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पखवाड़े की कविताएँ

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श्याम गुप्त


१.अपन-तुपन
मेरे रूठ कर चले आने पर ,
पीछे -पीछे आकर
'चलो अपन-तुपन खेलें '
माँ के सामने यह कहकर
हाथ पकड़कर ,
आंखों में आंसू भरकर ,
तुम मना ही लेतीं थी ,मुझे -
इस अमोघ अस्त्र से ;
बार-बार ,
हर बार ।
सारा क्रोध ,
गिले शिकवे ,
काफूर हो जाते थे ;
और, बाहों में बाहें डाले ,
फ़िर चल देते थे -
खेलने ,
हम-तुम
अपन-तुपन ॥


२.माया
माया सी लटपटी ,
वो छरहरी ,तवंगी ,
सांवली सुरतिया थी ,
कान्हा की प्रतिबिम्बी ।

मसालों की बेटी ,
लाल मिर्च की सहेली ;
तीन लोक से न्यारी ,
थी सबसे अकेली ।

मुंडेर की रेल की ,
थी परमानेंट इंजन ;
थी सब में ही आगे ,
हो कुश्ती या भाषण ।

वो साँसों की गिनती ,
हो सीधी या उलटी ;
कहाँ खोगई ,जो-
थी पल-पल झगड़ती ॥


३.सुहाना जीवन
छत पर ,वरांडे में या -
जीने की ऊपर वाली सीढी पर ,
खेलते हुए ,या-
लड़ते हुए ;
तुमने लिया था ,सदैव-
मेरा ही पक्ष ।
मेरे न खेलने पर ,
तुम्हारा भी वाक्-आउट ;
मेरे झगड़ने पर
पीट देने पर भी -
तुम्हारा मुस्कुराना ;
एक दूसरे से नाराज़ होने पर ,
बार-बार मनाना ;
जीवन कितना था सुहाना ,
हे सखि !
जीवन कितना था सुहाना ॥


४.यादों के झरोखे
यादों के झरोखे से
जब तुम मुस्कुराती हो ,
मन में इक नई उमंग ,
नई कान्ति बनकर आती हो ।

उस साल तुम,अपनी -
नानी के यहाँ आई थी ;
सारे मोहल्ले में ,एक-
नई रोशनी सी लाई थी ।

वो घना सा रूप,
वो घनी केश राशि ;
हर बात में घने-घने -
कहने की अभिलाषी ।

उसके बाग़ की,बगीचों की,
फूल पत्ते ओ नगीनों की ;
हर बात थी घनेरी-घनेरी ,
जैसे आदत हो हसीनों की।


गरमी की छुट्टी में ,
मैं आऊँगी फ़िर,
चलते-चलते ,तुमने
कहा था होके अधीर ।

अब न वो गरमी आती है ,
न वैसी गरमी की छुट्टी ।
शायद करली है तुमने ,
मेरे से पूरी कुट्टी॥
 
५.बिंदिया

तुम जो घबराकर ,
हुई रक्ताभ जब ;
तेरा वो चेहरा ,
अभी तक याद है ।
धत , 'यू बदमाश '
कहकर दौड़कर ;
मुझको तेरा -
भाग जाना याद है ।
प्रति दिवस की तरह ही
उस रोज़ भी ;
उस झरोखे पर ही ,
तुम मौजूद थीं ;
और छत पर
उस सुहानी शाम को,
डूब कर पुस्तक में
मैं तल्लीन था।
छूट करके वो ,
तुम्हारे हाथ से;
छोड़ दी थी या,
तुम्ही ने आप से ;
प्यारी सी डिबिया
जिसे तुमने पुनः ;
सौंप देने को
कहा था नाज़ से।
खोल कर मैंने ,
तुम्हारे भाल पर;
एक बिंदिया जब ,
सजा दी प्यार से ।
तब तुनक कर
भाग जाना याद है;
और मुड़कर
मुस्कुराना याद है ॥

 

-----डा श्याम गुप्त , के-३४८, आशियाना, लखनऊ
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डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'


मच्छर बनाम पूंजीपति
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कवि जी सो नहीं पा रहे थे
क्योंकि मच्छर उन्हें बेतरह सता रहे थे
कवि  ने मारा एक झपट्टा
पकड़ लिया मच्छर का एक पट्ठा
बोले--तू दूसरों के खून का शोषण करता है
दूसरों के खून से पूंजीपति की तरह
अपना पोषण करता है।

मच्छर भिनभिनाया ---
कवे! अपने बाल-बच्चों की खैर मनाओ
लेकिन कृपा कर मुझे पूंजीपति मत बनाओ।

माना कि मैं जीने के लिए दूसरों का खून चखता हूँ
लेकिन पूंजीपतियों की तरह
आवश्यकता से अधिक लेकर
स्वीस बैंक में तो नहीं रखता हूँ ?

आदित्यपुर-२, जमशेदपुर
०६५७/२३७०८९२

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धनंजय कुमार उपाध्याय

वो हाथ
गाँव की संकरी गली
मछली के सूखे ताल
बृजकुमार के घर में है
मिट्टी से लथपथ चाक|
        गूलर का वो पेड़
        ठूंठ सी बांस की झाड़
        आँख मिचौली खेलती
        जेठ दुपहरी बादल के साथ|
अंगोछे की आड़ में
मरघट शमशान की ओर
मुंह ढंककर खड़े-खड़े
रो रहे थे  बृजकिशोर|
        डंडे ने साथ निभाया नहीं
        रो रहा था कहकर चाक
        मिट्टी लथपथ सी पड़ी
        ख़ोज रही वो हाथ|
    == ==

दर्द
वीरान जंगलों में बंदूकों की घमासान,
बयाँ करती थी वो दर्द भरी रात सुनसान|
कंधे पर आग्नेयास्त्र तान,
पीठ पर रोटी की पोटली बाँध,
वो जा रहे थे जंगलों में दबे पाँव|
घर की याद, माँ-बाप की फ़रियाद, साहिबा की वो दबी आवाज,
याद कर भुला दिए, ले कलेजे को हाथ|
संघर्ष का तांडव, देख डर जाते भी पांडव|
आह-ईईह’’’’’’’’’ की लम्बी चीख पुकार,
धड़ाम-धूड़ाम का अनोखा अत्याचार,
सुनकर रो पड़ा वह वीरान|
सुबह अपनों का दर्द,
ऊपर जीत का सर्द लगा ऐसे की’’’’’
छोड़ चले निरीह बिलखते परिजनों को वो
बनकर बेदर्द|


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जय प्रकाश भाटिया


किसान की झोली
 
मौसम  बार बार ले रहा है, बेमौसम की करवट,
रंग बदलने में मार खा रही है बेचारी गिरगिट,
कभी धूप कभी छाया , कभी ओले भरा तूफ़ान,
अप्रैल के माह में, यह सब देख कर हम हैरान,
 
न सावन की बरखा सी मिट्टी में सौंधी खुशबू,
न बारिश में बच्चों को खूब नहाने की जुस्तजू,
बस बिजली कड़कती है और खूब पानी बरसता है, ,
बेचारा किसान भी इस तूफ़ान के थमने को तरसता है ,
 
न कहीं कागज़ की कश्ती है, न हरियाली तीज के झूले,
इस बेमौसम बरसात में, सब अपना काम धंधा भी भूले,
न चलती है असहनीय गर्मी से राहत देती पुरवा की बयार,
इस कुदरत के बेमौसम खेल ने, कितनों को किया बीमार, 
 
हे प्रभु , अब इस बेमौसम की बारिश को यहीं थमने दे,
बैसाख की आहट है, अब तो अन्न की फसल पकने दे,
बेचारे किसान का गोदाम भी 'कनक' से लबालब भरने  दे,
बेचारों की मेहनत के बदले, इनकी झोली 'कनक' से भरने दे,
 

09855022670


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कविराज आनन्द किरण उर्फ करनसिह राजपुरोहित

कविता -ताण्डव नृत्य
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
धर्म के ठेकेदारोँ से ,.,...
वेदोँ से शूद्र के कान सीसा तुमने ही डलवाया था।
धर्म के माथे पर यह कलंक तुमने ही लगवाया है॥
देवालय से दलित का प्रवेश निषेध तुमने ही करवाया था।
परम पिता पर प्रश्न चिन्ह तुमने ही लगवाया है॥
साहित्य से अस्पृश्यता का अध्याय तुमने ही लिखवाया था।
संस्कृती के आँचल पर तुमने ही यह काला धब्बा लगवाया है।
आज मैँ मनु स्मृति को खुले आम जलाऊंगा।
भेदभाव की दुनिया को छोड कर सत्य की शरणोँ जाऊँगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
समाज के दलालो से.,.,,
दलित का दूल्हा जब घोडी पर चढता है तो नाक तुम्हारी कैसे कट जाती है।
जब गैरोँ को बहन बेटियाँ ब्याही तब शान भारत की कौन सी बढ़ती है॥
दलित के संग एक चौपाल पर बैठने मर्यादा तुम्हारी कैसे घट जाती है।
गोरोँ को सलामी भरकर भारतमाता के दूध का मान कौन सा बढाया था॥
अछूत के हाथोँ का अन्न जल लेने तुम्हारा पुण्य कैसे घट जाता है।
अफीम गांजा व भांग पी कर तुम धर्मात्मा कैसे रह सकते हो॥
मनुप्रदत्त की समाज व्यवस्था को मिटाऊँगा।
नूतन समाज व्यवस्था का सर्जन करुंगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
शिक्षित दलितोँ से ......
ऊँचा ओहदा पा कर तुम शहरोँ मेँ जा अपना मुकाम बनाने लगे हो।
गाँवोँ मेँ तुम्हारे परिजन नित अवहेलना शिकार होते हैं॥
शहर मेँ अपने ऐश्वर्योँ की चिन्ता नित तुम लगे हो।
गरीब दलित के रोटी के प्रबंध का भी फर्ज निभाना है॥
शहर मेँ रहकर आधुनिकता मेँ खो जाते हो।
दरिन्दों की क्रुद्ध निगाहों से दलित को आजाद करवाने का धर्म निभाओ॥
आज मैँ क्रांति की आवश्यकता गाऊँगा।
एक अखण्ड मानव समाज बनाऊंगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
आरक्षण से .,,,.
आरक्षण के रथ अपने परिजनोँ को अधिकारी बनाने लगे हो।
अधिकारहीनोँ की खातिर अपने स्वार्थ त्याग कर को सामान्य बन जाओ तुम॥
विधायक, सांसद व मंत्री बनकर भी दलित बने बैठे हो।
अब तुम सवर्ण बनकर मनु की स्मृति को गाड़ दो॥
ब्रह्मा के शीश पर बैठ विप्र अब ललकार दो।
सदविप्र बनकर सबको पुण्य कर्म कराना सिखा दो॥
ता ता धिन ता ता।
धिन धिन ता ता ता॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥


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          प्रतिभा अंश

बदलती दुनिया 

मैं दुनिया में लोगों को,
चीखते-चिल्लाते देखा है,।
झूठ को सच में बदलना ,
यही अब तक देखा हैं ।।
हर एक चेहरे पर मैंने ,
बनावटीपन देखा है।
सीढी दर सीढी,
उम्र जैसी बढती हैं
उतनी तेजी से मैंने ,
लोगों को बदलते देखा है।।
कल तक जो रिश्ता था,अपना
उसमें भी मिलावट देखी हैं
ऐसी बनावटी दुनिया पर जब मैं   
सवाल उठाने लगती हूँ
मुझे पागल बता के ये
मुझे पर ही हँसा करते है ।
शब्द नहीं अल्फाज नहीं
कैसे बताऊँ मैं दुनिया को
पागल नहीं मैं प्रतिभा हूँ।
चीख और चिल्लाहट को
हँसी में बदलना चाहती हूँ
दब के रह गई कोशिशें सारी
फिर भी हर बार गिर के उठना,
यही तो है, नियति मेरी ,
कोशिशें रंग लाती है।
वह सवेरा भी आएगा जब
बदल जाएँगी नफरत सारी
प्यार के नीँव तले

 

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अंजली अग्रवाल

भीड़ में भी अकेले चलता हूँ मैं....
रास्ते में पड़े पत्थरों को अलग करता हूँ मैं....
फूलों से जैसे काँटें निकालता हूँ मैं....
पहचान ले जो मुझे उसे किनारे तक पहुँचाता हूँ मैं....
लोग देखते ही नहीं मेरी ओर जैसे अभिशाप बन गया हूँ मैं....
अरे दोस्तों तुम्हारा साथी हूँ मैं....
तुम्हारी उड़ती पतंग की डोर हूँ मैं....
तुम्हारे रिश्तों की नींव हूँ मैं....
एक बार मेरी ओर देखो गिरते को उठाता हूँ मैं....
असम्भव को सम्भव बनाता हूँ मैं....
विश्वास हूँ मैं....
पत्थर को मूर्ति बनाता हूँ मैं....
भीड़ में भी अकेले चलता हूँ मैं....
बाँहें फैलाये सबकी ओर देखता हूँ मैं....
विश्वास हूँ मैं....

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कुमार अनिल पारा

गीत-(उस रात में था अकेला)
उस रात में था अकेला.....
ख्वावों था वो तो मेला.....
में सो रहा था जहां पर.......
वहां लगता था चारों दि‍शाओं मेला..
चारों दि‍शाओं का मेला.....
उस रात में था अकेला.....
उस रात में था अकेला.....
हवायें भी आईं घटाऐं भी आईं,
वो खूबसूरत अदाऐं भी आईं,.............
ऐसा था वो तो झमेला,...
उस रात में था अकेला....
ख्वाबों का था वो तो मेला................उस......
हवाओं ने भी कुछ कहा था...........
कुछ-कुछ भी में सुन रहा था........
हवाओं का मन चल रहा था........
कोई ये ना सुन रहा था...........
ऐसा था वो तो झमेला.....
उस रात में था अकेला....
ख्वाबों का था वो तो मेला................उस......
घटाओं ने भी कुछ कहा था...
कुछ-कुछ भी मैंने सुना था........
मेरा भी दि‍ल कह रहा था.........
पर कोई भी ना सुन रहा था....
ऐसा ही था वो तो मेला...........
उस रात में था अकेला......
ख्वाबों का था वो तो मेला,..
उस रात में था अकेला....
उस रात में था अकेला..
ख्वाबों का था वो तो मेला....
अदाऐं भी कुछ कह रहीं थी...
घटा और हवा सुन रहीं थी....
कुछ-कुछ भी मैंने सुना था....
मेरा भी दि‍ल कह रहा था......;
पर कोई भी ना सुन रहा था....
उस रात में था अकेला......
ख्वाबों का था वो तो मेला......
उस रात में अकेला.......
---
कविता-(सच्‍चा यार नहीं मिलता)
छोड़ आया हूं उस जमाने को जिसमें प्‍यार नहीं मिलता,
झूठ और फरेब के आगे, दुलार नहीं मिलता,
जमीं तो बहुत थी, मेरी कब्र के लिए,
पर जमाना रोया था मेरे सब्र के लिए,
हकीकत, को झूठ होते देर नहीं होती,
झूठ ओर फरेब की तस्‍वीर नहीं होती,
छोड़ आया हूं उस फसाने को, जिसमें प्‍यार नहीं मिलता,
झूठ और फरेब के आगे सच्‍चा यार नहीं मिलता,
बेनाम मोहब्‍बत अब नाम को रोती है,
मेरे आने के बाद अब वो चैन से सोती है,
छोड़ आया हूं अब उस दीवाने को, जिसमें प्‍यार नहीं मिलता,
झूठ और फरेब के आगे दीदार नहीं मिलता,
----
(छोटे पर्दे पर धूम मचाने वाले डांस इंडिंया डांस में पहुंचने वाली देश की मम्‍मियों के नाम इस कविता को करता हूं।)
बेटा तेरे डांस का हर पल था बेकार,
बॉलीबुड ने पसंद किया ना, दिया ना तेरा साथ,
अब मम्‍मी की बारी है, डीआईडी के साथ,
बॉलीबुड ने थाम लिया है, अब मम्‍मी का हाथ,
गोविन्‍दा का साथ है, और बड़ी-बड़ी है बात,
अब मम्‍मी के डांस के बॉलीवुड है साथ।
- कुमार अनिल पारा,
anilpara123@gmail.com

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