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मोहब्बत का रस पीने दीजिए / कविताएँ / कवि जयचन्द प्रजापति कक्कूजी

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(1)

राजनीति में भ्रष्टाचार बसा है
..................................

देश में बसा है
राजनीति में भ्रष्टाचार बसा है
गाँव मुहल्ले  में बसा है
जहाँ देखो वहीं बसा है
वहीं बसा है,वहीं बसा है
देश में बसा है
राजनीति में भ्रष्टाचार बसा है.....

भ्रष्टाचार में सजा नहीं मिल पाता है
कोई कुछ कह नहीं पाता है
हमारा देश बड़ा आली शान है
भारत माता बड़ी महान है
हमारा भी बड़ा बड़ा शान है
दूध में पानी बसा है
देश में बसा है
राजनीति में भ्रष्टाचार बसा है.....

सच्चे देशभक्तों की भीड़ लगी है
नेता बनने की लाईन लगी है
यहाँ वहाँ जुगाड़ टेक्नालॉजी लगा है
सब जगह बेईमानों का मेला लगा है
तन से लगा है,मन से लगा है
रात रात दिनभर लगा है
भ्रष्टाचारी नेताओं से घर बसा है
देश में बसा है
राजनीति में भ्रष्टाचार बसा है......

सबहीं आपस में लड़े हैं
देखो आमजन पड़े हैं
धरती का किसान पिस रहा है
देश का मान नहीं रहा है
स्त्रियों का अपमान हो रहा है
बड़ा बड़ा गंदा काम हो रहा है
देश बड़े बड़े नेताओं से घिसा है
देश में बसा है
राजनीति मे भ्रष्टाचार बसा है.....

होंठों पर सच्चाई नहीं है
सच्ची निगाह रही नहीं है
यहाँ बातों में सुलझन नहीं है
राहों में बड़ा बड़ा अड़चन है
जनता को समझे अनपढ़ है
यही तो नेता का फंडा है
यही तो सब जगह धंधा है
जनता भ्रष्टाचार में फँसा है
देश में बसा है
राजनीति में भ्रष्टाचार बसा है....

(2)

मोहब्बत का रस पीने दीजिये
...................................

अपनीआँखों से
मोहब्बत का रस पीने दीजिये
इतना न सताओ प्रिये
बह रहा हूँ
तेरी जवानी में
होंठों की सराफत को
दिल में लगाने दीजिये
नजरों से जाम पीने दीजिये
मोहब्बत का रस पीने दीजिये

बड़ी तमन्ना थी
ले लूँ बाहों में
हर पल रखूँ ख्वाबों में
बहा दो श्रृंगार की धारा
भूखी है नैना हमारी
देर न करो प्राणेश्वरी
सीने से लग जाओ प्राणेश्वरी
होंठो को चूम लेने दीजिये
मोहब्बत का रस पीने दीजिये

उठे हैं मोहब्बत का रंग
साँसों में समा जा
फूलों की खुशबू बन जा
सहें हैं विरह, तेरी याद में
कैसे कहूँ दिल का हाल
छुप के धीरे से आना
बाहों में समा जाना
दिल की धड़कनों को बढ़ने दीजिये
मोहब्बत का रस पीने दीजिये

ये ऋतु कहीं निकल न जाये
हँसी का पल खतम न हो जाये
सराफत में कहीं बिक न जायें
बेवफा का दाग कहीं लग न जाये
उठाओ कदम,मिला लो नयन
खिलने दो हुश्न का ये चमन
यही है घड़ी मिलन को
कदम पीछे न हटने दीजिये
मोहब्बत का रस पीने दीजिये

सजा दूँगा तेरी महफिल
बहने लगेगी उपवन की धारा
चाहूँ हर पल तुझे  मैं रानी
लिख दूँ जवानी की कहानी
आयी है मिलन की बेला
कहीं शुभ मुहुरत निकल न जाये
दिल में बहने दो जवानी की राहें
खुल कर इश्क का रंग चढ़ने दीजिये
मोहब्बत का रंग पीने दीजिये

--

 

कवि  जयचन्द प्रजापति कक्कूजी
पढ़ाई..BA.PGDJMC(पत्रकारिता)
वर्क...अध्यापन कार्य
पता..जैतापुर,हंडिया,इलाहाबाद यूपी 221503
मो.07880438226
E.mail...jaychand4455@gmail.com

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