रविवार, 27 जुलाई 2014

वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - जनम-जनम का साथ है…

व्‍यंग्‍य

जनम-जनम का साथ है

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

लोग बताते है कि इस धरा-धाम पर उसका अवतरण मोबाइल धारण किये हुये ही हुआ था। इसी कारण उसकी सुबह ‘ऊँ मोबाइलाय नमः‘ की जाप से शुरू होती और रात में वह ‘गुडनाइट माय डियर मोबाइल‘ कहने के बाद ही बिस्‍तर पर जाता। कभी मोबाइल के बिगड़ जाने पर वह इतना दुःखी होता है, जितना अपने छोटे बच्‍चे के बीमार हो जाने पर या अपने पिताजी के दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाने पर भी नहीं होता। कभी नेटवर्क प्राब्‍लम के कारण यदि उसकी किसी से बात नहीं हो पाती तो वह पंख कटी मुर्गी की तरह फड़फड़ाने लगता। दिन में व्‍यस्‍त सड़क पर चलते समय उसकी नजर हमेशा रास्‍ते से ज्‍यादा मोबाइल के स्‍क्रीन पर होती है। औेर ऊंगलियां बटनों से अठखेलियाँ करती रहती है। बाइक या चार पहिया चलाते समय उसका यह उत्‍साह कई गुणा बढ़ जाता है। जिन्‍दगी को भगवान भरोसे छोड़कर वह पूरा ध्‍यान हर पल अपने मोबाइल पर देता था। वह पुनर्जन्‍म के सिद्धांत को मानने वाला आदमी है, उसका कहना है कि जिन्‍दगी दोबारा मिल सकती है पर मोबाइल? मोबाइल के नाम पर सिर पर कफन बाँधकर गाड़ी चलाने वाले उस आदमी की वीरता देख लोग दाँतों तले ऊंगलिया दबा लिया करते हैं।

उसकी वीरता देख पुलिस वाले कई बार उसे सम्‍मानित भी करना चाहते थे। पर वह पुलिस वाले के हाथों सम्‍मानित नहीं होना चाहता था। वह उन्‍हें देख ऐसे बिदकता था, जैसे लाल कपड़े को देखकर साँड़। फिर वह अपनी गाड़ी ऐसे दौड़ाता था। जैसे कोई बिना लगाम का घोड़ा। पुलिस वाले हर बार उसे सम्‍मानित करने से चूक जाते और हाथ मलते रह जाते। उस आदमी के हाव-भाव देखकर ऐसा लगता था कि जैसे कोई फकीराना अंदाज में गा रहा हो, ‘मन लागो यार मोबाइल में ‘।

अन्‍ततः उसकी वीरता का समाचार यमलोक तक पहुँच गया। यमराज उसके दर्शन के लिये व्‍याकुल हो गये। उसे स्‍वयं उस बहादुर को सम्‍मानित करने के लिये यहाँ असमय ही प्रकट होना पड़ा। हुआ कुछ यूँ था कि एक दिन वह अपने मोबाइल पर किसी से बात करते हुये फुलस्‍पीड में गाड़ी चला रहा था। बातों में वह इतना मशगूल हो गया था कि उसे आगे-पीछे का कुछ भी ध्‍यान नहीं था। दिख रहा था तो सिर्फ मोबाइल का स्‍क्रीन, जैसे महाभारत में द्रोपदी स्‍वयंबर के समय अर्जुन को सिर्फ मछली की आँख दिखाई दे रही थी। अचानक हवा का एक झोंका आया और उसका प्राणों से प्‍यारा मोबाइल उसके हाथ से छूटकर व्‍यस्‍त सड़क के बीच में जा गिरा। मोबाइल को जरा-सा भी खरोंच ना आ जाये, यह सोचकर उसने तुरन्‍त अपनी बाइक फिल्‍मी हीरो के स्‍टाइल में मोड़ी और मोबाइल को उठाने के लिये झुका। तभी एक ट्रक उसे रौंदते हुये निकल गया।

यमराज बांहे फैलाये कह रहा था कि धन्‍य हैं आप, आपकी वीरता देख मेरी आँखे धन्‍य हो गईं। यह मेरा परम सौभाग्‍य है कि आप मेरे कार्यकाल में स्‍वर्गारोहण कर रहे है। आइये, जल्‍दी चलिये यमलोक में आपके स्‍वागत की तैयारी बड़ी जोर-शोर से चल रही है।

मरकर जिन्‍दगी के कव्‍हरेज क्षेत्र से बाहर हो जाने के बाद भी उसका जीव मोबाइल पर किसी से बात करने की कोशिश कर रहा था। जिसे देख यमराज मुस्‍कुराते हुये बोला-‘‘अरे! अब तो इसे छोडि़ये महाशय, जल्‍दी चलिये देर हो रही है।‘‘ उसने झुंझलाकर यमराज को झिड़कते हुये कहा-‘‘अरे चुप रहो यार, दो मिनट घरवालों से बात तो कर लेने दो। तुम्‍हें जल्‍दी पड़ी है तो जाओ, अपना पता ठिकाना छोड़ दो, मैं आराम से आ जाऊँगा, ओ के। दो मिनट रूक भी नहीं सकते, कहीं भागे थोड़े ही जा रहा हूँ।‘‘ यमराज को अपना-सा मुँह लेकर रह जाना पड़ा और वह अपने मोबाइल में व्‍यस्‍त हो गया।

इधर घटना स्‍थल पर भीड़ बढ़ गई थी। पुलिस के सिपाही, पत्रकार, फोटोग्राफर सब आ गये थे। भीड़ हटाई जा रही थी, फोटो खींचे जा रहे थे। तभी एक सिपाही के मोबाइल का रिंगटोन बजा। उसने कॉल रिसीव करने से पहले मोबाइल का स्‍क्रीन देखा, एक अनजाना और नया नम्‍बर था। उसने कॉल रिसीव करते हुये पुलिसिया अंदाज मे कहा-‘‘कौन है बे?‘‘ जवाब मिला-‘‘साहब मैं बोल रहा हूँ, देख नही रहे हैं? अरे! साहब मैं आपके सामने मरा हुआ पडा हूँ और इधर यमराज के साथ खड़ा हूँ। मैंने तो आपको यह बताने के लिये फोन किया है कि आप उस ट्रक वाले को छोड़ दीजिये, उसकी कोई गलती नहीं है। मैं तो स्‍वयं अपने मोबाइल के साथ सती हुआ हूँ। ट्रक चालक और उसके मालिक को नाहक परेशान ना किया जाय। सर, आपके साथ जो पत्रकार बंधु है कृपा करके उन्‍हें भी मेरा यह संदेश सुना दीजिये ताकि वे जनहित में इसे प्रकाशित कर सके। और हाँ एक बात और, मेरी यह अंतिम इच्‍छा मेरे घरवालों को भी बता दीजिये कि जब मेरी शव यात्रा निकाले तो मेरे दोनों हाथ कफन से बाहर रखे और मेरे एक हाथ में एक लेटेस्‍ट मॉडल का मोबाइल जरूर पकड़ा दें। जिससे लोगों को पता चले कि इस नश्‍वर संसार में आदमी के साथ मोबाइल के सिवा और कुछ भी नहीं जाता। साथ-ही -साथ, समय-समय पर मेरे मोबाइल को यहीं से रिचार्ज भी कराते रहें, पता नही स्‍वर्ग में ये सब सुविधा है या नहीं। ‘‘

ये सब सुनकर सिपाही का दिल धक-धक करने लगा। बड़ी मुश्‍किल से उसने अपने आप को सम्‍हाला। आवश्‍यक कार्यवाही के बाद मृतक के शव को पोस्‍टमार्टम के लिये डॉक्‍टरों को सौप दिया गया। कुछ समय बाद डॉक्‍टर चीरघर में शव का पोस्‍टमार्टम करने लगे।

पोस्‍टमार्टम के दौरान शव के सीने मे कम्‍पन होने लगा। स्‍वीपर शेयर बाजार की तरह उछल पड़ा। स्‍वीपर बोला-‘‘सर! लगता है, आपका मोबाइल बज रहा है। शायद किसी का फोन आया है?‘‘ डाक्‍टर ने उसे डपटते हुये कहा-‘‘बकवास बंद करो, चुपचाप अपना काम करो। मैं अपना मोबाइल घर पर छोड़ आया हूँ और तुम्‍हारा मोबाइल अस्‍पताल में पड़ा है फिर यहाँ किसका मोबाइल बजेगा? शायद तुमने सिपाही की बात सुन रखी है तभी डर के मारे अनाप-शनाप बके जा रहे हो।‘‘ स्‍वीपर चुपचाप काम करने लगा। कुछ समय बाद वहाँ फिर मोबाइल का रिंग-टोन जोर-जोर से बजने लगा। ‘छोड़ेंगे ना हम तेरा साथ वो साथी मरते दम तक, मरते दम नहीं, सात जनम तक, सात जनम नहीं जनम जनम तक।‘

अब तो डॉक्‍टर के भी कान खड़े हो गये। वे सावधानी से मौका मुआयना करने लगे। उसका ब्‍लडप्रेशर पेट्रोल के दाम की तरह बढ़ने लगा। लेकिन उसने हिम्‍मत से काम लेते हुये कहा-‘‘लगता है इसके जेब मे मोबाइल पड़ा है। जेब टटोलकर तो देखो जरा।‘‘ स्‍वीपर ने डरते हुये कहा-‘‘सर, इसके कपड़े तो पहले से ही उतारे जा चुके हैं। जब कपड़े ही नहीं पहने हैं तो जेब कहाँ से होगी।‘‘ डाक्‍टर माथे पर छलक आये पसीने को पोछते हुये कहा-‘‘बात तो तुम सही कह रहे हो पर कम्‍पन तो सीने में ही हो रहा है। जरा सीने का विच्‍छेदन करके तो देखो।‘‘ डॉक्‍टर के इशारे पर सीने का विच्‍छेदन करके देखा गया। तो दोनों यह देखकर दंग रह गये कि शव के हृदय में मोबाइल की मनोहर छवि बसी थी। तस्‍वीर एकदम स्‍पष्‍ट थी। रिंगटोन उसी तस्‍वीर से बज रहा था और कम्‍पन भी वहीं से हो रहा था। दोनों उस महान मोबाइल प्रेमी को मन-ही-मन प्रणाम करते हुये कहने लगे-‘‘अहो भाग्‍य, हमारा जन्‍म सफल हो गया आपके दर्शन लाभ पाकर। धन्‍य हैं हम जो हमें आपके दिल के भीतर झाँकने का सौभाग्‍य मिला, मोबाइल आपकी आत्‍मा को शांति प्रदान करे।‘‘

पोस्‍टमार्टम के पश्‍चात उसके शव को परिजनों को सौंप दिया गया। उसकी अंतिम इच्‍छा का सम्‍मान करते हुये उनके परिजनों ने उसे अंतिम बिदाई देते समय उसके हाथ कफन से बाहर निकाल कर रखे थे और उसके एक हाथ पर मोबाइल भी रखा गया था। परिजन बिलख-बिलख कर रो रहे थे। लेकिन उसके चेहरे पर असीम शांति के भाव थे और होठों पर मधुर मुस्‍कान। ऐसा लग रहा था कि उसकी आत्‍मा मोबाइल में समाहित हो गई हो। तभी उसके मोबाइल का रिंगटोन फिर बजने लगा। जिसमे गाना आ रहा था, ‘जनम-जनम का साथ है हमारा तुम्‍हारा, अगर न मिलते इस जीवन में तो लेते जनम दोबारा ‘।

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वीरेन्‍द्र सरल

बोड़रा

पोष्‍ट-भोथीडीह ,व्‍हाया-मगरलोड़

जिला-धमतरी ,छ ग

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