विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका -  नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.
रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -

पिछले अंक

सुनील कुमार 'सजल' के व्यंग्य, लघु व्यंग्य और लघुकथाएँ

साझा करें:

  व्यंग्य -गड्ढा महिमा दूसरों की राह में गड्ढे खोदना इंसान की पुरानी फितरत है। कुछ लोगों का खाना गड्ढे खोदने पर ही पचता है। आजकल तो हर राह...

 

व्यंग्य -गड्ढा महिमा


दूसरों की राह में गड्ढे खोदना इंसान की पुरानी फितरत है। कुछ लोगों का खाना गड्ढे खोदने पर ही पचता है। आजकल तो हर राह गड्ढों से सजी होती है। कभी सरकार खुदवाती है ,कभी हम लोग खोदते हैं। इन दिनों राजनीति हो या शासन -प्रशासन। अपनों के लिए एडवांस गड्ढे खोदने का प्रचलन बढ़ा है। अतः गड्ढे खोदना हमारी सभ्यता का एक दौर है। मिली भगत से खोदे गए गड्ढे ज्यादा लाभदायक होते हैं। खोद लो जितना चाहो उतना। देश के सर से पाँव तक। जैसा चाहो वैसा। सरकार भी मेहरबान होती है। ऐसे क्रियाकलापों के लिए। अपनों को चांस देती है। खोद लो जब तक हम हैं। खनिज खोदो या गड़े मुर्दे उखाड़ो। राजनीति साथ है। गांव के पण्डे को गड्ढा खोदना लाभदायी रहा। प्राचीनकालीन देवी मूर्ति हाथ लगी। स्वर्ण धातु का घड़ा। पंडे ने दोनों हाथों से चाँदी काटी। देवी मूर्ति के सम्बन्ध में प्रचार किया कि उसे उसने स्वप्न में बताया कि अगर वह उसे मंदिर में स्थापित करेगा तो जग का कल्याण होगा। सो वह अब मंदिर में स्थापित कर अपनी पंडागीरी का धंधा चला रहा है।

वैसे सरकार धरती में जल स्तर बढ़ने के लिए गांव की सीमा में या जंगल किनारे गड्ढे खुदवाती है। ताकि इनमें जल भरे और पृथ्वी का जल स्तर बढे।

बाद में ये गड्ढे गांव के लुकछिप कर मिलाने वाले प्रेमी प्रेमिकाओं के काम आते हैं। सच कहें तो ये गड्ढे प्रेमालय का काम करते हैं।

आलिंगन। स्पर्श। वादे। सपने। सब कुछ स्वतंत्र रूप से इन गड्ढों में संपन्न होते हैं।

पिछले दिनों विपक्षियों ने सरकार को औंधे मुंह गिराने के षडयंत्र गड्ढे में रचे थे। वह तो सरकार की जासूसी संस्था थी,जिसने गड्ढों का पता लगा लिया। वरना …।

कुछ लोग गड्ढे का शक्ल देख कर उसकी औकात पहचानने में माहिर होते हैं। चाँद का चेहरा हो या हसीना का। वे बड़ी खूबसूरती से उसकीखूबसुरति का ग्राफ़ खींच लेते हैं।

खासकर प्रेम क्षेत्र के कवि गण। एक कवि ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर उगे गड्ढों पर इतनी सुन्दर कविता लिख मारी कि अगर चाँद को पढ़ना आता तो वह भी शरमा जाता। सोचता काश!ऐसे गड्ढे उसके चेहरे पर होते तो कितना अच्छा होता। व्यंग्यकारों की बात ही अलग है। वे तो निंदा रस के अलावा कुछ और उगलते ही नहीं।

विभाग या पौधरोपण करने वाली संस्था के लिए गड्ढे उतने महत्वपूर्ण होते हैं जैसे राशन दुकान के सेल्स मैन के लिए पिछला दरवाजा। गड्ढों की छाती पर पौधे रोपित किये जाते हैं। चंद महीने में वे ईश्वर को प्यारे हो जाते हैं। बाद में गड्ढे आंकड़े की लहलहाती फसल को बचाते हैं। इन गड्ढों के आधार पर तो पर्यावरण प्रगति की वार्षिक रपट तैयार होती है। हम खुश हाल होते हैं। पर्यावरण के मामलों में।

अगर सड़कों में गड्ढे न होते तो पीडब्लूडी का औचित्य न रह जाता। पेंच लगाना उसका महत्वपूर्ण कर्म है। साल भर होते हैं गड्ढे। साल भर मिट्टी का पेंच। सच कहें तो पीडब्लूडी के कर्मचारियों के पेट व पेट की जेब के गड्ढे में सड़क के गड्ढों का बहुत योगदान होता है। हमें तो कभी -कभी जनता की ह� �कत पर दुःख होता है ,जब वह गड्ढों को लेकर गालियां देती है। शासन - प्रशासन को ताने देती है। अखबारबाजी करवाती है।

अगर गड्ढे न होते तो क्या सरकार गड्ढों के नाम पर खर्च की जाने वाली राशि का बजट बनाती ?देश का बजट ही तो देश की तरक्की को दर्शाता है तो फिर काहे उल्टी सीधी बातें करना। ऐसे थोड़े ही न होता है यार।

000000000000000

 

व्यंग्य -बैंड बजा दो भैया

इधर शादी का मौसम आया। बैंड पार्टी वालो की चाँदी बन आई है। बड़े उल्टे -सीधे रेट बैंड बजाने के। मुंह माँगे दाम पर भी एक शंका। कहीं नहीं ही तो न कह दें-'भैया पहले बुकिंग करनी थी जब द्वार पे बारात आ खड़ी हुई। तब कह रहें हैं। बैंड बजा दो। ''.बस इत्ता ही कहना है उन्हें। फिर आप कहना ही पड़ेगा -भाई जी ,जो चाही रेट लगा दो। मगर बजा दो। '' बजवाना ही पड़ता है साब। ऐन ख़ुशी के मौके पर। बैंड न बजे तो काहे की ख़ुशी। काहे का उल्लास। उत्साह। दिखावा। आधुनिकता।

दिखावा व तारीफ़ भी कुछ ऐसी साब।फलां बैंड वाले को तय किया है साब। शहर की नामी बैंड पार्टी। क्या बैंड बजाता है साब। जोरदार। सुनकर हाथ पाँव थिरकने लगे। आधुनिक संगीत। बड़े मुश्किल से हमारे लिए वक्त निकाला है । वो तो हमने दो महीने पहले से कह रखी थी.'दादा ,हमाव लड़का की शा दी में तुम्हई को बैंड बजना चाहिए। तब जाकर हमाई बात मानी। थोड़ी बहुत न -नुकुर करी थी। हमने भी रेट की परवाह नई करी तो वे भी खुश होकर बोले ,-यादव जी तुम भी चिंता न करो। दुनियाँ को काम छोड़ देंगे ,मगर आपको नई। ' का करें बैंड बजवाना है तो तेल तो लगाना पड़ेगा। दूल्हा को बाद में तेल लगे तो चलेगा। मगर इन्हें पहले।

शादी का सीजन है साब। बैंड पार्टी के भाव आसमान पर तो रहेंगे ही। सीजन का महत्व है। जैसे सब्जी के अभाव में सड़ी सब्जी को भी भाव मिल जाता है। कुछ इसी तरह नामी - बेनामी बैंड पार्टी के भाव बढे हैं। ''नई दादा हमने जो कही उत्ते में ही हम बैंड बजायेंगे। और सुनो भैया ,टाइम फिक्स रहेगा। घंटा भर ज्यादा हुए तो एक्स्ट्रा चार्ज देने पड़ेंगे। इत्ते से इत्ते बजे तक मायने इत्ते बजे तक। ''

खुशी का दौर है। महँगाई तो जिंदगी का बैंड बजा ही रही है। वैसे भी जिन्दगी फटे ढोलक की तरह होकर रह गयी है। आह कर सकते न उफ़ ! झूठी खुशी का मुखौटा तो चेहरे पर लगाना पड़ता है। उत्साही दिखने के लिए।

एक वो दौर था साब। जब किसी भी जश्न में शहनाइयां की धुन गूंजा करती थी। नगाड़े व ढोलक की थाप पर कदम थिरकते थे। चूड़ियों की खनक तरह मंजीरे की धुन कर्णप्रिय होती थी। आधुनिक बैंड की धुन की तरह कलेजा हिलता था न दिमाग को धुन का भार धोना पड़ता था। दिन -दिन भर बजते रह ते थे वाद्य यन्त्र। मन को सुकून मिलता था।

पहले हमारे कस्बे में दो बैंड पार्टियाँ हुआ करती थी। मगर आज ?खरपतवार की तरह दर्जनों उग आई हैं। न सुर ,न संगीत जो मन को भाये। धूम -धड़ाका दिमाग को हिलाने वाला।

भाई साब ,समाज में रहना है तो जश्न में बैंड बजवाना तो पड़ेगा। हँसकर गाकर ,मुंह फुलाकर या फिर आँसू बहाकर। वैसे बैंड के कई मायने हैं मसलन महँगाई ,मर्ज ,तनाव और भागम भाग जिन्दगीं। कितने ही पुरातन पंथी बन जाएँ इनसे कब तक बचेंगे आप।

0000000000000000

 

व्यंग्य -आन्दोलन चालू आहे …….

इन दिनों देश में हलचल बढ़ी है। जगह `-जगह हड़तालें अनशन आन्दोलन तोड़फोड़ आदि चल रहें हैं। माहौल से वाकिफ होने के बाद लगा कि जागरूक हो चला है।अन्याय के खिलाफ। देश की सरकारें भले ही खुद को जागरूकता लाने का प्रयास कर रही है। पर वे ए .सी कक्ष में बैठी ब ाहर के माहौल से वाकिफ कहाँ है की धूप प्यास तपती जमीन पर व पानी के बीच खड़ा आदमी राजनैतिक पीड़ा व उपेक्षा से हताश होकर स्वयं कितना जागरूक हो चुका है।

अभी हाल ही में भ्रष्टाचार का आन्दोलन गतिमान हुआ। वह जन जागरूकता का प्रतीक है। मगर सरकारें की सोच यह है जागरूकता नही बल्कि बिचौलिए दिमाग का प्रतीक है।

सरकारें चाहती है कि आम आदमी को मालूम होना चाहिए भ्रष्टाचार क्यों किया जाता है। यह देश हित में कितना जरूरी है? ''भाई हम लोग विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ रहे है महाशक्ति लगभग बन है। ऐसे में आम लोगों के खर्च व सुविधाओं की जरूरत तो बढ़ेंगी। वह कहाँ से पूरी हो ? सरकारी खजाने की इतनी कुव्वत नही है कि वह खुले हाथों से सबको धन कहाँ से प्राप्त करे ?

अनशन ,आन्दोलन आदि होने पर ऐसा लगता है मानो आसपास दुर्गोत्सव व गणेशोत्सव आ गया है। चहल -पहल हो हल्ला होने से बोरियत कम होती है। ऐसे वक्त पर फुरसतिया नेताओं की भूमिका बढ़ जाती है। यार यह क्यों नहीं सोचते कि सबके पास अपने -अपने उल्लू है जो शाख पर बिठा कर रखते है

अपने देश में व्यावसायिक आन्दोलनकारियों की कमी नहीं है। इनकी खोपड़ी में ''जागरूकता ''का प्रतिशत ........बुक ऑफ़ रिकार्ड में दर्ज गणितज्ञ से कही ज्यादा होता है। अगर इन्हें धोखे से गंगा जल में एकाध कीड़े दिख जाये तो इनका आन्दोलन वही उग्र रूप ले लेता है। कहते हैं -''गंगा जल में कीटाणु नहीं पल सकते तो फिर ये मोटे ताजे कीड़े -मकोड़े क्यों पल रहें हैं ? गंगा सफाई के नाम पर भ्रष्टाचार हुआ है ,.ताकि कीड़े पलते रहें और सफाई का कार्य चलता रहे। और कमीशन हाथ लगता रहे।

वैसे आन्दोलन ने देश को नई दिशा दी है। गाँधी जी ने अपने आंदोलन के जरिये देश को स्वतंत्र कराया ,अन्ना जी भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र बनाने की राह पर है। देश के राजनैतिक आन्दोलन के जरिये अपनी राजनीति को सुरक्षित रखे हुए हैं।

पिछले दिनों एक रोचक समाचार सुनने में आया। जिस शहर में महिलाओं ने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ आन्दोलन किया था। महीने भर के अन्दर में उसी शहर में कन्या भ्रूण के गर्भपात के मामले सर्वाधिक आए थे।

आन्दोलन के हर दिल पर इस तरह राज हो चला है कि सडक पर पड़ी अज्ञात लाश को ठिकाने लगाने के नाम पर लोग अपनी जेब खोल देते है। कई मामलों में आन्दोलन एक व्यवसाय भी है इसलिए बेरोजगारों चिन्तित न होओ। बस अपनी दृष्टि सूक्ष्म रखो। इस तरह कि मुरदे के शरीर से भी सोना `चांदी खंगाला जा सके।

आन्दोलन का संस्करण भी आजकल अख़बारों के संस्करण की तरह बदल रहें हैं। संस्करण जितना खासमखास होगा। चंदा भी वैसा वसूल होगा।

वैसे भी हर व्यक्ति आजकल आन्दोलन की राह पर खड़ा है। जिन्दगी स्वयं एक आन्दोलन बन कर रह गयी है। उथल -पुथल चिंताओं से भरी सांसे ,तनाव ग्रस्त सोच इंसान को आन्दोलन का पुतला बनाकर रख दी है।

आन्दोलन का स्वरों में आयी गिरावट का रूप यह भी रहा कि फैशनेबुल लोग अर्धनग्न फैशन को बढ़ावा देने के लिए नारेबाजी करते नजर आते है।

आन्दोलन की आजादी हमारे लोकतंत्र की आधुनिक परिभाषा है। इसे किसी न किसी रूप में जीवित रहना आवश्यक है तभी न पीड़ितों के स्वर सरकारी कान तक पहुचेंगें ……। वरना।

00000000

व्यंग्य -रामयुग के साइड इफेक्ट्स

आजकल वह संतो सज्जनों के घेरे में आ गया है। संत तो संत ,बुढ़ापे के असर से ज्ञान की बातें करने वालों के घेरे में भी जो बुढ़ापा बिताने के लिए धार्मिक ग्रंथों व सामाजिक पाठों का अध्धयन करते हैं। यह अलग बात बुढ़ापे में ज्ञानी बने जो लोग जवानी में बदमाश थे। पर बुढ़ापे में बदमाशी कहाँ चलती है। सो वे ज्ञानी बन गये। आज वे हर किसी को अपने अनुभवों को जोड़ कर सदाचार की शिक्षा देते है। लोभ त्यागो। ब्रम्हचर्य पालन करो। सत्य अहिंसा को अपनाओ। और न जाने क्या -क्या।

वह ऐसे ही कुचक्र के घेरे में है। कुचक्र इसलिए कहा क्योंकि उसमे राजनीति का जोश उबल रहा है उसकी हर बात में राजनीति होती है। वक्त अनुसार राजनीति भी करता है। उसे मालूम है सदाचार राजनीति के जहर की पुड़िया है। राजनीति कदाचार से चलती है। फिर भी पागलपन अपनाए है।

उसे धर्म ज्ञानियों के बीच फंसे होने पर मैंने कहा -क्यों रज्जु ,तुम राजनीति करना चाहते हो न। '' ''वो तो मैं करता हूँ। ''उसने कहा

''इस संत पुजारियों के ज्ञान पंजों में कहाँ फंस गये।

''मैंने कहा।

''दादा ,मैं धर्म को भी मानता हूँ। सो इनकी संगत जरूरी है। ''

''जानता है राजनीति का असली धर्म ये नहीं होता। जिधर वोट बैंक पक्का दिखा राजनीतिक उसी जाति धर्म का अनुयायी हो जाता है चुनाव में। अगर तुम करते हो तो ठीक है। पर इनके ज्ञान को अपने कर्म क्षेत्र में उतारने की बात भी करते हो क्या... ?''मैंने कहा।

''तो क्या हुआ। ''उसने कहा।

''तुम राजनीति करते हो न। ''

''सो तो करता हूँ। ''

''राजनीति मैं सदाचार ,अपने पर अपने हाथों को काटना चाहते हो। ''

''ऐसा नहीं है। मैं राजनीति में भी सदाचार लाना चाहता हूँ। ''

''किस जमाने की बात कर रहे हो। देखो शेखचिल्ली न बनो। यहाँ सदाचारियों के कई काम उलटे चलते है। यानि मुंह में राम बगल में छुरी। ''

''दादा ,आप कुछ भी कहो मैं सदाचार के दम पर लोगों का दिल जीतूंगा ''

''तुम भी कहीं उन ढोंगियों की तरह रामराज्य लाने का सपना तो नहीं देख रहे। ''

''आप जो भी समझे। पर अपन सदाचार के पुजारी बनना चाहते हैं.''

''घाघ लोगों का इतिहास देखा। वे राम की बात कर रावण को नमस्कार करते है। इस युग में राम केवल चंदा बटोरने का आधार है। जनता को फुसलाने का तरीका है। ताकि चुनाव में उनकी पार्टी का झंडा लहराये। और एक तुम मूर्ख सदाचार का जाप कर रहे हो। ''

''दादा ,कुछ करने से बदलाव आता है। ''

''तुम राजनीति में सदाचार लाने का जोश लेकर बैठे हो। देखो ,गर्दन भी काट कर रख दोगे न ,तब भी राजनीति का कलेजा अपना चरित्र न बदलेगा। इसलिए रामराज्य का सपना देखना छोड़ दो। '' .

''नही दादा।''वह अड़ गया। मैंने उसे समझाने का प्रयास किया -देख रज्जू ,इस देश की जनता ''रावण युग ''की आदी हो चुकी है। उसके हर काम रावण चरित्र के तरीके से सुलझते है। वह रामराज्य की इमानदार व्यवस्था को बरदाश्त नहीं कर सकती। वह हर काम में सरलता चाहती है। कानून,नियम न्याय का घुमावदार पथ लांघना उसे पसंद नहीं है। वह चाहती है। बेईमानी चाहे जितनी करनी पड़े या सहना पड़े। पर वह पहाड़ जैसी मुश्किल को भी कदमों से लांघना चाहती है। और जब तुम उन्हें रामराज्य की व्यवस्था समझाओगे। लोग हंसेंगे। तुम पर। जनता राजनीति में राम के महत्व को जानती है। इसलिए फालतू का चक्कर छोड़कर वक्त के रावण युग की चर्चा करो और इस युग में खुद भी बदलो। '' वह इन दिनों गम्भीर है। वह राम व रावण चरित्र के पाटों के बीच खुद को फंसा महसूस कर रहा है। सोच नहीं सक रहा है कि क्या करे। लोग उसे समझा रहे हैं। तरह -तरह से। जो रावण युग का महत्व समझते हैं रामयुग के साइड इफेक्ट्स को जानते है। देखिये आगे रज्जू क्या करता है ? ....

00000000000000

 

व्यंग्य -भ्रष्टाचार का बीज -- -

-ब्लाक के कृषिविभाग की बात है दफ्तर में छोटे साहब वर्मा जी कहाते हैं। तपा जी बड़े साहब। दोनों कक्ष में बैठे है। चर्चा होनी है। सो वे आज एक साथ बैठे है। दोनों का एक साथ बैठकर चर्चा करना ही चर्चा का विषय होता है। जरूर कोई गडबड करने की सम्भावना रहती है। ऐसी बात नहीं है कि दोनों चर्चा करते हुए लड़ पड़ेंगे। बल्कि भ्रष्टाचार की कोई नई स्कीमों की पृष्ठभूमि तैयार करने हेतु चर्चा होती है। वैसे भी दोनों अधिकारी है गडबडी करना उनका स्वभाव है। अफसर गडबडी किए बगैर अफसर नही कहा सकता। ऐसा उनका विचार है। साब ,दोनों कक्ष में है। कोई और नहीं है। है अगर तो सारी निर्जीव चीजें। जिनका चर्चा से कुछ लेना देना नहीं है। बाबु,ग्रामसेवक जैसे छोटे पद के लोग अलग कक्ष में मौजूद हैं। अपने अप ने काम में व्यस्त है। वे जाते हैं ,साहब लोग जो भी काला - पीला करने की सोचेंगे। मोहरे हम ही होंगे। वे निर्देश देंगे चाल हमें चलना है। जनता के बीच चर्चा चल रही है। गंभीर हैं दोनों। मनो दो देश के नेता सीमा विवाद पर चर्चा करते हुए होते हैं। ''यार ,वर्मा ,अच्छी बाढ़ आयी इस वर्ष। सब फसल चौपट हो गयी। ''-बड़े साहब बोले। ''साब ,लेकिन बेचारे किसान तबाह हो गये। '' ''होने दो वे जब भी तबाह होते हैं। उनके हित की योजनायें अपने को आबाद करती हैं। '' '''वे तो मर गए सर। दुबारा फसल बोने के लिए उन्हें पुन: बीज चाहिए कुछ करना होगा अपने को। ''तुम ठीक कहते हो। यह बाढ़ लक्ष्मी दायनी साबित होगी अपने लिए। ''बड़े साहब का ख़ुशी भरा कथन। ''वो कैसे साब। '' वर्मा जी वैसे भी भोले टाइप इंसान हैं। वे अक्सर ऐसे ही सवाल करते हैं। जो पिछला बीज बचा है। उसे रजिस्टरों में वितरण दिखाकर बेच दो। अवितरण का जो प्रूफ है उसे बाढ़ बहा ले गयी। अपन तो बस कमा ई देखें। हाँ ! तो बेच दो बीज को। ''

''किसे किसानों को ?''

''अरे यार ,किसानों को बेचकर अपनी ऐसी तैसी करवाओगे। सालों  हो हल्ला मचा दिया तो। वैसे भी अपन उन्हें उल्लू बनाते आयें हैं। राजनीति गर्म हो जाएगी। ये किसान बड़े बदमाश होते हैं सब कुछ मुफ्त में बटोरना चाहते हैं सरकार से। और बाद में फसल ऊँचे दामों में बेचते हैं। इनको सबक सिखाने की सोच रहे हैं हम तो हरामी `कर्जा लें और बाजार से बीज खरीदें। ''साहब थोडा कडक मतलब सख्त स्वभाव के आदमी हैं।

'किसे बेंचे ?''छोटे साहब मासूमियत भरा सवाल पूछा।''

'' यार जरा बुद्धि लड़ाओ अफसर हो। बैल गाड़ी छाप किसान की बुद्धि से न सोचो। बस माल लादा और चल दिए बाजार को। '' छोटे साब अपने बुद्धि का केलकुलेटर खटखटाने में लगे थे। पर हर बार हल शून्य पर आ टिकता। अब आप ही बताइए किसके पास ठिकाने लगायें '' यार वर्मा तुम अफसर जरूर मगर अफसरी के गुण नहीं हैं तुममें। भ्रष्टाचार के सूत्र सीखो। कब कहाँ कैसे चाल चलनी है। कल हमारे पास एक बीज दलाल आया था। वह पूरा माल खरीदना चाहता है। खुद में न भ्रष्टाचार का रौब हो तो सूत्र बताने वाले खुद ब खुद चले आते हैं। वह दलाल हमारे मॉल को अपने पैकिंग में बेचना चाहता है। अपने को तो कमीशन मिलेगा सीधे में। ''

'' फर्जी हस्ताक्षर वह भी इतने नामों के ?''

' तुम्हारे पास दो हाथ दो पाँव और अंगुलियाँ हैं। जितने चाहो उतने हस्ताक्षर बनवा लो। '' अफसरी रौब में साहब बोले। ''इस देश में यही कुछ चल रहा है। ''छोटे साहब कुछ गम्भीर हुए तो वे पुन: बोले -''वर्मा ज्यादा न सोचो। रिकार्ड दुरुस्त रखो। कोई माई का लाल नहीं जो अपना कुछ बिगाड़ले बाकी सब अपन देख लेंगे। छोटे साहब कहीं कहीं समझदारी भी दिखाते है। वे बड़े साहब से बहस नहीं करते।

000000000

 

लघु व्यंग्य - किताब

`` वे मेरे कहने पर मुझसे एक संत जी की जीवन पर आधारित किताब पढ़ने को ले गए।

वे जब किताब लौटने मेरे घर पहुंचे तो उनसे पूछा -''कैसी लगी किताब ?अच्छे लगे संत के विचार। ''

-

''मजा नहीं यार। कोई गरमागरम वाली किताब हो तो दो। धर्म -अध्यात्म तो बूढ़ों को ही अच्छा लगता है अपन तो अभी यार उम्र में संतों की वाणी भला पच सकेगी कि जब जवानी.....।

वे किताब के बारे में बताते हुए ऊब महसूस कर थे।

------------------------------

लघु व्यंग्य -ऊब - -

''''तुम्हें वेश्यावृति के धंधे से जुड़े कितने साल हो गए ?'''

-- ''पूरे पांच साल। '''

---''फिर भी तुम्हें इस घृणित कार्य से ऊब नहीं आई ?''

`--''जिससे पेट का जुगाड़ चले ,उससे किसी को ऊब आती है भला ?'' ----- --------------------

लघु व्यंग्य -आधुनिक रक्षक

मोहल्ले में एक लड़की को किसी बाहरी युवक ने छेद दिया। पास खड़े लड़कों से रहा न गया। वे उस पर टूट पड़े। जम कर मरम्मत कर डाली उसकी। उन्ही लड़कों में गुंडा टाइप दिखने वाला उस पर अपना गुस्सा उतरते हुए कहा -अबे स्साले तेरी हिम्मत कैसे हुई उससे छेड़छाड़ करने की , घर में बहिन -बेटी नहीं है क्या ?तुझे मालूम होना चाहिए कि कोई उस पर नजर उठाकर नहीं देख सकता सिवाय,मेरे। '' - --- ---------------------------- ल घु व्यंग -जात

नगर के चौराहे व सडकों पर पुलिस की गश्त बढ़ गयी थी। पुलिस वाले पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्य पर डटे थे। मैंने इसका कारण जानने के उद्देश्य से अपने पुलिस मित्र से पूछा -''क्यों भाई क्या बात है आज तो आप लोग अपने कर्तव्य के प्रति ज्यादा सजग नजर आ रहे हैं। कोई नया आदेश मिल गया क्या ?''

'''आदेश -वादेश कुछ नहीं …. यार दरअसल आज उपमहानिरीक्षक साब दौरे पर आ रहे हैं। बस उसी का टंटा है। ' फिर वे कुछ रूककर निराश स्वर में बोले -''क्या बतायें यार सुबह से भूखे -प्यासे खड़े हैं। ये अफसर लोग भाकोश कर दौरे करते हैं। हम छोटे लोग इनकी सेवा में पापड़ बेलते रहते हैं ,,,,,,,,,,,,,,,बड़ी भूख लगी है यार…………. चल नाश्ता -वाश्ता करा दे। '' मेरे द्वारा टालमटोल करने पर वह न माना जबरन मुझे लेकर होटल की ओर बढ़ गया। मैं मन ही मन कुढ़ कर रह गया -''आखिर दिखा दिया न अपनी जात। स्साले ठहरे पुलिस वाले दूसरों की जेब तो नोचेंगे ही। ''

-------------------------------------------------------------------

लघु कथा -बैचैनी …………

वह ट्रेनिंग से लौटकर दो माह बाद घर जा रहा था। बस में बैठा विचार मग्न था -काश बस जल्दी पहुँचाती तो रजनी को एक झलक देख लेता। ढेर सारा सामान उसे देता। वह कितनी खुश होती। इसी बीच गाड़ी का टायर पंक्चर हो गया। अचानक उसके मुख से निकल पड़ा -''धत तेरी की .. अभी ही गाड़� � को पंक्चर होना था ... साली ये आजकल की सरकारी बसें ... ।''

''क्या बात है बेटा .. काफी परेशान नजर आ रहे हो …। क्या घर में किसी की तबियत ख़राब है। ''सीट में बगल बैठे बूढ़े से व्यक्ति ने उसके चेहरे पर छायी परेशानी को भांपते हुए कहा।

'''अरे नहीं दादा .. । ''

''तो इतने परेशान .... । ''

'''अगर आपकी नई -नई शादी हुई होती न तब समझ में आता। ''उसने खीझ भरे स्वर में उस बूढ़े व्यक्ति को जबाब दिया।

..................

लघु व्यंग्य -पेट का ____

मतदान की तिथि करीब आ चुकी थी। एक पार्टी कार्यकर्ता ने पार्टी प्रचार के पर्चे बांट रहे एक व्यक्ति से पूछा - कल हमारी पार्टी के पर्चे बाँट रहे थे और आज दूसरी पार्टी का। यह तो अपनों के साथ विश्वासघात है। '' ''साब ,काम मिला तो हम तीसरी पार्टी का परचा भी बांटेंगें। पार्टी के लफड़े में आप रहिये। यहां तो रोटी चाहिए ,चाहे पार्टी कोई भी हो। ''पास से गुजरते एक व्यक्ति को पर्चा पकड़ाते हुए उसने कहा ----- ----------------------------------- -

लघु व्यंग्य -मतलब कि ….

उनका स्वभाव था हर बात या स्थिति को ऊंटपटांग नजरिये से लेने का। एक दिन उन्होंने मुझे अपनी साली के साथ बाजार में घूमते देख लिया। शाम को मिले तो चुटकी लेते हुए बोले -''यार वाकई खूबसूरत है तुम्हारी साली। ''फिर मुस्कुराते हुए बोले -हाँ क्यों नहीं घूमोगे साथ में लेकर ,,,,,,आखिर साली भी तो आधी घरवा ली। ''साली के प्रति उनका यह मजाक मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने उनके नजरिये पर चोट करते हुए कहा -''वीरन भाई तुम भी तो किसी के साले हो और तुम्हारी दो बहनें अभी कुंवारी हैं। इसका मतलब कि वे भी आपके जीजा की. ..... .| वे ह्तप्रत होकर मेरा मुंह ताक रहे थे। --

लघुकथा -ख़ुशी

चुनाव की घोषणा से वह बहुत खुश हुआ -''अबकी बार मकान की छत पक्की करवा लूँगा। ''

''चुनाव से आपकी छत का क्या सम्बन्ध है। ''मैंने पूछा।

वह कहने लगा -''भाई साब नेता लोग पोस्टर ,बैनर बनवाने मेरे पास ही आते हैं। ''

''आपके पास ?और भी तो पेण्टर हैं यहाँ। 'मैंने उसके बडप्पन पर कटाक्ष करते हुए कहा।

'''आप नहीं समझेंगे। मैं सस्ते में काम करता हूँ। और चमचों को कमीशन भी देता हूँ। आखिर उन बेचारों का भी पेट लगा है। यही तो मौका है कि जब वे अपने नेता से कुछ लेते हैं। वरना उनका लीडर कल जीत हासिल करे इसका क्या भरोसा। ''

और वह खुशी में दो सिगरेट के लिए जेब में हाथ डालने ल गा। इसके पहले मैंने उसे कभी सिगरेट पीते नहीं देखा था। ------------------------------

मित्रों की दुआ ----

तीन चार कर्मचारी दफ्तर के लान पर खड़े बातचीत कर रहे थे। एक ने कहा -''यार कल का मुर्गा बड़ा स्वादिष्ट पका था। कायदे से ऐसा ही पकाना चाहिए। तब तो खाने का मजा है। वरना ………। '

दूसरे ने हाँ में हां मिलायी।

''किस ख़ुशी में पार्टी थी भाई ?'' तीसरे ने जिज्ञासा जताते हुए पूछा।

''अरे वो अपने रेलवे के टिकिट बाबू है न। वे किसी दुर्घटना में बाल बाल बचे थे। अत:  इसे मित्रों की दुआ का प्रतिफल मानकर हमलोगों को भोज पर बुलाया था। ''

मित्र की बातें सुनकर चौथा टिकिट बाबू और मुर्गे के बारे में सोच रहा था ,''वाह क्या जमाना आ गया है खुद तो मरते -मरते बचे ,तो ख़ुशी में भोज दिया पर किसी की जान लेकर।


0000000000000000
सुनील कुमार 'सजल',
द्वारा -सुनील नामदेव
,शीतला वार्ड ,निकट -मंडला -सिवनी रोड ,
बम्हनी बंजर -481771 जिला -मंडला (म .प्र )

 

ईमेल -sunilkusajal@in.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * || * उपन्यास *|| * हास्य-व्यंग्य * || * कविता  *|| * आलेख * || * लोककथा * || * लघुकथा * || * ग़ज़ल  *|| * संस्मरण * || * साहित्य समाचार * || * कला जगत  *|| * पाक कला * || * हास-परिहास * || * नाटक * || * बाल कथा * || * विज्ञान कथा * |* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4080,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,338,ईबुक,193,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3035,कहानी,2271,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,542,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,100,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,29,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,244,लघुकथा,1265,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,19,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,327,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2010,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,712,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,800,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,89,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,209,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: सुनील कुमार 'सजल' के व्यंग्य, लघु व्यंग्य और लघुकथाएँ
सुनील कुमार 'सजल' के व्यंग्य, लघु व्यंग्य और लघुकथाएँ
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2014/06/blog-post_3981.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2014/06/blog-post_3981.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ