रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - गिरफ़्त

गिरफ्त

हमारा देश महान है। हम लोग महान हैं। हमारे बीवी-बच्चे महान हैं हमारे नौकर-चाकर भी महान हैं। हमारे देश की हर चीज, यहां तक कि सब कुछ महान है।

हमारी परम्पराएं महान हैं। हमारी महान परम्पराओं में एक परम्परा यह भी है कि सभी दिवंगत जनों को हम महान समझते हैं। परसों पड़ोस का मल्लू मर गया। हेरा-फेरी न चल पाती थी तो खून बेचता था। जिस दिन खून बेचता था उस दिन पूरा अद्धा पीता था। उसे किसी ने समझा दिया कि शराब में बड़ी ताकत होती है। शराब पीकर ताकत पत्नी को मारने-कूटने और बच्चों को गालियां देने में निकलती थी। थोड़ी-बहुत ताकत मोहल्ले वालों से गाली गलौज में लगती थी।

मल्लू के मरने पर लोग जमा हुए तो बातचीत से पता चला कि वह महान था। सदाचारी था। काम से काम रखता था। मोहल्ले वालोें के साथ प्रेम से रहता था। धार्मिक प्रवृति का आदमी था। परिवार से बहुत प्रेम करता था।

जरा सोचिए, हमारे महान देश में मल्लू जैसा आदमी मरने के बाद अगर महान हो जाता है तो राजनेता मरने के बाद क्या हो जाते होंगे राजनेताओं मरने के बाद उनकी महानता सिद्ध करने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। पुण्य तिथि आते ही सारे देश में हलचल मच जाती है।

हमारे देश में तिथियां भी महान हैं। जन्म-तिथि हो या पुण्य-तिथि। कभी-कभी लगता है यदि तिथियां मतलब जन्म और पुण्य-तिथियां मारते रहते। और इतनी अधिक मक्खियों मरने के कारण पर्यावरण असंतुलित हो जाता, तब पर्यावरण का संतुलन बनाये रखने के लिए अमेरिका से मक्खियों मंगवानी पड़तीं।

यह कहानी भी एक राजनेता की पुण्य-तिथि की कहानी है। राजनेता जब जीवित था तब उस पर भ्रष्टाचार, दुराचार के ऐसे आरोप सिद्ध हो चुके थे कि अगर वह जीवित रहता तो जरूर जेल की हवा खाता, लेकिन सौभाग्य से मर गया और महान हो गया। उसकी पुण्य तिथि पर देश-भर में जगह-जगह एकता मेले लगाये गये, खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की गयीं, निबन्ध लेखन प्रतियोगिता हुई, रेडियो और दूरदर्शन ने विशेष प्रसारण किए। संगीत सभाएं, सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं, जुलूस, रैलियां, शिविर, सम्मेलन और वाद-विवाद प्रतियोगिताएं आदि आयोजित किये गये।

इन सब आयोजनों में सबसे ज्यादा शामत आई स्कूलों बच्चों की, यानी हर आयोजन में उन्हें आगे-आगे रखा गया। सामने बैठाया गया। नारे, लगवाये गये। श्रमदान कराया गया। पेड़ लगवाये गये। स्कूली बच्चे भी खुश हो गये। मास्टर मास्टरनियां भी प्रसन्न हो गये। सोचने लगे, काश! हर दिन किसी राजनेता की पुण्य-तिथि होती।

राजनेता की पुण्य-तिथि पर हर शहर में रक्तदान शिविर आयोजित हुए। दिल्ली में व्यापक शिविर एक सरकारी अस्पताल की ओ.पी.डी. में लगाया गया। झांडियां झंडे, गमले, सजावटी गेट, बन्दनवार लगाये गये। ओ.पी.डी. मरीजों के लिए बंद कर दी गयी।

खून देने वाले स्वयंसेवक सफेद झलझलाते कुत्तरें-पाजामों और चमचमाती मारुति कारों में आये। उनमें खून देने का इतना उत्साह था कि पोर-पोरसे खून टपका पड़ता था। वैसे उनके शरीर में इतना खून था कि पूरे देश को दिया जा सकता था। यानी वे मुस्टण्डे, हट्टे-कट्टे, खाये-पिये, खेले-खाये सांडों जैसे लग रहे थे।

ये सब मुस्टण्डे छोटे-छोटे गुटों में खड़े हो गये। दरअसल लघु-उप राज्यमंत्री पुण्य-तिथि आयोजन में आ रहे थे। उन्हीं के चरण-कमलों द्वारा इस रक्तदान शिविर का उद्घाटन होना था।

लघु-उप-राजमंत्री के आने से पहले एक विदेशी स्त्री आ धमकी और पिछली सीट से गीता जी उतरीं। उम्र चालीस के आसपास। पर देखने में घाघ। एक उभरते हुए उद्योगपति की दूसरी पत्नी। कुत्ते पालने की राजनीति का शौक। कुत्ते पालने क शौक तो शादी के बाद कुछ-कुछ कम हो चला है, लेकिन राजनीति से वही पुराना इश्क है। अपार धन। व्यापक सम्पर्क सैकड़ों चमचे, पचासों गुण्डे। पिछले साल राज्य सभा में आते-आते रह गयीं।

गीता जी आयीं तो बहार आ गयी। भागदौड़। आगे-पीछे। दायें बायें। ऊपर-नीचे। अंदर-बढ़ीं। तभी कैमरा टीम आ गयी। उसके पीछे मंत्री जी की गाड़ी आई। उतरे। जय-जयकार। देश का नेता कैसा हो पापी भ्रष्टाचारी, अपराधी हो। मुस्कराहटें सज गयीं। जेब में चमचमाता कलम। कलफ कपड़ों से टपका पड़ता। कपड़े हथियारें की तरह बज रहे थे। जो चीज कपड़ों से छू जाती थी, कट जाती थी। हाथ इस तरह जुड़े थे जैसे जुड़वा बच्चे हों।

गीता जी ने मंत्री के माला डाली। करतल ध्वनि हुई। मंत्री जी रक्त देने वालों के पास पहुंचे। सबसे पहले बेड पर गीता लेटी रक्त दे रही थीं। मंत्री जी और गीता जी पर कैमरे चमके। दूरदर्शन वालों ने छायांकन किया।

मंत्री जी ने रक्त देने वालों के दिल बढ़ाये। बाहर निकल एक अनर्गल-सा भाषण दिया। जिसमें सिद्ध कर दिया कि वे ही नहीं सुनने वाले तक महा चूतिया हैं या महा घाघ हैं। तालियां बजती रहीं। मंत्री जी कार में बैठे और उड़ गये। अगले रक्तदान शिविर में उनकी प्रतीक्षा हो रही थी।

गीता जी कार में बैठने ही वाली थीं। मेला उखड़ने ही वाला था कि एक जूनियर डॉक्टर अंदर से भागता हुआ आया। वह बुरी तरह हांफ रहा था बोला-‘‘अभी-अभी फोन आया है। पी.एम. यहां आ रहे हैं।’’

‘‘पी.एम. यानी प्राइम मिनिस्टर...प्रधानमंत्री’

‘‘जी हां...प्रधानमंत्री...उनका कार्यक्रम बदल गया है। जिस प्रार्थना सभा में उन्हें जाना था वहां बम पाया गया है।

‘‘थैंक गॉड! फटा तो नहीं’

‘‘प्रधानमंत्री के जाने के पहले फट गया।’’

‘‘थैंक गॉड...कोई मरा तो नहीं’

‘‘बाइस आदमी...’’

‘‘थैंक गॉड...इससे ज्यादा मर जाते तो हम क्या कर सकते थे!’’

फिर गीता जी को याद आया कि प्रधानमंत्री अभी-अभी आ रहे हैं। वे अन्दर की ओर भागीं।

दूरदर्शन की विशेष कैमरा टीम आ गयी। विदेशी समाचार एजेन्सियों की टीमें आ गयीं। गोरे संवाददाताओं ने रंग जमा दिया। ब्लैक कैट आ गये। ऊंचे अधिकारी आ गये। पुलिस की वर्दियों में अपराधी और अपराधियों की वर्दी में पुलिसकर्मी आ गये।

गीता जी ने अंदर डॉक्टर से कहा, ‘‘प्लीज डॉक्टर, मैं फिर से बलड डोनेट’ करना चाहती हूं।’’

डॉक्टर समझदार था। बोला, ‘‘लेकिन अभी-अभी तो आपने खून दिया है।’’

‘‘मैं फिर देना चाहती हूं।’’

‘‘लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है’

‘‘ये तो आपको सोचना है।’’ गीता जी का स्वर बदल गया और डॉक्टर की अकल पर पड़े पर्दे हट गये।

‘‘आप भी अजीब डॉक्टर हैं। विज्ञान के इस युग में आप असंभव शब्द पर विश्वास करते हैं...लानत है आप पर और आपके विज्ञान पर...।’’

‘‘नहीं...नहीं गीता जी...सब हो जायेगा...प्लीज आप चिन्ता न करें...।’’

डाक्टर ने जूनियर डॉक्टर को इशारा किया, जूनियर डॉक्टर ने कम्पाउंडर को संकेत दिया। उसने नर्स को आंख मारी । नर्स ने चपरासी को आंखों ही आंखों में कुछ बताया। चपरासी ने जमादार को इशारा किया और जमादार अस्पताल के पीछे नाले के किनारे एक नीम के पेड़ के नीचे जुआ खेलते मल्लू को लेकर हाजिर हो गया।

काला, सूखा, मरियल हड्डियों का ढांचा, मुंह से बीड़ी की दुर्गंध और शरीर से पसीने की बदबूं गीता जी ने उसे देखकर मुंह बनाया।

डॉक्टर-‘‘गीताजी, यह आदमी खून बेचता है।’’

गीताजी-‘‘वेरी गुड...’’

डॉक्टर-‘‘खून ही नहीं, आंख भी बेच सकता है।’’

मल्लू-‘‘पचास हजार।’’

डॉक्टर-‘‘किडनी भी बेचता है।’’

मल्लू-‘‘एक लाख।’’

डॉक्टर-‘‘दिल चाहें तो वह भी...’’

मल्लू-‘‘दो लाख।’’

डॉक्टर-‘‘यहां हर चीज बिकती है...’’

अचानक पूरा परिदृश्य बदल गया। नर्स नर्तकी बन गयी। डॉक्टर गायक/कव्वाल बन गया। जूनियर डॉक्ट तबलची बन गया। चपरासी सारंगी लेकर बैठ गया और डॉक्टर ने तान मारी...यहा हर चीज बिकती है...मेरी जां...ओ मेरी जां...यहां हर चीज बिकती है...संगीत...तबला, हारमोनियम, घुंघरु बांधे नर्स नाचने लगी...यहां हर चीज बिकती है। जूनियर डॉक्टर तबले पर पिल पड़ा और चपरासी सारंगी पर झुक गया...मेरी जां क्या खरीदोगे

गीता जी बोलीं, ‘‘ठीक है...समझ गयी।’’

दृश्य बदल गया। सब यथावत् हो गये। डॉक्टर ने झुककर दूरदर्शनी लहजे में कहा, ‘‘व्यवधान के लिए खेद है।’’ गीता जी ने अपना पर्स खोलकर जितने भी सौ-सौ के नोट हाथ में आये मल्लू की तरफ बढ़ा दिये। मल्लू के हाथ से सौ का एक नोट जमादार ने खींच लिया। दो नोट चपरासी ने ले लियं। तीन नोट नर्स ने झटक लिए। चार जूनियर डॉक्टर ने डकार लिये पांच नोट डाक्टर ने जेब में डाल लिये। फिर भी मल्लू के हाथ मे सौ-सौ के काफी नोट बचे। मल्लू ने जल्दी से उन्हें पाजामें में उड़स लिया।

प्रधानमंत्री सबसे पहले गीता जी के बेड के पाये आये। आडियो, वीडियो, सीडियो, पीडियो सब तरह के कैमरे चले। प्रधानमंत्री ने फूलों का एक गुलदस्ता गीता जी को भेट किया। गीता जी ने हाथ जोड़े। वे खून दे रही थीं। नीचे मल्लू लेटा था। चादर से सब कुछ ढका हुआ था। लगता यही थी कि टप-टप बोतल में गिरने वाला खून मल्लू का नहीं बल्कि गीता का है।

प्रधानमंत्री आगे बढ़े उनके पीछे संचार मंत्रालय भी चल दिया। गृह मंत्रालय भी चला। स्वास्थ्य मंत्रालय भी चला। गीता जी फुर्ती से उठीं और फूलों की एक मोटी-सी माला दरवाजे पर गयीं। जब प्रधानमंत्री बाहर निकलेंगे तो वे डालेंगी।

बोतल में खून टपक रहा था। मल्लू टेंट में दाबे रुपयों को मुट्ठी में दाबे सोच रहा था। दो महीने का राशन लाकर डाल देगा। ताकि रोज-रोज की किलकिल खत्म हो जाये। सबके कपड़े भी बन जायेंगे...बच्चों के लिए मिठाई भी ले जायेगे। और जमकर पियेगा...विलायती पियेगा...मुर्गा भी खायेगा...सेकेण्ड शो पिक्चर देखेगा। पिक्चर के दृश्य आंखों के सामने घूमने लगे...फिर धीरे-धीरे उसकी आंखें बंद होने लगीं। बूंदें टपक रही थीं। उसने जोर लगाकर आंखें खोलना चाहीं, लेकिन गहरी नींद के दबाव में आंखें बंद होती गयीं पर टेंट में दबे नोंटों पर उसकी गिरफ्त मजबूत हो रही थी।

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