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रमेश उपाध्याय / संपादक डाकिया नहीं होता / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

कथा-कसौटी (संपादक)

रमेश उपाध्याय

संपादक डाकिया नहीं होता

"आपने मेरी कहानी लौटा दी। क्या आपको अच्छी नहीं लगी? क्यों अच्छी नहीं लगी? अमुकजी को तो वह बहुत अच्छी लगी। उन्होंने तत्काल छाप भी दी। और जब से छपी है, उस पर पाठकों, आलोचकों और दूसरे संपादकों की बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं।"

मुझे ऐसी शिकायतें बहुत सुनने को मिली हैं। मैंने अपने संपादन में 'कथन' के जो साठ अंक निकाले हैं, उनमें लगभग तीन सौ कहानियाँ प्रकाशित की हैं। उन तीन सौ कहानियों को चुनने के लिए मुझे कम से कम तीन हजार कहानियाँ खारिज करनी पड़ी होंगी। वे अन्यत्र छपी भी होंगी, शायद सराही भी गयी होंगी। इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि वे कहानियाँ अच्छी नहीं थीं। अत: ऐसी शिकायतें करने वालों से क्षमा माँगते हुए मैं अक्सर कहता रहा हूँ, : अपनी-अपनी पसंद है।

पूछा जा सकता है, और पूछा जाना अनुचित भी नहीं होगा, कि संपादक की अपनी पसंद का भी कोई न कोई आधार तो होता होगा?

मेरे विचार से संपादक डाकिया नहीं होता कि लेखकों से उसे जो मिले, पाठकों तक पहुँचा दे। लेखन की भाँति संपादन भी एक प्रकार का सृजन है। पत्रिका के एक अंक में कई लेखकों की विभिन्न प्रकार की रचनाएँ होती हैं, किंतु वह अंक संपादक की अपनी रचना होता है। जैसे विभिन्न प्रकार के फूलों से बनाया गया एक गुलदस्ता। प्रत्येक फूल अपने-आप में सुंदर है, लेकिन असंख्य प्रकार के फूलों में से कुछ को चुनकर गुलदस्ते में सजाये जाने पर जो एक नया सौंदर्य पैदा होता है, वह गुलदस्ते का सौंदर्य होता है।

सौंदर्य के सृजन की प्रक्रिया में चुनने और छोडऩे की क्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं। लेखक अपने ढंग से यह काम करते हैं, संपादक अपने ढंग से यह काम करता है। लेकिन यह सिर्फ निजी पसंद-नापसंद का मामला नहीं है। इसके पीछे सर्जक का विवेक काम करता है, जो उसकी जीवन-दृष्टि, विश्व- दृष्टि, सौंदर्य-दृष्टि और नैतिक दृष्टि से मिलकर बनता है। इसी विवेक के आधार पर जैसे लेखक यह निर्णय करता है कि उसे क्या लिखना है और क्या नहीं लिखना है, वैसे ही संपादक यह निर्णय करता है कि उसे अपनी पत्रिका में क्या छापना है और क्या नहीं छापना है।

मेरा विवेक कहता है कि साहित्य का उद्देश्य दुनिया को बेहतर बनाना है और यह काम वही साहित्य कर सकता है, जो यथार्थवादी हो; जो अतीत के अनुभवों की रोशनी में वर्तमान यथार्थ को देखता-दिखाता हो और भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान को बेहतर बनाने के लिए पाठक को प्रेरित करता हो। ऐसा साहित्य आजादी, बराबरी और भाईचारे जैसे मानवीय मूल्यों को अपनाकर चलता है और उन्हें आगे बढ़ाता है। लेकिन यह काम वह नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र या सौंदर्यशास्त्र बनकर नहीं, साहित्य बने रहकर ही कर सकता है।

अत: कहानी को सबसे पहले कहानी होना चाहिए। एक मुकम्मल कहानी। यानी उसमें ऐसा कहानीपन होना चाहिए कि वह पढऩा शुरू करते ही पाठक को बाँध ले और स्वयं को आदि से अंत तक पढ़वा ले जाये। कहानी के मुकम्मल होने पर मैं बहुत जोर देता हूँ। मैंने अपने लेख 'सवाल मुकम्मल कहानी का' में लिखा भी है कि कहानी आधी-अधूरी नहीं, पूरी होनी चाहिए। कहीं न कहीं उसका अंत होना ही चाहिए, और अंत भी ऐसा कि शीर्षक सहित शुरू से जो कुछ कहा गया है, वह सब उससे जुड़ जाये।

लेकिन मुकम्मल कहानियाँ तो गैर-यथार्थवादी भी हो सकती हैं, जैसे ज्यादातर हिंदी फिल्मों की कहानियाँ। इसलिए कहानी से मेरी दूसरी माँग यह होती है कि वह यथार्थवादी हो। यथार्थवादी कहानी में कल्पना के लिए पूरी गुंजाइश है, इसलिए फैंटेसी या एलेगरी वाली, नीतिकथा या बोधकथा के शिल्प वाली, जादुई या चमत्कारपूर्ण वर्णनों वाली कहानी से मुझे परहेज नहीं। अर्थात, अच्छी कहानी वह है, जो चाहे किसी भी रूप या शिल्प में लिखी गयी हो, लेकिन अतीत के अनुभवों की रोशनी में वर्तमान यथार्थ को देखती-दिखाती हो और भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती हो।

कई कहानियाँ आदि-मध्य-अंत की दृष्टि से पूरी तरह मुकम्मल और लेखन की यथार्थवादी पद्धति अपनाकर लिखी हुई होने पर भी यथार्थवादी नहीं हो सकती हैं। मैं यह मानता हूँ कि यथार्थवाद लेखन की विभिन्न पद्धतियों में से एक पद्धति नहीं, बल्कि लेखक की जीवन-दृष्टि है। कहानीकारों में यथार्थ को देखने की विभिन्न दृष्टियाँ पायी जाती हैं, जिन्हें विभिन्न प्रकार के यथार्थवादों के नाम से पुकारा जाता है। जैसे अनुभववाद, प्रकृतवाद, आलोचनात्मक यथार्थवाद इत्यादि। अत: मैं कहानी में यह देखता हूँ कि उसमें कौन-सा यथार्थवाद है। मैं अनुभववाद और प्रकृतवाद पर आलोचनात्मक यथार्थवाद को तरजीह देता हूँ। 'कथन' का संपादन करते-करते ऐसी कई देशी-विदेशी कहानियाँ मेरे पढऩे में आयीं, जिनमें मुझे एक नये ढंग का यथार्थवाद दिखा। मैंने उसे भूमंडलीय यथार्थवाद का नाम दिया और अपनी कहानियों में तो उसे अपनाया ही, उसके बारे में दो पुस्तकें भी लिखीं—'साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ' तथा 'भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्ठभूमि।' मगर कहानी स्थानीय यथार्थ को सामने लाये चाहे भूमंडलीय यथार्थ को, वह ऐसी अवश्य होनी चाहिए, जो आजादी, बराबरी और भाईचारे जैसे मूल्यों को सामने लाने, उनकी अभिपुष्टि करने और उन्हें आगे बढ़ाने का काम करती हो।

कहानी में भाषा और शिल्प संबंधी नये प्रयोगों से मुझे परहेज नहीं। कहानीकार के रूप में मैं स्वयं अपनी कहानियों में इस तरह के अनेक प्रयोग करता रहा हूँ। लेकिन कहानी में प्रयोग के लिए प्रयोग करना या कहानी की अंतर्वस्तु की उपेक्षा करके, या उसकी कीमत पर, किये जाने वाले प्रयोग मुझे पसंद नहीं। साहित्य में नवोन्मेष के प्रयास मुझे पसंद हैं, लेकिन साहित्यिक फैशनों के नाम पर की जाने वाली नकल मुझे पसंद नहीं। मैं देशी-विदेशी कहानियाँ पढ़ता रहता हूँ, इसलिए नकल का पता मुझे फौरन चल जाता है और मैं यह बता सकता हूँ कि यह शिल्प या शैली कहाँ से नकल की गयी है। ऐसी बहुत-सी कहानियाँ, कई बहुचर्चित लेखकों की कहानियाँ भी, मैंने इसी कारण लौटायी हैं।

अंतत: संपादक पत्रिका अपने लिए या दूसरे लेखकों और संपादकों के लिए नहीं, बलिक पाठकों के लिए निकालता है। इसलिए उसकी पहली जिम्मेदारी पाठकों के प्रति होती है। संपादक के रूप में मुझे ऐसी कहानियाँ पसंद नहीं, जो पाठकों को भुलाकर संपादकों और आलोचकों को खुश करने के लिए लिखी गयी हों। और मैं अपने कहानी-लेखन तथा संपादन दोनों के अनुभव से जानता हूँ कि हमारा पाठक बहुत सजग, सचेत और प्रबुद्ध है। कुछ संपादक कहानीकारों को उठाने-गिराने का जो खेल खेलते हैं, उससे पाठक थोड़े दिनों के लिए भ्रमित भले ही हो जाये, लेकिन जल्दी ही वह उस खेल को समझ जाता है और कहानीकारों को ही नहीं, ऐसे संपादकों को भी उनकी सही जगह दिखा देता है।

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