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रचना और रचनाकार (९) / नागार्जुन के काव्य में तंज और तेवर / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

नागार्जुन के काव्य में कई धाराएं समाहित हैं. लेकिन दो धाराएँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं. एक में वे कविताएँ हैँ जिनके भाव लोक में कोमलता और मधुरता है. ये या तो मानवीय संबंद्धों की अनुभूतियों की कविताएँ हैं या फिर प्रकृति के विभिन्न रूपों के सौंदर्य की अनुभूतियों का चित्रण करने वाली कविताएँ हैं. नागार्जुन की कविताओं का यह वर्ग बहुत संमृद्ध है. लेकिन उनकी कविताओं की एक अन्य धारा राजनैतिक और सामाजिक कविताओं की है जिनके भाव-लोक में आक्रोश, आलोचना, व्यंग्य, कटाक्ष, तंज और तेवर है. वस्तुतः इस वर्ग की कविताओं में ही उन्हें जनकवि और एक लोकप्रिय कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया है.

नागार्जुन के लिए कविता मात्र एक साहित्यिक कर्म ही नहीं है, यह एक व्यापक सामाजिक कार्य है. उनके जीवन और रचना कर्म में कहीं कोई फाँक नहीं दिखाई देती. जैसे अन्य सभी सामाजिक कार्यों में व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी निभाता है उसी तरह नागार्जुन अपने कविता-कर्म में अपने उत्तरदायित्व को न केवल समझते हैं बल्कि उसे उठाते भी हैं. इसीलिए उनकी कविता भारतीय समाज, संस्कृति और राजनीति में विद्यमान विकृतियों और विरोधाभासों की न केवल पहचान कर उन्हें वाणी प्रदान करती है बल्कि उनकी तीखी आलोचना भी करती है. इतना ही नहीं, वह अमानवीय होती जा रही सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों के विरुद्ध संघर्ष के लिए एक हथियार के रूप में काम करती हैं. नागार्जुन ने अपने कविता-कर्म को अमानुषिक समाज को बदलने के लिए एक प्रभावशाली शस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया है. उनकी कविताएँ वर्तमान असहनीय स्थितियों पर टिप्पणी करती हैं, विसंगतियों पर सवाल उठातीं हैं, व्यंग्य करती हैं, कचोटती हैं. विद्रूपताओं पर हँसती हैं. ग़ैरज़िम्मेदार लोगों को चिढाती हैं. रूढियों को हास्यास्पद बनाती हैं और इन सब बातों के बावजूद वे संवेदनाओं की अभिव्यक्ति और मानवी आकांक्षाओं का प्रतिवेदन भी हैं.

यदि हम यह कहें कि हिंदी में भारतेंदु युग से आज तक का साहित्य व्यंग्य की गिरफ्त में आ गया है तो कदाचित यह अतिशयोक्ति नहीं होगी. हिंदी साहित्य का आज प्रधान स्वर तंज और तेवर, व्यंग्य, विक्षोभ और व्याक्रोश का है. गत शताब्दी का संपूर्ण भारतीय परिदृश्य व्यंग्य के विकास के लिए काफी उर्वरक रहा. भारतेंदु युग में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यदि व्यंग्य का निशाना भारत में विदेशी साम्राज्यवाद था जो कि “भारत दुर्दशा” का कारण बना तो स्वातंत्र्योत्तर काल में हमारी आर्थिक, सामाजिक और राज- नैतिक व्यवस्था कुछ ऐसी रही कि जिसने जनता के दुःख को दूर करने की बजाय उसे और भी संकट में डाल दिया. हमदर्दी और इंसानियत के पुतले बने नेताओं का आज सारा पाखंड आमआदमी को भौचक कर देता है. किसी भी संवेदनशील साहित्यकार को ये सारी स्थितियाँ परेशान किए बिना नहीं रहतीं. उसके भीतर बैठा इंसान आज के परिदृश्य से चकित है और विक्षोभ से भर उठता है. उसके साहित्य-कर्म में कचोट और कटाक्ष का स्वर तीखा और गहरा हो जाता है.

अपने समय की ये स्थितियां नागार्जुन को भी परेशान करती हैं. वे परिवेश की विकृतियों से, अधिसंख्यक नागरिकों की आर्थिक दरिद्रता से, व्यक्तियों से – विशेषकर शासकों और नेताओं के घिनौने और टुच्चे स्वार्थ से – व्यथित और क्रोधित हो उठते हैं और इसे अपनी कविताओं में वाणी देते हैं. उनकी व्यंग्य कविताएँ सुशिक्षित और संवेदनशील मस्तिष्क की सोची-समझी रचनाएँ हैं जो हँसाती नहीं बल्कि ललकारती हैं, यथास्थिति को बदलने के लिए कुरेदती हैं और प्रहार करने की मुद्रा अपनाती हैं. –"लाएँ मीठे वचन कहां से / फींका है मन / चिंतन खारे."

नागार्जुन की काव्यानुभूति जीवन और जगत के प्रत्यक्ष अनुभव से जुड़ी हुई है. वह मनुष्य के जीवन से संपृक्त है. लेकिन वह कौन सा मनुष्य है? ज़ाहिर है, वह और कोई नहीं, आम आदमी ही है जो आज भी व्यवस्था की चक्की में पिसता है, अकाल और दुर्भिक्ष में तो भूखा मरता ही है, सामान्य दिनों में भी भूखा रहने के लिए अभिशप्त है क्योंकि वह अन्याय और उत्पीड़न का शिकार है. नागार्जुन प्रतिबद्ध और आबद्ध हैं –

जी हां, प्रतिबद्ध हूँ –

बहुजन समाज की अनुपम प्रगति के निमित्त -

संकुचित "स्व" की आपाधापी के निषेधार्थ

+ + +

आबद्ध हूँ, जी हां, आबद्ध हूँ –

स्वजन परिजन की धार की डोर में

प्रियजन के पलकों की कोर में

आबद्ध, जी हां, शतधा आबद्ध हूँ

यही कारण है कि नागार्जुन क्रत्रिमता, आडम्बर और प्रदर्शन से कोसों दूर, पीड़ित, वंचित और अंत्यजों के साथ दृढता से खड़े दिखाई देते हैं. वे कहते हैं

जनता मुझसे पूछ रही है / क्या बतलाऊं

जन-कवि हूँ, मैं साफ कहूँगा / क्यों हकलाऊं

हर कवि को तो ऐसा नहीं लगता. लेकिन नागार्जुन को तो अवश्य यह लगता है कि जनता उनसे सवाल कर रही है, पूछ रही है कि आखिर समाज में यह अन्याय, यह विषमता क्यों है? उन्हें लगता है कि जनता उनकी ओर मुक़ातिब है. ऐसे में नागार्जुन

समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व समझते हैं और उसे निबाहना चाहते हैं. जनता को सिर्फ ख़ुश करने के लिए, उससे लगी-लिपटी बात तो कही नहीं जा सकती. उसे तो साफ बात बतानी होगी, जनकवि होने के नाते जो भी कहना है स्पष्ट शब्दों में ही कहना होगा. नागार्जुन के मन में कोई द्वंव्द या द्विध नहीं है. लाभ-हानि का कोई विचार नहीं है. फिर भला, "क्यों हकलाऊ?" हकलाने से अर्थ यहां अपने किसी स्वार्थ के चलते साफ-साफ न कहने की मानसिकता से है. लेकिन जब इस तरह की कोई ऊहापोह या असमंजस की स्थिति उनके पास है ही नहीं तो स्पष्ट ही उनमें वह साहस सहज आ जाता है कि वे अपनी बात डंके की चोट पर कह सकें. एक जनकवि से जब जनता सवाल करती है तो किंतु-परंतु, अगर-मगर से काम चलने वाला नहीं है. नागार्जुन असमंजस की भाषा नहीं बोलते. उनकी कविताएँ सीधे-सीधे कटाक्ष करती हैं. सफेद कॉलर वालों के दंभ और दिखावे पर वे बड़े इत्मीनान से मारक चोट करते हैं. नागार्जुन को हर प्रकार की विषमता, पाखंड और विद्रूप पर सहज ही क्रोध आता है-

अंदर-अंदर विकट कसाई बाहर खद्दरधारी हैं

ज़मींदार हैं, साहूकार हैं, बनियाँ हैं, व्यापारी हैं

......

झूठी जयजयकार मची है सच कह दूं भय्या मैं तो

तंग आ गया सुनते सुनते वतन-फ़रोशी का कीर्तन

लंदन, वाशिंगटन जा रहे उड़ उड़कर सब नेतागण

जीवन की सच्चाई को पूरी तल्खी के साथ उतारते हुए नागार्जुन लिखते हैं –

बतलाऊँ कैसे लगते हैं / दरिद्र देश के धनिक -

कोढी कूबड़, तन पर मणिमय आभूषण

विषमता पर इतनी तीखी और हिक़ारत भरी टिप्पणी बहुत कम देखने को मिलती है. फटे पुराने क्म्बल पर रेशमी थेगड़े इसके सामने फींके पड़ जाते हैं.

नागार्जुन की काव्यानुभूति जीवन और समाज के प्रत्यक्ष अनुभवों से जुड़ी हुई है. वे सीधे उस आम आदनी से जुड़ते हैं जिसके लिए जीना दुष्वार हो गया है. जो दाने-दाने को मोहताज हो गया है. जिसे रोज़ की रोटी नहीं मिलती. उनकी प्रसिद्ध कविता "अकाल और उसके बाद", में जिस व्यक्ति के घर कई दिनों के बाद चूल्हा जला है उसका विवरण देखते ही बनता है –

कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास

कई दिनों तक काली कुतिया सोई उसके पास

कई दिनों तक लगा भीत पर छिपकलियों का गश्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुँआ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आंखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद

इस कविता में व्यंग्य तो अपनी पूरी बुलंदी के साथ मुखर है ही, इसकी कलात्मक प्रस्तुति भी एक उदाहरण है. इसमें एक भूखे व्यक्ति के दुःख को उभारा ही गया है किंतु इसका प्रत्यक्ष उल्लेख इसमें कहीं नहीं है. छिपकलियाँ हैं, चूहा और कौआ है, लेकिन उस पीड़ित व्यक्ति का उल्लेख प्रत्यक्षतः कहीं नहीं है कि जिससे इसका वास्तविक सरोकार है. केवल उसे व्यंजित भर किया गया है.

नागार्जुन वस्तुतः हर उस प्राणी के प्रति हमदर्द हैं जो सताया हुआ है और असहाय है. इसमें केवल मनुष्य ही नहीं ऐसे सभी प्राणी सम्मिलित हैं. वक्रतापूर्ण व्यंजना के साथ सहज मानवीय हमदर्दी और आत्मीय लगाव को उन्होंने जिस तरह साधा है वह उनकी अपनी विशेष उपलब्धि है. इस संदर्भ में उनकी कविता "नेवला" दृष्टव्य है. नेवला शीर्षक इस कविता में कोई उपेक्षणीय जीव नहीं है. मीसा में बंद, बाबा के अन्य साथियों की तरह, वह भी उनका अपना ही मित्र है. उसके साथ कवि का आत्मिक एकालाप सहृदयों को अनायास नागार्जुन की भावनात्मक दुनिया से जोड़ देता है. कविता के लिए ऐसा कोई विषय नहीं है जिसे नागार्जुन अस्पर्श्य मानते हों. केकड़ा, बगुला, सूअर, मुर्ग़ा, कोयल आदि, तरह-तरह के जीव-जंतुओं को उन्होंने अपने कविता-देश में ससम्मान स्थान दिया.

परंतु उनका काम्य तो जीवित मनुष्य और उसका सम्मान ही है. वे लोग जो समाज में गरिमामय जीवन नहीं जी पाते, नगार्जुन के काव्य की प्रथम चिंता हैं. जीते इंसानों को नंगा-भूखा देखकर उन्हें अत्यंत क्षोभ होता है. "मन करता है" शीर्षक कविता में वे इसी क्षोभ को वाणी देते हैं. –

मन करता है:

नंगा होकर कुछ घंटों तक तट सागर पर मैं खड़ा रहूं

यों भी क्या कपड़ा मिलता है?

धनपतियों की ऐसी लीला! .....

मन करता है:

नंगा होकर मैं खड़ा रहूं सागर तट पर

कुछ घंटो तक क्या, जीवन भर

नंगा होकर –

यों भी क्या कपड़ा मिलता है?

साथ ही साथ नागार्जुन उस बेहूदा समृद्धि को हास्यास्पद बना देते हैं जो एक ऐसे अभि-जात्य वर्ग का निर्माण करती है जिसे दरिद्र और ग़रीब परिश्रमी लोगों के साथ बैठने में हिचक ही नहीं तकलीफ भी होती है. वे इस तथाकथित अभिजात्य वर्ग से पूछते हैं –

कुली मज़दूर हैं / बोझा ढोते हैं, खींचते हैं ठेला

धुँआ धुँआ भाप से पड़ता है साबका / थके माँदे

जहां जहां जाते हैं / सपने में भी सुनते हैं

धरती की धड़कन / आकर ट्राम के अंदर

पिछले डिब्बे में बैठ गए हैं / इधर उधर

तुमसे सटकर / आपस में उनकी बतकही

सच सच बताओ / नागवार तो नहीं लगती है?

जी तो नहीं कुढता है / घिन तो नहीं आती है?

ऐसे अभिजात्य गोत्र के लोगों से नागार्जुन एक खास दूरी बनाए रखना चाहते हैं, इसीलिए वे स्व्यं को “औघड़ गोत्र का कवि” मानते हैं.

वह जो अपने शरीर श्रम की रोटी खाता है, नागार्जुन उसी का सम्मान करते हैं – भले ही वह अपने प्रयत्नों में असफल ही क्यों न रहा हो –

जो नहीं हो सके पूर्ण काम / मैं उनको करता हूं प्रणाम

कुछ कुंठित औ” कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट ...

जो छोटी सी नैया लेकर / उतरे करने को उदधि-पार

जो उच्च शिखर की ओर बढे / रह रह नव उत्साह भरे ...

असफल ही नीचे उतरे / उनको प्रणाम ...

थी उग्र साधना, पर जिनका / जीवन नाटक दुःखांत हुआ ..

जिनकी सेवाएं अतुलनीय / पर विज्ञापन से दूर रहे

प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके / कर दिए मनोरथ चूर-चूर

--उनको प्रणाम!

इतना ही नहीं, वे समान धर्मा साहित्यकारों से जनसाधारण के प्रति स्पष्ट पक्षधरता की माँग करते हैं –

अजी आओ, / इतर साधारण जनों से अलहदा होकर रहो मत

कलाधर या रचयिता होना ही नहीं पर्याप्त है

पक्षधर की भूमिका धारण करो ...

विजयिनी जनवाहिनी का पक्षधर होना पड़ेगा ..

अगर तुम निर्माण करना चाहते हो

शीर्ष संस्कृति को अगर सप्राण करना चाहते हो

समस्त भारतीय दर्शन और काव्य का आरंभिक बिंदु दुःख रहा है. इस दुःख और उसके निवारण की कोशिश बुद्ध ने भी की है और इसका दिग्दर्शन अपनी कहानियों और उपन्यासों में प्रेमचंद ने भी किया है. दुःख कई प्रकार के होते हैं. कुछ दुःख ऐसे होते हैं कि जिनपर इंसान का वश नहीं होता. प्राकृतिक प्रकोपों से उत्पन्न दुःख बहुत-कुछ इसी प्रकार के हैं. वह जिन्हें हम आध्यात्मिक दुःख कहते हैं, इनका भी साधारण उपायों से निराकरण संभव नहीं है. लेकिन भौतिक दुःख जिन्हें नागार्जुन ने भौतिक ताप कहा है, ऐसे दुःख हैं जिन्हें स्वयं मनुष्य ने ही निर्मित किया है और जो मनुष्य द्वारा ही आसानी से दूर किए जा सकते हैं. भूख, बीमारी, बेकारी, अज्ञान, जहालत आदि, ऐसे ही दुःख हैं. नागार्जुन की कविता इन्हीं दुःखों से ग्रसित भूखों, ग़रीबों, बेसहारा और सताए हुए लोगों की कविता है. नागार्जुन दुःख के और दुःखियों के कवि हैं. अपने कवि-कर्म में उनका वास्तविक और प्राथमिक दुःख यही है कि हम क्योंकर ऐसे समाज की रचना नहीं कर पा रहे हैं जो मनुष्य के कम से कम इन भौतिक दुःखों को दूर कर सके – जब कि यह सर्वथा संभव है. वे एक ऐसे समाज निर्माण की दिशा में हम सभी को उन्मुख करते हैं जिसमें न्याय और समानता हो, सहृदयता और प्रेम हो. वर्तमान समाज पर उनका तंज और तेवर सिर्फ इसीलिए है कि चाहते हुए भी मनुष्य अपने भौतिक दुःखों का निराकरण करने में असमर्थ दिखाई देता है जब कि वह वस्तुतः ऐसा है नहीं .

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