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कलम की देवी - महाश्वेतादेवी

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कलम की देवी - महाश्वेतादेवी डॅा. लता सुमन्त भारतीय साहित्यकारों में मूर्धन्य एवं यशस्वी लेखिका महाश्वेतादेवी वर्तिका के संपादक श्रेष्ठ कवि म...

कलम की देवी - महाश्वेतादेवी

डॅा. लता सुमन्त

भारतीय साहित्यकारों में मूर्धन्य एवं यशस्वी लेखिका महाश्वेतादेवी वर्तिका के संपादक श्रेष्ठ कवि मनीष घटक की सुपुत्री हैं.14जनवरी 1926 में जन्मी,सशक्त साहित्यिक परंपरा में पली -बढी जीवन के यथार्थ तथा कटु अनुभवों को गले लगाने वाली लेखिका के साहित्य में मिट्टी की सोंधी -सोंधी खुश्बू आती है जो हमारी चेतना को बनाए रखती है.उनके साहित्य में निरुपित जीवन की वास्तविकता हमारे मन को ,हमारी भावनाओं को झकझोर देती है.उनके - नीलछबि उपन्यास की नायिका मॉडर्न स्त्री है.वह संबंधों को खुलकर जीने में मानती है.किसी भी रिश्ते को घसीटना उसके स्वभाव में नहीं है.अभ्र के साथ वह अपने आप को बाँधकर नहीं रख पाती और वरुण के साथ जुड़ जाती है.मगर अभ्र फिर भी उसके साथ जुड़ा रहता है.महत्वाकांक्षी होने के कारण वह अपने आपको सफलता की उँचाइयों पर देखना चाहती थी.शायद यही वजह थी जो वह अपनी बेटी को वेतनभोगी नौकर , अबाध स्वाधीनता और अपार पैसा दे पाती है मगर माँ की ममता नहीं.इस कहानी के व्दारा लेखिका ने समाज की उन युवतियों का चित्रण किया है जो अपने माता - पिता की अनुशासनहीनता तथा उनकी व्यस्तता का भोग बनती हैं.जिसके कारण वह समाज के उन दरिन्दों के हाथ लग जाती हैं जो उन्हें नशीली दवाओं का भोग बनाकर उनकी मजबूरी और बेबसी का फायदा उठाकर उनकी मासूमियत को ब्लू फिल्मों के व्दारा बाजारवाद का हिस्सा बना देते हैं. सुद्क्षिणा अपने पति कि तथाकथित राजनीति की कट्टर समर्थक है. खुद भी शासक दल व्दारा समर्थित सांस्कृतिक जगत् की एक प्रमुख व्यक्ति . वह जुलूस निकालती है, सभा में भाषण देती है. इसके अलावा लेखिका ने समाज के उस वर्ग का भी चित्रण किया है जो बदनाम है और कानून की नजरों में गुनहगार. कलकत्ता के जेबकतरों के बादशाह ने अभ्र से कहा - दादा , मैंने धंधा छोड़ दिया है. अब इस धंधे में इज्जत नहीं है.फिर जिस धंधे में भले घर की औरतें पडी हों , वहाँ अब हम जैसों का काम नहीं और फिर सस्ते और नकली गहने पहनने लगे हैं लोग.जान पर खेलकर नकली गहने नहीं चुराने हैं.

कलकत्ते की विख्यात वेश्या सावित्री ने कहा था -भद्र घरों की लड़कियाँ अब कोठी लेकर पेशा कर रही हैं ऐसे में हम अपना पेशा कैसे चलायें? पहले हमारी लाइन के भी कुछ नियम थे. वेश्या होने के लिये सधवा होना जरूरी था. चाहे तुम किसी पेड़ से शादी कर लो या सिल पत्थर से , बिना शादी किये तुम इस लाइन में नहीं आ सकतीं. पर अब हमारा सबकुछ चला गया.इनकी तलाक कहानी की नायिका कूलसम ने अपने पैंतीस वर्ष के वैवाहिक जीवन में आसगर के अलावा और किसी को नहीं जाना था.वहीं आसगर जब उसे तलाक दे देता है तब वह सब कुछ छोड़कर केवल पैसे लेकर अपनी बहन के पास चली जाती है.लंबे समय के बाद वक्त जब एक - दूसरे को सामने लाकर खडा कर देता है तब दोनों एक -दूसरे के बिना टूट चुके होते हैं. आसगर से दूर रहकर उसने समाज का तथा समाज के लोगों का कलुषित चेहरा पहचान लिया था. पैर की तकलीफ के कारण आसगर कूलसम का हाथ थामना चाहता है, परन्तु कूलसम अपने हाथ की लकडी उसे थमाकर अपने मार्ग पर आगे बढ जाती है.अब वह पुराने रिश्ते को फिर से संवारने के लिये तथा मुड़कर वापस लौटने के लिये तैयार न थी.रूपसी मान्ना -कहानी में समाज व्दारा प्रताडित नारी का चित्रण किया गया है.इनकी नारियाँ कठिन परिस्थितियों का मुँह तोड़ जवाब देती हैं तथा अपने जीवन समस्याओं का हल खुद ही ढूँढ लेती है.जवान रुपसी सोलह वर्ष की अवस्था में ही खून के इल्जाम में जेल चली जाती है.मियाद पूरी करके जब वह वापिस लौटती है तब विधवा रूपसी पति की तस्वीर के साथ गृहप्रवेश करती है. अपने लिये - कहानी की नायिका विधवा मुक्ति अडसठ वर्ष की अवस्था में आकर अपने बारे में सोचती है.समाज की ठोकरें तथा अपनों के परायेपन के एहसास ने उसे अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने के काबिल बना दिया था.उसका एक प्रेमी उसे बहत्तर वर्ष की अवस्था में मिलता है तो कहता है - तुम्हारा भी कोई नहीं है मेरा भी कोई नहीं है.अगर आओगी तो सिर पर बिठाकर रखूँगा.परंतु हिचकिचाता हूँ.मुक्ति अभयदान देकर प्रसन्न मन से उसके एक कमरे के घर में प्रवेश करती है.इनकी यशोवन्ती - कहानी में बंगाल कि एक विशिष्ट प्रथा क्षेत्रज प्रथा का निरुपण हुआ है.उस समय ठाकुर घराने तथा राजघरानों से संबंध स्थापित किये जाते थे. उनके खानदान की बहू कुँवरसाहब का दिल लुभा लेती है.उसके साथ संबंध स्थापित कर कुँवरसाहब पुत्र की प्राप्ति करते हैं.ऐसी क्षेत्रज संतान को जन्म देनेवाली माता को उच्चकुलों में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था तथा परिवार के सदस्य के रूप में उसे कुछ विशेष अधिकार भी प्राप्त होते थे.मगर वही यशोवन्ती अपने पति तथा परिवार केसाथ किस तरह का जीवन व्यतीत करती है तथा किस तरह की मानसिक यातनाओं का भोग बनती है.इस तरह से लेखिका ने यशोवन्ती की नारी व्यथा का सुन्दर निरुपण किया है.

महाश्वेतादेवी के लिये लेखन केवल धन उपार्जन का साधन नहीं है और ना ही वे इसके व्दारा यश की प्राप्ति करना चाहती हैं.जीने के लिये जरूरी केवल दो - जून की रोटी का जुगाड हो जाए इसके अलावा वे कुछ नहीं चाहती.लेखन उनके लिये जीवन की लडाई लड़ने का तथा आनेवाली मुसीबतों का सामना करने का कारगर साधन है.इसीलिए.वे शब्दों को कल्पना और सौन्दर्य के रंग में न रंगकर कटु - जीवन संघर्षों के साँचे में ढालती हैं.

वे सामाजिक कार्यों विशेषकर आदिवासियों ,सर्वहारा और स्त्रियों की समस्याओं को लेकर रचनात्मक कार्यों और आन्दोलनों में जी जान से जुटी रहती हैं. अपने कहानीसंग्रह -पंचाशटि गल्पो (1996) की भूमिका में महाश्वेतादेवी लिखती हैं ----- बाहर के कामों के लिये कितनी भी भाग दौड क्यों न करुँ, लिखने के लिये समय निकाल ही लेती थी.रचनाएँ सिर पर सवार हो जाती थी. स्तनदायिनी, द्रौपदी बिछन, तीन कहानियाँ प्रतिदिन एक कहानी के हिसाब से मैंने लिखी. सवेरे लिखने बैठती तो रात के डेढ दो बजे तक लिखती ही रहती. वह भी एक समय था . हजार चुराशीर माँ -उपन्यास चार दिन में लिख डाला. ऑपरेशन बसाई टुडु - उपन्यास डेढ से दो दिन में पूरा कर लिया. अब वह क्षमता नहीं है. जाहिर है 71 वर्ष की आयु में डायबिटीज जैसी इंसान को कमजोर बना देनेवाली बीमारी के साथ आज भी वे अपने आपको सक्रिय बनाए हुए हैं. इस छोटे कद की दुबली पतली महिला में आज भी कर्म के प्रति जितनी तत्परता और उर्जा है, वह हमें आश्चर्य में डाल देती है.

एक इन्टरव्यू में महाश्वेता देवी ने बताया कि - मेदनीपुर के लोध और पुरुलिया के खेडिया ,शबर जातियों के लिए वे पिछले 15 वर्षो से काम कर रही हैं. जिन शबरों को अंग्रेज सरकार ने 1871 में अपराधी जाति घोषित कर दिया था.एक ओर संपन्न वर्ग उन्हें आखेट केलिए उकसाते हैं तो दूसरी ओर उन्हीं अपराधों के लिये पुलिस और अन्य जातियों का उनसे शिकार करवाते हैं.आज भी जब वे अपनी जमीन के लिए आवाज उठाते हैं या उस पर किसी प्रकार का अधिकार जताने की कोशिश करते हैं तो उनके हाथ -पैर काट दिये जाते हैं. ऐसे निरीह,गरीब और कमजोर जाति के लोगों के पुनरुत्थान के लिये कर्मठ महिला जुड़ी हुई है. ब्याधखंड -उपन्यास लिखकर एक ओर वे उनके पुरखों की गौरव पूर्ण परंपरा को फिर से स्थापित करने की कोशिश करती हैं.दूसरी ओर वन संरक्षण कर ,कुँए और तालाब खुदवाना, मछलीपालन और अनेक गृहउद्योगों के काम सिखाकर उन्हें स्वनिर्भर बनाने की कोशिश करती हैं. शबर समिति के पंद्रह हजार लोगों के विकास कार्य में लगी महाश्वेताजी कहती हैं - मैं सरकार के पास अपनी योजना जमा करती हूँ और सरकार जो स्कीम देती है उस पर काम करती हूं.दयालु लोगों से चंदा मिलता रहता है.मैं उन लोगों के लिये फिशरी की व्यवस्था करना चाहती हुँयदि मुझे किसी तरह 25 लाख रुपये का फंड मिल जाता, मुझे तो आयकर छूट भी मिली हुई है,तो मुझे दर -ब -दर चक्कर न काटना पडतामुझे एंबुलेंस वैन की जरुरत है,लेकिन किसी ने सहयोग का हाथ नहीं बढाया..मुझे साठ मील का सफर तय करना पडता है.कुछ दूर बस या जीप से , उसके बाद पैदल ही जाती हूँ.(रविवारी जनसत्ता,10 अगस्त 1997)

महाश्वेता देवी का दावा है कि बांगला में वे अकेली लेखिका हैं जिसकी जीविका का एकमात्र आधार लेखन है. व्यावसायिक पत्रिकाओं में उन्होंने 1954 में ही लिखना शुरु कर दिया था.लघु और अव्यावसायिक पत्रिकाओं में बहुत बाद में लिखने लगी. अव्यावसायिक पत्रिकाओं में निकलनेवाली सामग्री लोग चाव से पढते हैं.मगर इसके अलावा वे आम पाठक तक पहुँचाना चाहती हैं. आदिवासियों के मानवीय अधिकारों की लडाई तथा लेखकीय स्वातंत्र्य तथा गरिमा को बनाए रखने के लिये आनेवाली हर बाधा एवं अंतर्विरोधों को सहजता से परे कर अपने मार्ग पर अग्रसर रहती हैं. वे कहती हैं - मैं सिर्फ अपने काम पर विश्वास करती हूँ.मैं हमेशा जमीन की ओर देखने में आस्था रखती हूँ. मैं बडी - बडी बातों में यकीन नहीं रखती.मेरा सारा विश्वास खत्म हो चुका है.( जनसत्ता 10 अगस्त 1997)

भारत की वनवासी संस्कृति के इतिहास और उनके जीवन के दुःख दर्द, दैन्य, अभाव, साहस ,उत्साह, परंपराएँ आदि को लेखिका ने अपनी संवेदनशील फिर भी तटस्थ लेखनी से चित्रित किया है.इन आदिवासियों का वर्तमान और बीता कल दोनों इनकी कृतियों के अभिन्न अंग हैं.इनके लेखन में इन आदिजातियों के प्रति गहरा ममत्व एवं उनके अधिकारों के प्रति लड़ने की दैवी शक्ति एवं तीव्र जुनुन की भावना दृष्टिगत् होती है.उनके आदिवासियों के जीवन पर आधारित कहानियों एवं उपन्यासों में -जगमोहनेर मृत्यु ,रुदाली ,शिशु नून आदि हैं.अपनी रचनाओं व्दारा वे बार -बार एक ही अंचल (पालामऊ वीरभूम ) की ओर लौटती हैं.यहि अंचल उनके लिये भारतवर्ष है.केवल अंचल ही नहीं कई चरित्र भी उनकी रचनाओं में बार - बार लौट कर आते हैं.उनका मानना है --चरित्रों के प्रति भी मेरी प्रतिबद्धता है.इसीलिए बिछन कहानी के प्रमुख चरित्र दूलन गंजु को लेकर मैंने आजकल की शारदीया में दो कहानियाँ लिखी.मैं समझती हूँ - कुछ मनुष्य अज्ञात महादेश की तरह हैं.जितना मैं उनका आविष्कार करुँगी , उतनी ही विनम्र और मुग्ध होऊँगी. चूकि इतिहास की चल मानता और अग्रगति में मेरा विश्वास है, इसलिये कुछ चरित्र घूम -घूमकर वापिस आते हैं. आज सत्तर पार करके मैं अच्छी तरह समझ रही हूँ कि यशोदा , द्रोपदी दूलन, बुलाकी, तथा दूसरे अन्य चरित्र आज के परिप्रेक्ष्य में लौट आना चाहते हैं अपने मन के दरवाजे पर मैं उनकी दस्तक सुन रही हूँ. दरवाजा खोलना ही होगा.मगर इसके लिए समय चाहिये.लिखने का समय.(पंचाशटि गल्पो पृ.10,11) अपनी प्रथम पुस्तक झाँसी की रानी से ही लेखिका ने ख्याति पा ली थी मगर 1084 की माँ -की जीवन दृष्टि और शैली अन्य लेखकों की तुलना में अलग थी.नक्सली आंदोलन से उपजी क्रांतिधर्मिता और उसके विरुध्द फैलाए गए अनेक दुर्विचारों को चीर इस रचना ने पाठक को नई जमीन दी.मुंडा, संथाल, शबर आदि जनजातियों के विद्रोहों को वाचा देते हुए भी उन्होंने स्त्री की भूमिका को कभी नजरअंदाज नहीं किया.उनकी रचनात्मकता का एक गुण और है उनकी प्रामाणिकता. झांसी की रानी, चोटी मुंडा, उसका तीर या वीरसा भगवान के विद्रोह की कथा,बिरसा मुंडा या नक्सली विद्रोह पर आधारित 1084 की माँ,सुजाता, रूपसी व्रती आदि अत्यंत प्रामाणिक हैं.

महाश्वेताजी कहती हैं -आदिवासी अंचल के आदमी को अपनी आँखों से जितना देखा या जाना है उससे कहीं अधिक मन की आँखों से देखा है.रोज की निकटता होने पर लिखना कठिन है मेरे काम ,मन और सत्ता के साथ खेडिया शबर इतना अधिक जुडे हुए हैं कि उनके बारे में लिख नहीं पाती.(पंचाशटि गल्पो भूमिका पृ.10)

महाश्वेता देवी की रचनाओं में उनके आसपास के जीवन में घटित घटनाऐं, आदिवासी क्षेत्रों में कार्य के व्दारा प्राप्त अनुभव , इतिहास, पुराण,किवदंतियो। पुराकथाओं आदि से प्राप्त सामग्री तथा अनेक समस्याओं कुप्रथाओं,अंधविश्वासों के व्दारा समाज के हर क्षेत्र में झाँका है.अशिक्षा,शोषण,अनीति के बढ़ते प्रमाण को देखते हुए उन्हें लगता है कि आज भी इसके लिए लड़ते रहना जरूरी है.उनकी व्ंयंजना पूर्ण, तत्सम प्रधान फिर भी सहज ग्राहय भाषा,उनके वैविध्य पूर्ण क्षेत्रों का ज्ञान,विविध भाषाओं पर उनका एकाधिकार सहज ही झलकता है. महाश्वेता देवी कहती हैं -जो नहीं जानती उसे जान लेने की कोशिश करती हूँ.यह भी जानती हूँ कि कितनी भी कोशिश करूँ,बहुत कुछ अजाना ही रह जाएगा.(पंचाशटि गल्पो पृ. 11).

आदिवासियों, गरीबों , शोषितों और अभाव ग्रस्त लोगों के लिए कुछ कर गुजरने का जोश और प्रतिबद्धता भारतीय भाषाओं में केवल प्रेमचन्दजी में देखने को मिलता है.महाश्वेताजी ने केवल उनका प्रतिनिधित्व किया है. जो आज भी संघर्षरत हैं और अपने अधिकारों के प्रति प्रयत्नशील.

महाश्वेता देवी को बंगाल के शरतचंद्र पदक, भुवनमोहिनी पदक, जगततारिणी पदक, और अमृत पुरस्कार से नवाजे जाने और पद्मश्री तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने के बाद भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से समादृत होकर, मेगसेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है.

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डॅा. लता सुमन्त

AssociateprofessorinHindi

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रचनाकार: कलम की देवी - महाश्वेतादेवी
कलम की देवी - महाश्वेतादेवी
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