शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - पुस्तक ऋण

व्यंग्य

पुस्तक ऋण

डॉ. रामवृक्ष सिंह

हाल ही में लखनऊ में आयोजित पुस्तक मेले के समापन समारोह में कुछ हिन्दी प्रकाशकों ने कई उदार घोषणाएं कीं। इनमें एक घोषणा यह भी थी कि अब हिन्दी के कुछ प्रकाशक दस हजार रुपये तक का पुस्तक-ऋण अपने पाठकों को उपलब्ध कराएँगे। इस व्यवस्था के अंतर्गत पाठक दस हजार रुपये की पुस्तकें बिना दाम चुकाए खरीद सकते हैं और चुकौती अगले एक वर्ष में किस्तों में कर सकते हैं। साथ ही, इन पुस्तकों के पुस्तकालय संस्करण पर पच्चीस प्रतिशत और पेपर-बैक संस्करण पर पन्द्रह प्रतिशत डिस्काउण्ट देने का वादा भी इन प्रकाशकों ने किया है।

प्रकाशकों का यह कदम वाकई स्वागत-योग्य है। इससे अपने समाज में पुस्तकों के प्रति जड़ जमा चुके वैराग में कमी आने की कुछ तो सम्भावना बनती ही है। वैसे तो अपने देश में एक बार स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद बहुत कम लोग ही पढ़ने-लिखने से वास्ता रखते हैं, लेकिन कई घरों में अब भी किताबों को सजाने और दिखाने का शौक बरकरार है। हजारों में कोई एक-दो लोग महीने-दो महीने में एकाध बार पढ़ने की रस्म भी अदा कर लेते हैं। प्रकाशकों की पुस्तक-ऋण योजना के ऐसे ही लोगों के दम पर आगे बढ़ने की सम्भावना है।

वैसे अपने देश में और खासकर उत्तर भारत में पुस्तकों का पूरा कारोबार सरकारी खरीद पर आश्रित है। यह सरकारी खरीद या तो सरकारी शैक्षिक संस्थाओं में होती है या विभिन्न स्तरों पर स्थापित सरकारी पुस्तकालयों में। इन्हीं जगहों पर प्रकाशक लोग डेढ़ सौ रुपये की पेपर-बैक पुस्तक का लाइब्रेरी संस्करण आराम से पाँच-सात सौ रुपये में बेच लेते हैं। पुस्तक चाहे जैसी हो, बस खरीद करनेवाले अधिकारी का कमीशन बाँध दीजिए। कमीशन देकर अपने देश में केवल बोफोर्स तोपें, मनचाही तैनातियाँ, चारा, दवाइयाँ, ताबूत, खेल-उपकरण आदि ही बेचे और खरीदे नहीं जाते, बल्कि किताबों की खरीद-फरोख्त भी कमीशन पर ही आधारित है। प्रकाशक भाई इस बात को खूब जानते हैं और अमल में लाते हैं।

हम सब जानते हैं कि पुस्तकों का कॉपी राइट लेखक की मृत्यु के कुछ वर्ष बाद समाप्त हो जाता है। फिर उसकी कहानियों, उपन्यासों और लेखों आदि की खुली लूट करने की छूट प्रकाशकों को हासिल हो जाती है। यही कारण है कि अपने देश में बहुत-सी किताबें केवल ऐसे दिवंगत लेखकों की छपती और बिकती हैं, जिनपर कॉपी राइट का बन्धन अब नहीं रहा। वही पुरानी बासी कढ़ी नई-नई तरह की पैकिंग में, नए-नए प्रकाशन-गृहों द्वारा उबाली और परोसी जाती है।

नया लेखक इस देश में छपने का इन्तजार करता-करता बुढ़ा जाता है और अंततः बेचारा मर-खप जाता है। उसे कोई प्रकाशक नहीं मिलता। किसी प्रकाशक के पास जाइए तो वह मुँह बिचकाता है- ‘ना जी ना। अभी तो हमारी कोई प्रकाशन-योजना नहीं है। छह महीने बाद देखेंगे।‘ छह महीने बाद जाइए तो फिर वही रोना। यदि आप कविता लिखते हैं तो वह कहेगा- ‘कविताएँ तो कोई पढ़ता नहीं। आप ऐसा कीजिए कि तकनीकी विषयों पर लिखिए।’ आपने मेहनत करके तकनीकी विषयों पर लिखा तो वह कहेगा- ‘तकनीकी विषयों पर तो युनिवर्सिटी के लोगों की लिखी हुई किताबें ही बिकती हैं। आप ऐसा कीजिए, कहानियाँ लिखिए।’ आप कहानी लिखिए तो वह कोई और बहाना बनाकर आपको टरका देगा। आपको छपने का ज्यादा ही शौक है तो आप प्रकाशक के सामने दूसरा प्रस्ताव भी रख सकते हैं या वह स्वयं ही आपसे अपनी फरमाइश कर देगा और पूछेगा- ‘आप कितना सहयोग कर सकते हैं छपने में?’ सहयोग से उसका आशय साफ है। यानी आप पुस्तक की लागत में कितनी राशि का योगदान करेंगे? चूंकि आप इस लाइन की रीति-नीति से अनभिज्ञ हैं, इसलिए वह ही आपको समझाएगा –‘ऐसा कीजिए कि आप हमें बीस हजार रुपये दे दीजिए। हम आपकी किताब की तीन सौ प्रतियाँ छाप देंगे।‘ आप खुश हो गए कि चलो आधे महीने की तनख्वाह में एक किताब छपकर आ जाएगी, वह भी शहर के छोटे-मोटे प्रकाशन के बैनर तले। लेकिन फिर आपकी व्यवसाय –बुद्धि जागती है और आप पूछते हैं- ‘बीस हजार तो मैं लगा दूँगा। पर मुझे मेरे पैसे कब वापस मिलेंगे और रायल्टी कितनी मिलेगी?’ प्रकाशक ने आपकी नब्ज पकड़ ली है। अब वह आपको निचोड़ने पर आमादा हो गया है- ‘जब किताबें बिक जाएँगी, तब आपको आपके पैसे मिल जाएँगे। शुरू में आपको चालीस किताबें दे देंगे। उनका आप चाहे जो करिए।’

लो जी, हो गई बात! बीस हजार रुपये देकर आपकी किताब छपी। चालीस प्रतियाँ आपको मिलीं। आपको किताबें बेचने का कोई तज़ुर्बा तो है नहीं। चालीस अदद किताबें बेचें तो किसे बेचें? सबसे पहले ज़हन में आते हैं, दोस्त, रिश्तेदार और जान-पहचान वाले। उन्हें किताबें बेचने का सवाल ही नहीं पैदा होता। हद से हद यह होगा कि आप उन्हें अपनी सद्यःप्रकाशित पुस्तक भेंट में दे देंगे। इस तरह भेंट दे-देकर चालीस किताबें कब बँट जाएँगी, पता ही नहीं चलेगा।

उधर प्रकाशक, जिसने आपकी किताब छापकर आपके ऊपर बहुत भारी अहसान लाद दिया है, उससे कभी शर्माते-सकुचाते पूछेंगे कि भाई साहब, मेरी किताब कैसी चल रही है, तो वह एकदम बुरा-सा मुँह बनाकर जवाब देगा- ‘दस कॉपियाँ भी नहीं बिकीं। सबकी सब पड़ी हैं। चाहे तो आप उठवा ले जाइए।‘ यदि प्रकाशक के किसी नौकर से आपकी रब्त-जब्त हो, और उसे फुसलाकर पूछने का मौका मिले तो हकीकत जानकर आप चकित रह जाएँगे। वह बताएगा कि ‘नहीं साहब, आपकी किताब तो निकल रही है। हर बार मैं कुछ कॉपियाँ इधर-उधर लाइब्रेरियों में पहुँचाकर आता हूँ।‘ दरअसल होता यह है कि प्रकाशक तीन सौ नहीं, कई हजार कॉपियाँ आपकी किताब की छपवा लेता है और उसे बेचता रहता है। अगली बार के लिए प्लेटें भी बचाकर रख लेता है, ताकि दुबारा छपवा सके। लेकिन लेखक पूछे तो बस ठेंगा दिखा देता है। प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता के लिए बेकार से बेकार किताब भी सरकारी लाइब्रेरियों में खपाना कोई बड़ी बात नहीं है। यह बिलकुल ऐसे ही है, जैसे तीन हजार अव्वल ईंटों में चार सौ सेमा या दोयम ईंटों को खपा देना या पाँच लीटर दूध में एक लीटर पानी खपा देना। अपने देश में इतनी बेईमानी चलती है। इसे वैधीकृत बेईमानी समझिए।

प्रेमचंद ने कभी कहा था कि हिन्दी का प्रकाशक पक्का ..... होता है। यहाँ ..... से आशय किसी जाति विशेष से नहीं है, बल्कि उस प्रवृत्ति से है जो मुर्दे का कफन चुराने से भी गुरेज नहीं करती। हिन्दी जगत में कोई व्यक्ति लेखन के दम पर जीवित बचा रह जाए, यह लगभग नामुमकिन है। यहाँ के हर लेखक ने अपने जिन्दा रहने और जीवन के जरूरी खर्चों को पूरा करने के लिए लेखन के साथ-साथ कोई न कोई दूसरा काम किया है। कोई पढ़ाता रहा है, तो कोई क्लर्की करता रहा है। कोई अखबारनवीस रहा है, तो कोई परचून की दुकान ही किए बैठा है। कोई बिजली मिस्त्री रहा, तो कोई किसान। छोटे से लेकर बड़े, सभी हिन्दी लेखक और रचनाकार आजीविका के लिए लेखन से इतर दूसरे-दूसरे धन्धों से जुड़े रहे। कारण?

हिन्दी के अनुदार, बेईमान प्रकाशकों ने कभी हिन्दी लेखक को उसका उचित मुआवजा नहीं दिया। हो सकता है, प्रकाशकों की इस भीड़ में कुछ भले मानुस भी हों, लेकिन बहुतायत तो ऐसों की ही है, जो अव्वल तो नए लेखक को छापते ही नहीं। और यदि छापते भी हैं तो उसी से पैसा लेकर।

कुछ चुनिन्दा प्रकाशक सस्ते मोल वाली अच्छी किताबें छापते हैं। पाठक उन्हें हाथों-हाथ लेते हैं। ऐसी किताबों में प्रमुखता हमारे धार्मिक साहित्य की है। लेकिन ज्ञान-साहित्य और ललित साहित्य की क्लासिक कृतियाँ, कोश आदि का अंकित मूल्य बहुत अधिक होता है। यही स्थिति बड़े-बड़े लेखकों के समग्र साहित्य की जिल्दों की होती है। इन जिल्दों (वॉल्यूम्स) को खरीदना आम आदमी के वश की बात नहीं है।

ऐसा नहीं कि पुस्तकों को छापने पर इतना खर्चा होता है। दरअसल प्रकाशन का काम बहुत बड़ी मात्रा में पूँजी के निवेश की अपेक्षा रखता है। लेखक को न भी दें, लेकिन कंपोजिंग, प्लेट मेकिंग, कागज, छपाई, जिल्द-साजी, वितरण, कमीशन-प्रदायगी आदि मदों पर काफी बड़ी रकम अदा होती है। यदि लेखक को भी उचित मुआवजा देने लगें तब तो हो गया काम। फिर प्रकाशक को क्या बचेगा? इसमें जो चर घटक है, वह लेखक की रॉयल्टी ही है। वही मार सकता है प्रकाशक। बाकी किसी मद के पैसे मारने की सामर्थ्य उसमें नहीं होती। दूसरा काम वह यह कर सकता है कि किताबों के दाम खूब बढ़ा-चढ़ाकर रख दे। समाज में एक आम धारणा है कि जो चीज जितनी महँगी है, वह उतनी ही अच्छी है। सस्ती चीज अच्छी हो ही नहीं सकती। तो प्रकाशक इसी आम धारणा का फायदा उठाता है। वह किताबों के दाम इतने अधिक रखता है कि बस अमीर लोग ही उनको खरीद सकें।

इधर समाज में ऋण लेकर घी ही नहीं और भी बहुत कुछ पीने की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है। बढ़ते-बढ़ते यह प्रवृत्ति इतनी बढ़ चली है कि बहुत-से लोग तो अब ऋण ही पीकर पचा जाते हैं और कभी लौटाने का नाम ही नहीं लेते। लब्बो-लुआब यह कि जिस चीज को देखिए वही अब ऋण पर, किस्तों में उपलब्ध कराई जा रही है। तो किताब भी क्यों न हो? वह भी तब, जब उसके दाम आम आदमी की पहुँच से बहुत अधिक हों।

बल्कि कुछ दिनों में किताबों की कीमतें इतनी अधिक हो जाएंगी कि यदि कोई व्यक्ति बिना ऋण लिए किताब खरीद लेगा तो आयकर विभाग के अधिकारी उसे नोटिस भेज देंगे कि आप यह बताइए कि इतनी बड़ी रकम आपको हासिल किस स्रोत से हुई। इसलिए यदि किताबें खरीदनी हों तो ऋण जरूर ले लेना चाहिए।

प्रकाशकों को ऐसी उत्तम योजना लाने के लिए बहुत-बहुत साधुवाद। लेकिन बेहतर होगा कि हमारी बाकी बातों पर भी गौर फरमाएँ।

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3 blogger-facebook:

  1. बहुत सुंदर विचार.... अब तो लोग ऋण पीकर ही पचा जाते हैं......
    गुदगुदा और सत्य

    सादर

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  2. बहुत सुंदर
    गुदगुदा गया... सत्य
    आज कल तो लोग ऋण ही पी जाते हैं.....

    वाह

    उत्तर देंहटाएं
  3. व्यंग्य नहीं, यह तो कड़वी सच्चाई है

    उत्तर देंहटाएं

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