शनिवार, 10 जनवरी 2015

मंतव्य 2 - हरे प्रकाश उपाध्याय का संपादकीय

(मंतव्य 2 ईबुक के रूप में यहाँ प्रकाशित है, जिसे आप अपने कंप्यूटिंग/मोबाइल कंप्यूटिंग उपकरणों में पढ़ सकते हैं. इसकी सामग्री को सर्चइंजन-मित्र बनाने के उद्देश्य से यूनिकोडित कर सिलसिलेवार प्रकाशित किया जा रहा है. प्रस्तुत है पहली कड़ी - संपादकीय)

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ताना-बाना

हरे प्रकाश उपाध्याय

एक लेखक की भूमिका और नियति के बारे में सोचते हुए अक्सर दाग़ देहलवी का एक रूमानी शेर याद आता है- मुझको मज़ा है छेड़ का दिल मानता नहीं। गाली सुने बग़ैर सितमगर कहे बग़ैर। एक लेखक आख़िर क्यों लिखता है, इस सवाल पर सोचते हुए देहलवी साहब की इन पंक्तियों के अलावा इसका कोई सटीक जवाब नहीं सूझता। बल्कि यह सवाल भी खाली समय का फितूर लगता है। जब लेखक कोई रचना शुरू करता है या उस पर काम कर रहा होता है, तो उस दरमियान यह सवाल कहीं नहीं होता। लिखने के वक़्त बस अपने जाने हुए को या अपनी कल्पना को साकार कर देने की बेचैनी होती है। कोई भाव, कोई पीड़ा, कोई स्मृति इस कदर उधम मचाने लगती है कि उससे छुटकारे का विकल्प लिखने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं। संभवतः किसी रचना के पीछे कोई महत्वाकांक्षा की जगह अमूमन कोई पीड़ा या कोई ख्याल ही प्रमुखतः होता है।

रचना के उद्देश्य और सरोकार को लेकर अक्सर बहुत बातें होती हैं पर ऐसा नहीं लगता कि कला या रचना निर्मित होते वक़्त या उसके पहले ही अपना कोई उद्देश्य या परिणाम तय कर लेती हो, ऐसा संभव नहीं है। जैसे फैक्ट्री में कोई सामान बनता है, जैसे साबुन बन रहा है, तो उसका उद्देश्य तय है कि इसे सफ़ाई के काम में लाया जाएगा। पर कोई कलाकृति बनाई जा रही है या कोई कविता रची जा रही है, तो उसके बारे में आप ठोस तरीके से यह नहीं बता सकते कि वह निर्मित होकर क्या निश्चित लाभ या काम देगी...? कहने का तात्पर्य यह नहीं कि सृजन कर्म निरुद्देश्य है। सृजन तो मानव संसार की ऐसी उपलब्धि है, जिसका कोई जोड़ ही नहीं। कई बार कोई कलाकृति या कोई रचना किसी व्यक्ति के विचार व भाव जगत को इस तरह बदलकर रख देती है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

अच्छी रचना मन को माँजती है। एक अच्छी कविता में या किसी साहित्यिक रचना में यह ताकत होती है कि वह सोचने व महसूस करने के ढंग को प्रभावित कर दे, यह कोई छोटी बात नहीं है। दुनिया भर के अधिकांश क्रांतिकारियों का साहित्य से नाता रहा है, तो इस संबंध को महत्व के साथ समझने की ज़रूरत है। पर बहुत सारी महत्वपूर्ण रचनाएं भी बहुत सारे लोगों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पातीं। इस रूप में भी सृजनात्मकता एक अद्भुत चीज़ है। जैसे साबुन है या दुनिया के कारखानों में बनने वाला कोई भी उत्पाद है, तो वह हर जगह जो उसका काम है, वही काम करेगा। साबुन हर जगह सफ़ाई के काम में ही उपयोग में लाया जाएगा और वह जहाँ उपयोग में लाया जाएगा, वह अपने गुण धर्म के अनुसार सफ़ाई का काम करेगा। पर एक रचना जो एक व्यक्ति के मानसिक जगत को झिंझोड़ रही है, किसी अन्य व्यक्ति के साथ भी ऐसा ही कर पाएगी, यह संभव नहीं है।

रचना या कला, दुनिया की किसी फैक्ट्री में नहीं बन सकती। वह मनुष्य के मानस में निर्मित होती है और हर रचना के निर्मित होने की अपनी अलग व अनूठी प्रक्रिया होती है। शायद कोई लेखक किसी रचना को लिखने से पहले यह तय नहीं करता होगा कि जो वह लिखने जा रहा है, उसका उद्देश्य यह होगा या वह इस काम के लिए इसे लिख रहा है। अगर ऐसा होता तो रचनात्मकता कितनी ऊबाऊ, क़ैद व ठस चीज़ हो जाती....हर रचना की एक ही प्रतिक्रिया व एक ही प्रभाव हर जगह ही होते। मगर ऐसा नहीं है। निर्मल वर्मा कला या रचना की दुनिया के बारे में बात करते हुए उसे एक ऐसी दुनिया बताते हैं जो एक साथ यथार्थ और अयथार्थ दोनों है। वे कहते हैं, हालांकि यह हमारी रोजमर्रा की दुनिया से मिलती-जुलती हुई भी हू-ब-हू बिल्कुल वैसी नहीं होती। यह सपने की तरह होती है और सपने की दुनिया, बावजूद इसके कि उसमें हमारी चेतन ज़िंदगी के अंश होते हैं, जीती-जागती दुनिया से अलग होती है।

एक बेहतर रचना हर पाठक को उसके साथ अपने संबंध व सरोकार बनाने के लिए आज़ाद छोड़ती है। वह पाठक को यह स्पेस देती है कि वह उस रचना का उद्देश्य अपने लिए खुद निर्धारित करे। रचना किसी विषय पर रोशनी तो फेंक सकती है पर पाठक को अंगुली पकड़ाकर कहीं नहीं ले जा सकती। किसी रचना का क्या प्रभाव हो सकता है, उसको उसका रचयिता भी ठीक-ठीक नहीं समझ सकता। कई बार रचना जब सामने आती है, तो देखा गया कि उसने कोई प्रासंगिकता नहीं साबित की, कहीं कोई उसकी चर्चा नहीं हुई और वही रचना कुछ समय गुज़रने के बाद किसी न किसी वजह से दीप्त हो उठी। हर कोई उसकी बात करने लगता है। तो यह एक बड़ी रहस्यात्मक दुनिया भी है।

रचना की प्रेरणा व प्रक्रिया भी कम रहस्यपूर्ण नहीं है। आपके मन में कोई पंक्ति या विचार कौंधते हैं, आप कहीं रास्ते में हैं और किसी काग़ज़ के टुकड़े पर उसे दर्ज़ कर लेते हैं पर जब आप उस पर काम करने बैठते हैं, तो ज़रूरी नहीं कि पूरी रचना के दौरान आप उसी मनःस्थिति को पा सकें। उपन्यास लिखते हुए रात में अपने बिस्तर पर आप यह सोचते हुए सोते हैं कि फलां पात्र का यह चरित्र होगा, वह ऐसे-ऐसे विकसित होगा, ये-ये काम करेगा, मगर जब लिखने बैठते हैं तो वह पात्र अपनी मनमानी पर उतर आता है या उसी उपन्यास के दूसरे पात्र उसके जीवन को इस तरह प्रभावित करने लगते हैं कि आपका सोचा हुआ एक किनारे चला जाता है। यही एक और सवाल आता है कि क्या रचना लेखक से स्वायत्त चीज़ है? क्या लेखक का उस पर कोई नियंत्रण नहीं होता? शायद ऐसा नहीं है।

हर रचना को उसके लेखक की पढ़ाई-लिखाई, उसका जीवन, उसके अनुभव, उसकी समझ, सरोकार व उसके संस्कार काफी हद तक प्रभावित तो करते ही हैं। लेखक के भीतर कोई विचार या पंक्ति इन सबके असर में ही कौंधती है। मगर लिखते हुए आपके अनुभव रिफ्रेश भी होते हैं, और आप पाते हैं कि जिस चीज़ के बारे में आप लिख रहे हैं, लिखने से पहले उसके जो अनुभव थे, लिखने के दौरान उसमें टूट-फूट पैदा हुई है। एक अच्छी रचना अपने भीतर तमाम तरह की संभावनाओं को समेट लेती है। अतः साहित्य की सामाजिक भूमिका तय करने के लिए समाज को भी साहित्य के प्रति सजग, उत्सुक व आत्मीय होना पड़ेगा। हम सिर्फ़ साहित्यकारों को कोस कर या यह लांछन मढ़कर कि साहित्य एक अप्रभावी माध्यम है, भारी चूक करते हैं। किसी लेखक से आप उम्मीद करते हैं कि वह कोई ऐसी रचना लिख दे, जिससे तुरंत ही कोई बड़ा सामाजिक उद्देश्य पूरा हो जाय, तो यह एक बचकानी इच्छा है। एक अनुकूल माहौल में ही साहित्य अपनी प्रासंगिकता तय कर सकता है। इस बात को ठीक से समझ लेने की ज़रूरत है। यह ज़रूर है कि रचनात्मक माहौल तैयार करने की ज़िम्मेदारी से रचनाकार भी बच नहीं सकता

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  1. तकरीरें तो आपने बहुत अच्छी लिखी हैं पर आज के रचनाकार तो पुरूस्कारों के लिए ही लिखते हैं.....राजीव आनंद

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