गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का राष्ट्रीय एकता दिवस - 31 अक्टूबर पर विशेष आलेख - सरदार वल्लभ भाई पटेल

 

अखंड भारत के अजेय शिल्पकार  : सरदार वल्लभ भाई पटेल 

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लौहपुरुष की व्यवहारिक दूरदृष्टि ने बचाया देश का विश्व-वैभव 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

फ्रैंक मोराएस ने लिखा है  कि एक विचारक आपका ध्यान आकर्षित करता है,एक आदर्शवादी आदर का आह्वान करता है, पर कर्मठ व्यक्ति, जिसको बातें कम और काम अधिक करने का श्रेय प्राप्त होता है,लोगों पर छा जाने का आदी होता है, और पटेल एक कर्मठ व्यक्ति थे। शायद यही कारण है कि सरदार पटेल को भारत का बिस्मार्क कहा जाता है लेकिन उनकी सफलताएं उनसे भी बडी है क्योंकि उन्होनें ऐसे माहौल में काम किया जो कि बहुत कठिन थे। उन्होंने छोटी-छोटी रियासतो और जागीरों को, जहां अलग अलग भाषाएं, परंपराएं और धर्म थे, को एक देश के रूप में एकीकृत किया, जहां आज विश्व की 17.5 प्रतिशत आबादी रहती है। स्मरण रहे कि इस विश्व में सबसे बडी जनसंख्या के रूप मे भारत का प्रभाव सरदार पटेल के योगदान के कारण है।

सरदार पटेल ने रियासतों के एकीकरण जैसे असंभव दिखने वाले कार्य को उस समय अंजाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे । अगर सरदार पटेल निरंतर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक दूसरे से लडते रहते। उन्होंने जगह-जगह घूमकर सब राजाओं को एकसाथ जोडकर भारत बनाने के लिए राजी किया, उन्हें सबको इकटठा करने में थोडा समय लगा और उन्हें इसके इसके लिए हिंसा बल का प्रयोग नही करना पड़ा।

आज़ादी की रक्षा की दीवानगी

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आजादी के बाद भारत को एक अखंड स्वरूप देने में लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल के योगदान को भुलाया नही जा सकता और माना जाता है कि उनके जैसे धैर्यवान और दूरदर्शी नेतृत्व के कारण ही छोटी छोटी रियासतों में बंटे भारत को एकजुट किया जा सका था। एक अनुशासित व्यक्तित्व के स्वामी सरदार पटेल ने वीपी मेनन समेत कई सहयोगियों की मदद से 500 से भी ज्यादा रियासतों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए मना लिया था। इनमें से अधिकांश रियासतों ने आजादी की पूर्व संध्या से पहले ही  भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस ऐतिहासिक एकीकरण के चलते ही भारत को आजादी खंडित टुकड़ों के बजाय एक अखंड राष्ट्र के रूप में मिल सकी। आजादी की घोषणा होने के बाद भारत में मौजूद सैंकड़ों छोटी-बड़ी रियासतों को एकसाथ मिलाना सबसे मुश्किल काम था, लेकिन लौह पुरुष ने यह कर दिखाया। 

अंग्रेजियत से इनकार-खादी स्वीकार

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इंग्लैंड से वकालत पढ़कर आए पटेल गुजरात के प्रसिद्ध वकीलों में शुमार थे। गांधी जी के व्यक्तित्व और उनके विचारों से प्रभावित होने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए थे। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने तमाम अंग्रेजीदां कपड़ों को आग के हवाले कर पूरी तरह से खादी अपना ली थी। उनका आजाद भारत का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय था लेकिन पटेल ने गांधी जी के कहने पर प्रधानमंत्री बनने का विचार सोच छोड़ दिया। इस पूरे दौर में ही पटेल और नेहरू के बीच कई मसलों को लेकर मतभेद रहे लेकिन उन्होंने राष्ट्रहित में इन मतभेदों को दरकिनार किया था।

सरदार पटेल भारत के देशभक्तों में एक अमूल्य रत्न थे। वे भारत के राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम में अक्षम शक्ति स्तम्भ थे। आत्म-त्याग, अनवरत सेवा तथा दूसरों को दिव्य-शक्ति की चेतना देने वाला उनका जीवन सदैव प्रकाश-स्तम्भ की अमर ज्योति रहेगा। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। इस मितभाषी, अनुशासनप्रिय और कर्मठ व्यक्ति के कठोर व्यक्तित्व में कौटिल्य जैसी राजनीतिक सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह, असीम शक्ति, मानवीय समस्याओं के प्रति व्यवहारिक दृष्टिकोण से उन्होंने निर्भय होकर नवजात गणराज्य की प्ररम्भिक कठिनाइयों का समाधान अद्भुत सफलता से किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया। 

मनसा-वाचा-कर्मणा देशभक्त

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सरदार पटेल मन, वचन तथा कर्म से एक सच्चे देशभक्त थे। वे वर्ण-भेद तथा वर्ग-भेद के कट्टर विरोघी थे। वे अन्तःकरण से निर्भीक थे। अद्भुत अनुशासन प्रियता, अपूर्व संगठन-शक्ति, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनके चरित्र के अनुकरणीय अलंकरण थे। कर्म उनके जीवन का साधन था। संघर्ष को वे जीवन की व्यस्तता समझते थे। गांधीजी के कुशल नेतृत्व में सरदार पटेल का स्वतन्त्रता आन्दोलन में योगदान उत्कृष्ट एवं महत्त्वपूर्ण रहा है। स्वतन्त्रता उपरान्त अदम्य साहस से उन्होंने देश की विभिन्न रियासतों का विलीनीकरण किया तथा भारतीय प्रशासन की निपुणता तथा स्थायित्व प्रदान किया। 

स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। गुजरात का खेडा खण्ड (डिविजन) उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से भारी कर में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हे कर न देने के लिये प्रेरित किया। अन्त में सरकार झुकी और उस वर्ष करों में राहत दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार और बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा।

संघर्ष को सौभाग्य मानने वाले वीर

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संघर्ष को सरदार पटेल जीवन की व्यस्तता और सौभाग्य समझते थे। किसानों की दयनीय स्थिति से वे कितने दुखी थे इसका वर्णन करते हुए पटेल ने कहा - किसान डरकर दुख उठाए और जालिम का लातें खाये, इससे मुझे शर्म आती है। और मैं सोचता हूँ कि किसानों को गरीब और कमजोर न रहने देकर सीधे खड़े करूँ और ऊँचा सिर करके चलने वाले बना दूँ। इतना करके मरूँगा तो अपना जीवन सफल समझूँगा। 

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा काल में ही उन्होंने एक ऐसे अध्यापक के विरुद्ध आंदोलन खड़ाकर उन्हें सही मार्ग दिखाया जो अपने ही व्यापारिक संस्थान से पुस्तकें क्रय करने के लिए छात्रों के बाध्य करते थे। सरदार पटेल के ऐतिहासिक कार्यों में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण, गांधी स्मारक निधि की स्थापना, कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा आदि कार्य सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे। उनके मन में गोआ को भी भारत में विलय करने की इच्छा कितनी बलवती थी, इसका उद्धहरण ही काफी है। माना जाता है कि यदि लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के प्रधानमंत्री बनते तो कश्मीर भारत के लिए आज समस्या नहीं होता. कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है, वह भी भारत के पास होता.पाक अधिकृत कश्मीर की एक-एक इंच भूमि मुक्त करा ली गई होती। आपकी सेवाओं, दृढ़ता व कार्यक्षमता के कारण ही आपको लौहपुरुष कहा जाता है।

आज भी देश का लगभग आधा भाग सांप्रदायिक एवं विघटनकारी तत्वों की चपेट में फंसा दिखाई देता है, ऐसी संकट की घड़ी में सरदार पटेल की स्मृति हो उठना स्वभाविक है।  देश को एक करने वाला यह लौह पुरुष 15 दिसंबर,1950 को हम सबको अलविदा कह गया। वे वास्तव में भारत की आन-बान-शान के प्रतीक हैं। 

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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी कालेज,

राजनांदगांव, मो.9301054300

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