बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

अनामिका शुक्ला का संस्मरण : कैंसर का समाचार मृत्यु का संदेश नहीं है।

यह मेरी माँ की कहानी है, जिन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर स्तन कैंसर को मात दी। मैं एक ऐसी विवाहिता हूँ, जिसकी एक संतान है और मेरे पति ने चार साल पहले साथ रहना छोड़ दिया था। उस कठिन हालत में मेरी माँ मेरे लिए सबसे बडा संबल थीं। उनके सहारे मैंने अपने कठिन हालातों पर विजय पायी थी।

मेरे पिता एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी हैं। अपने पति से अलग होने के बाद मैं अपने परिवार के साथ हरिद्वार भ्रमण पर गयी। कहावत है कि गंगा मे स्नान करने से समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है परंतु मेरा और मेरे परिवार का यह उद्देश्य नहीं था। हरिद्वार से लौटने के बाद मेरे पिता, माँ को डॉक्टर के पास लेकर गए क्योंकि उन्हें कुछ दिनों से अपने स्तन में एक दर्दरहित गाँठ होने की शिकायत थी। मेरी माँ ने यह सोचा कि यह कोई खास बात नहीं है और धीरे-धीरे यह गाँठ स्वतः समाप्त हो जाएगी। परंतु डॉक्टर ने इसकी पुष्टि स्तन कैंसर के रूप में की। उन्होंने और भी जांचें कराने तथा अन्य डॉक्टरों से परामर्श लेने की भी सलाह दी।

पिताजी को माँ के स्तन कैंसर का समाचार सुनकर गहरा धक्का लगा क्योंकि आमतौर पर ये धारणा है कि कैंसर होने का मतलब है सिर्फ मृत्यु। डॉक्‍टर ने उनसे मेरा फोन नंबर लिया तथा मुझसे विस्‍तार से बात की। शुरुआत के कुछ दिन हम लोगों को इस खबर पर यकीन ही नहीं हो रहा था। मैं अपने आप से पूछती कि आखिर ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि मेरी माँ का व्‍यवहार तो सभी के प्रति बहुत अच्छी रहा है। उन्होंने मुझे न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा किया वरन जीवन की समस्याओं से जूझना सिखाया। इस खबर के बाद कई बार मैं और पिताजी अकेले में मिलकर रोये लेकिन माँ को इसकी जानकारी नहीं दी। पर उनसे कब तक इस रहस्य को छुपाते ? अंततः तीसरे दिन हमने उन्‍हें इस बारे में बताया। यह सुनने के बाद उनके मुंह से सिर्फ यही वाक्य निकला कि, ‘‘हे प्रभु मुझे सिर्फ छह माह की मोहलत दे दो, मैं अपनी बेटी के जीवन में फिर से खुशियाँ देखना चाहती हूं।’’

आँखों में आँसू भरकर मैने उनसे पूछा कि – ‘क्या छह महीनों में मेरा जीवन सामान्य हो जाएगा और क्या मेरे पति मेरे पास लौट आयेंगे?’ मेरे आश्चर्य का उस समय कोई ठिकाना नहीं रहा, जब वे बोलीं, ‘‘हां वो वापस लौट आएगा।’’ जिस महिला को अभी-अभी स्तन कैंसर की बीमारी का पता लगा हो, वह अपने बारे में न सोचकर मेरे बारे में सोच रही थी। तब पहली बार मुझे लगा कि वे भीतर से बहुत दृढ इच्‍छाशक्‍ति वाली महिला हैं।

माँ और पिताजी ने मुझसे कहा कि मैं इस बुरी खबर को अपने भाई, जो मुंबई में नौकरी करते है, को न बताऊॅं। पर मुझे लगा कि इकलौते पुत्र होने के नाते उन्हें अपनी माँ की बीमारी के बारे में जानने का हक है। अतः मैंने उसे फोन पर सारी सूचना दे दी। अगले ही दिन वह दिल्ली पहुंच गए। उनके दिल्ली पहुंचने के बाद हमने दिल्ली में 4-5 डॉक्टरों से संपर्क किया और सारी रिपोर्ट मुंबई में एक डॉक्‍टर को भेजी। मेरे भाई ने माँ को इलाज के लिए मुंबई ले जाने का निर्णय लिया क्योंकि मैं एक कामकाजी महिला थी तथा मुझे अकेले दौड़भाग करने में दिक्क्त होती। मेरी माँ दिल्ली में रहकर ही इलाज कराना चाहती थी क्योंकि वे मुझे अकेला छोड़ना नही चाहती थी। परंतु मेरे भाई ने मुझे व्यावहारिक कठिनाईयों के बारे में समझाया।

काफी भारी मन से मेरी माँ इलाज के लिए मुंबई रवाना हो गयी। उनका उपचार शुरू हो गया तथा उन्होंने बेहद साहसपूर्ण तरीके से सर्जरी करायी। उनके इलाज के दौरान मेरे पिता और भाई बहुत बड़ा संबल थे। अस्पताल मे रहने के दौरान भी मेरी माँ ने कठोर इच्छा शक्ति का परिचय दिया। उन्हें अस्पताल में भी स्वयं से ज्यादा मेरी चिंता लगी रहती थी। उन्होंने अपने कष्टों के बारे में किसी को एक शब्द भी नहीं कहा।

इस दौरान उन्होने कीमोथैरेपी और रेडियोथैरेपी जैसे बेहद कष्टकारी उपचार झेले। हम सभी जानते हैं कि कीमोथैरेपी किसी कैंसर मरीज के लिए सबसे ज्यादा कष्टकारक इलाज है। इलाज के दौरान उनके सारे बाल झड़ गए। वे फोन पर मुझसे कहती कि ‘‘बेटा मेरे सारे बाल झड गए हैं?’’ मैं उन्हें तसल्ली देती कि ‘‘माँ, चिंता मत करो आपके और भी सुंदर बाल निकल आयेंगे।’’ कीमोथैरेपी के बाद उनका रेडियोथैरेपी से गुजरना तय था। उसके पूर्व वे मुझसे मिलने दिल्‍ली आयीं।

एयरपोर्ट पर जैसे ही मेरे बेटे ने उन्हें देखा, वह भागकर उनके गले लग गया। वे यह देखकर बहुत खुश हुयीं कि लगभग एक साल बाद भी मेरा कम उम्र बेटा उन्हें भूला नहीं था। इससे उनकी इच्छा शक्ति और जीने के हौसले में वृद्धि हुयी। चूँकि मेरी माँ का कैंसर काफी उन्नत अवस्था में था, इसलिए उन्हें हरसैप्टिन (मोनोक्लोनल एंटीबॉडी) के 17 इंजैक्शन भी लगाए गए। इस पूरे इलाज के बाद, जिसमें लगभग ढाई वर्ष का समय लगा, वे फिर से मेरे साथ रहने लगी लेकिन मेरे पति नहीं लौटे। फिर भी उन्हें आशा थी कि एक दिन वे लौट आयेंगे। छह माह बाद मेरे पति लौट आये और मेरे साथ रहने लगे।

अब मेरी माँ के बाल फिर से निकल आये हैं और सभी लोग कहते हैं कि वे विजयलक्ष्मी पंडित की तरह लगने लगी हैं। वे यह सुनकर मुस्कराती और थोड़ा शर्माती हैं।

अपनी इच्छा शक्ति, जीवन जीने की इच्छा, अपनों के प्यार और परिवार के सहयोग से कोई भी कैंसर पीडि़त व्यक्ति पुनः स्वस्थ हो सकता है, ऐसा मेरा मानना है। कैंसर का समाचार कोई मृत्यु का संदेश नहीं है।

- अनामिका शुक्‍ला

सेक्‍टर 7, रोहिणी

दिल्‍ली

8 blogger-facebook:

  1. आप माता जी की हिम्मत की दाद देनी चाहिए। उनका नया जीवन मंगलमय हो।

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  2. सही बात !
    इच्छाशक्ति वाकई कुछ होती है !

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  3. साहस और जीने की प्रबल इच्छा बहुत बड़ी दवा है. आपकी माँ शतायु हों.

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  4. बेनामी11:47 am

    आपकी माँ के स्वस्थ होने से हमारा भी संबल बढ़ा है और एक सीख मिली है कि इच्छाशक्ति में असीमित बल है और क्यों न ठीक होतीं उनके पास एक पवित्र प्रयोजन था किसी का घर बसाने का............. डॉ. शुक्ल

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  5. ashwani kumar sharma9:00 pm

    After all mother is mother, and who has a great will power which is a great thing and it is very rare...........this type of mother i wish should be everywhere..........

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  6. Akhilesh Chandra Srivastava7:01 am

    Anamikaji aapke dwara varnit aapki mataji ka cancer jaisi ghatak bimaari se sangharsh vastav men prernadayak hai jo prabhu ichchashakti dete hain vohi
    ant tak ladne ki prerna bhi ,unki antim vijay par par hamari badhaii aur shubh
    kamna sachmuch padhte padhte aansoo nikal pade Bhagwan unhe lambi aayu
    den

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  7. ‘ह्रदय घाव मोरे पीर रघुवीरे’,,,पुरे परिवार पर ईश्वर कि कृपया बनी रहे ,
    मनोज शर्मा ,sec.-7,Rohini,Delhi-85,

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  8. your mother, your father, your brother & you are the icons who taught us how to live. I salute your struggle.

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