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प्राची अप्रैल 2016 : ऊर्जा का उचित उपयोगः सभी जीवों में एकल / ओम प्रकाश दार्शनिक

आलेख

ऊर्जा का उचित उपयोगः

सभी जीवों में एकल

ओम प्रकाश दार्शनिक

क नाग अपने परिवार के साथ एक बिल में रहता था. इसी परिवार में एक युवा नाग था. उसके माता-पिता ने उसे बिल से बाहर नहीं निकलने दिया. उन्हें भय था कि कहीं वह किसी मुसीबत में न पड़ जाए. एक दिन युवा नाग बगैर बताए अपने बिल से निकल आया. यह पास ही के एक मंदिर में पहुंच कर शिवजी को मूर्ति पर चढ़ गया और फन फैला कर यहां का हाल लेने लगा. तभी वहां पुजारी व अन्य भक्त भी आ गए. ये लोग प्रसन्नता से झूम उठे. चमत्कार हो गया, कहकर नाग राज की अर्चना करने लगे. उसके सामने दूध तथा मिठाई वगैरह रखने लगे. मंदिर में उसके दर्शन के लिए भीड़ लग गई. रात में अवसर पाकर नाग अपने बिल में पहुंचा और अपने माता-पिता से बोला, ‘‘आप तो बिना मतलब के मुझे डराते थे, मुझे तो काफी सम्मान मिला.’’ अगले दिन वह फिर घर से निकला. वह एक बस्ती से गुजर रहा था कि लोग लाठी-डंडे लेकर उसके पीछे पड़ गए. वह किसी प्रकार से अपने प्राण बचाते हुए अपने बिल में वापस हुआ. यह बड़ा ही चकित था. वह सोच रहा था, मनुष्य भी कैसा है. एक स्थान पर जहां वे उसकी अर्चना कर रहे थे, वहीं दूसरे स्थान पर उसकी जान के प्यासे थे.

अपनी प्रवृति को परखेंः यह कथा हमें धर्म के अंधानुकरण के प्रति तो सचेत करती ही है, हमारी प्रवृत्ति पर भी अंगुली उठाती है. जैसा कि हमने दो स्थानों पर नाग के साथ व्यवहार किया, वैसा ही व्यवहार हम लोगों के साथ भी करते हैं. कोई छोटे पद पर है, तो हम उसे मुंह नहीं लगाते, लेकिन जब वह बड़े पद पर पहुंच जाए तो उसकी जय-जयकार करने लगते हैं या इसके विपरीत किसी के अच्छे दिन चल रहे हैं, तो उससे नजदीकियां बनाना चाहते हैं. यहीं उसके दुर्दिन आ गए, तो उससे दूरी बना लेते हैं. हम तो केवल यह देखते हैं कि वह समाज में किस पद पर आसीन है. नाग मंदिर में बैठा है, तो वह पूजनीय है. जब वह मार्ग पर चलता है, तो हम उसके शत्रु बन जाते हैं.

अद्वैत मिटाता है भेद-भावः हम अपने मन में ऊंच-नीचे स्थान बना लेते हैं और वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं. हमने धर्म के, समृद्धि के, रंग के, जाति के, कार्य के भिन्न-भिन्न स्थान बना लिये और किसी को बड़े और किसी को छोटे पद पर बैठा दिया है. यह प्रकृति घृणा का संचार करती है. जबकि भारतीय दर्शन में वेदांत का अद्वैत मत सभी की समानता प्रतियादित करता है. इसके अनुसार, समस्त प्राणी आत्मा है और सभी आत्माएं परम-आत्मा (ब्रह्म-ईश्वर) का अंश है. गोस्वामी जी ने भी कहा है- ईश्वर जीव अंश अविनाशी. अर्थात् जीव (आत्मा) और ईश्वर में कोई अंतर यानी भेद-भाव नहीं है. अद्वैत का कथन है, हम आत्मा और परमात्मा में अज्ञान वश अंतर मानते हैं. जब अज्ञान मिटता है, तब हम स्वयं में भी ईश्वर की अनुभूति प्राप्त करते हैं. ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहकर अपनी आंतरिक ऊर्जा को पहचान पाते हैं. स्वामी विवेकानन्द ने अपने एक आख्यान में कहा था, ‘आत्मा समस्त जीवों का केन्द्र स्थल है. तुम वही हो, जो दूसरे हैं. जो स्वयं को दूसरों से अलग मानता है, वह दुःखी रहता है. जो एकलव्य भाव का अनुभव करता है, वहीं सुख का अधिकारी होता है.’

मूलतः सभी एक हैः डोमेनिक गणराज्य में फेसलेस डॉल (गुड़िया) बिकती है जिसके मुंह पर नाक-आंख-कान नहीं बने होते हैं. वास्तव में इस गणराज्य में विश्व के अनेक देशों के विभिन्न चेहरे-मोहरे वाले, स्पेनिश, फ्रेंच तथा अफ्रीकी मूल के लोग रहते हैं और सभी को यह गुड़िया अपनी-सी लगती है. यदि हम समझ लें कि मूल रूप में तो हम सब एक ही हैं, फिर भेद-भाव का स्थान ही नहीं रह जाता है.

एक लोक-कथा है कि प्रारंभ में सभी पशु एक जैसे दिखायी देते थे. पहचान की समस्या के समाधान के लिए पशुओं ने कुछ डिजाइन व रंग चुने. कुछ ने भिन्न-भिन्न प्रकार की धारियां चुनीं. हाथी मस्तमौला प्राणी था. उसने स्लेटी रंग चुन लिया, किंतु वह इतना फीका लग रहा था कि किसी ने उसकी नाक खींच कर बड़ी कर दी. जिन पशुओं ने मोटे फर को चुना, वे पहाड़ों में चले गये. सुविधानुसार कुछ जल में चले गए, तो कुछ पृथ्वी पर. भिन्नता आने के उपरांत उनमें कभी झगड़ा हुआ, तो इस बात पर समाप्त हो गया कि कभी हम सब एक जैसे ही थे. अंतर तो हमने स्वयं अपनी सुविधा के लिए बनाए थे.

यत् पिंडे वत् ब्रह्मनांडेः आचार्य बिनोबा भावे कहते हैं, ‘शरीर में तरल खून है, तो बाहर तरल पानी. यहां ेंप्राण है, तो बाहर वायु. बाहर की सहायता अंदर के दोषों को मिटाने के लिए मिलती है. फेफड़ों में अपना वायु कम हो गई तो सलाह मिलेगी कि खुली हवा में सोचा करो. जैसे बिगड़े फेफड़ों को बाहर की शुद्ध आयु से मदद मिलती है, जैसे ही आत्मा को भी परमात्मा से सहायता मिलती है.’

हम यदि लोगों में भेद-विभेद करने में अपनी ऊर्जा को नष्ट कर, सभी में समानता का व्यवहार करें, तो हमें समस्त सृष्टि अपनी लगेगी. अपनी ऊर्जा को हम लोगों को जोड़ने में लगाए तो अधिक उपयोगी होगा.

सम्पर्कः 238, अलोपीबाग,

(रामलीला पार्क के पास), इलाहाबाद-211006,

मोः 09455622589

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