अजय गोयल की कहानी : बीसवीं सदी का जीवाश्म

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पने सीने से निकले दर्द के लावे में छटपटाते दीनदयाल जी बेहोश हो गए थे। होश आने पर स्वयं को उन्होंने एक प्राइवेट नर्सिंग होम की 'इर्न्टन्सिव केयर यूनिट' में पाया। उनके सिरहाने रखा पल-पल दिल का हाल का आकड़ा बनाता मॉनिटर बीप-बीप कर रहा था। निचुड़े शरीर और दर्द के ज्वार के बीच भी उन्होंने अपने बेटे तुषार को बुलवाया और कहा कि निकालो यहाँ से। सरकारी अस्पताल ले चलो। तुम्हारे अहसान के बोझ की बजाय मौत की गोद ज्यादा अच्छी है।

अपनी आज्ञा के साथ तुषार को पूछने और कहने का मौका न देते हुए दीनदयाल जी आगे बोले, “मेरा कहा नहीं माना तो परिणाम के जुम्मेवार तुम होगे। मैं इसी अवस्था में उठकर दौड़ लगाना शुरू कर दूँगा। जिसके साथ सब कुछ खत्म हो जाएगा। फिर फूँक आना मुझे मेरे कूड़े करकट के साथ।”

अपने पिता को तुषार उस दुर्लभ श्रेणी का व्यक्ति मानता, जो इतिहास में अटक कर वर्तमान को बस गलियाते रहना चाहते हैं। कभी-कभी वह सोचकर हँसता ', 'टर्मिनेटर कल्वर' तक आ पहुँची जिन्दगी को बाऊ जी सीधे 'गांधी आश्रम' पहुँचा देना चाहते हैं। ''

सरकारी अस्पताल के 'इन्टेन्सिव केयर यूनिट' का मॉनिटर खराब था। दिल के तीन मरीज पहले से वहां भर्ती थे। यूनिट के बगल में स्थित वातानुकूलित हॉल का पता राज्य मंत्री के भर्ती होने के बाद चल सका। वे बदहजमी के शिकार थे। सुरक्षाधिकारियों की धमक के कारण तीनों गंभीर मरीजों ने वहाँ से स्वयं छुट्टी करा ली। लगातार दो दिन वरिष्ठ डाँक्टर मन्त्री के साथ रहे। जबकि बाहर मन्त्री का बेटा हाथ में सेलुलर फोन लिए जमा रहा था। इन दो दिनों में तुषार मन्त्री जी के टोह में रहा। उनकी बदहजमी तो बहाना भर थी। असल में तेजी से करवटें ले रही राजनीतिक परिस्थितियों के बीच मंत्री जी चिन्तन मनन के लिए भर्ती हुए थे। यह निर्णय लेने कि किस राजनीति द्वीप पर अगली छलाँग लगाई जाए कि कामधेनु कुर्सी की छत्रछाया बनी रहे। मन्त्रीजी के जाने के बाद वातानुकूलित हॉल में बाऊजी को शिफ्ट करने के लिए अधिकारियों से तुषार ने कहा भी। पर उनका उत्तर टका-सा था, “हाल केवल वी.आई.पी. के लिए आरक्षित है।” तुषार का निश्चित मत था कि जनतंत्र में आम आदमी के नसीब में कुचला जाना लिखा है। उसे छोटी किरण ठीक लगती। जो कहती, “हमें आम बने रहने के 'जेनेटिक डिफेक्ट' से उभरना चाहिए।'' वह अपने कहे अनुसार अपनी राह चुनकर आगे बढ़ गई। तुषार को लगता कि बाऊजी की जिराक्स कापी बनने से क्या मिलेगा 7 वक्त शहादत की मुट्ठी से निकलकर आयोजकों प्रायोजकों के पास जा चुका है। जबकि बाऊजी दादा की शहादत को आगे कर विधायकी की दौड़ में शामिल होने तक के लिए तैयार नहीं हैं। आज पार्टी कार्यकर्ताओं की पैकेजिंग बदल चुकी है। गुड़ चना खाकर दरी बिछाने वालों की जगह सेलुलर और कम्प्यूटर वालों ने ले ली है। जो एक साँस में अमेरिकी शेयर बाजार और भारतीय वोट बाजार की बात कर सकें।

मन्त्री की छुट्टी के साथ स्थिति पूर्ववत् हो गई। चैन की साँस लेकर अस्पताल सुस्ताने लगा। दीनदयालजी की निगरानी जूनियर डाँक्टर कर रहे थे। वरिष्ठ डाँक्टर दिन में एक बार आता। और दूर से निगाह मारकर चला जाता। इस बीच तुषार और दीनदयालजी के कानों में वार्ड कर्मचारी यह निकाल चुके थे कि वे फीस डाँक्टर साहब की कोठी पर पहुँचा दे। तभी साहब थोड़ी-बहुत दिलचस्पी लेंगे। नहीं तो जिन्दगी जूनियर डाँक्टरों के हवाले समझो। अब डाँक्टर सेवा करते रहेंगे तो दुनिया के साथ कैसे चलेंगे 7

सब कुछ चुपचाप गटकते रहे दीनदयालजी। करीब सप्ताह बाद उन्हें 'इन्टेन्सिव केयर यूनिट' से निकाल कर वार्ड में शिफ्ट किया गया। जहाँ उनका पोता अपार बेसब्री से इन्तजार कर रहा था। जिसे देख उनकी भी इच्छा जिन्दगी में वापस लौटने की हुई। सुबह-शाम अपार उनके टीसते पैरों को सहलाता। अपनी मीठी आवाज में अंग्रेजी की कविताओं के साथ “वैष्णव जन तो तैने कहिए जी. '' को सुनता। जिसे वे तनावग्रस्त क्षणों में धीरे-धीरे जीवन भर गुनगनाते रहे थे। एक दिन अपार ने उन्हें बताया कि किरण बुआ जी घर आकर अपना सामान ले गई। किरण एक बार भी दीनदयाल जी को देखने अस्पताल नहीं आई। इसका अफसोस नहीं था उन्हें। वे सोचते कि मेरा महत्त्व क्या रह गया है अब। मेरा क्या 7 महत्व शहीद रामस्वरूप जी का भी नहीं रहा।

इस बिन्दु पर उन्हें कुछ भूला याद आ गया। उन्होंने तुषार को बुलाकर कहा, “मैंने इस वर्ष रामस्वरूपजी के स्मारक पर संगमरमर का चबूतरा बनवाने की प्रतिज्ञा की थी। वहाँ तुम जाना नहीं चाहते, यह जानता हूँ। पर पास के नाले की गन्दगी कम-से-कम वहाँ नहीं पड़नी चाहिए। तुम काम शुरू कर दो। मरने से पहले ...। यह मेरे पर अहसान होगा।''

फिर भी उन्हें थोड़ा अचरज था। उनका अपना दिल उन्हें धोखा दे गया। क्योंकि वे यह समाचार कहीं सहन कर सके कि उनकी अविवाहिता बेटी किरण अपने व्वॉयफ्रेंड के साथ रहने लगी हैं।

दीनदयाल जी को पता ही नहीं लगा कि किरण को मॉडलिग का इकेक्शन कब और कही हो गया। बस उन्हें याद था, उदारीकरण के साथ गौ संस्कृति वाली भूमि पर 'वैलेंटाइन डे' कल्चर की हलचल जोश भरने लगी थी। बाजार में नए-नए देशी-विदेशी ब्रांड तहलका मचाए थे। हुँकारे भर-भर कर शेयर सूचकांक नयी-नयी एवरेस्ट फाँद रहा था। उस गर्म माहौल में तुषार एक प्राइवेट वित्तीय कम्पनी से जा चिपका था। माडलिंग से अचम्भित थे दीनदयाल जी। जहाँ तम्बाकू तक के विज्ञापन में केवल औरत होती। वे समझते कि विज्ञापनों की चमक में जब कोई कार में बैठे तो उसे लगे कि वह औरत पर चढ़ा है। सीट पर बैठे तो लगे - औरत में धँसा है। और तम्बाकू खाए तो लगे कि तम्बाकू नहीं औरत चबा रहा है।

वे समझ नहीं पाते थे कि उनकी घरेलू चिड़िया किरण अचानक बाज कैसे बन गई। उसने अपना नाम भी किशी कर लिया था। वे विवाह के बारे में बात करना चाहते तो वह विद्रोह पर उतर आती। विज्ञापनों की शूटिंग के लिए वह विदेश तक उड़ आई थी। इसके बाद उसकी कल्पनाओं के विस्तार में समुद्र तट तक आ पहुँचे थे। जहाँ वह एक घरोंदा बनाकर बस जाना चाहती।

किरण को वे शहीद रामस्वरूप का वास्ता देकर समझाना चाहते। पर सब बेकार था। धीरे-धीरे डिजाइनर परिधानों की ठसक में रहने वाली किरण ने अपने अमीर दोस्तों के साथ फॉर्म हाउसों में रातें बिताना शुरू किया। इस पर रोजाना भुनते रहने वाले दीनदयालजी एक बार सुलग उठे। घर में तांडव कर डाला। शहीद परिवार की बेटी की पतुरिया जैसी हरकतें! उस दिन वे घर में लंका दहन कर डालना चाहते। परन्तु उन्होंने महसूस किया तुषार किरण

के पक्ष में खड़ा था। उन्हें झटकते हुए वह बोला, “यहाँ नहीं रह सकते तो अपने कूड़े-करकट के साथ निकल जाइए। घर का दरवाजा खुला हे।''

कूड़े-करकट में गांधी जी की तस्वीर थी। शहीद रामस्वरूप का तिरंगे के साथ फोटो था, और शीशों के आवरण में सुरक्षित एक पुराना चरखा था। इन्हें विरासत के रूप में सँजोए हुए थे दीनदयाल जी। ये तीनों घर के ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाते। उस दिन के बाद वे सब उनके छोटे से कमरे में सरका दिए गए। और ड्राइगरूम नए-नए मॉडल चित्रों से चमचमा गया था।

फिर एक काले सोमवार को क्रुद्ध साँड की तरह ऊपर दौड़ता शेयर सूचकांक फिसलकर नीचे आ गिरा। कम्पनी का दिवाला निकल जाने के कारण प्रवर्तकों के साथ तुषार भी रातों-रात गायब हो गया। निवेशक घर आकर गाली-गलौज करते। शर्म और लज्जा में गड़े दीनदयालजी उन दिनों अपने कमरे से बाहर नहीं निकलते थे। आश्चर्य, कुछ दिनों में सब कुछ सामान्य हो गया। मन्त्रियों के हस्तक्षेप से मामला ठंडा पड़ गया। तुषार भी मुस्कराता हुआ घर वापस आ गया। अपनी काली कमाई का निवेशक कितना हल्ला करते? दीनदयाल जी को लगता, काली कमाई की फसल पर पली-बढ़ी चौकड़ी भरती एक पूरी पीढ़ी तैयार है। जिनकी ऑखों में विदेशी कारों का तम्बू गड़ा हैं। जबड़ों में मेकडोनल्ड रेस्त्रां के बर्गर का स्वाद भरा है। और रातें फार्म हाउस के स्वप्नों से सजी हैं।

वित्तीय कम्पनी बन्द हो जाने के बाद तुषार और किरण ने मिलकर एक टेलीफ्रेंडशिप जैसी कंपनी बना ली। जिसका पता उन्हें घर में रखे 'निराशा दूर कीजिए' जैसे वर्गीकृत अखबारी विज्ञापन से चला। उसकी दो-तीन पंक्तियों मे ब्राडमाइंटेड लड़कियों और पुरुषों से अमेरिकी स्टाइल में दोस्ती की गारंटी थी। ओर शाही सन्तुष्टि के लिए मजा लूटने और दिलाने का आश्वासन भी।

अपने कमरे में सिमटे अपनी तुलना एक गरीब किसान से करते दीनदयालजी। जिसने ज्यादा दूध देने वाली नख के लालच में अपनी देसी गाय का संसर्ग विदेशी सीड से करा लिया। पहले उसे बछड़ा मिला। एक बछिया। बड़ी होने पर सँकरी बछिया ने दूध कम ही दिया। गाँव की तपाती धूप से उसे बचाने के लिए एयर कंडीशनर चाहिए था। बछड़ा भी बेकार रहा। न वह हल खींच सकता था, न बैलगाड़ी। क्योंकि उसके कूबड़ नहीं निकला था। अपनी इस मानसिक उथल-पुथल के बीच दीनदयालजी को अपार एक तोहफा लगता। दादा-पोते में खिचड़ी भी खूब पकती। उनके पलंग के नीचे का खाली स्थान उसके स्कैच पेनों और खिलौनों का एक सुरक्षित स्थान था। अपने स्कैच पेनों से अपार ने दादाजी के कमरे की दीवारों पर ब्रह्माण्ड उकेर दिया था। जहाँ तारे दिन भर चमकते रहते। समुद्र कहीं हरा तो कहीं नीला था। जहाँ चन्दा मामा रात-दिन अपने सूरज भैया के साथ मुस्कराता रहता। जल राशि में रंग बिरंगे पक्षी तैरते। मछलियाँ हवा में उड़ती। इन सबके साथ अपार ने एक हवाई जहाज भी बनाया था। उसके खिलौनों में हवाई जहाजों की संख्या ज्यादा थी। हवाई जहाज हमेशा उसकी पहली पसन्द रहते। जिन्हें वह अपनी छोटी बहन गंगा के साथ हवा में तैराता रहता। दिन में जब कोई हवाई जहाज घर के ऊपर से आकाश में गुजरता, वे पल अपार के लिए सबसे सुखद होते। उसकी गड़गड़ाहट का भान उसे घर में सबसे पहले होता। वह सबकुछ स्थगित कर बाहर भागता। शोर मचाता। और क्षितिज की तरफ जाने यान को विदाई देता। लौट कर कहता, “मेरे मामाजी का जहाज था। जो विदेश में रहते हें।'' उस दिन अपार को आश्चर्य हुआ जब विदेश से लौटे मामाजी मिलने के लिए कार से घर आए। वह उन्हें अपलक देखता रह गया। नमस्ते करना तक भूल गया। बोला, “मामाजी, मम्मी कहती हैं, आप तो हवाई जहाज में चलते हो। वो3 कही है 7 आप तो कार से आए हैं।”

अपार को चूमकर मामाजी ने गोद में उठा लिया। बोले, “हवाई जहाज अड्डे पर खड़ा रह जाता हे। बहुत बड़ा होता है ना 1 हम आपको ले चलेंगे जहाज दिखाने।” दूसरे दिन पिताजी की गोद में बैठकर अपार मामाजी के साथ हवाई पट्टी के पास तक गया। ब्रिज पर खड़े होकर उसने कई जहाज उड़ते हुए और उतरते हुए देखे थे।

घर आकर अपार दौड़ता हुआ दादा जी के पास पहुँचा। बोला, “जहाज तो बहुत बड़ा होता है। बहुत तेज आवाज करता है। दादाजी, उड़ने से पहले वो बहुत तेज दौड़ता है। फिर अपनी लम्बी नाक उठाता है और उड़नछू हो जाता है। उसकी इतनी लम्बी नाक क्यों होती है ?''

अपार के प्रश्न ने दादाजी का मन मोह लिया, जब उसे पूछा, “चिडिया भी तो उड़ती है। उनके पंख हिलते रहते हें। लेकिन जहाज के पंख क्यों नहीं हिलते ?”

सुबह उठकर अपार सबसे पहले अपने दादाजी के कमरे में आता। अपने चित्रों और खिलौनों से मिलता। पारदर्शक शीशों के अन्दर सुरक्षित चरखा उसके लिए आकर्षण का केन्द्र रहता। उसने लगभग रट लिया था कि चरखा दादाजी के दादाजी का है। जिनका नाम रामस्वरूपजी था। आजादी के वे सिपाही थे। चरखे पर सूत कातते थे। अपार के साथ दीनदयालजी प्रतिदिन शीशे साफ करते और चरखे पर फूल चढ़ाते। बस, यही था उनका पूजा-पाठ। चाहते थे कि उस युग का संस्कार युवाओं की अस्थि मज्जा तक जाए। जब वे गाँधी जी की ऊँचाई के सम्बन्ध में सोचते तो उन्हें परी कथाएँ तक सच लगने लगती। वो गाँधी ही था, जिसमें नोआखाली की आग में निहत्थे ही कूदने की ताकत थी। नहीं तो आज के नेता जलियाँवाला कांड को दोहराने का सामान साथ लेकर चलते हैं। वो गांधी ही हो सकता था, जिसके चरखा अपना भर लेने से बरतानिया के भीमकाय सूती उद्योग में हड़कम्प मच गया था। उस समय उन्हें अपने दादा रामस्वरूप याद आते। शहर के रामलीला मैदान में गाँधी जी की सभा होनी थी। पहले बारिश से मैदान गीला हो गया था। बस निकल पड़े थे रामस्वरूप जी घंटा लेकर जिसे बजाते हुए वे शहर भर में घूमे। देखते-देखते पूरा शहर उनके पीछे आ जुटा। सभी ने कपड़े से पोंछ-पोंछकर मैदान सुखा लिया। और 11 अगस्त, 42 को तिरंगे को हाथ में लेकर दहाड़ते हुए अपने सीने पर उन्होंने गोली खा ली थी।

इन स्मृतियों में डूबे दीनदयाल जी शीशे साफ करते समय अपने को जमीन से एक फुट ऊँचा खड़ा महसूस करते। अपने इसी उत्साह में दो साल पहले उन्होंने शहर में वृद्धों की सेवा के नाम पर आयोजित फैशन शो का विरोध करने की ठान ली। नगाई ओर सेवा का उनकी बुद्धि कोई जोड़ नहीं ढूँढ पा रही थी। अपनी जिद में चरखे के साथ उपवास का व्रत लेकर कार्यक्रम स्थल पर जा बैठे। लेकिन दो दिनों तक कोई हँसी उड़ाने तक उनके पास नहीं फटका था। फैशन शो हुआ क्योंकि सांसद के आशीर्वाद जैसे इंद्रजाल का संरक्षण था। अगले दिन स्थानीय अखबार में गर्दन ऊँची किए जिलाधिकारी एवं सांसद और शो नायक-नायिकाओं के चित्रों के साथ चरणामृत जितनी जगह के लिए लाठियाँ खाती युवाओं की भीड़ का चित्र छपा था।

उनकी ऑखें इतिहास से लपालप जीवन की धड़कनों में थिरकते और संस्कृति के इन्द्रधनुष में रंगे भारत को बस एक विशाल खुले बाजार में सिमटते देख रही थी। वे सोचते, सेटेलाइट फोनों से मदमाते और इंटरनेट से चमचमाते युग में गाँधी की भीत सहारा दे सकती हे।

उन दिनों ही अपार जन्मा था। उसकी बोलती ऑखों और तीखे नैन-नक्शों में दीनदयाल जी को अपने दादा की छाया महसूस होती। साल भर बीतते-बीतते वे अपार को अपने दादा का पुर्नजन्म मानने लगे। वे सोचते, संतति की चौखट से बीती पीढ़ियाँ वर्तमान में झाँकती हैं। यही4 पुनर्जन्म हैं।

जीवन की सीढ़ियों पर अपार दादाजी की अँगुलियाँ पकड़ कर अग्रसर था। उनका भी सारा ध्यान उस पर केन्द्रित हो गया। घर में गुब्बारे के साथ अपार हँस रहा होता तो उन्हें घर हँसता हुआ लगता। फिरनी के साथ नाचते और मुँह से पीपनी बजाते अपार के साथ घर भी उछलता-कूदता लगता।

खेलों में दादाजी के साथ अपार व्यस्त रहता। गेंद से न जाने कितने काँच के गिलास उन दोनों ने घर के अन्दर तोड़े। लेकिन तेज धड़कते फिल्मी संगीत पर वह दादाजी को थिरकने के लिए कहता तो वे हिचक जाते। चाहकर भी दीनदयाल जी के पाँव उठ नहीं पाते थे।

फिर भी दीनदयाल जी को महसूस होता, अब उनका ध्यान शहर में दो साइकिलों के टकराने की मामूली घटना से जिन्दा हो गए जैसे रक्तबीजी दानव के कारणों में नहीं अटकता। वे अपार से सम्बन्धित गुत्थियों की खुशबू में नहाये रहते। कुछ समय पहले तक अक्षर ज्ञान से विहीन अपार एक जैसे रंग, रूप और आकार वाली कैसेटों के बीच से अपनी मनपसन्द वाली कैसेट कैसे निकाल लाता है, उन्हें समझ नहीं आता था।

दादाजी सोचते कि सन्तति पूर्व पीढ़ियों के आग्रहों और सन्तापों से मुक्त होकर जन्मती हे। तभी एक दिन ट्यूब-लाइट की पैकिंग को मोड़-मोड़ कर बन सकने वाले अंग्रेजी के अक्षरों की आकृतियाँ अपार ने बनाकर उन्हें दिखा दी थीं। जबकि उन्हें मालूम था कि उनके दादा रामस्वरूप जी अंग्रेजी को उपनिवेशवाद का अमूर्त हथियार मानते और उससे परहेज करते थे।

अपार का अक्षर ज्ञान ए बी सी से शुरू हुआ। जिसका दीनदयाल जी ने विरोध किया। इस पर अपार के माता-पिता और किरण उनके सामने आ खड़े हुए। उनका कहना था कि अच्छी अंग्रेजी नहीं सीखेगा तो लँगड़ा रहेगा। और पागल समझा जाएगा। सारे हिन्दुस्तान के हर मुहल्ले में आज अंग्रेजी की दुकानें हैं।

“दुकानें तो भारत माता को डायन कहने वालों की भी हैं। प्राणायाम करने के बाद ध्यान को एकाग्र करने का प्रयास बीच में सोचने लगते दीनदयाल जी। उस समय उन्हें रामस्वरूप जी द्वारा विजयदशमी पर पूजे जाने वाली बही याद आती। जिसमें उन्होंने अपने खून से लिखा था, भारत माता की जय। महात्मा गाँधी की जय। हिन्दी भाषा की जय।” वे हिन्दी की औकात बिन्दी तक सिमटती देख रहे थे। और गाँधीजी को राजनीतिक कर्मकाण्ड का हिस्सा भर। उन्हें मालूम था, भारत माता के बारे में उनका पोता अपार तक बातें नहीं करता। लाड़ में जब उसकी मम्मी पूछती कि अपार तू बड़ा होकर कैसा बनेगा, तो उसका जवाब होता, मामा जैसा। कहीं जाएगा, पूछे जाने पर, उसका मासूम-सा जवाब होता, विदेश। अपनी कहस में भी अपने साथियों के बीच वह विदेश से कम की बातें नहीं करता। अपने सच्चे-झूठे किस्सों में अपनी मैडम तक को बहका देता।

दीनदयालजी को आश्चर्य होता कि दूसरी कक्षा में पढ़ते-पढ़ते अपार ने जीवन की सीढ़ियाँ समझ ली थी। उनकी गोद में बैठकर वह भोलेपन में कहता, ''दादाजी, में कुछ पढूँगा तो पापा जैसा बनूँगा ओर स्कूटर पर चलूँगा। ज्यादा पढूँगा तो बड़ा आदमी बनूँगा और राजू के पापा की तरह विदेशी कम्पनी में काम करूँगा। बहुत पढूँगा तो मामाजी जैसा बन जाऊँगा।'' आखिर तक उसके हाथ आकाश की तरह उठ चुके होते। दादाजी को मालूम था, अपार ने दीवार चित्रों में एक घर का चित्र भी बनाया था। जिसे वह राजू के संगमरमर से बना घर जैसा अपना घर बताता था।

वे महसूस करते कि अपार की बातों में राजू की दस्तक बार-बार होने लगी है। वे मानते कि विदेशी कम्पनियाँ तो जीती-जागती पूतनाएँ हैं। जो विषमता का जहर परोसती हैं। जिसका शिकार तुषार भी हे। वह कुंठित होकर

रामस्वरूपजी का सम्मान नहीं करता। सबको लतियाता रहता है। उनके बलिदान को कलंकित करते हुए कहता है कि कोई बताए, आजादी को जीमने वाले आज कितने विधायकों या सांसदों के दादा या परदादाओं ने आजादी के लिए इस सदी में शहादत दी। चाचा नेहरू यदि आजादी के संघर्ष में काम आ जाते तो उनकी पीढ़ियों के सदस्यों में देश का सीधे प्रधानमंत्री बनने की कुव्वत आ जाती क्या? रामस्वरूप जी अक्ल के साथ संघर्ष में भाग लेते। देश आजाद होने पर, विधायक बनते। सांसद होते। ये क्या हुआ, तिरंगा थामा और खाली गोली। अब गड़ा है एक पत्थर, एक छोटे से तिराहे पर उनके नाम का। जहाँ फूल चढ़ाने हमारे पड़ोसी तक नहीं जाते।

दीनदयालजी अपार को समझा नहीं पाते कि रामस्वरूपजी एक बड़े आदमी थे। उस समय उनकी एक आवाज में शहर घर के बाहर निकल आता था। उनकी गोद में बैठा अपार सोच में पड़ जाता। उसके अनुसार बड़ा आदमी कौन है 7 जैसे राजू के पापा मिस्टंर सिन्हा। जिनके पास बड़ी-सी गाड़ी है। विदेशी कम्पनी में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी है। महंगा मोबाइल फोन है। और बड़ा-सा संगमरमर से बना घर है।

इन्हीं नये संस्कारों में पक रहे अपार ने एक दिन दादाजी के पैर की जमीन हिला दी। स्कूल से लौटकर उसने पूछा, “दादाजी, हम क्या छोटे लोग हैं ?”

शहीद परिवार का तमगा पहने दीनदयालजी के लिए यह एक बुरी खबर थी। फिर भी उन्होंने पूछा, “कौन कहता है ?”

“राजू! मेरी कक्षा में पढ़ता है। उसने मुझे अपनी 'बर्थ डे' पार्टी में नहीं बुलाया।''

“क्यों ?''

“उसने कहा कि वो केवल बड़े लोगों से दोस्ती करेगा। जिनके पास गाड़ियाँ हैं। मोबाइल फोन .....।'' उस शाम अपार का गला भर आया था।

दिल पर पड़े दौरे के कारण दीनदयाल जी लगभग तीन सप्ताह तक अस्पताल में रहे। वहाँ वे विदेशी कपड़ों में सजे और लाखों के डायमंड अपनी उँगलियों में चढ़ाए वरिष्ठ डाँक्टर की उपेक्षा का शिकार रहे। उन्होंने मंत्री और जनता के बीच बिल्ली और चूहे वाला सम्बन्ध महसूस किया। उन्हें लगता, अंग्रेजों की देशी संस्करण बनी उनकी पीढ़ी ने स्वराज को सत्ता संघर्ष जैसी टुच्ची लड़ाई में बदल दिया है। तभी आजादी को नकारने वालों से लेकर कमाने और भुनाने वाले तक येदा हो चुके हैं। इसीलिए तुषार रामस्वरूपजी के बलिदान का बिकवाल बन बैठा है। मुझे चुनाव बाजार के लिए ठेलता रहता है।

घर आकर अपने कमरे में दीनदयालजी अपार की उँगली पकड़े गए। सब कुछ पूर्ववत् था। पर चरखे को सुरक्षित रखने वाले शीशे साफ थे। कुछ ताजे फूल भी वहाँ थे। यह सब देखकर वे उत्साह से भर गए।

“दादाजी, आप नर्सिंग होम छोड्कर सरकारी अस्पताल में क्यों भर्ती हुए।'' अपार ने उनसे पूछा।

वे समझ नहीं सके कि तुषार के मन में ऐसा महीन सवाल क्यों घुमडा? बात साफ राजू के पापा के आने पर हुई। कुशलक्षेम पूछने आए मिस्टर सिन्हा को देखकर दीनदयालजी को आश्चर्य हुआ।

क्लास में पिछले कुछ समय से राजू अपार को चिढ़ाने लगा था। कहता, “पहले तेरी बुआ भाग गई। फिर डैडी दूसरों के पैसे ले भागे। अब तू क्या लेकर भागेगा ?''

सुनकर अपार उदास हो जाता। धीरे-धीरे उसने बोलना बन्द कर दिया था। लेकिन जिस दिन राजू

ने कहा, “बुआ भागी। डैडी भागे। दादा को नर्सिंग होम वालों ने भगा दिया।” यह सुनकर अपार को गुस्सा आ गया। उसने राजू की नाक पर जोरदार घूँसा जमा दिया। नाक से खून बह निकला था। प्रिन्सिपल साहब तक बात गई। तुषार ओर मिस्टर सिन्हा को स्कूल बुलाया गया। तभी मिस्टर सिन्हा दीनदयालजी के सम्बन्ध में जान सके। कुशलक्षेम पूछने घर तक आए थे।

कुछ दिनों बाद अपार दादाजी के साथ रामस्वरूप जी के स्मारक पर गया। वहाँ संगमरमर के चबूतरे का निर्माण हो चुका था।

“दिन 11 अगस्त, 1942 को पुलिस की गोली से शहीद हुए रामस्वरूपजी। वन्देमातरम्।'' स्मारक पर लिखा अपार ने पढ़ा। बोला, “दादाजी, 11 अगस्त अगले हफ्ते है।''

“उस दिन यहाँ हमें फूल चढ़ाने आना है।''

“दादाजी, आपके दादाजी को भी उन्हीं अंग्रेजों ने मारा था जिन्होंने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से झाँसी छीन ली थी।”

? “हाँ।'' दादाजी ने कहा।

घर आते समय अपार ने रास्ते में दादाजी को बताया कि 'इन्डीपेन्डेन्स डे' पर स्कूल में झंडा फहराया जाएगा। प्रिन्सिपल साहब ने क्लास को “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी'' पोयम गाने को दी है। मैडम ने कहा है कि जो भी बच्चा अच्छा गाएगा, उसे स्टेज पर गाने का चांस मिलेगा। राजू कह रहा था, उसे ही चांस मिलेगा। आखिर में अपार की आवाज बुझ-सी गई थी।

“क्यों? दादाजी ने चौंक कर पूछा।''

“मैडम उसे ट्यूशन पढ़ाती हें ना।''

उन्होंने कुछ देर सोचा। बोले, “तुम्हारी आवाज बड़ी मीठी है। तुम्हें कोशिश करनी चाहिए।”

उस दिन से अपनी पुरजोर आवाज के साथ दादाजी के सामने गीत का अपार अभ्यास करने लगा।

11 अगस्त की सुबह अपार ने स्मारक पर जाकर फूल चढ़ाए। गीत गाया। 'भारत माता की जय' का उद्घोष किया। लौटने पर अपार दादाजी को ड्रांइगरूम में ले गया। जिसकी एक दीवार पर स्कैच पेन से स्मारक का एक रेखाचित्र बना था।

- अजय गोयल निदान नर्सिग होम फ्री गंज रोड हापुड़ -

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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: अजय गोयल की कहानी : बीसवीं सदी का जीवाश्म
अजय गोयल की कहानी : बीसवीं सदी का जीवाश्म
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