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धर्म का नाटक काम सारे अधर्मी / आलेख / दीपक आचार्य

 

 

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हम सब अपने आपको परम धार्मिक मानने और मनवाने के लिए पूरी जिन्दगी होम दिया करते हैं। हमें अच्छी तरह पता है कि भगवान और धर्म की बातों से किसी भी लुभाया जा सकता है, हमेशा के लिए प्रभावित किया जा सकता है।

हमने धर्म को कर्मकाण्ड और उपासना पद्धतियों तक सीमित करके रख दिया है। हमें पता है कि धर्म के नाम पर कोई कुछ भी कर सकता है, कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है, जो रोकने की कोशिश करेगा, उसके पीछे लगने के लिए पूरी की पूरी फौज उमड़ आती है।

नीचे से लेकर ऊपर तक सारे सांसारिक, गृहस्थी और संसार को त्याग कर वैराग्य धारण कर चुके लोग धर्म के नाम पर  जो कुछ कर रहे हैं वह कितने प्रतिशत धर्म की श्रेणी में आता  है उसके बारे में सभी जानते हैं।

धर्म व्यापक एवं विराट अर्थ वाला वह शब्द है जो सनातन परंपरा से चला आ रहा है। धर्म को समझना किसी के बस में नहीं है लेकिन जो यह समझ लेता है कि जो धर्म को धारण करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

धर्म के दस लक्षण है। और जो इनका पालन करता है वही धार्मिक कहलाने का अधिकारी है। इनमें धैर्य, क्षमा, वासनाओं पर नियंत्रण, चोरी न करना, आन्तरिक और बाहरी सभी प्रकार की पवित्रता, इन्दि्रयों को वश में रखना, बौद्धिक क्षमताओं का रचनात्मक उपयोग, अधिकाधिक ज्ञानार्जन के लिए निरन्तर प्रयासरत रहना,  मन, वचन और कर्म सभी प्रकार से सत्य का पालन और क्रोध नहीं करना शामिल है। 

अब इन दसों कसौटियों पर जो सौ फीसदी खरा उतरता है वही धार्मिक कहा जा सकता है। जो लोग इनका पालन नहीं करते, उन्हें धार्मिक नहीं कहा जा सकता, ऎसे लोग धर्म के नाम पर ढोंग, पाखण्ड और घूर्तताओं में रमे हुए माने जा सकते हैं।

इन लोगों को धर्म से कोई सरोकार नहीं होता, इन्हें केवल इसी बात से मतलब रहता है कि लोग उन्हें धार्मिक कहते रहें और धार्मिक मानते रहें ताकि धर्म की आड़ में वे अपने धंधों को बरकरार रख सकें और प्रतिष्ठा भी प्राप्त कर सकेंं।

आजकल हर शातिर इंसान को यही लगता है कि प्रतिष्ठित होना है, अपने अपराध ढंकने हों और अपने बिजनैस के लिए व्यापक नेटवर्क स्थापित कर अधिक से अधिक लोगों से परिचय बढ़ाकर लाभ उठाने की तमन्ना हो तो इसके लिए धर्म से बढ़कर और कोई निरापद, सस्ता और सहज मार्ग है ही नहीं।

किसी मन्दिर की गतिविधियों से जुड़ जाओ या फिर किसी बाबाजी के शिष्य बन जाओ। ये दोनों ही मार्ग धर्म के नाम पर बहुत आगे तक ले जाने वाले हैं। फिर जिसे धर्म या किसी बाबाजी का अभयदान प्राप्त हो जाए, शिष्य में गिनती हो जाए तो कहने ही क्या।

मन्दिरों में आजकल वीआईपी कल्चर का प्रभाव दिनों दिन बढ़ रहा है। मन्दिरों की वर्तमान स्थिति शांति और आत्म आनंद देने की बजाय दर्शनीय और पर्यटन स्थलों में तब्दील होती जा रही है जहाँ साधनात्मक, सेवा-परोपकार और शांति अनुभव कराने जैसी स्थितियों की बजाय सब कुछ बाजारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है।

यहां तक कि प्रसाद और चढ़ावा तक भी बेचा जा रहा है। इससे बड़ी शर्मनाक स्थिति और क्या होगी। लाखों लोग जिस देश में भूखे सोने को विवश हों, तन ढंकने को कपड़ा नहीं हो, इन हालातों में मन्दिरों में प्रसाद, भगवान को चढ़ाये गए श्रृंगार और दूसरी ढेरों प्रकार की सामग्री बिकने लगे, इससे बड़ा मानवता का अपमान और क्या होगा।

बहुत सारे देवालयों की स्थिति यह है कि वे पर्यटन की दृष्टि से विकसित हो रहे हैं, इनका धर्म से कोई सरोकार नहीं रहा। केवल अधिक से अधिक लोगों की आवाजाही बनाए रखने और चढ़ावे की रकम का भण्डार दिन ब दिन बढ़ाते रहने की चाहत के सिवा कोई लक्ष्य नहीं है।

एक गरीब आदमी के भाग में न महंगा प्रसाद है, न और कुछ। फोटो और तस्वीरें भी बिकने लगी हैं। कोई फोटो खिंचना भी चाहे तो नहीं खींच सकता। धंधेबाज फोटोग्राफरों और दुकानदारों से साँठ-गाँठ कर मन्दिरों में जगह-जगह बोर्ड लगवा दिए गए हैं - फोटोग्राफी करना मना है।

वीआईपी कुछ भी कर सकता है, भगवान की ओर पीठ करते हुए आसानी से फोटो खिंचवा सकता है। पता नहीं फोटो खिंचने से भगवान को क्या नुकसान हो जाएगा, भगवान किस प्रकार नाराज हो जाएंगे, भगवान का फोटो किस तरह खतरा पैदा कर देगा।

इसका जवाब भगवान के संरक्षकों के पास नहीं है। जिसकी जो मर्जी हो, वह धर्म के नाम पर करने लगा है। जो मन्दिर शांति और आत्म आनंद के लिए एकान्त और मौन परिसर रहे हैं वहाँ दिन-रात माईक लगाकर शांति भंग की जा रही है। 

मन्दिरों का अर्थ ही समाप्त हो गया है। कोई भी भक्त या साधक अपनी ओर से मन लगाकर कोई स्तुति नहीं कर सकता, जो माईक से सुनाया जा रहा है, वही सुनते रहो और आगे बढ़ो। खुद भगवान भी इन माइकासुरों से परेशान हैं।

कोई आश्चर्य नहीं कि कहीं कोई चमत्कार हो जाए और भगवान मूर्तियों से बाहर निकलकर शांति भंग करने वाले अपने संरक्षकों की ठुकाई कर दे और साफ-साफ कह डाले कि मन्दिरों का निर्माण शांति और एकान्त के लिए है, शोरगुल के लिए नहीं।

मन्दिरों से जुड़े पुजारियों, बाबाओं और पूजा-पाठ के नाम पर अपनी दुकानदारी चला रहे पण्डित भी इसलिए चुप हैं क्योंकि बात धंधे और दक्षिणा की है। धर्म के दस लक्षण का पालन नहीं करने वाले लोगों से धर्म रक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

बहुत सारे लोग हैं जो अपने आपको धार्मिक मानते हैं और गर्व करते हैं कि उनके मुकाबले कोई भगत या सेवादार नहीं है लेकिन उनकी निजी और सार्वजनिक जिन्दगी को देखें तो इनके चरित्र, स्वभाव और लोक व्यवहार में रात-दिन का अंतर साफ-साफ दिखाई देता है।

धर्म का सीधा संबंध सदाचार, कर्तव्य कर्म संपादन, नैतिक मूल्यों, मानवता, दया, करुणा, मैत्री, सत्य, शुचिता जैसे बुनियादी खंभों पर टिका हुआ है। कितने लोग हैं जो धर्म के लक्षणों और अपने कर्तव्यों को पूरा कर पा  रहे हैं। कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

धर्म केवल दिखावे के लिए नहीं है, आचरण के लिए है। और जब आचरण सही होगा तो दूसरे लोग उसका अनुकरण भी करेंगे।  हमारी कथनी-करनी में अंतर है, पग-पग पर झूठ बोलते हैं, अपने स्वार्थ में कुटुम्ब, अपनी मातृभूमि, समाज और देश को भूल जाते हैं।

अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार नहीं रहते, मुद्रा, उपहारों और दूसरे सभी प्रकार के लोभ-लालच में आकर धर्म को भूल जाते हैं। आखिरकार हम धर्म के नाम पर क्या करना चाहते हैं। धर्म के मूल मर्म को आत्मसात करने की आवश्यकता है ताकि धर्म को हम खुद अच्छी तरह समझ सकें और धर्म के सभी सिद्धान्तों का पूरा-पूरा पालन करते हुए सच्चे धार्मिक बन सकें। ऎसा यदि हम कर सकें तो ठीक है वरना धर्म के नाम पर ज्यादा समय तक यह सब नहीं चलने वाला।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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