प्राची अप्रैल 2016 : भाषा / अवधी भाषा का इतिहास / सूर्य प्रसाद दीक्षित

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भाषा अवधी भाषा का इतिहास सूर्य प्रसाद दीक्षित वि कास-क्रम की दृष्टि से अवधी को तीन चरणों में बांटा जा सकता है- 1. प्रारंम्भिक काल- ...

भाषा

अवधी भाषा का इतिहास

सूर्य प्रसाद दीक्षित

विकास-क्रम की दृष्टि से अवधी को तीन चरणों में बांटा जा सकता है-

1. प्रारंम्भिक काल- 1400 तक, 2. मध्यकाल- 1400 से 1900 तक, 3. आधुनिक काल- 1900 से अब तक.

अवधी भाषा के प्राचीनतम चिह्य हमें सातवीं शताब्दी से ही मिलने लगते हैं. कोई भी भाषा या बोली अचानक नहीं आ जाती है. पहले उसका प्रयोग समाज में होता है, तब कहीं वर्षों बाद वह साहित्य के रूप में सामने आती है. प्राकृत पैंगलम्, राउलबेल तथा कीर्तिलता आदि में अवधी के प्राचीन रूप देखे जा सकते हैं.

इस प्रकार अवधी के उत्पत्ति के संबंध में अनेक विद्वानों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए हैं. निष्कर्ष यह कि अवधी की उत्पत्ति किसी बोलचाल की भाषा से, अनुमानतः अर्द्धमागधी से हुई होगी.

अवधी के विभिन्न रूप

हिंदी की एक प्रमुख उपभाषा है अवधी, किंतु उसके भी कई रूप देखने को मिलते हैं, यथा-पूर्वी, कोसली, पश्चिमी, गांजरी (लखीमपुरी), बैसवाड़ी आदि.

संपूर्ण अवधी भाषा क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है, जिसके फलस्वरूप बोलचाल में स्थान-स्थान पर अंतर पाया जाता है. ‘तीन कोस में पानी बदले, पांच कोस में बानी’ कहावत इस कथन का प्रमाण है कि भौगोलिक दूरी के अनुसार भाषा भी प्रभावित होती रहती है और उसमें बदलाव आता रहता है. अतः स्थान-भेद के आधार पर साहित्यिक अवधी के तीन रूप हमें मिलते हैं : 1. पूर्वी अवधी, 2. पश्चिमी अवधी, 3. बैसवाड़ी अवधी.

डॉ. बाबूराम सक्सेना ने अवधी प्रदेश की बोलियों की पश्चिमी, मध्यवर्ती और पूर्वी कहा है. लखीमपुर-खीरी, सीतापुर, लखनऊ, उन्नाव और फतेहपुर की बोलियां पश्चिमी में, बहराइच, बाराबंकी और रायबरेली की बोलियां मध्यवर्ती में और गोंडा, फैजाबाद, सुलतानपुर, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, जौनपुर और मिर्जापुर की बोलियां पूर्वी अवधी में आती हैं. डॉ. श्याम सुंदर दास ने

अवधी की तीन बोलियों का उल्लेख किया है-अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी. अवधी और ‘बघेली’ में विशेष अंतर नहीं है. बघेलखंड में बोली जाने के कारण वहां अवधी का नाम बघेली पड़ गया.

छत्तीसगढ़ी में मराठी और उड़िया का प्रभाव पड़ा है और इस कारण वह अवधी से कुछ रूपों में भिन्न हो गई है.

डॉ. त्रिलोकी नारायण दीक्षित ने पूर्वी अवधी और पश्चिमी अवधी को एक माना है. वे पूर्वी अवधी का क्षेत्र अयोध्या से गोंडा, फैजाबाद तथा उसके आस-पास तक और पश्चिमी अवधी का क्षेत्र लखनऊ से कन्नौज तक मानते हैं और वे इसे ही शुद्ध अवधी कहते हैं. रायबरेली, उन्नाव और लखनऊ के कुछ भागों में बोली जाने वाली भाषा को उन्होंने बैसवाड़ी कहा है. वस्तुतः अवध के दक्षिण में गंगा और सई नदी के मध्य में जो विस्तृत भू-भाग है, वह प्राचीनकाल से तीन भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया जाता रहा है. इन तीनों में ऊपर का भाग बांगर, मध्य का भाग बनौधा और इससे भिन्न भाग को अरवर कहा जाता है. बांगर और बनोधा के मध्यस्थ क्षेत्र को ही बैसवारा कहा गया है. बैसवारा के उत्तर में उन्नाव का असोहा परगना और रायबरेली की महराजगंज तहसील है. पूर्व में (रायबरेली जिले की) सलोन तहसील, दक्षिण में गंगा और पश्चिम में (उन्नाव जिले का) हड़हा तथा परसंदन परगने हैं. इसका क्षेत्रफल 1459 वर्गमील है. इस क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली को बैसवाड़ी या बैसवारी कहा गया है.

अब पूर्वी हिंदी की अन्य दो बोलियां-बघेली एवं छत्तीसगढ़ी के साथ अवधी की स्थिति पर विचार करना आवश्यक है.

अवधी और बघेली

अवधी का ही एक रूप होने के कारण और स्वाभाविक ढंग से स्थान-भेद के आधार पर आए कुछ परिवर्तनों के फलस्वरूप बघेलखंड में बोली जाने वाली अवधी को बघेली के नाम से पुकारा जाने लगा. यद्यपि अवधी और बषेली में कोई विशेष अंतर नहीं है. डॉ. बाबूराम सक्सेना का मत है-‘‘भाषा-तात्विक दृष्टि से बघेली अवधी से भिन्न नहीं है.’’ डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने भी अवधी और बघेली में कोई भाषाई अंतर नहीं माना है. उनके अनुसार-‘‘नई खोज के अनुसार बघेली कोई स्वतंत्र बोली नहीं है, बल्कि अवधी का ही दक्षिणी रूप है.’’ वस्तुतः स्थान और परिवेश के आधार पर आए किंचित् परिवर्तन के आधार पर बघेली कही जाने वाली बोली को स्वतंत्र बोली नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें और अवधी में नाम-मात्र का ही अंतर है. यह उपबोली दमोह, जबलपुर, मांडला, बालाघाट, बांदा, हमीरपुर आदि क्षेत्रों में व्याप्त है. इसे दक्षिणी अवधी भी कहा जा सकता है.

अवधी और छत्तीसगढ़ी

डॉ. बाबूराम सक्सेना ने अवधी और छत्तीसगढ़ी में किंचित् भेद का उल्लेख करते हुए भेदक तत्वों का विवरण दिया है, यथा-‘‘अवधी की दक्षिणी सीमा में छत्तीसगढ़ी है, जो कि पूर्वी हिंदी का ही रूप है. इसमें अनेक ऐसे लक्षण हैं, जो इसे अवधी से भिन्न करते हैं. निश्चयात्मक पराश्रयी ‘हर्’ का संज्ञा और सर्वनामों के बाद आना, ‘मन्’ से बहुवचन बनना, कर्म-संप्रदाय परसर्ग ‘ला’ (का के साथ-साथ) और करण परसर्ग ‘ले’ का ‘से’ अधिक प्रचलित होगा, संबंधकारक के वचन एवं लिंग के अनुसार परिवर्तन न होना, इस भाषा का वैशिष्ट्य है.

इसी संदर्भ में अवधी की विभिन्न बोलियों का प्रारंभिक परिचय अपेक्षित है.

1. पूर्वी

जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक ‘भारत का भाषा सर्वेक्षण’ में अवधी को ‘पूर्वी बोली’ कहा है.

डॉ. बाबूराम सक्सेना ‘पूर्वी’ नाम पर आपत्ति करते हुए अपना यह मत प्रकट करते हैं-‘‘बिहार की बोलियों को भी पूर्वी (पुरबिया) कहा जाता है. अतः अवधी के लिए ‘पूर्वी’ नाम अतिव्याप्ति दोष के कारण स्वीकार करना उचित नहीं है.’’

2. कोसली

इसे भी डॉ. बाबूराम सक्सेना अवधी का ही रूप मानते हैं. उनके शब्दों में- ‘कोसली’ कोसल राज्य की भाषा का नाम हो सकता है.

कोसल के संबंध में डॉ. हरदेव बाहरी अपना यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि उत्तर में ‘उत्तर कोसल’ (अयोध्या के आस-पास), दक्षिण में ‘दक्षिण कोसल’ (जबलपुर के आस-पास), दो भाग थे. पूरे कोसल को ‘महाकोसल’ के नाम से जाना जाता था. इस प्रकार ‘कोसल’ राज्य में प्रायः अवधी और छत्तीसगढ़ी क्षेत्र आते हैं. स्पष्ट है कि कोसली लगभग संपूर्ण हिंदी की बोधक है, न कि मात्र

अवधी की. इसलिए अवधी के लिए ‘कोसली’ नाम देना उपयुक्त नहीं है.

3. पश्चिमी गांजरी

सन् 1923 ई. में डॉ. बाबूराम सक्सेना ने प्रो. टर्नर के निर्देंशन में अवधी की उपबोली लखीमपुरी पर कार्य किया था. बोली-विज्ञान की दृष्टि से हिंदी में यह प्रथम कार्य था. ब्लाख महोदय ने उक्त लेख ‘लखीमपुरी’ की समीक्षा ‘पेरिस की भाषा-विज्ञान परिषद्’ की मुख पत्रिका में प्रकाशित कराया था.भाषा-भूगोल के अनुसार उनके अध्ययन का निष्कर्ष यह था कि खीरी जिले की बोली हरदोई और फैजाबाद के हिस्से में भी बोली जाती है.

4. बैसवाड़ी

इसकी शब्द-संपदा का सर्वेक्षण करने का प्रथम श्रेय डॉ. देवीशंकर द्विवेदी को है. उन्नाव और रायबरेली के 14 परगनों को ‘बैसवाड़ा’ नाम से जाना जाता है. इस प्रदेश पर बस ठाकुरों का अधिकार रहा है, जिनमें से कई राव राजा अपनी वीरता और देशभक्ति के लिए प्रसिद्ध हुए हैं. वस्तुतः बैसवाड़ी का प्रयोग रायबरेली, उन्नाव में होता है. बैसवारी भाषी सामाजिक वर्गों की जो समीक्षा डॉ. देवीशंकर द्विवेदी ने की है, उनके विवेचन का

आधार वर्णनात्मक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक तीनों प्रकार का रहा है. उन्होंने शब्दावली के क्षेत्रीय रूपों की ओर भी ध्यान दिया है, जैसे-वहां ‘केहियां’ तथा ‘खियां’ दोनों रूप मिलते हैं-

राम के हियां जे रही.

राम खियां गे रही.

यह भी देखा गया है कि एक ही शब्द कई बोलियों में सामान्य रूप और अर्थ साम्य सहित प्रचलित है. एक ही शब्द अत्यंत साधारण ध्वनियों सहित विभिन्न बोलियों में मिलता है. एक प्रसंग का शब्द दूसरी बोली के उसी प्रयोग में व्यवहृत होकर भी किसी अन्य संबंधित वस्तु के लिए प्रचलित हो जाता है. एक ही शब्द के अनेक रूप मिलते हैं जैसे- ‘आगे’, ‘आगा’, ‘आगू’, ‘अगाड़ी’, ‘अगमन’, ‘अगारू’, ‘अगंत’, ‘अगहा’, ‘अगमाला’, ‘अगुवा’, ‘अगरासनु’ आदि.

डॉ. बाबूराम सक्सेना ने अवधी का विकास ग्रंथ में पहली बार अवधी के रूपों का इस प्रकार वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया है-

1. पश्चिमी बोली- खीरी, सीतापुर, लखनऊ, उन्नाव, फतेहपुर.

2. केंद्रीय बोली- बहराइच, बाराबंकी, रायबरेली.

3. पूर्वी बोली- गोंडा, फैजाबाद, सुलतानपुर, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, जौनपुर, मिर्जापुर.

प्राप्त प्रमाणों के अनुसार अवधी की उत्पत्ति 10वीं शताब्दी के आसपास हुई. इसकी उत्पत्ति के संबंध में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. जो कुछ साक्ष्य उपलब्ध हैं, उन पर विज्ञान एकमत नहीं हैं. डॉ. अंबा प्रसाद सुमन ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी और उसकी उप-भाषाओं का स्वरूप’ में विचार व्यक्त करते हुए कहा है-‘‘वास्तव में साहित्यिक भाषा का विकास मूलतः किसी जनबोली से ही हुआ करता है. यही बात अवधी के लिए भी लागू होती है. कोसल प्रदेश में मध्य भारतीय आर्य भाषा काल में जो भाषा बोली जाती थी, उसी से अवधी नामक उप-भाषा विकसित हुई.’’ डॉ. ग्रियर्सन ने अवधी को अर्द्धमागधी से उत्पन्न सिद्ध किया है. डॉ. बाबूराम सक्सेना ने उसे सीधे पाली से उत्पन्न घोषित कर दिया है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अवधी का उद्गम नागर अपभ्रंश से माना है. उनका कथन है-‘‘अपभ्रंश या प्राकृत काल की काव्य-भाषा के उदाहरणों में आजकल की भिन्न-भिन्न बोलियों के मुख्य-मुख्य रूपों के बीज या अंकुर दिखा दिए गए हैं. इनमें से ब्रज और अवधी के भेदों पर कुछ विचार करना आवश्यक है, क्योंकि हिंदी काव्य में इन्हीं दोनों का व्यवहार हुआ है.’’

अवधी के पश्चिम में जो भाषाएं एवं बोलियां (कन्नौजी, ब्रज आदि) चलन में हैं, उनको शौर सेनी से अद्भूत माना गया है. इसी प्रकार पूर्व में भोजपुरी को मागधी से निष्पन्न माना गया है. इसी आधार पर भौगोलिक दृष्टि से जॉर्ज ग्रियर्सन ने अवधी या पूर्वी हिंदी की उत्पत्ति अर्द्धमागधी से माना है, लेकिन अवधी को अर्द्धमागधी की मुख्य विशेषताओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है तो ज्ञात होता है कि कर्ता एकवचन का ‘ए’ व्यवहार केवल कुछ बोलियों में ‘इ’ में अंत होने वाले अपूर्ण कृदंत में मिलता है. न तो संज्ञा और न ही अवधी की पूर्वी बोलियों में प्राप्त मूल संबंध वाचक एकवचन के अतिरिक्त किसी परसर्ग में ‘ए’ का चिह्न मिलता है. इसके विपरीत एकवचन का उकारांत रूप शौरसेनी ‘औ’ की ओर स्पष्टतया संकेत करता है. अपूर्ण और पूर्ण कृदंत का प्रयोग क्रमशः ‘के’, ‘इ’ और ‘ए’ पश्चिमी हिंदी की पड़ोसी बोलियों में भी मिलता है. यों अपेक्षाकृत पाली प्राचीनतर भाषा है. जैन अर्द्धमागधी का जन्म पांचवीं शताब्दी में हुआ था. इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन मागधी बाद की अर्द्धमागधी से भिन्न थी और इसी प्राचीन अर्द्धमागधी से अवधी निष्पन्न हुई है.

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने अवधी की उत्पत्ति ‘कोसली’ से माना है. ब्रज भाषा के प्रख्यात कवि श्री जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ के अनुसार-अवधी शौरसेनी से विकसित हुई है और अवध प्रदेश या कोसल प्रांत शौरसेनी में ही सम्मिलित है. ब्रज, अवधी और मैथिली के पुराने नमूनों में सामान्य विशेषताएं मिलती हैं. मैथिली अपभ्रंश (अवहट्ट) में स्वयं मैथिली की विशेषताएं मिलती हैं. इस अवहट्ट के प्रयोग विद्यापति रचित कीर्तिलता में मिलते हैं.

कुछ वैयाकरणों का यह मत इन सभी से भिन्न है. उनका तर्क है कि ‘‘ब्रज भाषा का प्रारंभिक इतिहास शौरसेनी अपभ्रंश से संबंद्ध किया जा सकता है, परंतु अवधी के किसी साहित्यिक अपभ्रंश रूप का पता नहीं चलता. अवध प्रांत शूरसेन और मगध के बीच में होने से दोनों क्षेत्रों की भाषा को सामान्य विशेषताओं से युक्त समझा जाता है. वर्तमान भाषाओं के पूर्व शूरसेन में शौरसेनी अपभ्रंश, मगध में मागधी अपभ्रंश और इन दोनों के मध्यभाग में अर्द्धमागधी अपभ्रंश का प्रचलन रहा होगा.’’ इसी आधार पर अर्द्धमागधी अवधी के उद्गम का भी अनुमान किया जाता है. भाषाविदों के अनुसार, अवधी का उद्भव और विकास मागधी और शौरसेनी के मध्य स्थित उस क्षेत्रीय अपभ्रंश से हुआ है, जिसका मूलाधार मागधी थी, परंतु शौरसेनी का उस पर व्यापक प्रभाव पड़ा था. यही कारण है कि प्राकृत वैयाकरणों ने उसे अर्द्धमागधी की संज्ञा दी है.

डॉ. अंबा प्रसाद सुमन का मत स्पष्ट नहीं है, क्योंकि उन्होंने ‘मध्यकाल में जो भाषा प्रचलित रही हो’ से अवधी को उत्पन्न कहा है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत भाषा और व्याकरण की दृष्टि से अत्यधिक प्रामाणिक है. भाषा-विज्ञान की दृष्टि से रत्नाकर जी का मत तो बिल्कुल निराधार है, क्योंकि उन्होंने शौरसेनी से

अवधी और ब्रजभाषा की उत्पत्ति मानी है, जबकि ब्रज और

अवधी दोनों के वाक्य-विन्यास एवं शब्द-रचना में बड़ा अंतर है. डॉ. ग्रियर्सन और डॉ. बाबूराम सक्सेना एक-दूसरे के समर्थक दिखते हैं. वस्तुतः अपभ्रंश की यथेष्ट सामग्री के सम्यक् रूप से उपलब्ध न होने के कारण, सीमित साक्ष्यों के आधार पर अवधी का वास्तविक उद्भव आज भी विवादास्पद बना हुआ है.

अवधी का इतिहास लगभग 1000 वर्ष पुराना है. इसका प्रारंभिक रूप पुस्तकाकार अथवा हस्तलिखित रूप में भले ही सर्वांशतः प्राप्त न हो, फिर भी अधिकांश रचनाकार और उनकी कृतियां अब चर्चा में आ गई हैं. प्रत्येक भाषा का आरंभिक रूप मौखिक या अलिखित रूप में प्राप्त होता है, इसलिए क्योंकि पहले लोकमानस उस भाषा में अपनी अभिव्यक्ति करता है. कालांतर में उसे साहित्यिक रूप प्राप्त होता है. तब उसका प्रकाशन और अन्वेषण होता है. अवधी की भी यही स्थिति है. अवधी भाषा का विकास क्रम प्रस्तुत करते हुए कई विद्वानों ने इसी भाव से कोसली को अर्द्धमागधी प्राकृत और पालि भाषा से विकसित माना है. रत्नाकर जी ने इसे शौरसेनी अपभ्रंश से उत्पन्न सिद्ध किया था, किंतु अब यह ठेठ अवधी न होकर ब्रजावधी जैसी काव्यभाषा है. अर्द्ध मागधी से निकली हुई अवधी छत्तीसगढ़, बघेली और भोजपुरी के निकट मानी जा सकती है. इनका कालक्रम में परिविस्तार कन्नौजी और बुंदेलखंडी के रूप में हुआ है. अवधी के विभिन्न रूपांतर-पूर्वी, पश्चिमी, मध्यवर्ती, बैसवादी, गांजरी आदि-उसके क्षेत्र-विस्तार के ही साक्षी हैं. ये इस कथन के प्रमाण भी हैं कि अवधी का लोक साहित्य ही नागर साहित्य में ढल गया है/ढल रहा है. किंतु वह अधिकांशतः अप्रकाशित है. जब तक उसका महार्घ साहित्य प्रकाश में नहीं आ जाता, तब तक अवधी का प्रामाणिक इतिहास नहीं लिखा जा सकता. फिर भी जितना

उपलब्ध हो गया है, उसके आधार पर उसके साहित्येतिहास की प्रारंभिक रूपरेखा स्थिर की जा सकती है.

अवधी के साहित्येतिहास लेखन के मार्ग में अनेक प्रकार की व्यावहारिक कठिनाइयां आ सकती हैं. सबसे बड़ी समस्या इतिहास के काल-निर्धारण और नामकरण की है. विद्वानों ने राउरबेल को सबसे प्राचीन अवधी ग्रंथ माना है. इसकी रचना 11वीं शती में की गई थी. इसके नख-शिख वर्णन में अवधी का पर्याप्त पुट है. इसके साथ-साथ संदेश रासक, कीर्तिलता, हेमचंद्र व्याकरण, आदि ग्रंथों में अवधी का प्रयोग हुआ है. इनमें विषयगत बड़ा वैविध्य है. हेमचंद्र व्याकरण, वर्ण रत्नाकर, प्राकृत पैंगलम और उक्ति व्यक्ति प्रकरण व्याकरण ग्रंथ हैं. इनके भाष्य अवधी में लिखे गए हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि दसवीं से 14वीं शती तक अवधी उत्तर भारत की जनभाषा रही है. अन्यथा संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के भाषा ज्ञान का माध्यम अवधी को न बनाया जाता. उक्ति व्यक्ति प्रकरण दामोदर पंडित द्वारा 12वीं शती में लिखा गया अवधी का प्रथम गद्य ग्रंथ है. तब तक किसी विभाषा का गद्य विकसित नहीं हो पाया था. ब्रजभाषा, मैथिली और राजस्थानी गद्य बहुत परवर्ती है. इससे सिद्ध है कि अवधी ही इन चार शताब्दियों तक माध्यम भाषा के रूप में प्रचलित रही है और इसीलिए विभिन्न विषयों के ग्रंथों का रूपांतर अवधी में होता रहा है.

प्राचीन अवधी काव्य में यदि राउरबेल और संदेश रासक जैसे श्रृंगार काव्य लिखे गए तो चर्यागीतों में और कबीर की रमैनी तथा साखियों में अवधी का प्रयोग किया गया अर्थात् भक्ति और निर्वेद से संबंधित चिंताधार भी इस युग में समांतर गति से प्रवाहित हो रही थी. इन अंतर्विरोधों के कारण इस युग का कोई एक

अभिधान निर्धारित नहीं किया जा सकता. अतएव इसे आदिकाल या प्रारंभिक युग कहना ही समीचीन होगा. आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास लेखन में इसे देसी भाषा काल माना है, जो उपयुक्त ही है.

13वीं शती से अवधी का मध्यकाल कहा जा सकता है. इस बीच कवितापूर्ण मानक ग्रंथों की रचना आरंभ हुई. इसका सर्वाधिक श्रेय सूफी कवियों को दिया जा सकता है. वे देववाणी और शास्त्रीयता के मोह से मुक्त होकर लोकचेतना के साथ जुड़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अवधी को अपना माध्यम बनाया. मुल्ला दाउद ने सर्वप्रथम 1379 ई. में चांदायन काव्य की रचना की. फिर इसी क्रम में कुतुबन की मृगावती, जायसी कृत पदमावत्, मंझन की मधुमालती, शेख नबी का ज्ञान दीप, उसमान की चित्रावली, जान की कमलावती, नूर मुहम्मद की इंद्रावती, अनुराग बांसुरी, शेख रहीम का भाषा प्रेमतत्व, नारायण का छिताई वार्ता, साधन का मैनासत, सूरदास लखनवी का नलदमन, कासिम शाह का हंस जवाहर, शेख निसार का यूसुफ जुलेखा आदि काव्य-कृतियां रची गईं. इनका विकास 19वीं शती के पूर्वार्द्ध तक दिखाई देता है. लगभग 600 वर्षों तक प्रचलित इस प्रेमाख्यानक परंपरा में दो रूप परिलक्षित होते हैं- 1. सूफी प्रेमाख्यानक, 2. भारतीय हिंदू प्रेमाख्यानक.

सूफी प्रेमाख्यानक भी तीन वर्गों में विभाज्य हैं-1. भारतीय कथाओं पर आधारित 2. अरबी लोक कथाओं पर आधारित 3. भारतीय पुराख्यानों पर आधारित.

हिंदू प्रेमाख्यानक मूलतः प्रेमकथाओं, जैसे-नल-दयमंती, उषा-अनिरूद्ध आदि से संबंधित हैं. इन काव्यों की भाषा प्रायः ठेठ अवधी है. अधिकांश ग्रंथों की रचना रायबरेली, जौनपुर से गाजीपुर में बीच की पट्टी में अर्थात् अवधी भोजपुरी के सीमावर्ती क्षेत्र में हुई है. इनमें मसनवी शैली का प्रयोग हुआ है. धार्मिक समन्वय और परम तत्व के रूप में प्रेम की परिभाषा, जनरंजन के साथ लोक संग्रह की भावना, साथ ही अवध की लोक संस्कृति की गहरी पहचान इन कृतियों की विशेषता है.

आख्यानक काव्य से प्रेरित होकर अवधी में एक विशेष प्रवृत्ति का जन्म मध्यकाल में हुआ, जिसे हम चरितात्मक काव्य कह सकते हैं. ये चरित ग्रंथ प्रायः राम कृष्ण पर हैं और गौण रूप से सीता, हनुमान, ध्रुव, प्रहलाद, भीष्म आदि देवोपम महापुरुषों से संबंधित हैं. रामकाव्य तो अवधी में सर्वाधिक लिखा गया है. आश्चर्य की बात तो यह है कि अवध प्रदेश से बहुत दूर बिहार, पंजाब, गुजरात आदि राज्यों में भी अवधी रामकाव्यों की रचना की गई है. बिहार के शंकरदास तथा मोदलता ने, पंजाब के गोमतीदास ने और गुजरात के कवि रसिक ने रामकाव्य की नींव डाली. उसके पश्चात् पुरुषोत्तम दास का जैमिनीय अश्वमेघ और गोस्वामी तुलसीदास के 7 ग्रंथ अवधी में रचे गए. इस क्रम में सहजराम, अग्रदास, प्राणचंद चौहान, हृदयराम, दूलनदास, नेवाज, रसिक बिहारी, सीता प्रसाद, हनुमान शरण, राय बल्लभ शरण, जानकी प्रसाद, कृपा निवास, रामशरण, दीनदास, नवसादास आदि अनेक कवि इस क्षेत्र में प्रवृत्त हुए. रामचरित मानस के बाद तो दोहा-चौपाई शैली में रचित रामकथाओं की भरमार हो गई. इस रामकाव्य के भी तीन रूप अवधी में दिखाई देते हैं-1. दास्य भक्ति प्रेरित राम चरित 2. रसिक संप्रदाय की मधुरोपासना से संबंधित रामाख्यान 3. लोकाख्यान जैसे आल्हा रामायण.

मधुरोपासना से संबंधित भक्त कवियों ने इस क्षेत्र में विपुल परिमाण में साहित्य रचा है, जो गोपनीयता के कारण अभी प्रकाश में नहीं आ पाया है. बनादास एवं अनन्य शरण सरीखे कुछ कवियों की रचनाएं (जैसे-उभय प्रबोधक) प्रकाश में आई हैं, जो इस समृद्धि का किंचित् पूर्वाभास करा रही हैं. राम-चरित के बाद अवधी कवियों ने दूसरा महत्त्व दिया है कृष्ण-चरित को. इसमें कवि लालदास, सबल श्याम, चरनदास, रघुनाथ दास आदि के नाम अग्रगण्य हैं. आज भी चरित काव्यों की यह परंपरा न्यूनाधिक रूप में विद्यमान है.

निष्कर्ष यह है कि चरितात्मकता चूंकि अवधी भाषा की प्रकृति के बहुत अनुकूल है अथवा यह कहें कि अवधी के सर्वाधिक लोकप्रिय छंद दोहा, चौपाई, सोरठा में इतिवृत्त को कथात्मक परिणति देने की अद्भुत क्षमता है, इसलिए राम कथा से लेकर आल्हखंड जैसी लोकगाथाओं की रचना अवधी में बहुत हुई है. शायद ऐसी प्रबंधात्मकता दूसरी भाषा में नहीं है. वह अवधी काव्य की एक मूलभूत प्रवृत्ति है.

अवधी की तीसरी प्रवहमान काव्यधारा है-संतकाव्य. भक्तिकाव्य के दो प्रभेद तो प्रायः सर्वस्वीृत हैं. 1. निर्गुण 2. सगुण. अवधी कविता में तीसरी धारा भी प्रवाहित होती दिख रही है, जिसमें निर्गुण-सगुण दोनों का समन्वयात्मक स्वरूप दिखाई देता है. उत्तरकाल की संत परंपरा में सर्वाधिक पंथ प्रचलित रहे हैं. जैसे-सतनामी संप्रदाय, अनंत पथ, नानक पंथ, गुलाल पंथ, साईदाता संप्रदाय, रामसनेही संप्रदाय, शिवनारायणी संप्रदाय आदि. इन मतवादों से संबद्ध कवि-साधक शास्त्रगत और लोकमत का तो समन्वय कर ही रहे थे, साथ ही विभिन्न उपासना-पद्धतियों में भी एक सेतु स्थापित कर रहे थे. इनका विभाजन ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शाखाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता है. इनमें शास्त्रज्ञ तो कम ही थे. आत्मबोधपरक, आत्मानुभूति प्रेरित कवि अधिक थे. इनका ब्रह्म चिंतन यदि निर्गुण मत के निकट था तो इनकी उपासना सगुण ब्रह्म की साकारोपासना जैसी थी. इनमें हिंदू-मुसलमान दोनों संप्रदायों के कवि थे. कुछ गृहस्थ थे,

अधिकतर विरक्त थे. इनमें अलग-अलग मतवाद, शिष्यमंडल और धर्मग्रंथ थे. लेकिन ये सब एक वैचारिक सूत्र से जुड़े हुए थे. वह है-सामाजिक संस्कार और आत्मप्रबोध. इसकी परंपरा आज भी विद्यमान है. ये कवि यद्यपि शुद्ध कला कवि नहीं हैं, पर अनुभूति के धनी अवश्य हैं. इन्होंने नीति काव्यों की रचना की है, जो सर्वथा महार्घ्य है. आश्चर्य की बात है कि अवधी में नायिका भेद परक लक्षण-ग्रंथों के बावजूद रीतिकाव्य की परंपरा नहीं चल सकी. प्रशस्तिकाव्य, दरबारी काव्य, समस्यापूर्ति, चित्रकाव्य आदि को भी अवधी ने प्रश्रय नहीं दिया. यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि 17वीं और 20वीं शती के बीच अवधी की काव्यधारा विछिन्न सी दिखाई देती है. संभवतः इसका कारण यह रहा हो कि इस बीच ब्रजभाषा पूर्णतः काव्य भाषा रूप में प्रतिष्ठित हो गई थी और उसके बाद माध्यम भाषा या जनभाषा रूप में फारसी से सम्मिश्रित उर्दू एवं खड़ी बोली का प्रचार हो गया था. इसलिए काव्य-भाषा रूप में भी अवधी नहीं रह पाई और जनभाषा रूप में भी यह आगे नहीं चल सकी.

इस बीच अवधी में टीकाएं और काव्य बहुत लिखे गए. रामायण की कई टीकाएं अवधी-ब्रज खड़ी-बोली मिश्रित गद्य में लिखी गईं. इस क्षेत्र में बाबा बैजनाथ कुर्मी का स्थान सर्वोपरि है. कई काव्यशास्त्रीय ग्रंथों की टीका भी अवधी में हुई. महाभारत, भागवत एवं अनेक पुराणों के अनुवाद, बैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी के रूपांतर और कई प्रकार के उपयोगी ग्रंथ इस बीच

अवधी में लिखे गए. जैसे कृषि, बागवानी, पशु चिकित्सा आदि. इस प्रवृत्ति एवं विद्या का नया नामकरण करना अवधी इतिहास की स्वायत्तता की दृष्टि से उपयोगी होना. तात्पर्य यह है कि आधुनिक युग के पूर्व (18वीं के अंत तक) का यह काल-खंड अनेक विधाओं और भाषिक रूपों से ओतप्रोत दिखाई देता है.

उन्नीसवीं सदी से अवधी का आधुनिक युग शुरू हुआ है.

आधुनिक अवधी साहित्य खड़ी बोली में लिखे गए साहित्य के सर्वथा समानांतर नहीं है. इसमें न भारतेंदु युग है, न द्विवेदी युग. यहां न प्रगतिवाद है, न प्रयोगवाद. इधर समकालीन हिंदी के प्रभाववश अवधी में गीत, नवगीत, गजल, नई कविता, हाइकु आदि रचे गए हैं, किंतु वे अवधी के मूल प्रकृति के बहुत अनुरूप नहीं हैं. ये प्रयोग मात्र उस कथन के साक्षी हैं कि अवधी भाषा अधुनातन कथ्य एवं शिल्प को वहन करने में सक्षम है. व्यक्ति रूप में कोई ध्रुवक व्यक्तित्व भी अवधी साहित्य को नहीं मिला. पश्चिमी साहित्य से प्रेरित प्रवृतियां भी अवधी साहित्य में प्रवेश नहीं कर सकीं. अवधी कविता अधिकांशतः अपनी ही परंपरा और प्रकृति के अनुरूप विकसित होती रही है.

1857 के बाद अर्थात् विपक्षी शासन से प्रेरित होकर अवधी के जनकवियों ने कई प्रकार से उद्गार व्यक्त किए, जिनके मुख्य बिंदु हैं-व्यंग्य-विनोद और व्यंग्य विद्रूप. व्यवस्था से असहमत होकर और साथ ही अपनी विवशता से कसमसाते हुए इन कवियों ने कभी सत्ता पर व्यंग्य किया, कभी आयातित पाश्चात्य सभ्यता पर. इस क्षेत्र में प्रताप नारायण मिश्र, पढ़ीस, बंशीधर, देहाती, नवीन, रमई काका आदि की कविताएं चिर स्मरणीय रहेंगी. दूसरी विशेषता है-कृषक संस्कृति और ग्रामीण व्यवस्था परक रचनाएं. अवधी में किसान काव्य सर्वाधिक लिखा गया है. लहलहाते खेत, स्थानीय ऋतु सौंदर्य अर्थात् प्रकृति-परिवेश इन कवियों को आह्लाादित करते रहे हैं. दूसरी ओर ऋणग्रस्त और गरीब किसानों की भुखमरी, उनकी बेगार अर्थात् शोषण-उत्पीड़न इन कवियों के मन में व्यंग्य, वेदना और प्रकारांतर से व्यंग्य-विद्रोह की सृष्टि करते रहे हैं. घाघ जैसे लोकपंडितों ने कृषि और मौसम विज्ञान पर बहुत लिखा है. आधुनिक अवधी कवियों ने प्रकृति प्रेम-सौंदर्य को भी छायावाद के समानांतर कुछ स्तर दिया, किंतु वह काल्पनिक लोकोत्तर सौंदर्य की जगह लोक सौंदर्य ही बना रहा. उसी से प्रेरित होकर वे कवि राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण की ओर अग्रसर हुए. समकालीन अवधी गद्य, पद्य के विभिन्न रूपों, नए-पुराने सभी छंदों, पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक यानि सब तरह के विषयों को आत्मसात कर उन्हें प्रासंगिक बनाने हेतु और जन-जन का साहित्य बनने हेतु तत्पर है.

संलिष्ट चित्रों की दृष्टि से नया अवधी काव्य बेजोड़ है. यह काव्य कलात्मक गुणावत्ता से अधिक लोक चेतना में मुखरित हुआ है. इस प्रकार समकालीन अवधी काव्य न विचारधाराओं के कर्दम से लथपथ हैं और न रूपवादी प्रयोगों के फतवे से. वह जन-मन के साथ विकसित होता चल रहा है. इसका संबंध चूंकि मध्य निम्न वर्ग से है, इसलिए आधुनिकता बोध (नगर-बोध, युग-बोध, वर्ग-संघर्ष, यौन-मुक्ति आदि विचार-विभ्रम) उसे विचलित नहीं कर पाते हैं. उसमें जनजीवन के सहज सात्विक उद्गार व्यक्त होते दिखाई देते हैं. इसलिए आवश्यकता यह है कि इसके अपने अर्थात् निजी इतिहास-बोध पहचानकर साहित्येतिहास लेखन का प्रयत्न किया जाए.

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COMMENTS

BLOGGER: 2
  1. बहुत ही उपयोगी लेख बहुत ही उपयोगी प्रेरक और ज्ञानवर्धक है इससे अच्छा लेख अभी तक अवधि अवधि में देखने को नहीं मिला ले के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद अवधी के लोक साहित्य परंपरा अधिकतर लोग सहित परंपरा के बारे में भी एक लेख इस पर डालने औरों लोधी का संत साहित्य इसको उस पर एक लेख लिखें और साथ में का योगदान इस पर भी एक लेख लिखें

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  2. प्रो दीक्षित जी का बहुत महत्वपूर्ण आलेख।

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रचनाकार: प्राची अप्रैल 2016 : भाषा / अवधी भाषा का इतिहास / सूर्य प्रसाद दीक्षित
प्राची अप्रैल 2016 : भाषा / अवधी भाषा का इतिहास / सूर्य प्रसाद दीक्षित
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