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पखवाड़े की कविताएँ

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श्याम गुप्त १.अपन-तुपन मेरे रूठ कर चले आने पर , पीछे -पीछे आकर 'चलो अपन-तुपन खेलें ' माँ के सामने यह कहकर हाथ पकड़कर , आंखों में आ...

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श्याम गुप्त


१.अपन-तुपन
मेरे रूठ कर चले आने पर ,
पीछे -पीछे आकर
'चलो अपन-तुपन खेलें '
माँ के सामने यह कहकर
हाथ पकड़कर ,
आंखों में आंसू भरकर ,
तुम मना ही लेतीं थी ,मुझे -
इस अमोघ अस्त्र से ;
बार-बार ,
हर बार ।
सारा क्रोध ,
गिले शिकवे ,
काफूर हो जाते थे ;
और, बाहों में बाहें डाले ,
फ़िर चल देते थे -
खेलने ,
हम-तुम
अपन-तुपन ॥


२.माया
माया सी लटपटी ,
वो छरहरी ,तवंगी ,
सांवली सुरतिया थी ,
कान्हा की प्रतिबिम्बी ।

मसालों की बेटी ,
लाल मिर्च की सहेली ;
तीन लोक से न्यारी ,
थी सबसे अकेली ।

मुंडेर की रेल की ,
थी परमानेंट इंजन ;
थी सब में ही आगे ,
हो कुश्ती या भाषण ।

वो साँसों की गिनती ,
हो सीधी या उलटी ;
कहाँ खोगई ,जो-
थी पल-पल झगड़ती ॥


३.सुहाना जीवन
छत पर ,वरांडे में या -
जीने की ऊपर वाली सीढी पर ,
खेलते हुए ,या-
लड़ते हुए ;
तुमने लिया था ,सदैव-
मेरा ही पक्ष ।
मेरे न खेलने पर ,
तुम्हारा भी वाक्-आउट ;
मेरे झगड़ने पर
पीट देने पर भी -
तुम्हारा मुस्कुराना ;
एक दूसरे से नाराज़ होने पर ,
बार-बार मनाना ;
जीवन कितना था सुहाना ,
हे सखि !
जीवन कितना था सुहाना ॥


४.यादों के झरोखे
यादों के झरोखे से
जब तुम मुस्कुराती हो ,
मन में इक नई उमंग ,
नई कान्ति बनकर आती हो ।

उस साल तुम,अपनी -
नानी के यहाँ आई थी ;
सारे मोहल्ले में ,एक-
नई रोशनी सी लाई थी ।

वो घना सा रूप,
वो घनी केश राशि ;
हर बात में घने-घने -
कहने की अभिलाषी ।

उसके बाग़ की,बगीचों की,
फूल पत्ते ओ नगीनों की ;
हर बात थी घनेरी-घनेरी ,
जैसे आदत हो हसीनों की।


गरमी की छुट्टी में ,
मैं आऊँगी फ़िर,
चलते-चलते ,तुमने
कहा था होके अधीर ।

अब न वो गरमी आती है ,
न वैसी गरमी की छुट्टी ।
शायद करली है तुमने ,
मेरे से पूरी कुट्टी॥
 
५.बिंदिया

तुम जो घबराकर ,
हुई रक्ताभ जब ;
तेरा वो चेहरा ,
अभी तक याद है ।
धत , 'यू बदमाश '
कहकर दौड़कर ;
मुझको तेरा -
भाग जाना याद है ।
प्रति दिवस की तरह ही
उस रोज़ भी ;
उस झरोखे पर ही ,
तुम मौजूद थीं ;
और छत पर
उस सुहानी शाम को,
डूब कर पुस्तक में
मैं तल्लीन था।
छूट करके वो ,
तुम्हारे हाथ से;
छोड़ दी थी या,
तुम्ही ने आप से ;
प्यारी सी डिबिया
जिसे तुमने पुनः ;
सौंप देने को
कहा था नाज़ से।
खोल कर मैंने ,
तुम्हारे भाल पर;
एक बिंदिया जब ,
सजा दी प्यार से ।
तब तुनक कर
भाग जाना याद है;
और मुड़कर
मुस्कुराना याद है ॥

 

-----डा श्याम गुप्त , के-३४८, आशियाना, लखनऊ
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डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'


मच्छर बनाम पूंजीपति
----------------------------

कवि जी सो नहीं पा रहे थे
क्योंकि मच्छर उन्हें बेतरह सता रहे थे
कवि  ने मारा एक झपट्टा
पकड़ लिया मच्छर का एक पट्ठा
बोले--तू दूसरों के खून का शोषण करता है
दूसरों के खून से पूंजीपति की तरह
अपना पोषण करता है।

मच्छर भिनभिनाया ---
कवे! अपने बाल-बच्चों की खैर मनाओ
लेकिन कृपा कर मुझे पूंजीपति मत बनाओ।

माना कि मैं जीने के लिए दूसरों का खून चखता हूँ
लेकिन पूंजीपतियों की तरह
आवश्यकता से अधिक लेकर
स्वीस बैंक में तो नहीं रखता हूँ ?

आदित्यपुर-२, जमशेदपुर
०६५७/२३७०८९२

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धनंजय कुमार उपाध्याय

वो हाथ
गाँव की संकरी गली
मछली के सूखे ताल
बृजकुमार के घर में है
मिट्टी से लथपथ चाक|
        गूलर का वो पेड़
        ठूंठ सी बांस की झाड़
        आँख मिचौली खेलती
        जेठ दुपहरी बादल के साथ|
अंगोछे की आड़ में
मरघट शमशान की ओर
मुंह ढंककर खड़े-खड़े
रो रहे थे  बृजकिशोर|
        डंडे ने साथ निभाया नहीं
        रो रहा था कहकर चाक
        मिट्टी लथपथ सी पड़ी
        ख़ोज रही वो हाथ|
    == ==

दर्द
वीरान जंगलों में बंदूकों की घमासान,
बयाँ करती थी वो दर्द भरी रात सुनसान|
कंधे पर आग्नेयास्त्र तान,
पीठ पर रोटी की पोटली बाँध,
वो जा रहे थे जंगलों में दबे पाँव|
घर की याद, माँ-बाप की फ़रियाद, साहिबा की वो दबी आवाज,
याद कर भुला दिए, ले कलेजे को हाथ|
संघर्ष का तांडव, देख डर जाते भी पांडव|
आह-ईईह’’’’’’’’’ की लम्बी चीख पुकार,
धड़ाम-धूड़ाम का अनोखा अत्याचार,
सुनकर रो पड़ा वह वीरान|
सुबह अपनों का दर्द,
ऊपर जीत का सर्द लगा ऐसे की’’’’’
छोड़ चले निरीह बिलखते परिजनों को वो
बनकर बेदर्द|


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जय प्रकाश भाटिया


किसान की झोली
 
मौसम  बार बार ले रहा है, बेमौसम की करवट,
रंग बदलने में मार खा रही है बेचारी गिरगिट,
कभी धूप कभी छाया , कभी ओले भरा तूफ़ान,
अप्रैल के माह में, यह सब देख कर हम हैरान,
 
न सावन की बरखा सी मिट्टी में सौंधी खुशबू,
न बारिश में बच्चों को खूब नहाने की जुस्तजू,
बस बिजली कड़कती है और खूब पानी बरसता है, ,
बेचारा किसान भी इस तूफ़ान के थमने को तरसता है ,
 
न कहीं कागज़ की कश्ती है, न हरियाली तीज के झूले,
इस बेमौसम बरसात में, सब अपना काम धंधा भी भूले,
न चलती है असहनीय गर्मी से राहत देती पुरवा की बयार,
इस कुदरत के बेमौसम खेल ने, कितनों को किया बीमार, 
 
हे प्रभु , अब इस बेमौसम की बारिश को यहीं थमने दे,
बैसाख की आहट है, अब तो अन्न की फसल पकने दे,
बेचारे किसान का गोदाम भी 'कनक' से लबालब भरने  दे,
बेचारों की मेहनत के बदले, इनकी झोली 'कनक' से भरने दे,
 

09855022670


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कविराज आनन्द किरण उर्फ करनसिह राजपुरोहित

कविता -ताण्डव नृत्य
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
धर्म के ठेकेदारोँ से ,.,...
वेदोँ से शूद्र के कान सीसा तुमने ही डलवाया था।
धर्म के माथे पर यह कलंक तुमने ही लगवाया है॥
देवालय से दलित का प्रवेश निषेध तुमने ही करवाया था।
परम पिता पर प्रश्न चिन्ह तुमने ही लगवाया है॥
साहित्य से अस्पृश्यता का अध्याय तुमने ही लिखवाया था।
संस्कृती के आँचल पर तुमने ही यह काला धब्बा लगवाया है।
आज मैँ मनु स्मृति को खुले आम जलाऊंगा।
भेदभाव की दुनिया को छोड कर सत्य की शरणोँ जाऊँगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
समाज के दलालो से.,.,,
दलित का दूल्हा जब घोडी पर चढता है तो नाक तुम्हारी कैसे कट जाती है।
जब गैरोँ को बहन बेटियाँ ब्याही तब शान भारत की कौन सी बढ़ती है॥
दलित के संग एक चौपाल पर बैठने मर्यादा तुम्हारी कैसे घट जाती है।
गोरोँ को सलामी भरकर भारतमाता के दूध का मान कौन सा बढाया था॥
अछूत के हाथोँ का अन्न जल लेने तुम्हारा पुण्य कैसे घट जाता है।
अफीम गांजा व भांग पी कर तुम धर्मात्मा कैसे रह सकते हो॥
मनुप्रदत्त की समाज व्यवस्था को मिटाऊँगा।
नूतन समाज व्यवस्था का सर्जन करुंगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
शिक्षित दलितोँ से ......
ऊँचा ओहदा पा कर तुम शहरोँ मेँ जा अपना मुकाम बनाने लगे हो।
गाँवोँ मेँ तुम्हारे परिजन नित अवहेलना शिकार होते हैं॥
शहर मेँ अपने ऐश्वर्योँ की चिन्ता नित तुम लगे हो।
गरीब दलित के रोटी के प्रबंध का भी फर्ज निभाना है॥
शहर मेँ रहकर आधुनिकता मेँ खो जाते हो।
दरिन्दों की क्रुद्ध निगाहों से दलित को आजाद करवाने का धर्म निभाओ॥
आज मैँ क्रांति की आवश्यकता गाऊँगा।
एक अखण्ड मानव समाज बनाऊंगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
आरक्षण से .,,,.
आरक्षण के रथ अपने परिजनोँ को अधिकारी बनाने लगे हो।
अधिकारहीनोँ की खातिर अपने स्वार्थ त्याग कर को सामान्य बन जाओ तुम॥
विधायक, सांसद व मंत्री बनकर भी दलित बने बैठे हो।
अब तुम सवर्ण बनकर मनु की स्मृति को गाड़ दो॥
ब्रह्मा के शीश पर बैठ विप्र अब ललकार दो।
सदविप्र बनकर सबको पुण्य कर्म कराना सिखा दो॥
ता ता धिन ता ता।
धिन धिन ता ता ता॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥


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          प्रतिभा अंश

बदलती दुनिया 

मैं दुनिया में लोगों को,
चीखते-चिल्लाते देखा है,।
झूठ को सच में बदलना ,
यही अब तक देखा हैं ।।
हर एक चेहरे पर मैंने ,
बनावटीपन देखा है।
सीढी दर सीढी,
उम्र जैसी बढती हैं
उतनी तेजी से मैंने ,
लोगों को बदलते देखा है।।
कल तक जो रिश्ता था,अपना
उसमें भी मिलावट देखी हैं
ऐसी बनावटी दुनिया पर जब मैं   
सवाल उठाने लगती हूँ
मुझे पागल बता के ये
मुझे पर ही हँसा करते है ।
शब्द नहीं अल्फाज नहीं
कैसे बताऊँ मैं दुनिया को
पागल नहीं मैं प्रतिभा हूँ।
चीख और चिल्लाहट को
हँसी में बदलना चाहती हूँ
दब के रह गई कोशिशें सारी
फिर भी हर बार गिर के उठना,
यही तो है, नियति मेरी ,
कोशिशें रंग लाती है।
वह सवेरा भी आएगा जब
बदल जाएँगी नफरत सारी
प्यार के नीँव तले

 

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अंजली अग्रवाल

भीड़ में भी अकेले चलता हूँ मैं....
रास्ते में पड़े पत्थरों को अलग करता हूँ मैं....
फूलों से जैसे काँटें निकालता हूँ मैं....
पहचान ले जो मुझे उसे किनारे तक पहुँचाता हूँ मैं....
लोग देखते ही नहीं मेरी ओर जैसे अभिशाप बन गया हूँ मैं....
अरे दोस्तों तुम्हारा साथी हूँ मैं....
तुम्हारी उड़ती पतंग की डोर हूँ मैं....
तुम्हारे रिश्तों की नींव हूँ मैं....
एक बार मेरी ओर देखो गिरते को उठाता हूँ मैं....
असम्भव को सम्भव बनाता हूँ मैं....
विश्वास हूँ मैं....
पत्थर को मूर्ति बनाता हूँ मैं....
भीड़ में भी अकेले चलता हूँ मैं....
बाँहें फैलाये सबकी ओर देखता हूँ मैं....
विश्वास हूँ मैं....

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कुमार अनिल पारा

गीत-(उस रात में था अकेला)
उस रात में था अकेला.....
ख्वावों था वो तो मेला.....
में सो रहा था जहां पर.......
वहां लगता था चारों दि‍शाओं मेला..
चारों दि‍शाओं का मेला.....
उस रात में था अकेला.....
उस रात में था अकेला.....
हवायें भी आईं घटाऐं भी आईं,
वो खूबसूरत अदाऐं भी आईं,.............
ऐसा था वो तो झमेला,...
उस रात में था अकेला....
ख्वाबों का था वो तो मेला................उस......
हवाओं ने भी कुछ कहा था...........
कुछ-कुछ भी में सुन रहा था........
हवाओं का मन चल रहा था........
कोई ये ना सुन रहा था...........
ऐसा था वो तो झमेला.....
उस रात में था अकेला....
ख्वाबों का था वो तो मेला................उस......
घटाओं ने भी कुछ कहा था...
कुछ-कुछ भी मैंने सुना था........
मेरा भी दि‍ल कह रहा था.........
पर कोई भी ना सुन रहा था....
ऐसा ही था वो तो मेला...........
उस रात में था अकेला......
ख्वाबों का था वो तो मेला,..
उस रात में था अकेला....
उस रात में था अकेला..
ख्वाबों का था वो तो मेला....
अदाऐं भी कुछ कह रहीं थी...
घटा और हवा सुन रहीं थी....
कुछ-कुछ भी मैंने सुना था....
मेरा भी दि‍ल कह रहा था......;
पर कोई भी ना सुन रहा था....
उस रात में था अकेला......
ख्वाबों का था वो तो मेला......
उस रात में अकेला.......
---
कविता-(सच्‍चा यार नहीं मिलता)
छोड़ आया हूं उस जमाने को जिसमें प्‍यार नहीं मिलता,
झूठ और फरेब के आगे, दुलार नहीं मिलता,
जमीं तो बहुत थी, मेरी कब्र के लिए,
पर जमाना रोया था मेरे सब्र के लिए,
हकीकत, को झूठ होते देर नहीं होती,
झूठ ओर फरेब की तस्‍वीर नहीं होती,
छोड़ आया हूं उस फसाने को, जिसमें प्‍यार नहीं मिलता,
झूठ और फरेब के आगे सच्‍चा यार नहीं मिलता,
बेनाम मोहब्‍बत अब नाम को रोती है,
मेरे आने के बाद अब वो चैन से सोती है,
छोड़ आया हूं अब उस दीवाने को, जिसमें प्‍यार नहीं मिलता,
झूठ और फरेब के आगे दीदार नहीं मिलता,
----
(छोटे पर्दे पर धूम मचाने वाले डांस इंडिंया डांस में पहुंचने वाली देश की मम्‍मियों के नाम इस कविता को करता हूं।)
बेटा तेरे डांस का हर पल था बेकार,
बॉलीबुड ने पसंद किया ना, दिया ना तेरा साथ,
अब मम्‍मी की बारी है, डीआईडी के साथ,
बॉलीबुड ने थाम लिया है, अब मम्‍मी का हाथ,
गोविन्‍दा का साथ है, और बड़ी-बड़ी है बात,
अब मम्‍मी के डांस के बॉलीवुड है साथ।
- कुमार अनिल पारा,
anilpara123@gmail.com

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,541,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,96,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,345,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,67,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,242,लघुकथा,1248,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2005,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,709,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,793,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,83,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,204,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: पखवाड़े की कविताएँ
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