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होरी के रंग / कहानी / धर्मेंद्र निर्मल

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होरी के रंग तोर मुंड़ म टंगिया परय ! रोगहा ! कीरहा ................... कहते हुए फूलों पटापट अपनी उंगलियां फोड़ने लगी।  फागुन का दिन है। फूलो ...

होरी के रंग

तोर मुंड़ म टंगिया परय ! रोगहा ! कीरहा ................... कहते हुए फूलों पटापट अपनी उंगलियां फोड़ने लगी। 

फागुन का दिन है। फूलो गालियों की फाग गा रही है। गाँव के बीच चैपाल पर फाग का फड़ जमा हुआ है। चौपाल से नगाड़ों की थाप गली-गली घूमती गाँव के छोर तक गूँज रही है। 

मस्ती में सराबोर इन थापों ने फूलो की फाग को कोई तवज्जो नहीं दी। फाग के शोर की भीड़ में शामिल होकर फूलो की गालियाँ भी दूर जाती रही। गलियों ने भी मुँह फेर लिया। वे जल्दी ही अगली मोड़ पर मुँह बिचकाती मिटकाती मुड़ गई - हूँ, बड़ी आई ..........। दीवारें, छप्पर का मुँह लगटकाए यूँ ही खड़ी रही। बोकबाय देखती। मानो कह रही हो - तुम्हें क्या फर्क पड़ता है फूलो ! तुम तो शेरनी हो न ? शेरनी ! हाँ!! यहीं तो कहती है अपने आपको फूलो। कहती क्यो ? है भी फूलो, शेरनी।

संगी-जहुँरियों में ऐसा कोई नहीं जो इसकी बात पर आरी चला सके। सब पर अपनी मर्जी चलाती है फूलो। मुहल्ले के सारे बच्चे डरते हैं इससे। दरसल मुहल्ले के बच्चों में सबसे बड़ी है फूलो। बड़ी नहीं बल्कि बराबर ही है। लेकिन भरी पूरी उँची देह की होने के कारण इसे सब बड़ी मानते-समझते हैं। ऊपर से बड़ी चंचल शरारती और मुँहफट भी। इसलिए लोग चाहकर भी इसके मुँह नहीं लगते।

गली के किसी भी चैरे को अपना आसन बनाकर बैठ जाती है। दरबार लगा लेती है। जिस-तिस पर अपना हुकुम झाड़ने लगती है। सारे मुहल्ले में एकछत्र राज है फूलो का।

होरी भी इसी मुहल्ले में रहता है। होरी की उम्र फूलो की उम्र के बराबर है। चाहता तो होरी भी मुहल्ले के बच्चों पर शासन कर सकता है। लेकिन मजबूर है बेचारा! मुहल्ले में इसकी उमर का छोकरा भी तो नहीं है ,जो साथ दे सके। लाला और मिलन है, मगर वे इन लोगों के तीन पाँच में पाँव नहीं धरते। करना-धरना चाहते है तो भी नहीं कर सकते। दरसल मुहल्ले में लड़कियों की संख्या ज्यादा है लड़कों से। ज्यादा नहीं बहुत ज्यादा है। लोग तो यहाँ तक कहते है कि पूरा लड़कियों का मुहल्ला है - भरका पारा। 

जी हाँ! यही नाम है इस मुहल्ले का। जहाँ फूलों सी कोमल और तितलियों सी चंचल फूलो अपना हुकुम चलाती है। जहाँ होरी मंडराता रहता है। नंग-धडंग। कभी इधर-कभी उधर। नंग-धडंग होरी। पता नहीं उसे किसी ने आज तक चड्डी पहने पहले देखा भी है या नहीं। देखा भी होगा तो याद नहीं। वैसे भी बच्चे किसे याद रखे किसे बिसरे। दुनिया को इससे मतलब न बच्चों को। 

मुहल्ले में होरी का राज नहीं चलने का एक यह भी कारण है। होरी का नंग-धडंग रहना। दूसरा कारण है फूलो की शरारत। शरारत में होरी के नंग-धडंग होने का फायदा उठाना। इसलिए होरी फूलो से दूर-दूर रहता है। मगर फूलो बड़ी चालाक छोरी है। किसी न किसी बहाने बुला ही लेती है, होरी को। 

अभी कल ही की तो बात है। सब रामलीला-रामलीला खेल रहे थे। गाँव में जब कभी कोई लीला की मण्डली आती है। कभी नाच होता है। बच्चे उसकी नकल उतारा करते हैं। अपने-अपने मुहल्ले में, अपने-अपने तरीके से। बाकी मुहल्ले का जैसा भी हाल हो। भरकापारा में फूलो का अपना तरीका है नाटक-नौटंकी खेलने का। नाटक-नौटंकी की क्यों ? सुर्रे-फल्ली, खो-खो, कबड्डी, डण्डा पचरंगा कोई भी खेल हो। फूलो अपने ही अंदाज में खेलती है।

पात्रों के चरित्रों से उसका कोई लेना-देना नहीं। वह वही खेल निभाती है जिसमें उसकी दबंगई चले। चौरे पर बैठ जाती है। एक पैर को दूसरे पैर पर रख लेती है। हो गई रामलीला शुरू। 

छमियाँ नाच शुरू किया जाय हा..हा...हा -रावण की तरह गरजती है फूलो।

छोटी-छोटी लड़कियाँ नाचने लगती है छमियाँ बनकर। 

ऐसे ही रामलीला चल रही थी कल। फूलो अपने आसन में विराजमान थी रावण की मुद्रा में। होरी भी बैठा था दर्षक दीर्घा में। फूलो से बेपरवाह छमियाँ नाच देखने में मस्त। अचानक फूलो को मस्ती सूझी। यह मस्ती बीच-बीच में फूलो को सूझती रहती है। यही मस्ती और शरारत भी फूलो के शासन का राज है।

फूलो को अचानक मस्ती सूझी। उसने आवाज लगायी - होरी!

होरी बेपरवाह छमियाँ नाच देखने में मस्त। उसने सुना भी कि नहीं कोई नहीं जानता। हो न हो होरी सुनकर भी अनसुना कर रहा हो। हो भी सकता है। क्योंकि होरी अच्छी तरह वाकिफ है फूलो की शरारत से। फूलो फिर चिल्लाई - होरी! इस बार आवाज जरा तेज थी। सो होरी को सुनना पड़ा। मन-मारकर उसकी ओर देखना पड़ा होरी को। उसने देखा फूलो बुला रही है उसे। होरी जाना नहीं चाहता फूलो के पास। फूलो के पास गया, माने होरी का फिर छीछालेदर होना है। यही एक करलाई है होरी का फूलो के संग -साथ खेलना। 

होरी ने देखा - फूलो बुला रही है उसे। नहीं! इस बार नहीं जाना है। नहीं फँसना है मुझे फूलो के चंगुल में। अनदेखा-अनुसना कर दिया होरी ने। एक कौतूहल और भय। दोनो ही आ जा रहे थे होरी के दिमाग में। बारी-बारी से । रह-रहकर। कुछ देर रूककर होरी ने कनखियों से देखा - इस बार फूलो अलग ही अंदाज में बुला रही है। शायद! अपने बाजू में बैठने का इषारा कर रही है। इस बार रोक नहीं पाया होरी अपने आपको। सोचा मंच में बैठने के लिए बुला रही है। मुहल्ले का लीला मंच और होरी की यह पूछ-परख। होरी उठकर चलने लगा। धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। एक मन संकोच और एक मन उछाह लिए। सामने बैठे बच्चों को आजू -बाजू सरकाते। उनके उपर से अपनी नन्हीं टाँग कूदाकर पार करते।

फूलो देह भर अदाओं से, नैन भर प्यार से देख रही है। होंठ भर-भर मुस्कान निछावर कर रही है। होरी चलकर पास आ रहा है। पास आकर खड़ा हो भी नहीं पाया था। इससे पहले कि होरी कुछ सोच -समझ पाता। फूलो ने चप्प से होरी की चोटली धर ली । दूसरे हाथ से पीछे की ओर धकिया दिया होरी को। सबके सब हँस पड़े। 

होरी कलबला गया। तिलमिलाता हुआ बेतहाशा भागा-

कुत्ती ! कमीनी ! हरामजादी ! साली ...........

प्राण बचाकर भाग रहा है होरी। पीछे -पीछे फूलो की आवाज भी दौड़ लगा रही हैं- आओ न। अरे ! होरी इधर आ। इधर आ ।

जाल से छुटा शिकार पीछे मुड़कर कब देखता है भला। वह सीधे अपने ठिये में जाकर सुकून पाता है। 

बस ! यही एक दर्द है होरी का फूलो के साथ।

होरी का यह दर्द कोई नहीं समझता मुहल्ले में। न बड़े न बच्चे। बच्चे तो समझने से रहे। बड़े शिकायत के बाद भी ध्यान नहीं देते। बच्चे हैं। 10-12 साल के बच्चे खेलेंगे तो खेलेंगे भी क्या। वे मजे लूटने लगते हैं। मजा लूटने में ज्यादातर औरतें होती है। वे पल्लू से मुँह ढाँपकर हँसती है। आपस में बतियाती है - वो फूलो है न ..............।

भीतर ही भीतर अपने आपको गुदगुदाती गदगद रहती हैं वे।

गलियों और दीवारों को कोई  फर्क नहीं पड़ता इन घटनाओं से। वे हमेशा बेपरवाह रहते है। गली उसी तरह मुँह बिदकाकर मिटकाती मुड़  जाती है दूसरी ओर ......हूँ बड़े आए....

और दीवारें ! दीवारें उसी तरह छप्पर का मुँह लटकाए खड़ी रहती हैं। बोकबाय।

पारा- मुहल्ला की औरतों की तरह मुँह ढाँपकर नहीं हँसती । न ही अपने आपको गुदगुदाती है भीतर ही भीतर। न गदगद होती है। न कभी बतियाती है पारे की औरतों की तरह - वो फूलो है न ....

फागुन का दिन है आज। बड़े - बूढ़े बच्चे सब मस्त है फाग में। होरी अपने दुवार में पिचकारी लिए मस्त है। उसे भीड़ से डर लगता है। माँ भी मना करती है । कहीं मत जाना। यहीं खेल। 

होरी अकेले ही मस्त है।

खेलते - खेलते अचानक उसने देखा। गाँव की छोर से फूलो आ रही है। फूलो का घर गाँव के छोर में ही है। वह अपनी धुन में मस्त मंद- मंद मुस्कराती - गुनगुनाती आगे बढ़ रही है । होरी के मन में यक-ब-यक भय और कौतूहल दोनों साथ जाग उठे। पहले वह डरा कि कहीं फूलो....

दूसरे ही क्षण वह संभल गया। नहीं..नहीं. वह फाग देखने जा रही है। ऐसे समय में वह ऐसा नहीं करेगी।

उसने देखा। फूलो गजब खुश नजर आ रही है। थोड़ी शरमाती - इठलाती बल-खाकर चल रही है फूलो। गजब का उमंग है उसके चेहरे पर। उनकी अदाओं का साथ उसके तन भी दे रहे हैं पूरे मन से झूम- झूमकर। मचल-मचलकर।

होरी उसे अचरज से देखता रहा। 

उधर फूलो यही सोच रही थी कि होरी मुझे देख रहा है । उसकी नजर मेरे ऊपर है। शायद ! फूलो यही चाह भी रही थी कि कोई उसे नजर भर देखे। 

कोई क्यों ? होरी क्यों नहीं ?

उसके तन - मन की सारी गतिविधियों से तो यही लग रहा था।

मगर जब ऐसा नहीं हुआ , होरी ने अपनी नजर उस पर से फेर ली। आखिर फूलो को ही कहना पड़ा:- कोई अगर मेरे ऊपर रंग डालेगा न तो मैं उसको खूब मजा चखाउँगी। 

इतने पर भी होरी का ध्यान फूलो पर नहीं गया या यों कहना चाहिए कि होरी की उस नजर से फूलो का मन नहीं भरा। तब  फूलो आगे बोली - आज मैं नई ब्लाउज पहनी हूँ , बाबूजी आज ही बाजार से लेकर आए हैं।

होरी ने अचानक गौर किया। फूलो सचमुच नई ब्लाउज पहन रखी है। चुक्क लाल। ..अच्छा ! अब समझ में आया। तभी तो मैं सोच रहा था कि फूलो आज इतनी इतरा क्यों रही है ?

होरी कुछ नहीं बोला। न कुछ ऐसे हाव- भाव दिखाए कि वह ऐसी कोई हरकत करे। फूलो अब बेफिक्र उसी मस्ती में इतराती शरमाती इठलाती बढ़ती रही। वह अब बेफिक्र है। उसका ध्येय केवल अपनी नई ब्लाउज दिखाना था , सो वह दिखा चुकी।

लेकिन फूलो के ब्लाउज का चुक्क लाल रंग होरी की आँखो में गड़-सा गया। 

वही उसे जाते देख रहा है। चुपचाप। खड़े-खड़े। उसकी आँखो में गड़़ा ब्लाउज का चुक्क लाल रंग उसके मन को चुभने लगा। वह सोचने लगा - अच्छा ! तो मुझे बताने के लिए ही फूलो ने कहा कि कोई उसे रंग न डाले।

होरी सोच रहा है। शायद !् वह रंग डलवाना ही चाहती हो। शायद !!

तब तक फूलो होरी को पार कर कुछ दूर जा चुकी। होरी देख रहा है। फूलो अब इस गली को अलविदा कर दूसरी गली में मुड़ने को है।

फिर पता नहीं होरी को एकाएक क्या सूझा। पीछे से चुपचाप गया और पिचकारी का सारा रंग उड़ेल दिया फूलो की नई ब्लाउज पर......सर्र सर्र....

..और भाग गया। 

फूलो पटापट उँगलियाँ फोड़ती बखानती रही होरी को .....

 

धर्मेन्द्र निर्मल

ग्राम पोस्ट कुरूद भिलाईनगर 

जिला दुर्ग छ.ग.-490024

9406096346

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रचनाकार: होरी के रंग / कहानी / धर्मेंद्र निर्मल
होरी के रंग / कहानी / धर्मेंद्र निर्मल
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