बुधवार, 12 नवंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - स्वच्छता और शहरी भारत की भीतरी चुनौती

स्वच्छता और शहरी भारत की भीतरी चुनौती

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के भारत का मौजूदा दौर साफ़ सुथरेपन की नई बयार लेकर आया है। लोग साथ आ रहे हैं, कारवाँ बनता जा रहा है। जिन गलियों को मूलतः समस्याग्रस्त बताकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था इनमें भी अब सफाई कर्मियों के अलावा पर्यवेक्षक और उनसे भी ऊपर प्रशासकीय अधिकारियों की निगरानी का मुकम्मल माहौल सा देखा जा रहा है।

बहरहाल ये सब कुछ देखकर अच्छा लगना स्वाभाविक है लेकिन, क्या आप जानते हैं कि सुरक्षित स्वच्छता सुविधाओं के अभाव में रहने वाली बड़ी आबादी के कारण विश्व स्तर पर भारत को सबसे बड़ी स्वच्छता चुनौती के रूप में माना गया है। अनुमान है कि भारत में खुले में शौच की दर विश्व की 60 प्रतिशत है। इस चुनौती का सामना करने के लिए सरकार द्वारा शौचालयों के निर्माण के लिए गरीबों को सब्सिडी प्रदान करने जैसे कुछ केंद्रित प्रयास किए गए हैं। हालांकि इसमें से बहुत कुछ कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ है। परन्तु, विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी गरीबों खासकर छोटे शहरों में स्वच्छता पर काफी ध्यान दिए जाने की ज़रुरत है। शहरी स्वच्छता की चुनौतियाँ कई तरह की हैं और इसकी उपेक्षा करना स्वच्छता के मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन पीछे करने जैसा होगा। 

आंकड़ों और हालात में फासला

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महत्वपूर्ण चुनौतियों पर एक नज़र डालें तो हम पाते हैं कि शहरी स्वच्छता की प्रमुख चुनौती आँकड़ों के मामले में व्यावहारिक रूप से अदृश्यता है। अगर शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता का कवरेज देखा जाए तो (2011 की जनगणना के अनुसार) यह कहा जाता है कि करीब 18 प्रतिशत परिवारों में स्वच्छता की पहुंच नहीं है लेकिन अगर इन आंकड़ों को गहराई से देखें तो यह पाएंगे कि मलिन बस्तियों में (अधिसूचित और गैर अधिसूचित) रहने वाले गरीबों को स्वच्छता की उपलब्धता बहुत कम है। चूंकि, शहरों में मलिन और अवैध बस्तियों की संख्या का कोई सही अनुमान नहीं है, अतः यह संख्या विवादास्पद हो सकती है लेकिन शहरी विकास मंत्रालय का अनुमान है कि गैर अधिसूचित मलिन बस्तियों में 51 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है। तेजी से हो रहा शहरीकरण एक वास्तविकता है और शहरी स्वच्छता की रणनीति वहां विकसित हो रही नई और अवैध बस्तियों से तालमेल रखने में सक्षम नहीं है।

निवेश में असमानता का सवाल

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समझा जा रहा है कि शहरों में अन्य ढाँचागत निवेश की तुलना में स्वच्छता पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त बड़े शहरों में स्वच्छता पर जो भी निवेश किया जा रहा है वह ज्यादातर आबादी के बेहतर वर्गों पर केंद्रित है। अधिकांश निवेश सीवर नेटवर्क के विकास, मल-जल उपचार संयंत्र आदि पर किया जा रहा है। हालांकि इनमें से ज्यादातर कार्य शहरों के उस हिस्से में हो रहा है जहां उन्नत वर्ग रहता है।

बड़े शहरों की तुलना में कस्बों में समग्र निवेश भी बहुत कम होता है। छोटे शहर अल्प मानव संसाधन, कम निवेश और कमजोर शासन तंत्र से त्रस्त हैं। जहां तक स्वच्छता सेवाओं का संबंध है, कस्बों में केवल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का कार्य हो रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार भारत के 8000 कस्बों में से केवल 160 कस्बों में सीवेज सिस्टम और सीवेज उपचार संयंत्र है। इसके अतिरिक्त सीपीसीबी का अध्ययन दावा करता है कि यहां केवल 13 प्रतिशत सीवेज का उपचार किया जाता है। यह भी कहा गया है कि उपचार की सुविधा असमान रूप से 40 प्रतिशत क्षमता के साथ केवल दो बड़े शहरों में दिल्ली और मुंबई में ही उपलब्ध है।

सामुदायिक शौचालय की स्थिति

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शहरों में नगर निकायों द्वारा किए गए प्रयासों और कुछ जगहों पर पीपीपी मॉडल के माध्यम से झुग्गी बस्ती निवासियों के लिए बस्ती में ही स्वच्छता के समाधान के रूप में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण किया गया है। हालांकि, जेएमपी अनुसार साझा शौचालय बेहतर विकल्प नहीं माना जाता है फिर भी ऐसी बस्तियों में जहां घरों में शौचालयों के निर्माण के लिए जगह की कमी है वहां इन्हें एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में देखे जाने की जरूरत है। हालांकि, ये उपयोग के कुछ साल बाद ही अनुपयोगी हो जाते हैं। ऐसा होने के कई कारण हैं। अगर शौचालय का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम है (सुलभ आदि द्वारा प्रोत्साहित मॉडल की तुलना में) तो अकसर ही उपयोगकर्ता द्वारा दिए जाने वाला शुल्क सामुदायिक शौचालय के रखरखाव के लिए पर्याप्त नहीं होता है। कई मामलों में देखा गया है कि समुदाय द्वारा भवन में कोई निवेश नहीं होने पर सामुदायिक शौचालय बेकार हो जाते हैं। ऐसे मामलों में मूल निवेश के साथ शौचालयों के संचालन और रखरखाव के खर्च पर जोर देने वाली योजनाओं को विकसित करने की आवश्यकता है।

अपशिष्ट जल उपचार की चुनौती

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एनएफएचएस 3, 2005-06 के अनुसार भारत में 17 प्रतिशत शहरी परिवारों में घर में किसी भी प्रकार का शौचालय नहीं है, 24 प्रतिशत परिवार शौचालय साझा कर रहे थे और 19 प्रतिशत घरों के शौचालय नाली से जुड़े थे। जिन घरों में शौचालय थे उनमें से 27.6 प्रतिशत में सेप्टिक टैंक और 6.1 प्रतिशत में गड्ढे का इस्तेमाल किया गया था। 5 प्रतिशत शौचालय ऐसे थे जहां फ्लश/नाला/सेप्टिक टैंक/गड्ढा’ नहीं था जिसका अर्थ है कि यहां से निकलने वाला मानव मल बिना उपचार के भूमि पर और जल स्रोतों में बहाया जा रहा था।

2011 की जनगणना भी बताती है कि केवल 32.7 प्रतिशत शहरी परिवार पाइप वाली सीवर प्रणाली से जुड़े हैं जबकि 38.2 प्रतिशत परिवार अपने मल का निपटारा सेप्टिक टैंक और 7 प्रतिशत गड्ढा शौचालयों में करते हैं। यह बताता है कि ऐसे परिवारों की संख्या बहुत ज्यादा है जो वहीं निपटारा करते हैं। यह भी पता चलता है कि लगभग 50 लाख गड्ढा शौचालय अस्वस्थ्यप्रद हैं (कोई स्लैब नहीं है या खुले गड्ढे हैं), और 13 लाख सेवा शौचालय हैं- 9 लाख शौचालय का अपशिष्ट सीधे नालियों में मिलता है, 2 लाख शौचालयों का मानव मल इंसानों द्वारा उठाया जाता है (अवैध रूप से) और 1.8 लाख पशुओं द्वारा सेवित है।

शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है (2030 में लोगों के 50 प्रतिशत लोगों का शहरी केंद्रों में होना कहा जाता है।) शहरों की ओर पलायन करने वाले ज्यादातर गरीब वे लोग होते हैं जो ग्रामीण क्षेत्र में घर नहीं बना सकते और वे शहर की बस्तियों या फुटपाथ पर बस जाते हैं और इन्हें आमतौर पर कोई सुविधा या मान्यता नहीं मिलती है। अधिकांश समय तक ये मलिन बस्तियों उन खुली नालियों के समीप स्थित रहती हैं जिनमें कॉलोनियों के निवासियों द्वारा उनका जल अपशिष्ट (कुछ मामलों में सेप्टिक टैंक से भी सीवर का पानी) का निपटान किया जाता है। कई बार शौचालय भी सीधे इन खुली नालियों से जुड़े होते हैं। शहरी क्षेत्रों में बड़ा निवेश मुख्य रूप से सीवेज नेटवर्क या सीवर उपचार संयंत्रों जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण पर किया जा रहा है। हालांकि, ये संसाधन केवल अमीर और नव अमीर क्षेत्रों में होते हैं। यह समझा जाता है कि औसतन केवल 10 प्रतिशत अपशिष्ट जल (ग्रे और काला पानी) का उपचार किया जाता है। इसलिए जो भी अतिरिक्त निवेश किया जाता है वह केवल बेहतर क्षेत्रों के लिए होता है, कोई गरीब समुदाय इनमें से किसी भी नेटवर्क से नहीं जुड़ पाता है।

जीवन रेखाओं की उपेक्षा न हो

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गरीब और वंचित समुदाय मलिन बस्तियों और शहरों की बाहरी बस्तियों में बसते हैं। इन मलिन बस्तियों में से अधिकांश सरकारी ज़मीन या अन्य ज़मीन पर होती है और इन्हें अवैध मान कर बाहरी होने के कारण बोझ समझा जाता है जबकि वे वास्तव में किसी भी शहर की जीवन रेखाएं हैं। इन परिवारों में से अधिकांश के पास उस भूमि का कोई अधिकार नहीं होता है जिस पर उनकी बस्ती बसी है। ज़मीन का मालिकाना अधिकार न होने का मुद्दा इन मलिन बस्तियों के घरों के लिए सीवर नेटवर्क जैसी बुनियादी व्यवस्था उपलब्ध नहीं करवाने का कारण बन जाता है। सुविधाओं का न मिलना खुले में शौच का कारण बन जाता है। उन स्थानों पर जहां समुदाय शौचालय के महत्व को समझते हैं वे शौचालय निर्माण करने में सक्षम हैं, लेकिन इन स्थानों पर अपशिष्ट का निपटारा एक बड़ी चुनौती बन जाता है और यह अपशिष्ट खुली नालियों और अन्य जल निकायों में बहता है।

यह शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता की गंभीर स्थिति बतलाता है जो हमेशा ही उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों पर काफी दबाव डालता है। इस आपातकाल जैसी स्थिति के लिए एक स्थायी समाधान की आवश्यकता है और समाधान खोजने की इस यात्रा में विभिन्न समुदायों और हितधारकों से चर्चा कर उनकी राय जानना महत्वपूर्ण है। आइए, स्वच्छ भारत मिशन की कामयाबी के लिए इस संकट पूर्ण स्थिति में लोगों को एकजुट करें।

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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय

पीजी कालेज,राजनांदगांव। 

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