गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

दीपक आचार्य का आलेख - हम सब निःशक्त हैं या आधे-अधूरे

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गवान ने हमें पूर्ण मनुष्य के रूप में भेजा है लेकिन हममें से ऎसे कितने लोग हैं तो यह दावा कर सकने की स्थिति में होंगे कि हम मनुष्य के रूप में परिपूर्ण हैं और हम हमारे अकेले के बूते दुनिया में अपना वजूद कायम कर सकते हैं और कुछ करके दिखा सकते हैं। शायद बहुत कम।

एक इंसान के रूप में भरा-पूरा दिमाग, स्वस्थ शरीर और हर तरह से उपयुक्त मन हम सभी के पास है। बावजूद इसके हमारी स्थिति यह हो गई है कि हमें अपनी दिनचर्या और रोजमर्रा तक के काम करने के लिए दूसरों के सहारे की जरूरत पड़ती है।

हर दृष्टि से स्वस्थ होने के दिनों में भी, और मानसिक या शारीरिक अशक्ति की स्थितियां आ जाने पर भी। हमेशा हमारी मनःस्थिति निर्देशक या उपदेशक की भूमिका में होती है।

हमेशा हम यही चाहते हैं कि हम चुपचाप बैठकर मौज मस्ती में रहें और हमारे काम भी दूसरे लोग बिना थके या उफ किए अथवा बिना प्रतिफल चाहे करते रहें।

हम हर दृष्टि से सबल और स्वस्थ होते हुए भी कभी बच्चों की तरह तो कभी बूढ़ों की तरह व्यवहार करते हैं। हममें से अधिकांश लोग हैं जो खुद उठकर पानी भी नहीं पीते, इसके लिए भी औरों पर हुकूमत करते हैं और दूसरों का सहारा लेते हैं। निःशक्तजन की तरह व्यवहार करते हैं। कभी पत्नी से, तो कभी बच्चों से पानी मंगवाने के आदी हैं।

छोटे-छोटे घरेलू काम भी हम नहीं कर पाते हैं और इनके लिए भी दूसरों पर ही निर्भर रहा करते हैं। बड़े कामों की तो बात ही कुछ और है।

पुराने जमाने के लोग अपने सारे काम खुद ही किया करते थे। यही नहीं तो औरों को भी उनके कामों में मदद किया करते थे और उनका हमेशा यही प्रयास रहता था कि जी भर कर परिश्रम करें और शरीर को काम में लाएं।

आज न वह भावना रही है, न वैसे ही शरीर।  सारे के सारे लोग दूसरों के भरोसे ही हैं या फिर रामभरोसे ही।

पहले आदमी अपने रोजमर्रा के और दूसरे सारे काम खुद ही कर लिया करता था। आज खुद के काम भी उसके हाथ में नहीं रहे।

दुर्भाग्य यह है कि इंसान अब पूरी तरफ पराश्रित होकर रह गया है। कहीं उसे उपकरणों और संसाधनों की जरूरत पड़ती है, कहीं लोगों की। जिन कामों को वह अकेले कर सकने का माद्दा रखता है उनके लिए भी उसे दूसरों की ओर मुँह ताकने को विवश रहना पड़ता है।

हर किसी की मानसिकता यही होती जा रही है कि खुद को कुछ नहीं करना पड़े, हमारे भी सारे काम दूसरे ही करते रहें और हम बिना कुछ किए खूब पाते ही पाते रहें, हमारी आवक लगातार बनी रहे। हमारा नाम होता रहे और अपनी उन्मुक्त एवं स्वेच्छाचारी मौज मस्ती पर कोई फर्क न पड़े।

हममें से कई लोग ऎसे भी हैं जिन्हें अपने दायित्वों के बारे में भी ठीक से पता नहीं है, न हमारे पास अपने से संबंधित दस्तावेजों और कागजातों के बारीकी से अध्ययन करने की फुर्सत है।

यही कारण है कि जो विषय हमारे दिमाग में होने चाहिएं उनके लिए हम अपने मातहतों पर निर्भर रहते हैं और यही वजह है कि हमारे बारे मेें कहा जाता है मातहतों की बैसाखी के बगैर न कहीं जवाब दे पाने की स्थिति में हैं और न कुछ कह पाने की।

यही वजह है कि काफी लोगों को अक्सर मातहतों की आवश्यकता पड़ती है और इनकी मजबूरी होती है कि अपने कुछ मातहतों को हमेशा अपने पास बनाए रखें ताकि वे ढाल के रूप में उपयोग में आ सकें।

बैसाखियाँ रखने की स्थितियां तकरीबन हर कर्मस्थलों में आसानी से देखी जा सकती हैं जहाँ काफी कुछ लोगों ऎसे होते हैं जो अपने काम ठीक ढंग से नहीं कर पाते हैं और न अपने कामों को लेकर उनकी कोई समझ होती है।

यही कारण है कि बहुत सारे लोग स्वतंत्र रूप से कोई काम नहीं कर पाते हैं। अपने कामों के लिए किसी न किसी की मदद की जरूरत पड़ती ही हैं। किसी की मदद लेना या करना बुरा नहीं है लेकिन जिसे मदद की जा रही है उसकी सबसे बड़ी मदद यही है कि उसे स्वतंत्र रूप से काम करना सिखाया जाए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके, अपने खुद के काम बड़ी ही आसानी से खुद ही कर सके।

पर आज का दुर्भाग्य यह है कि आदमी इतना आरामतलबी हो गया है कि वह सीखने को तैयार नहीं है, खुद कुछ करने के लिए राजी नहीं है। जब उसे बैसाखियां सहज तौर पर उपलब्ध हैं तो फिर आखिर क्यों वह सीखना चाहेगा।

उसे पता है कि हर जगह ऎसे लोग मिल ही जाते हैं जो किसी न किसी प्रभाव या स्वार्थ से मदद करने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते हैं। ऎसे में कोई भी बेवजह दिमाग का उपयोग करना क्यों चाहे। लेकिन इतना जरूर है कि इन तमाम स्थितियों में हममें से कोई भी व्यक्ति अपने आपको आत्मनिर्भर, मनुष्य के रूप मेंं पूर्ण या सक्षम कह पाने की स्थिति में नहीं है।

इसी तरह बैसाखियों के भरोसे रहेंगे तो ऊपरवाला भी नाराज होगा। इंसान के रूप में पूर्णता पाने के लिए  आत्मनिर्भर बनें, बैसाखियों की तलाश या मोह छोड़ें और खुद के बूते ऎसे काम करके ऊपर जाएं कि धरती के लोग याद रखें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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