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प्रश्न अभी शेष है - 6 / कहानी संग्रह / पटाक्षेप / राकेश भ्रमर

(पिछले अंक से जारी..)

कहानी 6

पटाक्षेप

मनोहर ने कोई अपराध नहीं किया था. उसने किसी को कष्‍ट भी नहीं दिया था फिर भी दारोगा ने उसे सारे गांव के लोगों के सामने तमाचा मारा था. वह हतप्रभ रह गया था. तमाचे के जोर से उसका गाल ही नहीं, सिर भी झन्‍ना गया था. शरीर लहराकर एक तरफ झुक गया था । एक पल के लिए उसकी सोचने-समझने की शक्‍ति गुम हो गई थी. जब दिमाग कुछ ठिकाने हुआ और उसके सोचने-समझने की इन्‍द्रियों ने काम करना शुरू किया, उसने हैरत और रंजभरी निगाहों से दारोगा को घूर कर देखा था दारोगा गुस्‍से में फनफना रहा था, ‘‘साले, हरामजादे, तुम लोगों ने पुलिस को क्‍या समझ रखा है...चमगादड़, जो उल्‍टे लटके रहते हैं या कुएं का मेढक...था ने में आकर ठाठ से गलत-सलत रिपोर्ट लिखाते हो और समझते हो पुलिस तुम्‍हारी नौकर है. दौड़ी-दौड़ी आएगी और तुम्‍हारे कहे मुताबिक एक अनजान चोर को तलाशने के लिए खाक छानती फिरेगी. तुम्‍हीं तनख्‍वाह देते हो न हमें? मार-मार कर भुर्ता बना दूंगा.'' गांव के लोग भी हैरान थे. इस बात पर कि मनोहर तो पीड़ित था, उसे दारोगा ने क्‍यों मारा? उसका क्‍या कसूर...? यह तो नाइंसाफी थी. चोर को तो पुलिस ने गाली तक न दी और जिसके घर में चोरी हुई थी, उसे सरेआम थप्‍पड़ रसीद कर दिया. सबके मन में एक आक्रोश उफन रहा था, परन्‍तु दारोगा से पंगा कौन ले? कहीं उनकी ही मां-बहन करने लगे, सबके सामने दो डण्‍डे चूतड़ पर रसीद कर दे, तो उनकी क्‍या इज्‍जत रह जाएगी मनोहर ने अपने चारों तरफ नजर डाली. लोग डरे-सहमे खड़े थे. फिर बाईं तरफ देखा, सूरजभान चारपाई पर बैठे कुटिलता से उसे देखकर मुस्‍कराये जा रहे थे. दारोगा उसको थप्‍पड़ मारने के बाद सूरजभान के नजदीक जाकर खड़ा हो गया था.

सूरजभान चारपाई पर इस प्रकार अकड़कर बैठे थे जैसे पूरे गांव के वहीं कर्त्ता- धर्त्ता थे. सच भी था. वह गांव के प्रधान थे. वह जो कहेंगे, वही होगा. पुलिस का दारोगा भी उनके हुक्‍म का गुलाम था मनोहर समझ गया, सब कुछ एक सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा था जान-बूझकर उसे अपमानित करने के लिए चोर को सच्‍चा और उसे झूठा साबित करके सारे गांव के सामने अपमानित करने का षडय्‌ न्‍त्र रचा गया था. परन्‍तु यह कहां का न्‍याय था कि पुलिस का दारोगा एक चोर की बात को सच मान रहा था, परन्‍तु उसकी बात को झूठ, जिसके घर में चोरी हुई थी मनोहर के अपमान की आज परिणति थी. मुसीबत तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब उसने प्रधानी का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था. निर्णय उसका अकेले का नहीं था. वह चुनाव लड़ना भी नहीं चाहता था. वह अपनी खेती-किसानी और परिवार में मस्‍त था. पुश्‍तैनी काश्‍तकारी थी. दो भाइयों में बंटवारा हो जाने के बाद भी दोनों भाइयों के हिस्‍से में पर्याप्‍त जमीन आई थी. जरूरत से ज्‍यादा अन्‍न पैदा कर लेते थे, इसीलिए फसल की कटाई के बाद उनके हाथ में कुछ रुपये आ जाते थे. दोनों भाई अमीर तो नहीं, परन्‍तु गांव के खेतिहर मजदूरों की तुलना में संपन्‍न थे. संपन्‍न होने के बावजूद गांव के सवर्णों के बीच उनकी कोई पूछ नहीं थी, क्‍योंकि मनोहर दलित था और गांव के संकुचित वातावरण में भेदभाव की जड़ें बहुत गहरे तक समाई होती हैं, जिन्‍हें काटकर फेंक पाना किसी के लिए भी आसान नहीं होतागरीब दलितों में केवल मनोहर और उसके बड़े भाई जवाहर के मकान ही पक्‍के थे. बड़ा भाई अनपढ़ था, परन्‍तु मनोहर ने गांव के स्‍कूल में कक्षा पांच तक पढ़ाई की थी. गांव में सवर्णों की संख्‍या अधिक थी. उनमें भी बहुतायत ठाकुरों की थी उन्‍ही के पास अधिकांश जमीनें थी, रुपया-पैसा था. गांव के अधिकतर पिछड़ी और दलित जाति के लोग ठाकुरों के खेतों में मजदूरी करके अपनी जीविका चलाते थे इस बार जब प्रधान के चुनाव की घोषणा हुई तो कई लोगों ने मनोहर को उकसाया कि वह चुनाव में खड़ा हो जाए. इसके दो कारण थे - एक तो अपनी जाति बिरादरी की तुलना में वह थोड़ा संपन्‍न किसान था और चुनाव का खर्चा वहन कर सकता था, दूसरे वह स्‍वभाव से सज्‍जन और वक्‍त पर लोगों की मदद करनेवाला व्‍यक्‍ति था. लोगों को विश्‍वास था कि उसके प्रधान बनने से गांव में थोड़ा बहुत विकास होगा, वरना तो अभी विकास के नाम पर ठाकुरों के घरों के सामने खंड़जा बिछा था, नालियां बनी थीं और गरीब दलित बस्‍ती के नाम पर आए सरकारी नल उन्‍हीं के घरों के सामने गड़े थे गांव में सवर्णों की संख्‍या लगभग आधी थी, परन्‍तु चूंकि वहीं लोग सम्‍पन्‍न थे, इसलिए गांव की आधी गरीब जनसंख्‍या उन्‍हीं के घरों और खेतों में काम करके अपना पेट पालती थी, और वक्‍त जरूरत पर रुपये उधार लेती थी. बदले में ये लोग गुलामी जैसी जिन्‍दगी जीते हुए उम्र भर ठाकुर-महाजन का कर्जा अदा करते रहते थे. मतलब कि वह सारे लोग बड़े लोगों के एहसानों तले दबे थे.

यहीं कारण था कि आज तक ठाकुर ही गांव के प्रधान होते रहे थे. पहले ठाकुर सूरजभान सिंह के पिता मुखिया थे, बाद में प्रधान बने. उनकी मृत्यु के बाद सूरजभान ने उनकी विरासत संभाल ली. जिस प्रकार उनके पिता निर्विरोध मुखिया और प्रधान बनते रहे, उसी प्रकार सूरजभान भी परम्‍परागत तरीके से निर्विरोध प्रधान चुने जाते रहे थे परन्‍तु अब गांव में चेतना की एक लहर दौड़ चली थी. जब से ग्राम पंचायत के माध्‍यम से ग्रामीण विकास के लिए सरकार लाखों रुपये देने लगी थी, तब से पंचायत से जुड़े लोगों की चांदी होने लगी थी. योजनायें तो कागजों में पूरी हो जातीं, थोड़ी बहुत इधर-उधर खुदाई होती, खड़ंजे के नाम पर कुछ ईंटें बिछ जातीं, कुछ नालियां बन जातीं, परन्‍तु यह काम समस्‍त योजनाओं का बीस प्रतिशत भी नहीं होता था. सारा पैसा जिले स्‍तर से लेकर पंचायत तक जुड़े लोगों के बीच में बंट जाता था सरकारी अधिकारी और कर्मचारी माला-माल हो रहे थे और सरकार का पैसा खा-खाकर उनके मुंह लाल हो रहे थे, परन्‍तु मजदूर सूखे पेड़ के पत्तों की तरह झड़ रहे थे. उनके हाथों में केवल जाब कार्ड थे, घरों में अन्‍न नहीं था और जेब में पैसे भी नहीं थे कि अन्‍न खरीद सकें. चेतना की लहर का परिणाम ये हुआ कि गांव के कुछ प्रगतिशील विचारों वाले, परन्‍तु जेब से कड़क युवकों ने मनोहर को उकसाकर चुनाव में खड़ा कर दिया. उसने पर्चा भर दिया, परन्‍तु इसके साथ ही सवर्णो और दलितों के बीच की खाई और गहरा गई. चुनावी राजनीति बड़ी रहस्‍यमय होती है. यहां जो लोग मुंह पर वोट देने की बात करते हैं, वहीं पोलिंग बूथ के अन्‍दर जाकर किसी और को वोट दे आते हैं सूरजभान और मनोहर के बीच कांटे की टक्‍कर थी, परन्‍तु सूरजभान के पक्ष का सबसे जोरदार पहलू यह था कि सवर्णों के सभी वोट उन्‍हें ही मिलने थे. इसके अलावा दलितों के भी अधिकतर वोट उन्‍हें ही मिलने थे, क्‍योंकि जो लोग ठाकुरों की दया-ममता पर जीवित थे, वह मनोहर को वोट देने का दुःसाहस नहीं कर सकते थे. क्‍या खाकर वह ठाकुरों का विरोध करते...? मनोहर के जीतने का मतलब था, उन सभी के जीवन में दुर्दिनों का आना...तब गांव में उनका जीना मुश्‍किल हो जा ताचुनाव प्रचार के दौरान सूरजभान ने मनोहर को धमकाते हुए कहा था - ‘‘सरकार तुम लोगों को सुविधाएं दे रही है, तो क्‍या तुम अपने आपको प्रधानमन्‍त्री समझने लगे? अपनी औकात में रहो, प्रधानी का चुनाव लड़कर लखनऊ नहीं चले जाओगे. यहीं रहोगे न! एक ठाकुर का विरोध करने का नतीजा तुम्‍हें भुगतना पड़ेगा. प्रधान तो मैं ही बनूंगा. एक बार चुनाव हो जाने दो, फिर तुमको तुम्‍हारी औकात दिखाता हूं. सियार होकर शेर के सामने गुर्राने की जुर्रत की है. नोंचकर रख दूंगा.''

उस वक्‍त सूरजभान धमकाने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते थे ? चुनाव तक वह कोई ऐसा काम नहीं कर सकते थे, जिससे कि चुनाव स्‍थगित हो जाए इसलिए केवल धमकाकर रह गये थे, परन्‍तु उनकी बातों से उनके खतरनाक इरादों की बू आ रही थी. मनोहर को इस खतरे का आभास हो चुका था, परन्‍तु अब उसके हाथ में क्‍या था ? नाम वापस लेने की तारीख भी खत्‍म हो चुकी थी. वह सीधा सादा आदमी था, किसी के पंजे-छक्‍के में नहीं पड़ता था, परन्‍तु इस बार पता नहीं कैसे वह कुछ युवकों के बहकावे में आ गया था. यह कौन से खतरनाक और गलत रास्‍ते में उसने कदम बढ़ा दिए थे ? अब उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था चुनाव वाले दिन तक वह तरह-तरह की सोचों से घिरा रहा. चिन्‍ता में सोच-सोचकर वह अधमरा हो चुका था. सूरजभान के अलावा और भी कई लोगों ने उसे गंभीर परिणामों के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी थी. पता नहीं क्‍या करेंगे वे लोग? कौन सा परिणाम उसे भुगतना पड़ेगा? वह रात-दिन चिन्‍ता में घुलने लगा. उसे अच्‍छी तरह पता था कि आजादी के बाद भी सवर्णों द्वारा गरीबों पर अत्‍याचार कम नहीं हुए थे. वह समर्थ था, सवर्णों के रहमो-करम पर जिन्‍दा नहीं था, परन्‍तु यह बात उसे भली-भांति पता थी कि ठाकुर से दुश्‍मनी करके दलित कभी जीत नहीं पाया है. उनके पास हर तरह के दांव-पेंच, चालाकी और दुश्‍मन को परास्‍त करने के हथियार थे. धन-बल और साम-दाम-दण्‍ड-भेद की उनके पास कोई कमी नहीं थी. उनकी ऊंची सोच तक पहुंचने की क्षमता गरीब दलितों में नहीं थी. होती तो क्‍या हजारों वर्षों से वह गरीब और दलित रहते चुनाव परिणाम घोषित हो गए. जैसा कि अपेक्षित था, मनोहर पराजित हो गया था. उसको पिछड़े वर्ग और दलितों के आधे से भी कम वोट मिले थे. इससे यह साबित हो गया था कि गांव की आधे से ज्‍यादा आबादी अभी भी गुलामी के साए में जीने के लिए विवश थी. उनकी अपनी कोई सोच नहीं थी. अपनी मर्जी से न वह कुछ सोच सकते थे, न कर सकते थे. उनके जीवन की डोर सवर्णों के हाथ में थी और वह जिस प्रकार चाहते थे, उन्‍हें नचाते थे सूरजभान की जीत की खुशी में बहुत बड़ा जुलूस निकला. जानबूझकर जुलूस को मनोहर के घर के सामने रोका गया. घंटों वही पर नाच गाना होता रहा, ढोल-मंजीरे और बैण्‍ड बजते रहे. नाच-गाने के बीच में मनोहर को भद्दी-भद्दी गालियों से नवाजा गया, परन्‍तु उन्‍हें सुनने के लिए वह वहां मौजूद नहीं था. दरवाजा बन्‍द करके वह घर के अंदर चुपचाप बैठा हुआ था. इतने बड़े हुजूम से पंगा लेने का मतलब था, अपनी मौत को न्‍यौता देना.... चुप रहने में ही उसकी भलाई थी सूरज पश्‍चिम की तरफ झुकने लगा था. शाम होने में अब ज्‍यादा देर नहीं थी. पेड़ों और मकानों की परछाइयां लंबी होकर जमीन पर पसरने लगी थी. लोग बाग खेतों से अपना काम समेटकर घरों की तरफ लौटने लगे थे. ऐसे में ग्राम प्रधान सूरजभान तेज कदमों से फकीर मुसलमानों की गन्‍दी मलिन बस्‍ती की तरफ बढ़ते जा रहे थे.

फकीरों की यह बस्‍ती हिन्‍दू दलितों से भी गई गुजरी थी. किसी के पास खेती के नाम पर जमीन का एक इंच टुकड़ा न था. गांव गांव जाकर दुआ देकर भीख मांगना उनका पुश्‍तैनी पेशा था. इस धन्धें में कोई बरक्‍कत नहीं थी. लोगों के दिल से रहम खत्‍म होता जा रहा था. मांगे भीख नहीं मिलती थी. ऊपर से दस गालियां सुननी पड़ती थीं, लिहाजा कई लोगों ने ठाकुरों के खेतों में मजदूरी करनी शुरू कर दी थी कमरुद्दीन उर्फ कमरू अपने दरवाजे पर बैठा बीड़ी सूत रहा था. घर के नाम पर झोपड़ीनुमां एक कोठरी थी. उम्र तीस के लगभग थी. गरीब होने के बावजूद शरीर मजबूत था. शादी हो चुकी थी और पांच बच्‍चों का बाप बन चुका था, तीन बेटियां और दो बेटे. सभी की उमर दस और दो साल के बीच थी. लोग ताना कसते थे कि उसकी बीवी और बकरी में कोई ज्‍यादा अन्‍तर नहीं था. बकरी साल में एक बार दो-तीन बच्‍चे जनती थी, तो उसकी बीवी भी हर साल या डेढ़ साल में एकाध बच्‍चा जरूर जनती थी. कमरू दिखावे के लिए हाट बाजारों और गांव में लगने वाले मेले-ठेलों में कपड़े बेचने का काम करता था, जैसे बनियान, धोतियां, तहमद और गमछे. पेट भरने लायक कमा लेता था, परन्‍तु गांव के सभी लोग जानते थे कि गाहे-बगाहे वह घरों में नकब लगाकर चोरियां भी करता था. शरीर का मजबूत था और बेहद फुर्तीला था, ऊंची से ऊंची दीवार भी फांदकर घरों में कूद जाता था कमरू ने प्रधान को अपने घर के सामने देखा तो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, ‘‘सलाम मालिक!''

‘‘क्‍या हाल हैं कमरू?'' ठाकुर साहब ने दुनिया भर की मिठास अपनी बोली में घोलते हुए कहा, जैसे उनसे बड़ा भलामानस और कमरू का खैरख्‍वाह उनके अलावा और कोई नहीं है.

‘‘आपकी मेहरबानी है मालिक,'' कमरू ने चारपाई डालते हुए कहा, ‘‘बैठिए मालिक.''

ठाकुर साहब इत्‍मीनान से चारपाई पर बैठ गए. चारों तरफ नजर डाली. उसकी औरत सिर पर दुपट्टा डाले कोठरी के दरवाजे पर बैठी थी. लड़के-लड़कियां फटे पुराने कपड़ों में अधनंगे इधर-उधर खेल रहे थे. ठाकुर को देखकर इर्द-गिर्द खड़े हो गये थे. बच्‍चों के मन में स्‍वाभाविक उत्‍सुकता थी. कोई बड़ा आदमी उनके दरवाजे पर भूले-भटके ही आता था. आता भी था तो इस तरह बैठकर उनके घर को पवित्र नहीं करता था. कमरू की बीवी गुलाबो के मन में भी यही जिज्ञासा थी कि गांव के प्रधान उनके यहां क्‍यों आए थे ? बिना काम के तो नहीं आ सकते थे आते भी तो इस तरह इत्‍मीनान से चारपाई पर बैठकर खैर-सल्‍लाह नहीं पूछते उसके कान भी खड़े हो गये थे और सांस रोककर पति और ठाकुर साहब के बीच होने वाली बातें सुन रही थी.

ठाकुर साहब ने जैसे एहसान जताते हुए कहा, ‘‘इस बार सोचा है, तुम्‍हारी बस्‍ती के लिए कुछ विकास का काम किया जाए. जैसे ही बजट आया, सबसे पहले तुम्‍हारे मोहल्‍ले में एक नल लगवाऊंगा. पानी भरने के लिए तुम्‍हारी घरवाली और बच्‍चों को दूसरे मोहल्‍ले में जाना पड़ता है. तुम्‍हारे घर के सामने तो काफी खाली जगह पड़ी है. कहो तो तुम्‍हारे घर के सामने ही लगवा दूं. तुमको आराम हो जाएगा.'' कमरू की तो जैसे बोलती बन्‍द हो गई. गांव में तरह तरह के विकास के कार्य हो रहे थे, सबके जीवन में परिवर्तन आ रहे थे ; परन्‍तु आज तक किसी प्रधान या सरकारी अधिकारी ने उसकी बस्‍ती की तरफ मुंह नहीं किया था. कितनी गंदगी और गरीबी वहां थी, यह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की थी. आज ठाकुर साहब के मुंह से ऐसी बात सुनकर उसकी खुशी का पार न था. ठाकुर साहब उसे एक फरिश्‍ते से कम नहीं लग रहे थे.

‘‘मालिक, आप तो खुदा के फरिश्‍ते हैं.'' कमरू ने कमर के बल झुककर कहा.

‘‘फण्‍ड ज्‍यादा आ गया तो तुम्‍हारे घर के सामने खंड़जा और नाली भी बनवा दूंगा.'' ठाकुर साहब ने और दरियादिली दिखाई. र्कमरू तो जैसे संज्ञाशून्‍य हो गया. वह कुछ कह नहीं पा रहा था. तभी पीछे से उसकी बीवी की आवाज आई, ‘‘हमने तो आपको ही वोट दिया था. गरीब हैं, आपका करम हो जाए तो घर की हालत सुधर जाए. यह एक कच्‍ची कोठरी है, अगर आप पक्‍की करवा दें तो....'' फिर वह चुप हो गई.

ठाकुर साहब सोच में पड़ गए. फिर बोले, ‘‘वैसे इन्‍दिरा कालोनी की योजना केवल दलितों के लिए है. आप लोग उस कैटेगरी में तो नहीं आते, परन्‍तु मैं कुछ ऐसा करूंगा कि तुम्‍हारा घर पक्‍का बन जाए, चाहे एक छोटा कमरा ही सही...'' इतना सुनते ही उसके बच्‍चे उछलने-कूदने लगे. चीख-चीख कर सबको बताने लगे कि उनका घर पक्‍का हो जाएगा. कमरू के दरवाजे पर शोर सुनकर अड़ोस-पड़ोस की औरतें, मर्द और बच्‍चे भी इकट्ठा हो गए थे. सभी ध्‍यान से ठाकुर साहब की बातें सुनने लगे. मौका देखकर प्रधानजी सबको आश्‍वासन देने लगे कि उनके विकास और उन्‍नति के लिए भरपूर प्रयास करेंगे. मजमा ज्‍यादा बढ़ने लगा तो वह उठकर खड़े हो गए और कमरू से बोले, ‘‘कमरू जरा मेरे साथ आओ!'' वह अपने घर के रास्‍ते पर बढ़ चले. पीछे पीछे कमरू था. कुछ दूर तक जाकर एकान्‍त में वह रुके. अब अन्धेरा घिरने लगा था दूर का आदमी दिखाई नहीं पड़ता था प्रधान ने कमरू के कान में फुसफुसाकर कहा, ‘‘कमरू, तुमसे एक बात कहता हूं. इस बात की किसी को कानों कान खबर नहीं होनी चाहिए. बोलो, किसी को बताओगे तो नहीं!''

‘‘मालिक, क्‍या बात करते हैं. आपका अन्‍न जल खाकर बड़े हुए हैं. नमक हरामी नहीं करूंगा. आप हमारे लिए फरिश्‍ते हैं. इतना कर रहे हैं तो आपके लिए जान भी हाजिर है, बताइए क्‍या करना होगा?'' कमरू ने विश्‍वास भरे स्‍वर में कहा. सूरजभान सिंह आश्‍वस्‍त हो गये. लंबी गहरी सांस भरकर बोले, ‘‘इतना बड़ा त्‍याग नहीं करना पड़ेगा तुम्‍हें...बस समझ लो कि यह तुम्‍हारे ही लायक काम है, इसीलिए कह रहा हूं.'' वह रहस्‍य को गहरा करते जा रहे थे. कमरू बात जानने के लिए उत्‍सुक था.

‘‘आप काम तो बताइए!'' वह हाथ मलकर बोला. ठाकुर साहब ने चारों तरफ नजर घुमाई. दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं पड़ रहा था, न कोई आहट सुनाई पड़ रही थी. वह आश्‍वस्‍त हो गए कि आस-पास कोई नहीं था. फिर भी आवाज को और धीमा करते हुए बोले, ‘‘तुम्‍हें चोरी करनी होगी!''

‘‘चोरी!'' कमरू को जैसे बिच्‍छू ने डंक मार दिया हो.

‘‘हां, चोरी! परन्‍तु बहुत संभलकर. काम होने के पहले किसी को पता नहीं चलना चाहिए. काम होने के बाद तुम्‍हें तगड़ा इनाम दूंगा.'' कमरू के घर परिवार के लिए सूरजभान ने आज तक कुछ नहीं किया था, न सरकारी तौर पर न व्‍यक्‍तिगत तौर पर, जबकि काफी समय से वह गांव के प्रधान थे. परन्‍तु आज के सुनहरे आश्‍वासनों से वह जैसे उनके एहसान तले दब गया था. दूसरी बात यह थी कि उन जैसे लोगों को ठाकुरों के ही खेत-मेड़ से गुजरना होता था. उनसे पंगा लेकर वह कहां रह सकता था. न कहने का मतलब था, ठाकुरों से दुश्‍मनी मोल लेना...वह सोच में डूब गया.

‘‘कोई परेशानी है क्‍या?'' सूरजभान को शक हुआ कि वह मना कर देगा.

‘‘नहीं,'' वह उलझन भरे स्‍वर में बोला, ‘‘परेशानी तो कोई नहीं, पर यह धन्‍धा छोड़ने की सोच रहा था. काफी दिनों से इसमें हाथ नहीं डाला है, परन्‍तु आप चिन्‍ता न करें. आपके लिए इसे करूंगा. कब करना होगा और कहां?'' कहते-कहते उसके स्‍वर में दश्‍ढ़ता और आत्‍मविश्‍वास आ गया था.

‘‘एक हफ्‍ते के अन्‍दर...!''

‘‘किसके घर में करनी है?'' उसने पूछा.

ठाकुर साहब ने बताने के पहले फिर से चारों तरफ देखा और जब आश्‍वस्‍त हो गए तो उसके कान के पास मुंह ले जाकर बोले, ‘मनोहर!'' कमरू चौंका, फिर सब समझ गया.

‘‘और हां, मनोहर के घर से रुपया-पैसा और जेवर ही चुराने हैं, बाकी कुछ नहीं. चोरी का माल लेकर सीधे मेरे पास आना.'' ठाकुर साहब ने आगे बताया.

‘‘ठीक है, मालिक!'' कमरू ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘अभी मैं निश्‍चित दिन नहीं बताऊंगा, लेकिन जिस दिन काम हो गया, सीधा आपके पास आऊंगा. रात में ही आऊं या सुबह?''

‘‘रात में ही आना, सुबह कोई आते-जाते देख लेगा. पूरे सप्‍ताह मैं बाहर चौपाल में अकेला ही सोऊंगा. समझ गए न!'' ‘‘बिलकुल, आप निशा-खातिर रहें. काम हो जाएगा.'' फिर दोनों अलग होकर अपने-अपने रास्‍ते चले गए. तीन दिन के अन्‍दर ही कमरू ने इस काम को अंजाम दे दिया. रात के घुप अन्धेरे और भयानक सन्‍नाटे में कमरू ठाकुर सूरजभान की चौपाल में पहंुचा था वह जैसे उसी का इन्‍तजार कर रहे थे. हल्‍की आवाज में ही उठकर चारपाई पर बैठ गए.

‘‘कौन?'' उन्‍होंने धीमें स्‍वर में पूछा.

‘‘मैं, कमरू मालिक!'' वह भी फुसफुसाकर बोला‘‘काम हो गया?''

‘‘क्‍यों न होता मालिक? आपका भरोसा और ऊपर वाले की दुआ मेरे साथ थी.''

‘‘ला देखूं; क्‍या-क्‍या है?'' वह जैसे उतावले हुए जा रहे थे. चौपाल के कोने में टार्च की रोशनी में उन्‍होंने चोरी का माल देखा. देखकर उनकी आंखों में चमक आ गई. सोने चांदी के जेवर के साथ साथ लगभग पचास हजार की नकदी थी यह नकदी सालों साल में इकट्ठी की गई होगी, क्‍योंकि उसमें पुराने चलन के नोट भी थे.

 

ठाकुर साहब ने चांदी के जेवर और दस हजार की एक गड्डी उसके हाथ में थमाते हुए कहा, ‘‘यह सामान तुम अपने पास रखो. एक हजार रुपया जेवरों के साथ बांधकर रख देना. बाकी नौ हजार कहीं सुरक्षित जगह में छिपाकर रख देना. पुलिस जब आएगी तो मैं पहले से ही उनके साथ हो लूंगा. उनको अच्‍छी तरह समझा दूंगा. तुम्‍हारा बाल भी बांका नहीं होगा. तुम्‍हारे घर से बस ये चांदी के जेवर और एक हजार रुपया ही बरामद होना चाहिए, समझे.''

‘‘समझ गया, मालिक, लेकिन पुलिस को पता कैसे चलेगा? क्‍या आप उन्‍हें बताएंगे?''

ठाकुर साहब अन्धेरे में मुस्‍कराये, ‘‘तुम इस बात को नहीं समझोगे. मुझे मनोहर से एक हिसाब चुकता करना है, इसलिए चोरी का माल बरामद होना जरूरी है.'' कमरू सचमुच नहीं समझा, ‘‘परन्‍तु माल...?''

‘‘तुम्‍हें ज्‍यादा बात करने की जरूरत नहीं है. पुलिस जब तुम्‍हें पकडेगी तो केवल यही बयान देना है कि मनोहर के घर में तुमने चोरी की है, परन्‍तु केवल चांदी के जेवर और एक हजार रुपया ही चुराया है. इतना ही सामान तुम्‍हारे घर से बरामद होगा. यहीं तुम्‍हें कबूलना है. बाकी एक शब्‍द नहीं बोलना है. मैं साथ में रहूंगा. सब संभाल लूंगा. चिंता न करो. एक बार ये काम हो जाए, फिर तुम्‍हें और इनाम दूंगा. अभी तुम्‍हारे लिए नौ हजार रुपये बहुत ज्‍यादा हैं. जाओ, अब तुम घर जाकर आराम करो और निश्‍चिन्‍त होकर सो जाओ. इसके बाद सब कुछ देखना और संभालना मेरा काम है.'' कमरू कुछ समझा, कुछ नहीं. उसने ज्‍यादा दिमाग नहीं खपाया. ठाकुर का काम करने और नौ हजार रुपये पाने की जो खुशी उसे प्राप्‍त हो रही थी, उसके आगे बाकी डर और भय फीके पड़ गये थे दूसरे दिन गांव में हंगामा सा बरपा हो गया. मनोहर के घर में चोरी की खबर चारों तरफ फैल गई. लोग उसके दरवाजे पर इकट्ठा हो गए थे. सभी लोग अपने-अपने कयास लगा रहे थे कि कौन चोरी कर सकता था. कुछ लोगों का अनुमान कमरू की तरफ जा रहा था, परन्‍तु कुछ लोगों का कहना था कि वह छोटा-मोटा चोर था. इतने बड़े और पक्‍के घर में चोरी करने की उसकी हिम्‍मत नहीं पड़ सकती थी. मनोहर के घर में चोरी करने वाला कोई तगड़ा चोर होगा. वह बाहर से आया होगा, परन्‍तु जिसने भी मुखबिरी की थी, बहुत सही मुखबिरी की थी बातों-बातों में पता चला कि मनोहर के घर से लगभग तीन लाख के सोने चांदी के जेवरात और पचास हजार रुपये नकद चोरी हुए थे. यह सुनकर गांव के समस्‍त लोगों को विश्‍वास हो गया कि इतनी बड़ी चोरी की वारदात को कमरू जैसा छोटा चोर अंजाम नहीं दे सकता था. गलती से अगर अंजाम दे भी दे तो इतना कीमती सामान वह छुपाकर कहां रखेगा. यह जरूर किसी बाहरी और शातिर चोर का काम हो सकता था.

सहानुभूति दिखाने के लिए सूरजभान भी मनोहर के दरवाजे पर आए थे. थोड़ी देर बात करके और उसे था ने जाकर रिपोर्ट लिखवाने की सलाह देकर चले आए थे मनोहर अपने एक पड़ोसी के साथ जाकर चोरी की रिपोर्ट अज्ञात चोरों के खिलाफ लिखा आया था. चोरी गए एक-एक सामान की लिस्‍ट उसने था ने में जमा कर दी थी. विश्‍वास तो नहीं था कि चोरी गया माल कभी उसे वापस मिलेगा, परन्‍तु कानूनी फर्ज अदायगी तो करनी ही थी. वह उसने पूरी कर दी थी उस दिन तो नहीं परन्‍तु दूसरे दिन दारोगा साहब एक हवलदार तथा एक सिपाही के साथ जांच के लिए गांव में पधारे थे. जैसा कि रिवाज था, गांव में कोई वारदात हो जाए या था ने से पुलिस किसी काम से गांव में आती थी तो वह प्रधान के दरवाजे पर ही डेरा डालती थी. वहां उनकी अच्‍छी तरह से आवभगत होती थी और गांव के लोग भी बुलाने पर आसानी से वहां आ जाते थे. इससे जांच में सहूलियत होती थी और पुलिस का काम आसान हो जाता था.

छककर मिठाई खाने और जल-पान करने के बाद दारोगा प्रधान सूरजभान सिंह की तरफ मुखातिब हुए, ‘‘भाई प्रधान जी, ये आपके गांव में क्‍या हो रहा है? हमारे था ने का यही एक ऐसा गांव है, जहां से अपराध के आंकड़ों में शून्‍य दर्ज रहा है. अब अचानक ऐसा क्‍या हो गया कि...?''

ठाकुर सूरजभान सिंह थोड़ा संकोच से भर उठे. माफी मांगते बोले, ‘‘अब क्‍या बताएं दारोगा जी...आदमी का स्‍वभाव ही लालची होता है. जो आदमी लालची और निकम्‍मा होगा, वह चोरी डकैती जैसा अपराध ही करता है.''

‘‘आप गांव के हर आदमी को अच्‍छी तरह जानते समझते हैं. कोई सुराग दे सकते हैं?''

‘‘हूं...'' प्रधान जी ने सोचने का नाटक किया, ‘‘क्‍या मनोहर ने किसी पर शक जाहिर किया है?''

‘‘नहीं, अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई है.''

‘‘और क्‍या-क्‍या चोरी गया है?'' सूरजभान रिपोर्ट में लिखाई गई चीजों के बारे में जानने के लिए उत्‍सुक थे.

‘‘कुल तीन लाख के जेवर और पचास हजार नकद चोरी हुए हैं.''

‘‘आं...'' सूरजभान ने मुंह फाड़कर आश्‍चर्य प्रकट किया, ‘‘इतना सोना और रुपया उसके पास था ?''

‘‘क्‍यों, नहीं हो सकता था क्‍या?'' दारोगा ने संशय से प्रधानजी की तरफ देखा।

‘‘नहीं, मेरा मतलब...'' सूरजभान ने अपने अदभुत अभिनय में लड़खड़ाने का अन्‍दाज भरते हुए कहा, ‘‘इतनी बड़ी हैसियत का आदमी तो नहीं है. बस खाता पीता किसान है. फसल पकने पर आलू और गन्‍ना बेचकर थोड़ा-बहुत नकद पैसा कमा लेता है, परन्‍तु इतना...?''

‘‘पुश्‍तैनी माल होगा?'' दारोगा ने बात खत्‍म करनी चाही.

‘‘हो सकता है, परन्‍तु इतना नहीं...दो भाइयों के बीच में बंटवारा भी तो हुआ है. हो सकता है रिपोर्ट में बढ़ा-चढ़ाकर चोरी का माल लिखाया हो.'' प्रधान ने दारोगा के मन में संशय पैदा करने का प्रयास किया.

‘‘अगर ऐसा हुआ तो उसकी खाल खींच लूंगा. पुलिस को मजाक बना रखा है. आप तो इतना बताइए, क्‍या इस गांव का कोई आदमी ऐसा काम कर सकता है. ऐसा आदमी...जो कभी कभार चोरी चकारी के काम में लिप्‍त होता रहा होउसको पकड़ने से सुराग लग सकता है.''

‘‘हूं...'' प्रधान जी ने फिर सोचने का नाटक किया, ‘‘इस गांव के ज्‍यादातर लोग गरीब हैं. गरीबी कई तरह के अपराधों को जन्‍म देती है. कमरुद्दीन के बारे में पता चला है कि वह छोटी-मोटी चोरियों को अन्‍जाम देता था. हाल-फिलहाल का पता नहीं...अभी तो कपड़ों की फेरी लगाता है.''

‘‘कोई बात नहीं...एक सूत्र पकड़ में आ जाए, फिर आगे के सारे दरवाजे खुल जाएंगे.'' दारोगा ने विश्‍वास भरे स्‍वर में कहा.

‘‘देख लीजिए, उसके घर में अगर माल मिल गया तो ठीक, वरना फिर बाहर के ही किसी चोर ने हाथ मारा होगा.'' ठाकुर साहब ने होशियारी से चाल चलते हुए कहा.

‘‘आइए, उसके घर तक चलते हैं.'' दारोगा ने अपनी मोटर साइकिल पर बैठते हुए कहा. प्रधान जी पीछे बैठ गए. दोनों हवलदार और सिपाही अलग मोटर साइकिल से आए थे. काफिला कमरू के घर की तरफ रवाना हो गया. नाटक लिखा जा चुका था. पात्र तैयार थे. रिहर्सल हो चुकी थी. मंच सज चुका था. बस पटाक्षेप होना शेष था. कमरू घर पर ही था. सब कुछ प्रधानजी की पूर्व नियोजित योजना के तहत हो रहा था. चोर भी पकड़ में आ गया और चोरी का माल भी. कमरू को चोरी के माल के साथ मनोहर के दरवाजे पर लाया गया. उसके घर के सामने सहन में मजमा लग गया था. भीड़ के बावजूद सभी शांत थे और यह जानने को उत्‍सुक थे कि आगे क्‍या होता है? दारोगा साहब चारपाई पर बैठे, साथ में प्रधान सूरजभान भी. मनोहर चारपाई के सिरहाने थोड़ी दूर पर खड़ा था. सामने कमरू दयनीय चेहरा लिए बैठा था. वह चकराई आंखों से कभी दारोगा को देखता तो कभी प्रधान जी को...मनोहर की तरफ उसने एक बार भी नजर उठाकर नहीं देखा था, जबकि मनोहर की विस्‍मय भरी आंखें उसी के ऊपर लगी थीं. उसको विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि कमरू ने उसके घर में चोरी की थी दारोगा ने कमरू से पूछताछ शुरू की, ‘‘क्‍या तुम कुबूल करते हो कि तुमने मनोहर के घर में चोरी की है?''

‘‘जी हुजूर!'' उसने अपने स्‍वर में दुनिया भर की मासूमियत और दयनीयता भरते हुए कहा.

‘‘कैसे?'' दारोगा का स्‍वर कठोर था.

‘‘दीवार फांदकर घर में घुसा था. आधी रात से अधिक का समय था अन्धेरा पाख था, इसलिए पूरा घर अन्धेरे में डूबा हुआ था. घर के सभी लोग खर्राटे भर रहे थे. एक कमरे के बक्‍स में मुझे जेवर और रुपये मिल गए थे.''

‘‘क्‍या-क्‍या चुराया था ?''

‘‘चार-पांच चांदी के गहने थे और एक हजार रुपये...''

‘‘केवल इतना ही, कुछ और नहीं...मनोहर ने तो लिखाया है कि सोने और चांदी के जेवर के साथ-साथ पचास हजार रुपये चोरी हुए थे.'' दारोगा ने आश्‍चर्य से पूछा.

‘‘और कुछ नहीं था साहब! बस इतना ही माल हाथ लगा था. मैं छोटा चोर हूं साहब. ज्‍यादा के लालच में नहीं पडता. एक जगह जितना माल मिला, लेकर तुरन्‍त भाग आया. ज्‍यादा के चक्‍कर में पड़ता तो जगहग हो जाती और मैं पकडा़ जाता.'' कमरू ने इतनी दीनता से कहा, जैसे उसके मुंह से केवल सच्‍चाई के मोती निकल रहे थे मनोहर पास खड़ा सब सुन रहा था. उसको सख्‍त हैरानी हुई. वह कहने लगा, ‘‘अरे यह क्‍या बोल रहा है? केवल इतना सामान...मेरा तो पूरा घर लुट गया. एक भी जेवर और रुपया नहीं बचा और तू कहता है कि बस ये चांदी के गहने और एक हजार रुपये चुराये हैं.'' फिर उसने दारोगा से मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘साहब यह झूठ बोल रहा है, इसने बाकी का माल कहीं और छिपा कर रखा है. इसका कोई साथी होगा, जो सारा माल लेकर गांव से बाहर चला गया होगा.'' बोलते-बोलते मनोहर की आवाज लड़खड़ाने लगी थी दारोगा ने उसे आंखें तरेरकर देखा और गुर्रा कर बोला ‘‘तुम चुप रहो जी. तफ्‍तीश हम कर रहे हैं. अभी सच्‍चाई का पता चल जाएगा.'' फिर उसने कमरू की तरफ देखकर नर्मी से पूछा, ‘‘देखो तुम गरीब आदमी हो. सच बोलोगे तो हम नर्म रुख अख्‍तियार करेंगे और कोशिश करेंगे कि तुम्‍हें कम से कम सजा मिले.'' कमरू के कुछ बोलने के पहले ही प्रधान जी ने हस्‍तक्षेप किया, ‘‘आपने इसका घर देखा ही है, साहब! उस कोठरी के अलावा इस गांव में इसका कोई ठौर ठिकाना नहीं है. अगर इसने इतना बड़ा हाथ मारा होता तो उसे कहां छिपाता. चोरी हुए समय ही कितना हुआ है. इतने कम समय में यह बाहर जाकर माल को बेच भी तो नहीं सकता था. यह इतने बड़े गुर्दे का आदमी नहीं है कि इतना कीमती माल इतनी जल्‍दी हजम कर जाए.''

‘‘तो फिर...''

गर्म लोहे पर चोट करते हुए प्रधान जी ने सरगोशी में कहा, ‘‘मुझे तो लगता है, मनोहर ने जान-बूझकर चोरी का माल बढ़ा-चढा़कर बताया है. इसका मकसद क्‍या रहा होगा, यह मैं नहीं जानता. आप पूछताछ कर लीजिये.'' दारोगा का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. कोई उसे बेवकूफ बनाए, था ने में आकर झूठी रिपोर्ट लिखाए; यह वह किस प्रकार बर्दाश्‍त कर सकता था. कमरू के घर वालों की दयनीय हालत देखकर दारोगा को भी विश्‍वास होने लगा था कि वह टुंटपुजिया चोर था, वरना अब तक उसके ठाठ बन गए होते. एक बार फिर उससे सख्‍ती से पूछा-

‘‘क्‍या तेरा कोई साथी है?''

‘‘नहीं साहब!''

‘‘बाकी माल कहीं और छिपाकर तो नहीं रखा?''

‘‘नहीं साहब! मेरा तो कोई खेत खलिहान भी नहीं है.''

‘‘तो बस इतना ही माल तूने चुराया है?''

‘‘परवर दिगार की कसम खाकर कहता हूं, इससे ज्‍यादा मैंने कुछ नहीं चुराया.'' खुदा की कसम खाकर कोई बयान दे रहा हो और उस पर विश्‍वास न किया जाय, ऐसा कहीं संभव था. कमरू की आत्‍मविश्‍वास भरी स्‍वीकारोक्‍ति, प्रधान द्वारा पैदा किया संशय और बरामद किए गये माल ने दारोगा के विवेक को हिलाकर रख दिया. उसके शक की सुई उल्‍टी दिशा में घूम गई. दिमाग खौलने लगा. आम लोगों ने पुलिस को मखौल बना रखा था. उनका इतना बड़ा दुःसाहस कि झूठी रिपोर्ट लिखवाने लगे. एक सामान चोरी जाता है, तो दस सामान लिखवाते हैं, जैसे पुलिस उनके चोरी गये पूरे सामान की भरपाई कर देगी, या बीमा की रकम दिलवा देगी. साले, हरामजादे...दारोगा की कुछ समझ में नहीं आया तो वह तमतमाते हुए उठा और अपने दायें खड़े मनोहर को एक झन्‍नाटेदार थप्‍पड़ रसीद कर दिया. नाटक का पटाक्षेप हो चुका था और इसके साथ ही प्रधान जी का हिसाब भी चुकता हो गया था.

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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