बुधवार, 25 जून 2014

स्वप्ना नायर का आलेख -- मोहन राकेश हिन्दी नाटक का नवीन हस्ताक्षर

आलेख

मोहन राकेश

हिन्दी नाटक का नवीन हस्ताक्षर

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स्वप्ना नायर, तमिलनाड़ु के कॉयम्बत्तूर करपगम विश्वविद्यालय में प्रो.(डा.) के.पी.पद्मावती अम्मा के मार्गदर्शन में पी.एच.डी केलिए शोधरत

हिन्दी में नाटक का विकास आधुनिक काल में हुआ था। जिसमें महान साहित्य नायक बाबु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का स्थान सर्वोपरी है। साहित्य में ‘भारतेन्दु युग’ नामक काल को निर्मित हरिश्चन्द्र को हिन्दी नाटक के संस्थापक माना जाता है। ‘नहुष’ उनका पहला नाटक है।

हमारी नाटक परंपरा की ओर दृष्टि डालते समय प्रथम नाटककार के स्थान में रीवा नरेश विश्वनाथ सिंह का नाम आता है। उनका ‘आनन्द रघुनन्दन’ को हिन्दी का पहला मौलिक नाटक माना जाता है। हिन्दी नाटक के इतिहास को कई चरणों में विभाजित किया जा सकता है।

1. भारतेन्दु युगीन नाटक।

2. प्रसाद युगीन नाटक।

3. प्रसादोत्तर बुद्धि प्रधान नाटक।

4. प्रसादोत्तर आधुनिक बोध को निरूपित करने वाले नाटक।

भारतेन्दु युगीन नाटक

भारतेन्दु ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में हिन्दी गद्य का स्वरूप निश्चित करके गद्य में विभिन्न प्रकार के रचनाएँ करने का प्रारंभ किया। वे स्वयं नौ मौलिक नाटक रचे तथा आठ नाटकों के अनुवाद प्रस्तुत किए। उनका प्रसिद्ध नाटक ‘सत्यवादी हरिश्चन्द्र’ है। इस युग के नाटकों का प्रमुख आधार संस्कृत भाषा पर रचित नाटक है। एक और विशेषता यह है कि इस काल में पद्य व्रज भाषा में और गद्य खड़ीबोली में लिखते थे। मालूम होता है कि इस समय के नाटककारों ने कथापात्रों के चरित्र-चित्रण में बड़ी ध्यान नहीं दिया है।

प्रसाद कालीन नाटक

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बीसवीं सदी के आरंभ में मौलिक नाटकों की तुलना में अनूदित नाटकों का भरमार रहा और अनुवाद के स्रोत तीन भाषाओं से रहे, अंग्रेज़ी, बँगला और संस्कृत। यह तर्क रहित बात है कि हिन्दी नाटक का उत्थान महाकवि जयशंकर प्रसाद के साथ आरंभ हुआ। प्रसाद मुख्य रूप में कवि होकर भी नाटक क्षेत्र में भी अपना प्रतिभा दिखाया बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार है। उनका पहला प्रौढ़ नाटक ‘विशाख’ है। इसके बाद अजात शत्रु, स्कन्द गुप्त, चन्द्र गुप्त, राज्य श्री और ध्रुवस्वामिनी आदि लिखे गये। प्रसाद की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने हिन्दी के साहित्यिक नाटक का पुनरुद्धार किया। वे अपने नाटकों के संवाद और चरित्र-चित्रण पर नया रूप और भाव लाया।

प्रसादोत्तर हिन्दी नाटक

लक्ष्मी नारायण मिश्र प्रसादोत्तर नाटक क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध नाटककार है। वे आरंभ में सामाजिक नाटक रचकर साहित्य रंगमंच पर पदार्पण किया। मिश्र के समय का अन्य नाटककारों में उपेन्द्रनाथ अश्क का नाम उल्लेखनीय है। सेठ गोविन्ददास भी इस ज़माने के प्रसिद्ध नाटककारों में एक है। उनके समकालीन नाटक रचयिताओं में मोहन राकेश, लक्ष्मीनारायण लाल, रमेश बख्शी तथा सुरेन्द्र वर्मा के नाम आदर के साथ लिया जाता है। इस समय के नाटकों में प्रेम, सौन्दर्य और कल्पना की जगह समसामयिक यथार्थ ने ली है और आदर्श का चौखटा टूट गया है।

मोहन राकेश

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हिन्दी नाट्य परंपरा के एक सशक्त आवाज़ है मोहन राकेश। वास्तव में राकेश हिन्दी नाटक क्षेत्र का नयी चेहरा है। राकेश कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार और कवि भी है। उनका जन्म 8 जनवरी 1925 में पंजाब के अमृतसर पर हुआ था। उनके बच्चपन का नाम ‘मदन मोहन मुगलानी’ था। वे पंजाब विश्व विद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम. ए. शिक्षा पूरा करके साहित्य पर उतरे। पहले वे अध्यापक का नौकरी करता था। ‘सारिका’ के संपादक के रूप में प्रसिद्ध हुए राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार मिला गया नाटक है। नाटकों के सिवा राकेश ने अंधेरे बंद कमरे, अन्तराल तथा न आनेवाला कल आदि उपन्यास, क्वाटर तथा अन्य कहानियाँ, पहचान तथा अन्य कहानियाँ, वारिस तथा अन्य कहानियाँ, अन्तराल, इन्सान के खंडहर, एक और ज़िन्दगी, जानवर और जानवर जैसे कहानी संग्रह भी लिखे है। ‘आखिरी चट्टान’ तक उनके यात्रा वृत्तांत है। ‘परिवेश’ उनका निबंध संग्रह और ‘मृच्छकटिक’ एवं ‘शाकुंतलम’ अनुवाद है। वे नयी कहानी आन्दोलन के वक्ता रहा था। इस कालजयी नाटककार ने सीमा रेखाओं को पार करके हिन्दी नाटक को देश-विदेश तक की व्याप्ति दे दिया। 3 जनवरी 1972 दिल्ली में राकेश का निधन हुआ। नाट्य साहित्य न केवल अपनी विकास-यात्रा में वैविध्य पूर्ण रहा है, अपितु विकास के विभिन्न चरणों में प्रयोग से प्रगति, प्रगति से नव लेखन तक फैलता चला गया है। यही कारण है कि हिन्दी नाटक की विकास यात्रा के केन्द्र में प्रसाद स्थित है तो छठे दशक में मोहन राकेश।

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मोहन राकेश हिन्दी नाटक रास्ता के एक ज्वलित दीपस्तंभ है। ‘नाटककार और रंगमंच’ नामक लेख में राकेश अपना मनोभाव व्यक्त करता है- ‘‘रंगमंच की पूरी प्रयोग-प्रक्रिया में नाटककार केवल अभ्यागत, सम्मानित दर्शक या बाहर की इकाई बना रहे, यह स्थिति मुझे स्वीकार्य नहीं लगती। न ही यह कि नाटककार की प्रयोगशीलता उसकी अपनी अलग चार दीवारी तक सीमित रहे और क्रियात्मक रंगमंच की प्रयोगशीलता उससे दूर अपनी अलग चारदीवारी तक। इन दोनों को एक धरातल पर लाने के लिए अपेक्षित है कि नाटककार पूरी रंग-प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग बन सके। साथ यह भी कि वह उस प्रक्रिया को अपनी प्रयोगशीलता के ही अगले चरण के रूप में देख सके।’’ उन्हें नाटक संबन्धी विषय पर अपनी आदर्श और निष्ठा है।

राकेश का स्थान

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटक में मोहन राकेश को महत्व पूर्ण स्थान होता है। राकेश ने नाट्य-लेखन के साथ साथ नये ढंग में रंग चेतना का विकास भी किया और नाट्य समीक्षा में यह बात अहम् हो उठी कि नाटक की आलोचना पाठ्य साहित्य के प्रतिमानों की भूमिका पर उतना उचित नहीं है। मोहन राकेश मानते है कि लिखित नाटक मंचीय प्रस्तुतीकरण में नया जन्म लेता है और एक ही नाटक प्रस्तुतीकरण की भिन्नता के कारण भिन्न रूप धारण कर लेता है। उनके अनुसार नाट्य साहित्य का महत्व दूसरा है। वह है एक स्तर पर वह लिखित रचना के रूप में साहित्यिक सौन्दर्य से वलयित है और दूसरे स्तर पर वह मंचीय गुणों के कारण प्रभावी है तथा जन मानस में धर किये हुए है। उनके नाटकों में ये दोनों पक्ष प्रबल है। मोहन राकेश के नाटक संवेदना, चरित्र-सृष्टि, आधुनिकता एवं शिल्प के नये प्रतिमान को प्रस्तुत करते है। उन्होंने पूरी सफलता के साथ आधुनिक मानव और उनके संबंधों को अपने नाटकों में निरूपित किया है।

मोहन राकेश के नाटकों में आषाढ़ का एक दिन, लहरों का राजहंस और आधे-अधूरे तथा उनके अवसानोपरांत कमलेश्वर द्वारा पूरा किया ‘पैर तले की ज़मीन’ आदि सभी नाटक आधुनिक बोध के वाहक है। आषाढ़ का एक दिन का प्रकाशन 1958 में हुआ था। इसे आधुनिक हिन्दी नाटक के प्रवाह धारा का प्रथम नाटक माना जाता है। यह नाटक ऐतिहासिक clip_image010

पृष्ठभूमि पर रचित होकर भी आधुनिक लगता है। रंगमंच प्रस्तुतीकरण उनके नाटकों के शीर्षस्थ गुण है। उनकी नाट्य-भाषा निरन्तर साहित्यिकता अथवा काव्यात्मता से बोलचाल के मुहावरे में ढलती गयी है। उसमें पर्याप्त नाटकीयता एवं जीवनी शक्ति है। इतना ही नहीं, राकेश ने कथा तत्व, चरित्रांकन, वस्तु-विन्यास, अभिनेता और शिल्प को पूर्णता देने में या कहें कि उसे व्यवहारिक और स्वाभाविक बनाने में पर्याप्त श्रम किया है। नाट्य-लेखन के क्षेत्र में राकेश की परिकल्पनाएँ यथार्थ से पुष्ट, समकालीन जीवन की त्रासदी से संस्पर्शित और अस्तित्ववादी चेतना से वलयित है तो उनका शिल्प अकृत्रिम और जीवंत अवश्य है।

आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे नाटकों में मोहन राकेश ने यथार्थ परिवेश को प्रस्तुत किया है। आषाढ़ का एक दिन में उन्होंने कलाकार की सृजनात्मक प्रतिभा की समस्या को लेकर अपने विचारों को प्रस्तुत किया है। वास्तव में मोहन राकेश के चर्चित तीनों नाटक तीन बिन्दुओं से महत्वपूर्ण जीवन स्थितियों के संकेत देते है, प्रेम, विरक्ति और अधूरापन की संकेत। ये तीनों नाटक अपने आप में उपलब्धि है और मोहन राकेश की रचनात्मक प्रतिभा को उजागर करता है। इन तीनों नाटक राकेश के अमरत्व को उज्ज्वल बना देता है।

सहायक ग्रंथः-

1.हिन्दी साहित्य का इतिहास, डा. नगेन्द्र।

2.हिन्दी साहित्य का इतिहास, डा.चातक एवं प्रो.राजकुमार वर्मा।

3.नाटककार और रंगमंच, मोहन राकेश।

(Swappna Nair, Research scholar, under the guidance of Dr.K.P.Padmavathi Amma, Karpagam University,Coimbatore,Tamil Nadu)

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