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अमित शाह का आलेख - गांधीजी के विरोध से पहले संस्कृति के मर्म को पहचानिए

गांधी के विचार और आज के हालातों में काफी अंतर है। उनके उपदेश आज भी जीवित है, लेकिन संघर्षरत है। कई लोग गांधीजी को देश का विरोधी भी मानते है, लेकिन वह इस संस्कृति के मर्म के अनुसार आगे बढ़े। जिसे पहचानने की जरूरत है। कई लोग दावा करते है कि गांधीजी हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति को हाशिए पर लाने वाले थे, विरोधी थे। लेकिन असलियत यह है कि इस तरह की कल्पना करने वाले लोगों ने भारतीय संस्कृति के मर्म को को नहीं पहचाना। धर्म का मर्म भी उनसे दूर है। हृदय का मर्म भी आसपास नहीं है। भारतीय इतिहास को उठाकर देख लीजिए, वह हमेशा कहता आया है संसार में एकता होनी चाहिए। सभी जगह पर भाव एक होने पर बेहतर है। हमें मानव जाति से प्रेम करना चाहिए। अत्याचार और अनाचार का विरोध। उसे फेंक देना चाहिए। उससे घृणा करनी चाहिए।


हम अब बात करेंगे गांधी के उपदेश कहें या उनके सिद्धांत की। इस आधार पर हम चले तो वाकई भारत एकजुट दिख सकता है। प्रेमभाव का उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन गांधी का उपदेशों पर सिर्फ तो सिर्फ उनकी जयंती पर चर्चा होती है। इसी दिन सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और संस्थाओं में गांधी को याद किया जाता है। यह तो खुशकिस्मती है कि नोटों पर राष्ट्रपिता को सम्मान मिला है। नहीं तो लोग वाकई गांधी को आंधी की तरह तेजी से भूल जाते। वह कहते थे आंख के बदले आंख पूरे विश्व को अंधा कर देगी। अर्थ साफ था। माफ करने की सीख दे रहे थे। आज यह बहुत कम दिखने को मिलता है। उन्होंने समाज को बदलने के लिए पहले खुद को बदलने की सीख दी। वह कहते थे दुनिया में आप जो बदलाव चाहते हो, वैसे खुद बन जाइए। गांधी सभी धर्मों को भी समान भाव से देखते थे। उनका कहना था – सभी धर्मों की इज्जत करों। सत्य की राह पर चलना, कपड़ों की बजाए चरित्र से व्यक्ति की पहचान, मौन सबसे सशक्त भाषण, कायरता से अच्छा लड़ते-लड़ते मर जाना जैसी सीख हमें गांधीजी से ही मिली है। हालांकि हमारी युवा पीढ़ी 21वीं सदी में इसकी पालना किस तरह कर रही है वो आप भी जानते हो और मैं भी।


गांधीजी की एक बात मैं हमेशा अपने जहन में रखता हूं। वो कहते थे अक्लमंद काम करने से पहले सोचता है और मूर्ख काम करने के बाद। यह कुछ शब्दों की लाइन काफी कुछ कह जाती है। शायद, इसका विस्तार करने की जरूरत नहीं है। गांधीजी ने अपने जीवन को देश के लिए समर्पित किया। उनके आदर्श और विचारों को सहजना हमारा कर्तव्य है। बल्कि सहजना ही नहीं अपनाना भी हमारा दायित्व बनता है। हालांकि देश में कई संस्थान और कॉलेज ऐसे है जिन्होंने गांधीवाद को देश के लिए जिंदा रखा है। इससे हमें अहसास होता है कि गांधी अभी जाग रहे हैं। वर्धमान खुला विश्वविद्यालय महात्मा गांधी के सिद्धांतों को लेकर विशेष प्रकार के कोर्स चला रहा है तो नार्वे में एक इंस्टीट्यूट की ओर से गांधी पर ही पाठ्यक्रम चल रहा है। इस तरह विदेशों में कई विश्वविद्यालय और संस्थान शांति का पाठ गांधीजी के माध्यम से चला रहे हैं। भारत में भी जनता और प्रशासन के बीच मीठे रिश्तों की भूमिका निभा रहा है। देहात और शहरों के लोग भी गांधी के विचारों को खुले दिन से प्रयोग में ला रहे हैं, लेकिन इसे आक्रामकता से अपनाने की जरूरत है।


गांधीजी की हत्या के पहले ही सुरक्षाकर्मियों को इसका अंदाजा लग गया था। उन्होंने गांधीजी को सुरक्षा के लिए पुलिस के जवान बढ़ाने की पेशकश की, लेकिन वो माने नहीं। उन्होंने उल्टा सुरक्षा बढ़ाने पर बिड़ला सभागार में नहीं आने की चेतावनी दे दी। बस उनकी बात कौन टाल सकता था। जिस दिन उनकी हत्या हुई उस दिन भी वह उसी खुली छाती लिए हुए प्रार्थना की तैयारी कर रहे थे। उन पर खतरा था, लेकिन वह निडर थे। गोडसे सफल हो गया। जबकि गांधी खुद दूसरों के लिए इस्पात के तारों का कवच बुनता था। आज हिंसा और रूढ़िवादिता के सामने सीना खोलकर डांटने वाले दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ते। संप्रदायवाद, धर्म के नाम पर हिंसा फैलाने वाले गली-गली, मोहल्लों में मिल जाएंगे। गांधी की आवाज दबी पड़ी हुई है। नफरत की बातें बहरे भी सुन लेते है। कभी-कभी मन कहता है यह सब बकवास है कि गांधी अमर है। शास्त्रों में ऐसे महान पुरुष के लिए अमर की संज्ञा दी गई है। लेकिन सचमुच कभी महसूस होता है मेरा गांधी मर गया है


समाज में जागरूकता के लिए समय रहते राष्ट्रपिता के विचारों को अपनाने के लिए कदम उठाने होंगे। मनुष्य में उनके सिद्धांतों की चेतना और जागृति को पैदा करना होगा। प्रशासन, पुलिस, वकील, नेता, चिकित्सक और आमजनता को एकजुट होना होगा। समाज में अपनी भागीदारी बढ़ानी होगी। यह सबकुछ सही रहा तो ही हैवानियत की ताकत को हम असफल करने में कामयाब रहेंगे।

 

संदर्भ : गांधी जयंती

 

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अमित शाह, लेखक एक राष्ट्रीय अखबार में युवा पत्रकार है।
Amitbankora@yahoo.com

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