसार रोमन 30 हजार से 60 हजार के बीच थे जबकि गॉल तीन लाख तीस हजार। कोर्टेस ने भी मुट्ठी भर सेना के साथ कुख्यात अमेरिकन विजयें प्राप्त की थीं।


मुझे याद पड़ता है कि एक वामपंथी साहित्यकार महोदय ने महिषासुर प्रसंग को अपने उपन्यास में एक भैंसे और एक स्त्री के बीच पूर्व-वैदिक प्राचीनकाल में हुई ऐसी लड़ाई के रूप में चित्रित किया था जिसे बाद में कवियों और पंडितों के अतिशयीकरण ने मध्यम चरित्र का रूप दे दिया। सोचिए, कितने बेवकूफ हैं भारतीय, इनकी पुस्तकें और इनकी श्रद्धा। जबकि बात इतनी हल्की नहीं है। सत्ताच्युति और बाद में देवी की कृपा से उसकी पुनरुपलब्धि के माध्यम से कहीं यह कहा जा रहा है- जो कि बेंजामिन डिजरायली ने बहुत बाद में कहा कि सारी शक्ति/सत्ता एक न्यास है, एक ट्रस्ट कि हम इसके अनुप्रयोग के लिए स्वयं जवाबदेह हैं, कि सत्ता एक अमूर्त सिद्धान्त नहीं है, उसे मूर्तिमंत करना होता है। यह एक प्रवर्तनीय शक्ति है, कुछ खास करने के लिये। सत्ता उस तरह के ‘संकरे नियंत्रण’ (नैरो कंट्रोल) के लिए नहीं है जहाँ शुंभ की यह राजाज्ञा चलती है- ‘‘मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः/यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक-पृथक’’ - कि- ‘‘संपूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकार में है, देवता भी मेरी आज्ञा के अधीन चलते हैं, संपूर्ण यज्ञों के भागों को मैं ही पृथक-पृथक भोगता हूँ।’’ यह सत्ता के संघनन का चरमतम रूप है। वूचर्ड और मेज़र्ड के एक अध्ययन के अनुसार विश्व के कई देशों में वहां की 90% संपत्ति विश्व की 5% आबादी के पास है। ‘सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है’- लार्ड एक्टन की यह उक्ति शायद शुंभ के उसी भ्रष्टाचार के बारे में है। शुंभ को उसका लाभ लेते हुए दिखाना सत्ता में पनप आने वाले भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) और "Kin selection'' की ओर संकेत है। निशुंभ तो भाई है लेकिन भतीजावाद की परंपरा मध्यकालीन चर्च की देन है जब कई पोपों ने अपने भतीजों को चर्च के ताकतवर पदों पर नवाजा ताकि वे भी पोप बन सकें।

16वीं-17वीं सदी में तो यह भतीजावाद चरम पर था। 14 कार्डिनल-भतीजे पोप बने थे। कई अवैध या गोद ली संतानों, भाइयों, चाचाओं ने भी चर्च की प्रधान पोज़ीशन इसी तरह हासिल कीं। भतीजावाद वामपंथियों पर भी हावी रहा। चाहे वह रोमानिया के कम्युनिस्ट शासन की बात हो या उत्तर कोरिया की जहाँ किम इल सुंग की जगह उसका बेटा किम जोंग-इल ने सत्तारोहण किया या अभी क्यूबा की जहाँ फिदेल कास्त्रो की जगह उसका बेटा आ गया है। शुंभ के साथ निशुंभ का राक्षसत्व सत्ता में फलने फूलने वाले भाई भतीजावाद का द्योतक है। आज अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर आरोप है कि उन्होंने अपने विदेश मंत्री कॉलिन पावेल के लड़के माइकेल पॉवेल को संघीय संचार आयोग का अध्यक्ष बना दिया। सीनेटर मिच मैक्कोनेल की पत्नी इल्यैन चाओ श्रम मंत्री हो गई। वहाँ का मुख्य श्रम अटार्नी यूजीन स्केलिया उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश एंटोनिन स्केलिया का बेटा है।

एक दूसरे न्यायाधीश विलियम रेंक्विस्ट की पुत्री स्वास्थ्य और मानवीय सेवाओं को संभाल रही है। उपराष्ट्रपति की पुत्री एलिजाबेथ चेनी विदेश मंत्रालय में डेपुटी असिस्टेंट बना दी गई है। उनके पति प्रबंधन और बजट विभाग के मुख्य कौंसल बना दिए गए हैं। सीनेटर स्ट्रोम घूरमंड की प्रार्थना पर बुश ने उनके 28 वर्षीय पुत्र को दक्षिण कैरोलिना का अमेरिकी अटार्नी बना दिया है। बुश प्रशासन को इन दिनों ‘‘फैमिली अफेयर’’ कहा जा रहा है। ज्यां एनौल्थ का व्यावहारिक अनुभव यह था कि ‘‘भगवान सबकी तरफ है, लेकिन अंतिम विश्लेषण में यह उनके साथ है जिनके पास बहुत सारा पैसा और बहुत बड़ी सेना है।’’ राक्षस सत्ता के सैन्यत्व को प्रतीकायित करते हैं, देवी सत्ता के दिव्यादर्शों को। सैन्य-शक्ति एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं कर सकती। सैन्य सत्ता वाला गैरीसन स्टेट सामाजिक और आर्थिक लाभों (goods) को इस तरह से वितरित नहीं करता कि समाज के सबसे निरीह और सबसे वंचित को फायदा पहुँचा सके। ग्रूचो मार्क्स कहता था कि ‘सैन्य न्याय का न्याय के लिए वही योगदान है जो सैन्य संगीत का संगीत के लिए है।’

महिषासुर और शुंभ निशुंभ की बहुत बड़ी-बड़ी सेनाएँ हैं और दुर्गा सप्तशती में उनका विशद वर्णन किया भी गया है- ‘आज उदायुध नाम के छियासी दैत्य सेनापति अपनी सेनाओं के साथ युद्ध के लिये प्रस्थान करें। कम्बु नामवाले दैत्यों के चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनी से घिरे हुए यात्रा करें। पचास कोटिवीर्य-कुल के और सौ धौम्र-कुल के असुर सेनापति मेरी आज्ञा से सेनासहित कूच करें। कालक, दौर्ह्रद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्ध के लिये तैयार हो मेरी आज्ञा से तुरंत प्रस्थान करें।’ लेकिन शत्रुओं के ‘कोटिवीर्याणि’ और ‘महासैन्यसह स्रैबहुर्भिर्वृत्तः’ होने के बावजूद देवी जीतती हैं और इस तरह दुर्गा सप्तशती एक विपरीत आदर्श को स्थापित करके विद्रोह, क्रांति और परिवर्तन की संभावनाओं को हमेशा जिंदा रखती है। हाँ, यह बुरा लग सकता है कि एक स्त्री करोड़ों की आक्रामक भीड़ का संहार कर देती है, लेकिन उससे ज्यादा भी बुरा तब लगेगा जब करोड़ों की आक्रामक भीड़ द्वारा एक अकेली स्त्री मार डाली जाए। उत्तर चरित्र में दैत्य शुंभ कहता है- ‘यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि’ (संपूर्ण यज्ञों के भागों को मैं ही भोगता हूँ), देवी कहती हैं : ‘देवाः सन्तु हविर्भुजः’ कि देवता यज्ञभाग का उपभोग करें। भले लोगों को लाभ मिले। भले लोग जो अपमानित, राज्यभ्रष्ट, पराजित तथा अधिकारहीन करके निकाल दिये जाते हैं : ‘‘ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः/ह्रताधिकारास्त्रिदशाभ्यां सर्वे निराकृताः’’, शक्ति उनके पक्ष में है। ये भले लोग जब अपराजिता देवी के पास जाते हैं तो वे सत्ता-संघर्ष में न्यूट्रल होना नहीं चुनती हैं, वे हस्तक्षेप करती हैं।

मिशेल फूकाल्ट का कहना था कि ज्ञान कभी भी तटस्थ या न्यूट्रल नहीं होता, क्योंकि यह सत्ता संबंधों को तय करता है। मध्यम चरित्र में उन्हें इन्हीं भले लोगों की सेंट्रीफ्यूगल फोर्स के रूप में दिखाया गया है। वहाँ देवी भले लोगों का एकीकरण हैं, यूनिफिकेशन हैं। उत्तर चरित्र में उनके एक से अधिक रूप यह जताने के लिए हैं कि यूनिफिकेशन को यूनिफार्मिटी नहीं समझा जाए। समरसता एकरसता नहीं है। उसमें नए विचार नए रूप लेते रहेंगे। सप्तशती कहती हैं : उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है : ‘तथापि तत्समुप्रत्तिबर्हुधा’। वे परिस्थितियों की मांगों का उत्तर देने के लिए प्रकट होंगे। कभी वह ड्रास्टिक भी होंगे, भयावह, विकराल। काली करालवदना विनिष्क्रांतासिपाशिनी।

कभी वे सौम्य होंगे, शिवादेवी की तरह - ‘समुद्भूताब्रवीच्छिवा’। यह एकीकरण कोई कृत्रिम या थोपी गई एकता से नहीं होगा, यह संकट को साथ-साथ और साझा झेलने की इच्छा का प्रतिफल होगा। इसीलिए सप्तशती के बारहवें अध्याय में कहा गया है कि ‘‘संघात भेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्ततम’’, अर्थात् यह माहात्म्य मनुष्यों के संगठन में फूट होने पर अच्छी प्रकार मित्रता कराने वाला होता है। यह रेखांकित करने योग्य है कि देवता सिर्फ शरण में आकर किसी दूसरे को उनकी ओर से लड़ने देने की निष्क्रियता में घटकर नहीं रह गए हैं, बल्कि जिस देवता का जैसा रूप, जैसी वेशभूषा और जैसा वाहन है, ठीक वैसे ही साधनों से सम्पन्न हो उसकी शक्ति असुरों से युद्ध करने के लिये आती है- ‘‘यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनं/तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान योद्धुमाययौ’’। यह भी ध्यान देने योग्य है कि ज्ञान-प्रधान महासरस्वती वाले उत्तर चरित्र में देवी के अधिकतम रूप बताए गए हैं। शायद यह बताने के लिये कि जानने के कई तरीके हैं। लेकिन जो आँखें खोलने वाली बात है वह तब सामने आती है जब अपने भाई निशुंभ को मारा गया देख तथा सारी सेना का संहार होता जान शुंभ ने कुपित होकर कहा- ‘दुष्ट दुर्गे! तू बल के अभिमान में आकर झूठ मूठ का घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी बनी हुई है किन्तु दूसरी स्त्रियों के बल का सहारा लेकर लड़ती है।’ यह वही शुंभ था जिसका दूत यह दावा करता था कि- ‘‘तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं न पुनः स्त्री त्वमेकिका’’ - तुम अकेली स्त्री होकर कैसे ठहर सकती हो। ‘‘स्त्री त्वमेकिका’’ (5/24) यही शब्द, यही मानसिकता तो इतिहास में स्त्री पर तमाम अतिचारों और जोर जबर्दस्ती का कारण बनी।

लेकिन संभ्रम का निवारण- आसुरी अवधारणा का निवारण- शुंभ के कुपित होकर उपर्युक्तानुसार कहने पर स्वयं देवी करती है :- ‘‘एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा/पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः’’ (10/5) कि ओ दुष्ट! मैं अकेली ही हूँ। इस संसार में मेरे सिवा दूसरी कौन है? देख ये मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं। ‘‘त्वमेकिका’’ के ताने पर ठोककर कहा गया ‘‘एकैवाहं’’। यह शब्द कानों में देर तक बजता है। दूसरी ओर स्त्रियों में फूट डालकर एक को दूसरे से लड़ाने और उन्हें एक दूसरे में ही व्यस्त रखने वालों के लिये कहा गया है : ‘‘द्वितीया का ममापरा’’ यह एक प्रश्न है जो देवी जैसे सिर्फ शुंभ के सामने नहीं, समस्त दिक्काल - सारे ब्रह्म वैवर्त-के सामने रखती हैं। जो किसी भी स्त्री को या स्त्रियों को अत्याचार और ज्यादती का शिकार बनाते हैं, वे देवी के सामने खड़े शुंभ निशुंभ ही हैं। बलात्कार आज भारत का ‘फ्रास्टेस्ट ग्रोइंग’ अपराध है। 1971 से 2006 के बीच भारत में बलात्कार मामलों में 78% की वृद्धि हुई है। अन्य अपराधों को भी मिला लें तो प्रति घंटे देश में 18 महिलाएँ शिकार होती हैं (2006, राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो)।

1998 के राष्ट्रमंडल निधि सर्वेक्षण के अनुसार 31% (लगभग एक तिहाई) अमेरिकी स्त्रियाँ जीवन में कभी न कभी अपने पति या ब्वायफ्रेंड के हाथों शारीरिक रूप से या सेक्सुअली ‘एब्यूज’ का शिकार होती हैं। नेशनल वायलेंस अगेंस्ट वीमेन सर्वे (1995-96) में अमेरिकी स्त्रियों के बारे में पता लगा था कि उनमें से लगभग 25% जीवन में कभी न कभी बलात्कार या शारीरिक हमले की शिकार बनी हैं। जब अमेरिका जैसे तत्कथित समृद्ध देशों का यह हाल है तो कांगो जैसे युद्धरत अफ्रीकन देश को क्या कहें जहाँ ‘रेप एपिडेमिक’ (बलात्कार महामारी) फैला। इन तथ्यों के सामने देवी दुर्गा का यह उद्घोष- द्वितीया का ममापरा - एक अलग ही किस्म का मनोवैज्ञानिक आघात है।
उस दूत के द्वारा ‘तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं न पुनः स्त्री त्वमेकिका’ (5/124) का जवाब दसवें अध्याय के इसी प्रसंग में ‘‘तत्संहृतं मयैकेव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव’’ में मिलता है। उस ‘‘तिष्ठन्ति’’ के बदले में यह ‘‘तिष्ठाम्याजौ’’। ‘तुम अकेली स्त्री कैसे खड़ी हो सकती हो’ के जवाब में ‘‘अब अकेली ही युद्ध में खड़ी हूँ।’’ देवी के ऐश्वर्य शक्ति उनके रूपों की विविधता है। यह सम्पन्नता और समृद्धि भ्रम पैदा न करे, इसलिये उसकी एकात्मता और एकसूत्रता को रेखाङ्कित करना भी जरूरी था। दुर्गा सप्तशती इसी जरूरत को पूरा करती है।
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विविधा
महाकाली वाले प्रथम अध्याय में देवी को ‘‘नित्यैव सा’’ कहा गया। यदि समय के अर्थ में इसे लिया जाए तो यह समय ही हमारे लिए नित्य है। जब सब कुछ हमसे छूट जाए- कांचन, रिश्तेदार, सुख, मित्र सबसे हम वंचित हो जाएं तो उस विकट स्थिति में भी समय हमारे साथ रहता है। एक ऐसा धन जो नित्य है। यदि महाकाली, जैसा कि हमने पहले संकेत किया है, अवचेतन मन की प्रतीक हैं क्योंकि आखिरकार वह महामायादेवी ही तो ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं : बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति-तो भी वह इस अर्थ में नित्य हैं कि हमें अवचेतन ऊर्जा का अर्जन नहीं करना है बल्कि वह तो हमें सदैव उपलब्ध है। हमारी इन अवचेतन गहराइयों में अनन्त प्रज्ञा और अनन्त शक्ति है और जिसकी भी हमें आवश्यकता है, उसकी अनन्त आपूर्ति यहाँ से होती रहती है : त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैत्सृज्यते जगत्। यह अवचेतन शक्ति हमें दैनिक जीवन की विकलांगताओं से मुक्त कर पूर्ण बनाती है। इसके भीतर एक चामत्कारिक उपचार - ऊर्जा है। इसे ‘स्वधा’ कहा गया, जिसके और दूसरे याज्ञिक अर्थ हों, लेकिन एक अर्थ संकेत यह है कि यह ‘सब्जेक्टिव माइंड’ की शक्ति है। आब्जेक्टिव माइंड तो सचेत मन है जो प्रायः तर्काधारित और ऐन्द्रिक प्रत्यक्ष पर निर्भर है, लेकिन सब्जेक्टिव माइंड की तराई, उपत्यकाएँ और भूतल कुछ दूसरे ही हैं। वह ‘परापराणां परमा त्वमेव’ है।

हमारी अवचेतन ऊर्जा हमें चिरन्तन के संस्पर्श में लाती है। डॉ. जेम्स ईसाडेल अवचेतन मन की शक्ति का उपयोग कर मानसिक अनेस्थीसिया देते थे। 1843 से 1846 के बीच बंगाल में इस विधि से उन्होंने 400 बड़े सर्जिकल आपरेशन किए। तब तक लुई पाश्चर और जोसेफ लिस्टर की खोजों का अतापता न था। उनके मरीजों को न पीड़ा होती थी और न उनमें से कोई सर्जरी के दौरान मरा। इसलिए सप्तशती महामाया को जीवनदायिनी सुधा कहती है। उनके मरीज सम्मोहन की अवस्था में ले जाए जाते थे और उन्हें कहा जाता था कि उन्हें न कोई संक्रमण (इन्फेक्शन) होगा और न सेप्टिक कंडीशन होगी। सम्मोहन की उस अवस्था में उनका अवचेतन मन उन निर्देशों को स्वीकारता जाता है और उन सजेशन्स के मुताबिक अनुक्रिया करने लगता था। इसी परिप्रेक्ष्य में ‘महामोहा’ भगवती के प्रति श्रद्धा की बात प्रथम अध्याय में मिलती है। यह ‘महामाया’ वह है जिन्हें सप्तशती ‘तया सम्मोह्यते जगत’ कहती है। स्विस चिकित्सक मेस्मर ने उपचार करने में अवचेतन ऊर्जा का इस्तेमाल सम्मोहन के जरिए किया था और वह इतना सफल रहा था कि फ्रेंच सरकार ने उसके इलाजों की जाँच के लिए एक आयोग गठित किया जिसमें एकेडमी ऑफ साइंस के प्रख्यात चिकित्सक और वैज्ञानिक सदस्य बनाए गए। बेंजामिन फ्रेंकलिन भी इसका सदस्य था। लेकिन इस आयोग ने भी मेस्मर के इलाजों की पुष्टि की। बात उस ‘हिप्नोटिक ट्रांस’ की ही थी। यह अवचेतन ऊर्जा समय और स्थान की सीमाओं से स्वतंत्र है। इसी कारण चिकित्सा विज्ञान में आजकल ‘एब्सेंट ट्रीटमेंट’ की बात चल रही है क्योंकि मन की यह ऊर्जा देशकाल को अतिक्रान्त करती है। यह अवचेतन को गर्भाधानित करती है।  इसी अर्थ में वह ‘महाकाली’ है। इस अध्याय में ब्रह्मा की स्तुति एक तरह की ‘प्रेयर थिरेपी’ है। प्रार्थना-उपचार।


देवी बहुगणन से नहीं घटतीं, एक मधुर रागिनी की तरह एक ही साथ वह अनेक स्थानों पर हो सकती हैं। दुर्गा सप्तशती में उनका अवतार या उनके अन्य अनेक अवतार जितना ध्यान खींचते हैं, उससे कहीं ज्यादा मुझे यह बात ध्यान आती है कि ये सारे अवतार किसी अर्नेस्ट तरीके से ही होते हैं, उनमें एक संकट की आसन्नता है और उसका उत्तर बनकर वे आते हैं। दूसरी ओर, वे शायद इस बात के लिए भी हैं कि किसी रूप विशेष की बद्धता से मनुष्य को मुक्त किया जाए। जिस तरह से दुर्गा सप्तशती में देवों द्वारा की गई देव-स्तुति उनके रूपों का परिचय देती हैं, उसी तरह से ल्यूशियल एप्यूलीमेस ने अपने उपन्यास "The Golden Ass' में क्वीन आइसिस नामक वैश्विक महादेवी से कहलवाया है :-
I am she that is the natural mother of all things, my name, my divinity is adored throughout the world, in diverse manners, in variable customs, and by many names........... For the Phyrygians…… call me the Mother of the gods of Pessinus; the Athenians which are sprung from their own soil, Cecropian Mineva; the Cyprians, which  are girt about by the sea, Paphian Venus, the Cretans which bear arrows, Dictynian Diana; the Sicilians, Eleusians their ancient goddess Ceres; some Juno, others Bellona, other Hecate, Others Ramnusie and  principally both sort of the Ethiopians which dwell in the orient and are enlightened by the morning rays of the sun; and the Egyptians which are excellent in all kind of ancient doctrine, and by their proper ceremonies accustomed to worship mess call me by my true name,  Queen of Isis.


यदि दुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम, कवच, कीलक नाम-विशेष की बद्धता से आजाद करते हैं तो तीनों चरित्र और विशेषतः उत्तरचरित्र रूप-विशेष की सीमा से स्वतंत्र करते हैं। देवी का तत्व नाम और रूप दोनों के पार जाता है। ये नाम और रूप, ये स्तुतियाँ तो अनुभव के किसी तट पर ले जाने वाली नौकाएँ मात्र हैं।
ग्रीक दार्शनिक एंटीस्थीनीस (जन्म 444 ई.पू.) का कहता थाः ईश्वर किसी चीज की तरह नहीं है, अतः उन्हें किसी छवि के माध्यम से कोई नहीं समझ सकता। (God is not like anything; hence no one can understand him by means of an image) शायद हमारे यहाँ ज्यादा सकारात्मक तरीके से यह कहने की कोशिश की गई है कि वह हर किसी चीज की तरह है और इसलिए हर छवि में वह रूपायित होता है, लेकिन मैं जिस ‘अर्नेस्ट’ तरीके की बात कर रहा था - ब्रह्माणी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, वाराही, शिवदूती, नारसिंही- वे ऐसा लगता है जैसे किसी विश्व-चेतना के स्वतःस्फूर्त संवेग की तरह प्रकट होती हैं, उन्हें जैसे ज्ञात है कि ‘दे मस्ट हरी’ (उन्हें जल्दी करनी चाहिए)। यह सिर्फ रूप का प्राकट्य नहीं है, गति का प्राकट्य भी है। यह गतिमय छवि है, ऐसे कि जैसे उनके भीतर ही एक तैयारी हो, एक ‘इनर रेडीनेस’। जैसे कि वे अर्थवत्ता के इम्प्रिन्ट्स लेकर और जानकर ही आयी हों, जैसे कि वे पश्चिमी दार्शनिक शोपेनहार के सिद्धान्त - सभी महान चीजें धीरे परिपक्व होती हैं- All great things mature slowly - का प्रतिकार कर रही हों, ये सभी देवियाँ अपनी अपनी तरह से पैटर्न्ड हैं। ब्रह्माणी अक्षसूत्र विभूषणा है, ऐन्द्री वज्रहस्ता है और ऐरावत पर बैठकर आई है। जानबूझकर ये देवियाँ बौद्धिक से कहीं अधिक भौतिक बताई गई हैं। वे अपने डी.एन.ए. पर इम्प्रिन्ट्स अपने पिता-माता से ग्रहण नहीं कर रहीं बल्कि वे जिस देवता की शक्ति हैं, उन्हीं के नकूश लेकर पेश हो गई हैं। वे ही वे वाहन, वे अस्त्र।


दुर्गा सप्तशती में संभुक्त एक और चीज है : परिवर्तनों का एक ‘क्षण’ एक इस्टेंट में होना। सहसा भगवती के शरीर कोश से शिवादेवी प्रकट हो जाती है, ‘हुँ’ शब्द के उच्चारण मात्र से ध्रूमलोचन असुर भस्म हो जाता है, अत्यन्त भयानक और परम उग्र चंडिका-शक्ति प्रकट हो जाती है। हमारी कंडीशनिंग जिस तरह से हुई है, वहाँ इस तरह का ‘तत्काल’ चकित करता है। इस तरह की घटनाएँ हमारी विश्वास प्रणाली में एक शिफ्ट तय करने के लिए हैं कि हमारे जीवन और अनुभव में इसी क्षण या किसी क्षण बदलाव हो सकता है। हमारे न्यूरोंस में अद्भुत क्षमता है। हमारा मस्तिष्क 30 बिलियन सूचनाएँ प्रति सेकंड ‘प्रॉसेस’ कर सकता है और जिस ‘कौशिकी’ का संकेत यहाँ है, वह कहीं 28 बिलियन वे न्यूरोंस या नर्व सेल्स तो नहीं जो ‘इम्पल्स’ (संवेग) कन्डक्ट करने केलिए डिज़ाइन किए गए हैं। किसी एक न्यूरोन की रिएक्शन लाखों अन्य न्यूरोंस में बीस मिली सेकंड के भीतर फैल सकती है। तो कौशिकी का प्रसंग क्या किसी तरह के न्यूरो-एसोसिएशन को इंगित करने के लिए है? एक क्षण को तो यह एक तरह के सेल्फ-सेबोटेज की तरह लगता है कि जब सुंदर भौहों वाली भगवती देवताओं से पूछती हैं, ‘आप लोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं,’ तब उन्हीं के शरीरकोश से प्रकट हुईं शिवादेवी बोलती हैं....’ ‘यहाँ एकत्र हुए ये समस्त देवता यह मेरी ही स्तुति करते हैं’ कथा यह भी कहती है कि कौशिकी के प्रकट होने के बाद पार्वती देवी का शरीर काले रंग का हो गया। मुझे कोरिन्थिअंस (15:15) की याद आती है : Behold, I show you a mystery; we shall not all sleep, but we shall all be changed, in a moment, in the twinkling of an eye लगता है जैसे एक सेकंड (क्षण) में सेकंड लाइफ (द्वितीय जीवन) हो।


पता नहीं इस ‘शक्ति त्रयात्मकः’ की संकल्पना में ऐसा क्या रहस्य है, लेकिन ‘तीन’ को विश्व की अनेक संस्कृतियों ने बड़ा स्थान दिया है। तीन को ‘ईश्वर का हस्ताक्षर’ माना जाता है। गणित में इस अंक को पहला ‘लकी प्राइम’ या पहला ‘यूनिक प्राइम’ कहा जाता है। एक ‘त्रिकोण’ को गणितज्ञ सबसे स्थाई आकार कहते हैं। तीन का लिप्यंकन पहले त्रिपुंड की तरह होता था। बाद में वह थोड़ा वक्र बनी है और तीनों रेखाएँ जुड़ गईं, भौतिकी की दुनिया में किसी न्यूट्रान के भी तीन क्वार्क होते हैं। न्यूटन के तीन सिद्धांत हों या आइज़क आसिमोव की रोबोटिक्स के तीन नियम, फ्रायड के इड, ईगो या सुपर-ईगो हों या जीवशास्त्र में आएनए व डीएनए की कोडोन सिस्टमत्रयी, सभी जगह तीन का वैशिष्ट्य है।


दुर्गा सप्तशती की देवी-त्रयी उस ईश-त्रयी के समकक्ष है जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश में रूपायित होती है या तीन ग्रीक देवों ज्यूस-पोसीडान-हेडेस में या तीन रोमन देवों जूपिटर-नेप्चून और प्लेटो या तीन इजिप्शिअन धर्ममूर्तियों होरुस-आइसिस-ओसिरिस में या ईसाइयत की पिता-पुत्र और स्पिरिट वाली त्रयी में या बुद्धत्व के बुद्ध, धम्म और संघ के त्रिरत्नों में, ताओ के ‘तीन परमशुद्धों’ में या सत-रज-तम के त्रिगुणों में या गुरजिएफ के तीन केन्द्रों में त्रिदेवी का एक रूप- मेडन, मदर, क्रोन की तरह चलता है या ग्रीक पौराणिकी में एक त्रिमुखी देवी ‘हिकेट’ की तरह। संत ऑगस्टीन स्मृति-समझ-संकल्प के त्रिगुण की बात करते थे और संत एक्विनास एकता-सत्य और शिवत्व को।
द्वितीय चरित्र में ‘पशु’ से नफरत करना थोड़े सिखाया गया है, अन्यथा इस चरित्र में ‘सिंह’ की अति सक्रियता क्यों दिखाई जाती जो देवी का वाहन है। देखें, यह वही सिंह है जिसने सभ्यता के आदिकाल से ‘हंटिंग’ के लिए मनुष्य से स्पर्धा की। फ्रांस के चौवेट के गुफा चित्रों की बात हो या अफ्रीका के नामीबिया के ट्वाइफेल्फोंटीन के गुहा-चित्रों की, सिंह की आदि मानव द्वारा की गई ड्राइंग्स बार-बार इसका प्रमाण देती हैं। जैसे सप्तशती में सिंह देवी का वाहन होने (‘‘सिंह देत्याः स्ववाहनः’’) की, जगह देवी का स्वयं में एक शस्त्र है, वैसे ही फ्रांस के इस्तुरित्ज़ की गुहा-पेंटिंग देखें जहाँ सिंह को एक बाण की तरह चित्रित किया गया है। सुमेर में सिंह डैगन के मंदिर की रक्षा कर रहा है और सीरिया हो या ईरान ऐसे कई स्थल/निर्मितियाँ हैं जहाँ सिंह किसी द्वार के रक्षक की तरह खड़ा है।

लेकिन सप्तशती में वह देवी की ओर से युद्ध करते हुए सक्रिय ही नहीं, अतिसक्रिय भूमिका अदा कर रहा है। महिषासुर से देवी लड़ रही हैं और उसकी सेना से सिंह। ‘‘क्षणेन तद्बलं सर्वंक्षयं नीतं महात्मना/तेन केसरिणा देत्या वाहनेनातिकोपिना’’ (मध्यम चरित्र)। यह ध्यान देने की बात है कि चीन और तिब्बत में बौद्ध धर्म गया तो अन्य अनेक चीजों के साथ ‘सिंह’ को भी लेकर गया। यानी बौद्धों में भी हम ‘तारा’ और ‘वज्रयोगिनी’ देवी तो देखते ही हैं, उसके साथ-साथ तिब्बती सिंह की दहाड़ या चीन के हान वंशीय (सिंह) मार्शल आर्ट को भी। चीन में सी जी सिंह का भी नाम है और बुद्ध का भी। चीनी भाषा में सी-जी-हाओ का अर्थ है : सिंहनाद : और सप्तशती में भी सिंह के इस ‘‘नादं सुभैरवं’’ की चर्चा है। चीनी सी-जी-हाओ एक सशक्त उपदेश या प्रवचन को भी कहते हैं। राजगद्दी को हमारे यहाँ सिंहासन कहा गया है और ‘सिंह’ को देवी के ‘रजस’ चरित्र महालक्ष्मी के संदर्भ में विशेष सक्रिय दर्शाया गया है।

श्रीलंका को भी सिंहल कहा गया है- सिंह के द्वारा स्थापित राज्य। वह सिंह जो श्रीलंका के तत्समय राक्षसों पर विजय प्राप्त करता है। इस चरित्र में भी सिंह राक्षसों का नाश कर रहा है। यह भी ध्यातव्य है कि विष्णु का एक पर्याय हरि है जिसका अर्थ सिंह भी होता है।
महाकाली शायद यह बताने के लिये भी हैं कि काल को ‘किल’ नहीं किया जा सकता, कि वह तो महाकाली की तरह नित्य और स्थिर है। समय खर्च नहीं होता, हम होते हैं। हेनरी ऑस्टिन डॉब्सन ने यही तो कहा : टाइम गोज़, यू से? आह नो/एलास, टाइम स्टेस, वी गो। काल की अक्षयता और निर्व्ययता का स्वीकार महाकाली की वास्तविक पूजा है। हम अपनी अंतवत्ता और पार्थिवता को काल पर आरोपित करना चाहते हैं किन्तु महाकाली का आइकॉन हमें लगातार सचेत करता है कि यह सब सुनी सुनाई बातें हैं, कान का मैल। इस मैल से ही दैत्योत्पत्ति है। अतः जागो। प्रजल्प और कानाफूसी से - चाहे वह मधुर हो या कड़वी - कहीं आगे एक जीवन है। एक अच्युत, एक अव्यय, एक अमित विक्रम की सक्रियता से सस्पंद।

उसी अमृताश और अनंतात्मा के प्रति उन्मुख हो। जीवन की सार्थकता और सार इसी में है।
ttt

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