सोमवार, 9 जून 2014

सुनील कुमार 'सजल' के व्यंग्य, लघु व्यंग्य और लघुकथाएँ

 

व्यंग्य -गड्ढा महिमा


दूसरों की राह में गड्ढे खोदना इंसान की पुरानी फितरत है। कुछ लोगों का खाना गड्ढे खोदने पर ही पचता है। आजकल तो हर राह गड्ढों से सजी होती है। कभी सरकार खुदवाती है ,कभी हम लोग खोदते हैं। इन दिनों राजनीति हो या शासन -प्रशासन। अपनों के लिए एडवांस गड्ढे खोदने का प्रचलन बढ़ा है। अतः गड्ढे खोदना हमारी सभ्यता का एक दौर है। मिली भगत से खोदे गए गड्ढे ज्यादा लाभदायक होते हैं। खोद लो जितना चाहो उतना। देश के सर से पाँव तक। जैसा चाहो वैसा। सरकार भी मेहरबान होती है। ऐसे क्रियाकलापों के लिए। अपनों को चांस देती है। खोद लो जब तक हम हैं। खनिज खोदो या गड़े मुर्दे उखाड़ो। राजनीति साथ है। गांव के पण्डे को गड्ढा खोदना लाभदायी रहा। प्राचीनकालीन देवी मूर्ति हाथ लगी। स्वर्ण धातु का घड़ा। पंडे ने दोनों हाथों से चाँदी काटी। देवी मूर्ति के सम्बन्ध में प्रचार किया कि उसे उसने स्वप्न में बताया कि अगर वह उसे मंदिर में स्थापित करेगा तो जग का कल्याण होगा। सो वह अब मंदिर में स्थापित कर अपनी पंडागीरी का धंधा चला रहा है।

वैसे सरकार धरती में जल स्तर बढ़ने के लिए गांव की सीमा में या जंगल किनारे गड्ढे खुदवाती है। ताकि इनमें जल भरे और पृथ्वी का जल स्तर बढे।

बाद में ये गड्ढे गांव के लुकछिप कर मिलाने वाले प्रेमी प्रेमिकाओं के काम आते हैं। सच कहें तो ये गड्ढे प्रेमालय का काम करते हैं।

आलिंगन। स्पर्श। वादे। सपने। सब कुछ स्वतंत्र रूप से इन गड्ढों में संपन्न होते हैं।

पिछले दिनों विपक्षियों ने सरकार को औंधे मुंह गिराने के षडयंत्र गड्ढे में रचे थे। वह तो सरकार की जासूसी संस्था थी,जिसने गड्ढों का पता लगा लिया। वरना …।

कुछ लोग गड्ढे का शक्ल देख कर उसकी औकात पहचानने में माहिर होते हैं। चाँद का चेहरा हो या हसीना का। वे बड़ी खूबसूरती से उसकीखूबसुरति का ग्राफ़ खींच लेते हैं।

खासकर प्रेम क्षेत्र के कवि गण। एक कवि ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर उगे गड्ढों पर इतनी सुन्दर कविता लिख मारी कि अगर चाँद को पढ़ना आता तो वह भी शरमा जाता। सोचता काश!ऐसे गड्ढे उसके चेहरे पर होते तो कितना अच्छा होता। व्यंग्यकारों की बात ही अलग है। वे तो निंदा रस के अलावा कुछ और उगलते ही नहीं।

विभाग या पौधरोपण करने वाली संस्था के लिए गड्ढे उतने महत्वपूर्ण होते हैं जैसे राशन दुकान के सेल्स मैन के लिए पिछला दरवाजा। गड्ढों की छाती पर पौधे रोपित किये जाते हैं। चंद महीने में वे ईश्वर को प्यारे हो जाते हैं। बाद में गड्ढे आंकड़े की लहलहाती फसल को बचाते हैं। इन गड्ढों के आधार पर तो पर्यावरण प्रगति की वार्षिक रपट तैयार होती है। हम खुश हाल होते हैं। पर्यावरण के मामलों में।

अगर सड़कों में गड्ढे न होते तो पीडब्लूडी का औचित्य न रह जाता। पेंच लगाना उसका महत्वपूर्ण कर्म है। साल भर होते हैं गड्ढे। साल भर मिट्टी का पेंच। सच कहें तो पीडब्लूडी के कर्मचारियों के पेट व पेट की जेब के गड्ढे में सड़क के गड्ढों का बहुत योगदान होता है। हमें तो कभी -कभी जनता की ह� �कत पर दुःख होता है ,जब वह गड्ढों को लेकर गालियां देती है। शासन - प्रशासन को ताने देती है। अखबारबाजी करवाती है।

अगर गड्ढे न होते तो क्या सरकार गड्ढों के नाम पर खर्च की जाने वाली राशि का बजट बनाती ?देश का बजट ही तो देश की तरक्की को दर्शाता है तो फिर काहे उल्टी सीधी बातें करना। ऐसे थोड़े ही न होता है यार।

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व्यंग्य -बैंड बजा दो भैया

इधर शादी का मौसम आया। बैंड पार्टी वालो की चाँदी बन आई है। बड़े उल्टे -सीधे रेट बैंड बजाने के। मुंह माँगे दाम पर भी एक शंका। कहीं नहीं ही तो न कह दें-'भैया पहले बुकिंग करनी थी जब द्वार पे बारात आ खड़ी हुई। तब कह रहें हैं। बैंड बजा दो। ''.बस इत्ता ही कहना है उन्हें। फिर आप कहना ही पड़ेगा -भाई जी ,जो चाही रेट लगा दो। मगर बजा दो। '' बजवाना ही पड़ता है साब। ऐन ख़ुशी के मौके पर। बैंड न बजे तो काहे की ख़ुशी। काहे का उल्लास। उत्साह। दिखावा। आधुनिकता।

दिखावा व तारीफ़ भी कुछ ऐसी साब।फलां बैंड वाले को तय किया है साब। शहर की नामी बैंड पार्टी। क्या बैंड बजाता है साब। जोरदार। सुनकर हाथ पाँव थिरकने लगे। आधुनिक संगीत। बड़े मुश्किल से हमारे लिए वक्त निकाला है । वो तो हमने दो महीने पहले से कह रखी थी.'दादा ,हमाव लड़का की शा दी में तुम्हई को बैंड बजना चाहिए। तब जाकर हमाई बात मानी। थोड़ी बहुत न -नुकुर करी थी। हमने भी रेट की परवाह नई करी तो वे भी खुश होकर बोले ,-यादव जी तुम भी चिंता न करो। दुनियाँ को काम छोड़ देंगे ,मगर आपको नई। ' का करें बैंड बजवाना है तो तेल तो लगाना पड़ेगा। दूल्हा को बाद में तेल लगे तो चलेगा। मगर इन्हें पहले।

शादी का सीजन है साब। बैंड पार्टी के भाव आसमान पर तो रहेंगे ही। सीजन का महत्व है। जैसे सब्जी के अभाव में सड़ी सब्जी को भी भाव मिल जाता है। कुछ इसी तरह नामी - बेनामी बैंड पार्टी के भाव बढे हैं। ''नई दादा हमने जो कही उत्ते में ही हम बैंड बजायेंगे। और सुनो भैया ,टाइम फिक्स रहेगा। घंटा भर ज्यादा हुए तो एक्स्ट्रा चार्ज देने पड़ेंगे। इत्ते से इत्ते बजे तक मायने इत्ते बजे तक। ''

खुशी का दौर है। महँगाई तो जिंदगी का बैंड बजा ही रही है। वैसे भी जिन्दगी फटे ढोलक की तरह होकर रह गयी है। आह कर सकते न उफ़ ! झूठी खुशी का मुखौटा तो चेहरे पर लगाना पड़ता है। उत्साही दिखने के लिए।

एक वो दौर था साब। जब किसी भी जश्न में शहनाइयां की धुन गूंजा करती थी। नगाड़े व ढोलक की थाप पर कदम थिरकते थे। चूड़ियों की खनक तरह मंजीरे की धुन कर्णप्रिय होती थी। आधुनिक बैंड की धुन की तरह कलेजा हिलता था न दिमाग को धुन का भार धोना पड़ता था। दिन -दिन भर बजते रह ते थे वाद्य यन्त्र। मन को सुकून मिलता था।

पहले हमारे कस्बे में दो बैंड पार्टियाँ हुआ करती थी। मगर आज ?खरपतवार की तरह दर्जनों उग आई हैं। न सुर ,न संगीत जो मन को भाये। धूम -धड़ाका दिमाग को हिलाने वाला।

भाई साब ,समाज में रहना है तो जश्न में बैंड बजवाना तो पड़ेगा। हँसकर गाकर ,मुंह फुलाकर या फिर आँसू बहाकर। वैसे बैंड के कई मायने हैं मसलन महँगाई ,मर्ज ,तनाव और भागम भाग जिन्दगीं। कितने ही पुरातन पंथी बन जाएँ इनसे कब तक बचेंगे आप।

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व्यंग्य -आन्दोलन चालू आहे …….

इन दिनों देश में हलचल बढ़ी है। जगह `-जगह हड़तालें अनशन आन्दोलन तोड़फोड़ आदि चल रहें हैं। माहौल से वाकिफ होने के बाद लगा कि जागरूक हो चला है।अन्याय के खिलाफ। देश की सरकारें भले ही खुद को जागरूकता लाने का प्रयास कर रही है। पर वे ए .सी कक्ष में बैठी ब ाहर के माहौल से वाकिफ कहाँ है की धूप प्यास तपती जमीन पर व पानी के बीच खड़ा आदमी राजनैतिक पीड़ा व उपेक्षा से हताश होकर स्वयं कितना जागरूक हो चुका है।

अभी हाल ही में भ्रष्टाचार का आन्दोलन गतिमान हुआ। वह जन जागरूकता का प्रतीक है। मगर सरकारें की सोच यह है जागरूकता नही बल्कि बिचौलिए दिमाग का प्रतीक है।

सरकारें चाहती है कि आम आदमी को मालूम होना चाहिए भ्रष्टाचार क्यों किया जाता है। यह देश हित में कितना जरूरी है? ''भाई हम लोग विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ रहे है महाशक्ति लगभग बन है। ऐसे में आम लोगों के खर्च व सुविधाओं की जरूरत तो बढ़ेंगी। वह कहाँ से पूरी हो ? सरकारी खजाने की इतनी कुव्वत नही है कि वह खुले हाथों से सबको धन कहाँ से प्राप्त करे ?

अनशन ,आन्दोलन आदि होने पर ऐसा लगता है मानो आसपास दुर्गोत्सव व गणेशोत्सव आ गया है। चहल -पहल हो हल्ला होने से बोरियत कम होती है। ऐसे वक्त पर फुरसतिया नेताओं की भूमिका बढ़ जाती है। यार यह क्यों नहीं सोचते कि सबके पास अपने -अपने उल्लू है जो शाख पर बिठा कर रखते है

अपने देश में व्यावसायिक आन्दोलनकारियों की कमी नहीं है। इनकी खोपड़ी में ''जागरूकता ''का प्रतिशत ........बुक ऑफ़ रिकार्ड में दर्ज गणितज्ञ से कही ज्यादा होता है। अगर इन्हें धोखे से गंगा जल में एकाध कीड़े दिख जाये तो इनका आन्दोलन वही उग्र रूप ले लेता है। कहते हैं -''गंगा जल में कीटाणु नहीं पल सकते तो फिर ये मोटे ताजे कीड़े -मकोड़े क्यों पल रहें हैं ? गंगा सफाई के नाम पर भ्रष्टाचार हुआ है ,.ताकि कीड़े पलते रहें और सफाई का कार्य चलता रहे। और कमीशन हाथ लगता रहे।

वैसे आन्दोलन ने देश को नई दिशा दी है। गाँधी जी ने अपने आंदोलन के जरिये देश को स्वतंत्र कराया ,अन्ना जी भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र बनाने की राह पर है। देश के राजनैतिक आन्दोलन के जरिये अपनी राजनीति को सुरक्षित रखे हुए हैं।

पिछले दिनों एक रोचक समाचार सुनने में आया। जिस शहर में महिलाओं ने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ आन्दोलन किया था। महीने भर के अन्दर में उसी शहर में कन्या भ्रूण के गर्भपात के मामले सर्वाधिक आए थे।

आन्दोलन के हर दिल पर इस तरह राज हो चला है कि सडक पर पड़ी अज्ञात लाश को ठिकाने लगाने के नाम पर लोग अपनी जेब खोल देते है। कई मामलों में आन्दोलन एक व्यवसाय भी है इसलिए बेरोजगारों चिन्तित न होओ। बस अपनी दृष्टि सूक्ष्म रखो। इस तरह कि मुरदे के शरीर से भी सोना `चांदी खंगाला जा सके।

आन्दोलन का संस्करण भी आजकल अख़बारों के संस्करण की तरह बदल रहें हैं। संस्करण जितना खासमखास होगा। चंदा भी वैसा वसूल होगा।

वैसे भी हर व्यक्ति आजकल आन्दोलन की राह पर खड़ा है। जिन्दगी स्वयं एक आन्दोलन बन कर रह गयी है। उथल -पुथल चिंताओं से भरी सांसे ,तनाव ग्रस्त सोच इंसान को आन्दोलन का पुतला बनाकर रख दी है।

आन्दोलन का स्वरों में आयी गिरावट का रूप यह भी रहा कि फैशनेबुल लोग अर्धनग्न फैशन को बढ़ावा देने के लिए नारेबाजी करते नजर आते है।

आन्दोलन की आजादी हमारे लोकतंत्र की आधुनिक परिभाषा है। इसे किसी न किसी रूप में जीवित रहना आवश्यक है तभी न पीड़ितों के स्वर सरकारी कान तक पहुचेंगें ……। वरना।

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व्यंग्य -रामयुग के साइड इफेक्ट्स

आजकल वह संतो सज्जनों के घेरे में आ गया है। संत तो संत ,बुढ़ापे के असर से ज्ञान की बातें करने वालों के घेरे में भी जो बुढ़ापा बिताने के लिए धार्मिक ग्रंथों व सामाजिक पाठों का अध्धयन करते हैं। यह अलग बात बुढ़ापे में ज्ञानी बने जो लोग जवानी में बदमाश थे। पर बुढ़ापे में बदमाशी कहाँ चलती है। सो वे ज्ञानी बन गये। आज वे हर किसी को अपने अनुभवों को जोड़ कर सदाचार की शिक्षा देते है। लोभ त्यागो। ब्रम्हचर्य पालन करो। सत्य अहिंसा को अपनाओ। और न जाने क्या -क्या।

वह ऐसे ही कुचक्र के घेरे में है। कुचक्र इसलिए कहा क्योंकि उसमे राजनीति का जोश उबल रहा है उसकी हर बात में राजनीति होती है। वक्त अनुसार राजनीति भी करता है। उसे मालूम है सदाचार राजनीति के जहर की पुड़िया है। राजनीति कदाचार से चलती है। फिर भी पागलपन अपनाए है।

उसे धर्म ज्ञानियों के बीच फंसे होने पर मैंने कहा -क्यों रज्जु ,तुम राजनीति करना चाहते हो न। '' ''वो तो मैं करता हूँ। ''उसने कहा

''इस संत पुजारियों के ज्ञान पंजों में कहाँ फंस गये।

''मैंने कहा।

''दादा ,मैं धर्म को भी मानता हूँ। सो इनकी संगत जरूरी है। ''

''जानता है राजनीति का असली धर्म ये नहीं होता। जिधर वोट बैंक पक्का दिखा राजनीतिक उसी जाति धर्म का अनुयायी हो जाता है चुनाव में। अगर तुम करते हो तो ठीक है। पर इनके ज्ञान को अपने कर्म क्षेत्र में उतारने की बात भी करते हो क्या... ?''मैंने कहा।

''तो क्या हुआ। ''उसने कहा।

''तुम राजनीति करते हो न। ''

''सो तो करता हूँ। ''

''राजनीति मैं सदाचार ,अपने पर अपने हाथों को काटना चाहते हो। ''

''ऐसा नहीं है। मैं राजनीति में भी सदाचार लाना चाहता हूँ। ''

''किस जमाने की बात कर रहे हो। देखो शेखचिल्ली न बनो। यहाँ सदाचारियों के कई काम उलटे चलते है। यानि मुंह में राम बगल में छुरी। ''

''दादा ,आप कुछ भी कहो मैं सदाचार के दम पर लोगों का दिल जीतूंगा ''

''तुम भी कहीं उन ढोंगियों की तरह रामराज्य लाने का सपना तो नहीं देख रहे। ''

''आप जो भी समझे। पर अपन सदाचार के पुजारी बनना चाहते हैं.''

''घाघ लोगों का इतिहास देखा। वे राम की बात कर रावण को नमस्कार करते है। इस युग में राम केवल चंदा बटोरने का आधार है। जनता को फुसलाने का तरीका है। ताकि चुनाव में उनकी पार्टी का झंडा लहराये। और एक तुम मूर्ख सदाचार का जाप कर रहे हो। ''

''दादा ,कुछ करने से बदलाव आता है। ''

''तुम राजनीति में सदाचार लाने का जोश लेकर बैठे हो। देखो ,गर्दन भी काट कर रख दोगे न ,तब भी राजनीति का कलेजा अपना चरित्र न बदलेगा। इसलिए रामराज्य का सपना देखना छोड़ दो। '' .

''नही दादा।''वह अड़ गया। मैंने उसे समझाने का प्रयास किया -देख रज्जू ,इस देश की जनता ''रावण युग ''की आदी हो चुकी है। उसके हर काम रावण चरित्र के तरीके से सुलझते है। वह रामराज्य की इमानदार व्यवस्था को बरदाश्त नहीं कर सकती। वह हर काम में सरलता चाहती है। कानून,नियम न्याय का घुमावदार पथ लांघना उसे पसंद नहीं है। वह चाहती है। बेईमानी चाहे जितनी करनी पड़े या सहना पड़े। पर वह पहाड़ जैसी मुश्किल को भी कदमों से लांघना चाहती है। और जब तुम उन्हें रामराज्य की व्यवस्था समझाओगे। लोग हंसेंगे। तुम पर। जनता राजनीति में राम के महत्व को जानती है। इसलिए फालतू का चक्कर छोड़कर वक्त के रावण युग की चर्चा करो और इस युग में खुद भी बदलो। '' वह इन दिनों गम्भीर है। वह राम व रावण चरित्र के पाटों के बीच खुद को फंसा महसूस कर रहा है। सोच नहीं सक रहा है कि क्या करे। लोग उसे समझा रहे हैं। तरह -तरह से। जो रावण युग का महत्व समझते हैं रामयुग के साइड इफेक्ट्स को जानते है। देखिये आगे रज्जू क्या करता है ? ....

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व्यंग्य -भ्रष्टाचार का बीज -- -

-ब्लाक के कृषिविभाग की बात है दफ्तर में छोटे साहब वर्मा जी कहाते हैं। तपा जी बड़े साहब। दोनों कक्ष में बैठे है। चर्चा होनी है। सो वे आज एक साथ बैठे है। दोनों का एक साथ बैठकर चर्चा करना ही चर्चा का विषय होता है। जरूर कोई गडबड करने की सम्भावना रहती है। ऐसी बात नहीं है कि दोनों चर्चा करते हुए लड़ पड़ेंगे। बल्कि भ्रष्टाचार की कोई नई स्कीमों की पृष्ठभूमि तैयार करने हेतु चर्चा होती है। वैसे भी दोनों अधिकारी है गडबडी करना उनका स्वभाव है। अफसर गडबडी किए बगैर अफसर नही कहा सकता। ऐसा उनका विचार है। साब ,दोनों कक्ष में है। कोई और नहीं है। है अगर तो सारी निर्जीव चीजें। जिनका चर्चा से कुछ लेना देना नहीं है। बाबु,ग्रामसेवक जैसे छोटे पद के लोग अलग कक्ष में मौजूद हैं। अपने अप ने काम में व्यस्त है। वे जाते हैं ,साहब लोग जो भी काला - पीला करने की सोचेंगे। मोहरे हम ही होंगे। वे निर्देश देंगे चाल हमें चलना है। जनता के बीच चर्चा चल रही है। गंभीर हैं दोनों। मनो दो देश के नेता सीमा विवाद पर चर्चा करते हुए होते हैं। ''यार ,वर्मा ,अच्छी बाढ़ आयी इस वर्ष। सब फसल चौपट हो गयी। ''-बड़े साहब बोले। ''साब ,लेकिन बेचारे किसान तबाह हो गये। '' ''होने दो वे जब भी तबाह होते हैं। उनके हित की योजनायें अपने को आबाद करती हैं। '' '''वे तो मर गए सर। दुबारा फसल बोने के लिए उन्हें पुन: बीज चाहिए कुछ करना होगा अपने को। ''तुम ठीक कहते हो। यह बाढ़ लक्ष्मी दायनी साबित होगी अपने लिए। ''बड़े साहब का ख़ुशी भरा कथन। ''वो कैसे साब। '' वर्मा जी वैसे भी भोले टाइप इंसान हैं। वे अक्सर ऐसे ही सवाल करते हैं। जो पिछला बीज बचा है। उसे रजिस्टरों में वितरण दिखाकर बेच दो। अवितरण का जो प्रूफ है उसे बाढ़ बहा ले गयी। अपन तो बस कमा ई देखें। हाँ ! तो बेच दो बीज को। ''

''किसे किसानों को ?''

''अरे यार ,किसानों को बेचकर अपनी ऐसी तैसी करवाओगे। सालों  हो हल्ला मचा दिया तो। वैसे भी अपन उन्हें उल्लू बनाते आयें हैं। राजनीति गर्म हो जाएगी। ये किसान बड़े बदमाश होते हैं सब कुछ मुफ्त में बटोरना चाहते हैं सरकार से। और बाद में फसल ऊँचे दामों में बेचते हैं। इनको सबक सिखाने की सोच रहे हैं हम तो हरामी `कर्जा लें और बाजार से बीज खरीदें। ''साहब थोडा कडक मतलब सख्त स्वभाव के आदमी हैं।

'किसे बेंचे ?''छोटे साहब मासूमियत भरा सवाल पूछा।''

'' यार जरा बुद्धि लड़ाओ अफसर हो। बैल गाड़ी छाप किसान की बुद्धि से न सोचो। बस माल लादा और चल दिए बाजार को। '' छोटे साब अपने बुद्धि का केलकुलेटर खटखटाने में लगे थे। पर हर बार हल शून्य पर आ टिकता। अब आप ही बताइए किसके पास ठिकाने लगायें '' यार वर्मा तुम अफसर जरूर मगर अफसरी के गुण नहीं हैं तुममें। भ्रष्टाचार के सूत्र सीखो। कब कहाँ कैसे चाल चलनी है। कल हमारे पास एक बीज दलाल आया था। वह पूरा माल खरीदना चाहता है। खुद में न भ्रष्टाचार का रौब हो तो सूत्र बताने वाले खुद ब खुद चले आते हैं। वह दलाल हमारे मॉल को अपने पैकिंग में बेचना चाहता है। अपने को तो कमीशन मिलेगा सीधे में। ''

'' फर्जी हस्ताक्षर वह भी इतने नामों के ?''

' तुम्हारे पास दो हाथ दो पाँव और अंगुलियाँ हैं। जितने चाहो उतने हस्ताक्षर बनवा लो। '' अफसरी रौब में साहब बोले। ''इस देश में यही कुछ चल रहा है। ''छोटे साहब कुछ गम्भीर हुए तो वे पुन: बोले -''वर्मा ज्यादा न सोचो। रिकार्ड दुरुस्त रखो। कोई माई का लाल नहीं जो अपना कुछ बिगाड़ले बाकी सब अपन देख लेंगे। छोटे साहब कहीं कहीं समझदारी भी दिखाते है। वे बड़े साहब से बहस नहीं करते।

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लघु व्यंग्य - किताब

`` वे मेरे कहने पर मुझसे एक संत जी की जीवन पर आधारित किताब पढ़ने को ले गए।

वे जब किताब लौटने मेरे घर पहुंचे तो उनसे पूछा -''कैसी लगी किताब ?अच्छे लगे संत के विचार। ''

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''मजा नहीं यार। कोई गरमागरम वाली किताब हो तो दो। धर्म -अध्यात्म तो बूढ़ों को ही अच्छा लगता है अपन तो अभी यार उम्र में संतों की वाणी भला पच सकेगी कि जब जवानी.....।

वे किताब के बारे में बताते हुए ऊब महसूस कर थे।

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लघु व्यंग्य -ऊब - -

''''तुम्हें वेश्यावृति के धंधे से जुड़े कितने साल हो गए ?'''

-- ''पूरे पांच साल। '''

---''फिर भी तुम्हें इस घृणित कार्य से ऊब नहीं आई ?''

`--''जिससे पेट का जुगाड़ चले ,उससे किसी को ऊब आती है भला ?'' ----- --------------------

लघु व्यंग्य -आधुनिक रक्षक

मोहल्ले में एक लड़की को किसी बाहरी युवक ने छेद दिया। पास खड़े लड़कों से रहा न गया। वे उस पर टूट पड़े। जम कर मरम्मत कर डाली उसकी। उन्ही लड़कों में गुंडा टाइप दिखने वाला उस पर अपना गुस्सा उतरते हुए कहा -अबे स्साले तेरी हिम्मत कैसे हुई उससे छेड़छाड़ करने की , घर में बहिन -बेटी नहीं है क्या ?तुझे मालूम होना चाहिए कि कोई उस पर नजर उठाकर नहीं देख सकता सिवाय,मेरे। '' - --- ---------------------------- ल घु व्यंग -जात

नगर के चौराहे व सडकों पर पुलिस की गश्त बढ़ गयी थी। पुलिस वाले पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्य पर डटे थे। मैंने इसका कारण जानने के उद्देश्य से अपने पुलिस मित्र से पूछा -''क्यों भाई क्या बात है आज तो आप लोग अपने कर्तव्य के प्रति ज्यादा सजग नजर आ रहे हैं। कोई नया आदेश मिल गया क्या ?''

'''आदेश -वादेश कुछ नहीं …. यार दरअसल आज उपमहानिरीक्षक साब दौरे पर आ रहे हैं। बस उसी का टंटा है। ' फिर वे कुछ रूककर निराश स्वर में बोले -''क्या बतायें यार सुबह से भूखे -प्यासे खड़े हैं। ये अफसर लोग भाकोश कर दौरे करते हैं। हम छोटे लोग इनकी सेवा में पापड़ बेलते रहते हैं ,,,,,,,,,,,,,,,बड़ी भूख लगी है यार…………. चल नाश्ता -वाश्ता करा दे। '' मेरे द्वारा टालमटोल करने पर वह न माना जबरन मुझे लेकर होटल की ओर बढ़ गया। मैं मन ही मन कुढ़ कर रह गया -''आखिर दिखा दिया न अपनी जात। स्साले ठहरे पुलिस वाले दूसरों की जेब तो नोचेंगे ही। ''

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लघु कथा -बैचैनी …………

वह ट्रेनिंग से लौटकर दो माह बाद घर जा रहा था। बस में बैठा विचार मग्न था -काश बस जल्दी पहुँचाती तो रजनी को एक झलक देख लेता। ढेर सारा सामान उसे देता। वह कितनी खुश होती। इसी बीच गाड़ी का टायर पंक्चर हो गया। अचानक उसके मुख से निकल पड़ा -''धत तेरी की .. अभी ही गाड़� � को पंक्चर होना था ... साली ये आजकल की सरकारी बसें ... ।''

''क्या बात है बेटा .. काफी परेशान नजर आ रहे हो …। क्या घर में किसी की तबियत ख़राब है। ''सीट में बगल बैठे बूढ़े से व्यक्ति ने उसके चेहरे पर छायी परेशानी को भांपते हुए कहा।

'''अरे नहीं दादा .. । ''

''तो इतने परेशान .... । ''

'''अगर आपकी नई -नई शादी हुई होती न तब समझ में आता। ''उसने खीझ भरे स्वर में उस बूढ़े व्यक्ति को जबाब दिया।

..................

लघु व्यंग्य -पेट का ____

मतदान की तिथि करीब आ चुकी थी। एक पार्टी कार्यकर्ता ने पार्टी प्रचार के पर्चे बांट रहे एक व्यक्ति से पूछा - कल हमारी पार्टी के पर्चे बाँट रहे थे और आज दूसरी पार्टी का। यह तो अपनों के साथ विश्वासघात है। '' ''साब ,काम मिला तो हम तीसरी पार्टी का परचा भी बांटेंगें। पार्टी के लफड़े में आप रहिये। यहां तो रोटी चाहिए ,चाहे पार्टी कोई भी हो। ''पास से गुजरते एक व्यक्ति को पर्चा पकड़ाते हुए उसने कहा ----- ----------------------------------- -

लघु व्यंग्य -मतलब कि ….

उनका स्वभाव था हर बात या स्थिति को ऊंटपटांग नजरिये से लेने का। एक दिन उन्होंने मुझे अपनी साली के साथ बाजार में घूमते देख लिया। शाम को मिले तो चुटकी लेते हुए बोले -''यार वाकई खूबसूरत है तुम्हारी साली। ''फिर मुस्कुराते हुए बोले -हाँ क्यों नहीं घूमोगे साथ में लेकर ,,,,,,आखिर साली भी तो आधी घरवा ली। ''साली के प्रति उनका यह मजाक मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने उनके नजरिये पर चोट करते हुए कहा -''वीरन भाई तुम भी तो किसी के साले हो और तुम्हारी दो बहनें अभी कुंवारी हैं। इसका मतलब कि वे भी आपके जीजा की. ..... .| वे ह्तप्रत होकर मेरा मुंह ताक रहे थे। --

लघुकथा -ख़ुशी

चुनाव की घोषणा से वह बहुत खुश हुआ -''अबकी बार मकान की छत पक्की करवा लूँगा। ''

''चुनाव से आपकी छत का क्या सम्बन्ध है। ''मैंने पूछा।

वह कहने लगा -''भाई साब नेता लोग पोस्टर ,बैनर बनवाने मेरे पास ही आते हैं। ''

''आपके पास ?और भी तो पेण्टर हैं यहाँ। 'मैंने उसके बडप्पन पर कटाक्ष करते हुए कहा।

'''आप नहीं समझेंगे। मैं सस्ते में काम करता हूँ। और चमचों को कमीशन भी देता हूँ। आखिर उन बेचारों का भी पेट लगा है। यही तो मौका है कि जब वे अपने नेता से कुछ लेते हैं। वरना उनका लीडर कल जीत हासिल करे इसका क्या भरोसा। ''

और वह खुशी में दो सिगरेट के लिए जेब में हाथ डालने ल गा। इसके पहले मैंने उसे कभी सिगरेट पीते नहीं देखा था। ------------------------------

मित्रों की दुआ ----

तीन चार कर्मचारी दफ्तर के लान पर खड़े बातचीत कर रहे थे। एक ने कहा -''यार कल का मुर्गा बड़ा स्वादिष्ट पका था। कायदे से ऐसा ही पकाना चाहिए। तब तो खाने का मजा है। वरना ………। '

दूसरे ने हाँ में हां मिलायी।

''किस ख़ुशी में पार्टी थी भाई ?'' तीसरे ने जिज्ञासा जताते हुए पूछा।

''अरे वो अपने रेलवे के टिकिट बाबू है न। वे किसी दुर्घटना में बाल बाल बचे थे। अत:  इसे मित्रों की दुआ का प्रतिफल मानकर हमलोगों को भोज पर बुलाया था। ''

मित्र की बातें सुनकर चौथा टिकिट बाबू और मुर्गे के बारे में सोच रहा था ,''वाह क्या जमाना आ गया है खुद तो मरते -मरते बचे ,तो ख़ुशी में भोज दिया पर किसी की जान लेकर।


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सुनील कुमार 'सजल',
द्वारा -सुनील नामदेव
,शीतला वार्ड ,निकट -मंडला -सिवनी रोड ,
बम्हनी बंजर -481771 जिला -मंडला (म .प्र )

 

ईमेल -sunilkusajal@in.com

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