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हिन्दी में हाइकु और उसका परिवार / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

जापानी काव्य-विधा, हाइकु, हिन्दी कवियों को खूब भा गयी है. आज ढेरों कवि हिन्दी में हाइकु लिख रहे हैं. हाइकु-लेखन ने लगभग एक आन्दोलन का रूप ले लिया है. एक और महत्त्वपूर्ण बात यह हुई है कि अब हाइकु रचनाकार स्वयं को केवल हाइकु लेखन तक ही सीमित नहीं रखे हैं बल्कि हाइकु परिवार की अन्य विधाओं को भी, जैसे, वाका/तांका, सेदोका, चोका, सेंरयु आदि को भी अपना रहे हैं.

हिन्दी में इस हाइकु आन्दोलन के प्रेरक डा. सत्य भूषण वर्मा थे. अज्ञेय ने सबसे पहले हिंदी जगत को हाइकु विधा से परिचित कराया था. कुछ हाइकु लिखे भी थे किन्तु हाइकु लेखन को वह आन्दोलन नहीं बना सके. डा. वर्मा ने सबसे पहले मूल जापानी से कुछ हाइकु रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद किया. इससे हिन्दी जगत को मूल जापानी रचनाओं की एक अच्छी जानकारी मिली. साथ ही उन्होंने अंतरदेशीय पत्र में हाइकु की एक पत्रिका निकालना आरम्भ की जिससे हिंदी हाइकुकारों को एक मंच मिला. आज जिन हिन्दी रचनाकारों ने हाइकु लेखन में अपनी पहचान बनाई है उनमें से अधिकतर इस पत्रिका से जुड़े रहे हैं. डा. वर्मा ने स्वयं तो हाइकु रचनाएं नहीं कीं किन्तु ‘ जापानी हाइकु और आधुनिक हिन्दी कविता ‘ पर शोध कार्य कर एक अति महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हिन्दी साहित्य को प्रदान किया. उस समय हाइकु लेखन को जो उन्होंने प्रोत्साहन दिया वह उल्लेखनीय है. इस प्रोत्साहन को और भी आगे बढाने में डा. भगवतशरण अग्रवाल का नाम और भी उल्लेखनीय है. सौभाग्य से प्रोत्साहन के इस कार्य में वे आज भी जुटे हुए है. उन्होंने अपनी “हाइकु भारती” पत्रिका के माध्यम से न जाने कितने रचनाकारों को हाइकुकार बना दिया. उन्होंने स्वयं भी खूब हाइकु रचे और वह अनेक रचनाकारों को सामने लाए. उनके प्रयत्नों से हिन्दी में हाइकु लेखन ने सचमुच एक आन्दोलन का ही रूप ले लिया. हिंदी में प्रथम हाइकु संग्रह, ‘शाश्वत क्षितिज’ डा. अग्रवाल का ही आया. उन्होंने एक ‘हाइकु विश्व-कोश’ भी तैयार किया जो संभवत: विश्व में हाइकु काव्य पर प्रथम विश्व-कोश है.

हाइकु को समर्पित हिन्दी में अनेक पत्रिकाए निकलने लगीं. डा. जगदीश व्योम ने ‘हाइकु दर्पण’ निकाला. यह अभी तक निकल रहा है. डा. महावीर सिंह ने रायबरेली से ‘त्रिशूल’ निकाला यह भी अभी तक निकल रहा है. इसके अलावा कुछ अल्पजीवी हाइकु पत्रिकाएँ भी निकली और ढेर सारे हाइकु-विशेषांक अन्यान्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे. ‘अभिनव इमरोज़’ ने लभभग दो सौ-पौने दो सौ पृष्ठों का एक हाइकु विशेषांक बड़ी सज- धज के साथ अक्टूबर, २०१३ में निकाला. इसकी अतिथि सम्पादक थीं, डा. मिथलेश दीक्षित. इसका फलक बहुत व्यापक था. इसमें २०० से अधिक रचनाकारों के लगभग १५०० हाइकु सम्मिलित किए गए. हाइकु पर अनेक आलेख प्रकाशित हुए. विभिन्न विधाओं में हाइकु रचनाओं को स्थान दिया गया – हाइकु नवगीत, हाइकु मुक्तक, हाइकु रुबाई, हाइकु दोहे, हाइकु ग़ज़ल आदि छापी गईं. हाइकु आधारित ये विधाएं हिन्दी रचनाकारों की सूझ हैं.

हिन्दी हाइकु के लिए एक बड़ा कान कमलेश भट्ट कमल ने भी किया. उन्होंने प्रतिनिध हाइकु कविताओं के संकलन निकाले. पहला संकलन – ‘हाइकु-१९८९’ –निकला. बाद में ‘हाइकु-१९९९’ तथा ‘हाइकु-२००९’ भी निकाले गए. इन संकलनों से रचनाकारों की पहचान बनी.

हाइकु लेखन में हिन्दी में खूब प्रयोग हुए. लेकिन हिन्दी रचनाकार इनसे संतुष्ट नहीं हुआ. उसने जापान में प्रचलित ‘हाइकु परिवार’ की अन्य विधाओं की भी जानकारी ली. इन सभी विधाओं को हम ‘हाइकु परिवार’ का इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इनका शिल्प ‘हाइकु’ से मिलता जुलता है. ये सभी लघुकाय हैं और सभी अक्षर अनुशासन का पालन करती है. इनमें एक है “ताँका”. तांका का परिचय हिन्दी जगत को सबसे पहले डा. अंजलि देवधर ने कराया. उन्होंने जापान के दस वाका, या कहें, ताँका –एक ही बात है- कवियों की १०० रचनाओं का हिन्दी अनुवाद किया. वाका का अर्थ ही जापानी कविता या गीत है. ‘वा’ अर्थात जापानी और ‘का’ अर्थात गीत. यह पांच पंक्तियों की तेरह अक्षरों वाली कविता है. इसे ५-७-५-७-७ अक्षरों में आयोजित किया जाता है. बाद में वाका कविता की ही प्रथम तीन पंक्तियों के आकार को स्वीकार कर, हाइकु कविताओं का रूप विन्यास ५-७*५ प्रतिष्ठित हुआ. तेरहवीं शताब्दी से पहले की जापानी वाका कवितायेँ मुख्यत: राज दरबार की कवितायेँ हैं. ये सहज न होकर बहुत कुछ कृत्रिमता ओढ़े हुए है. किन्तु इनमें वे कवितायेँ जो वैयक्तिक भावनाओं को सरलता से प्रकट करती हैं बहुत अच्छी बन पडी हैं – * * समुद्र तट /दहाड़ती लहरें /घिरती रात / अनुपस्थित है तू /फिर भी मेरे पास * हर चौखट /भटकता कहा मैं /तुम्हारे लिए/ नगर में, वन में /आग में, बरफ में * इतना वृद्ध /कि छोड़ गए मित्र /सारे के सारे /बरगद पुराना /नहीं देता सांत्वना * वासंती दिन /हर जगह शान्ति /चेरी के फूल/ क्यों अशांत होकर /यत्र तत्र बिखरे! * वादा करके /वह मुकर गया /मेरी तो छोडो / शपथ बद्ध वह /कैसा दयनीय है! * एक अकेला /पर्वत की ढाल पे /चेरी का वृक्ष /अनजान सा खडा / सहचर के बिना

(रूपांतरण – डा. सुरेन्द्र वर्मा)

प्रसन्नता की बात है की आज हिन्दी में वाका/तांका कवितायेँ भी खासी मात्रा में लिखी जा रही हैं. इन्हें सर्वप्रथम डा. सुधा गुप्ता ने लिखा. परन्तु तांका का संग्रह के रूप में सबसे पहले डा. उर्मिला अग्रवाल का संग्रह आया, २००९ में. अब तक तो हिन्दी में कई तांका संकलन आ चुके है. मिथलेश कुमारी दीक्षित का एक सुन्दर टांका है – ‘मेरे आने पे / उसकी आँखें भीगीं /तो यकीन आया /उसको भो मुझसे /सचमुच प्यार है.’

वाका कविताओं के लगभग साथ साथ ही ‘सेदोको’ भी हिन्दी जगत में खरामा खरामा टहलता हुआ चला आया. सेदोका को भी हाइकु परिवार का सदस्य कहा जा सकता है, क्योंकि यह भी अक्षर-अनुशासन का पालन करता है. सेदोका के दो भाग होते हैं. इसका रचाव ५-७-७ ५-७-७ अक्षरों के युग्म में होता है. सेदोका के हर भाग को ‘कतौता’ कहा जाता है. अकेला कतौता अपूर्ण माना गया है. यह केवल अर्ध-कविता है. कतौता का युग्म ही पूर्ण सेदोका-कविता है. रामेश्वर काम्बोज और डा. हरदीप कौर संधु ने हिन्दी में सर्वप्रथम ‘अलसाई चांदनी’ शीर्षक पुस्तक में २१ कवियों के ३२६ सेदोका संपादित किए. बाद में हिन्दी का पहला सेदोका संग्रह २०१२ में डा. उर्मिला अग्रवाल का प्रकाशित हुआ. अब तक हिन्दी में कई (२ से अधिक) सेदोका संग्रह आचुके हैं. डा. उर्मिला अग्रवाल के अलावा डा. सुधा गुप्ता तथा डा. रमाकांत श्रीवास्तव के सेदोका संग्रह मैंने देखे हैं. सांध्य वेला पर डा. सुधा गुप्ता का एक सुन्दर सेदोका देखें –

फाकता थी शाम / भूरी-सलेटी पांखें / कुछ बोलती आँखें मुंडेर बैठी / कुछ देर टहली / खामोशी से उड़ ली

हाइकु परिवार का एक और छंद ‘चोका’ है. हिन्दी में धीरे धीरे अब यह भी प्रवेश पा रहा है. इण्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार चोका भी जापान का एक वर्णिक छंद है. ५-७-५-७ वर्ण क्रम में लिखे गए चोका में कई चरण होते हैं. अंतिम दो चरणों में ७-७ अक्षर होते है. चोका के चरणों की संख्या निश्चित नहीं है. यह कवि पर निर्भर करती है. मेरी जानकारी में चोका के एकल-संग्रह हिन्दी में कम ही आए हैं. एक संग्रह डा सुधा गुप्ता का है. एक और संग्रह मनोज सोनकर का है – चोका-चमन – जो मुझे पिछले माह ही (सितम्बर, २०१४) प्राप्त हुआ है. इसी वर्ष प्रकाशित भी हुआ है. डा. सोनकर का पहला हाइकु संग्रह, चितकबरी, १९९२ में प्रकाशित हुआ था. तब से वह बराबर हाइकु और हाइकु परिवार से जुड़े हुए हैं. हाइकु के अलावा उनके ताँका और सेदोका संग्रह तो आ ही चुके हैं, चोका-चमन उनका पहला चोका संग्रह है. मनोज सोनकर के काव्य में सामाजिक चेतना है. वे सामाजिक विकृतियों का बड़ा प्रभावशाली और व्यंग्यात्मक अंकन करते है. चोका छंद में उनका एक आकर्षक व्यक्ति चित्र देखिए -

आँखें तो बड़ी / रंग बहुत गोरा / विदेशी घड़ी / कुत्ते बहुत पाले पड़ोसी मोना / खुराक अच्छी डालें / आजादी प्यारी / शादी तो बंधन कहें कुंवारी / अंग्रेज़ी फ़िल्में लाएं / हिन्दी कचरा / खूब भुनभुनाएं / ब्रिटेन भाए / बातचीत उनकी / घसीट उसे लाए भले ही किताबें कम प्रकाशित हुई हों, इटरनेट पर हिन्दी में हाइकु परिवार का बोल-बाला है. डा. रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने ‘त्रिवेणी’ नाम से एक इंटरनेट पत्रिका ही कुछेक वर्षों से प्रकाशित करना आरम्भ कर दी है. इसमें वाका कवितायेँ, सेदोकू रचनाएं तथा चोका ही प्रकाशित किए जाते हैं. दर्जनों कवि इसमें शिरकत कर रहे हैं. ‘हिमांशु’ जी हाइकु परिवार की विधाओं पर रचनाकारों को लिखने के लिए प्रेरित भी खूब करते हैं. डा. सुधा गुप्ता, डा. रमाकांत श्रीवास्तव तथा डा. उर्मिला अग्रवाल ने तो उनके प्रोत्साहन को खुले दिल से स्वीकार भी किया है. इन प्रवृत्तियों को देखते हुए लगता है कि हिन्दी में हाइकु और हाइकु परिवार अपना वजूद कायम करने में पूरी तरह सफल हो गया है.

हाइकु लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए इन दिनों “सत्रह आखर” नाम से रचनाकारों का एक समूह वाट्स-एप पर सक्रीय है | इसमे प्रकाशित होने वाले श्रेष्ठ हाइकु हर माह मेरे ब्लॉग “ श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु” के अंतर्गत देखे जा सकते हैं.

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बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख।हाइकू लेखन इतना प्रसिद्ध है,पहली बार जाना।धन्यवाद।

सचमुच उपयोगी लेख। जानकारी बढ़ी । मेरे लेखन में सुधार लाने के लिए अवसर। आभार।

-----वस्तुतः सभी छंदों व सदा-सर्वदा की भाँति..हाइकू भी मूलतः संस्कृत छंद उष्णिक-८ ८ १२...एवं गायत्री -८ ८ ८ का अपर रूप है ...

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