रविवार, 19 जून 2016

कलम छूट गई, कहानी बनती रही / प्रियदर्शन / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

प्रियदर्शन

कलम छूट गई, कहानी बनती रही

किताबों के अतीत और भविष्य को लेकर कुछ साल पहले आई किताब ‘दिस इज़ नॉट दि एंड ऑफ द बुक’ में उपन्यासकार उंबेर्तो इको पटकथाकार और लेखक जां क्लाद केरिअर से अपनी उस मुश्किल का ज़िक्र करते हैं जो कंप्यूटर पर लेखन की वजह से पैदा हुई है। वे बताते हैं कि वे अपने उपन्यासों के कई ड्राफ्ट करते रहे हैं और हर ड्राफ्ट के बाद कृतियां कुछ और निखर कर आती रही हैं। वे कहते हैं कि कंप्यूटर पर लेखन ने यह सुविधा खत्म कर दी है। अब उन्हें पता ही नहीं चलता कि उनके कितने ड्राफ़्ट हो रहे हैं। हो सकता है, वे और ज्यादा होते हों, और उनमें कृति की संपूर्णता का पता नहीं चलता। जवाब में जां क्लाद केरियर बताते हैं कि वे अपने पन्नों को आमने-सामने रखकर अपनी पटकथाओं में पंक्तियों का संतुलन तौलते रहे हैं। यह सहूलियत कंप्यूटर ने खत्म कर दी है।

दो लेखकों के बीच की इस बातचीत से उस दुविधा का कुछ सुराग मिलता है जो तकनीक ने लेखकों के सामने पैदा की है। वे अपनी कृतियों के शिल्प और विन्यास की स्पष्टता को लेकर असमंजस में रह जाते हैं। कागज पर कलम से लिखने का पुराना अभ्यास इतना सधा हुआ है कि कंप्यूटर बहुत सारे मामलों में कागज की नकल होने के बावजूद अलग सा लगता है। उसमें किसी भी शब्द को मिटा कर दूसरा शब्द लिखने की सुविधा भी लेखक को मंज़ूर नहीं है।

लेकिन क्या एक लेखक के लिए वाकई कागज और कंप्यूटर की स्क्रीन इतनी दूर की चीज़ें हैं? यहीं किताब इस बात की ओर भी हमारा ध्यान खींचती है कि दरअसल लिखने में बाएं से दाहिने चलने की जो परंपरा है, उसी ने हमारी कंप्यूटर स्क्रीन भी बनाई है और उसी के अनुशासन में हमारी फिल्मों के दृश्य भी रचे जाते हैं। यह भले अनायास हो, लेकिन बाएं से दाहिने जाने के इस अभ्यास ने हमारी उंगलियों और हमारी आंखों को अलग ढंग से ढाला है। जिन लिपियों को दाहिने से बाएं लिखा जाता है, उनके मामले में

स्क्रीन और सिनेमा के दृश्यों में भी ठीक उल्टा होता है। ईरानी सिनेमा इसकी एक मिसाल है।

बहरहाल, बात रचनात्मक लेखन पर केंद्रित रहे। यह अक्सर जैसे मान लिया जाता है कि रचनात्मक लेखन सिर्फ़ कलम की चीज़ है। करीब 30 बरस पहले जब रांची के रेडियो नाटककार डॉ सिद्धनाथ कुमार ने एक कार्यक्रम में यह बताया था कि वे अपने नाटक या अपनी कविताएं सीधे टाइपराइटर पर लिखते हैं तो यह हमें अचरज में डालने वाली बात लगी थी? आखिर कोई लेखक सीधे कलम और कागज़ के अलावा किसी और माध्यम से कैसे लिख सकता है? बरसों बाद किसी ने बताया कि अशोक वाजपेयी भी सीधे टाइपराइटर पर लिखते हैं।

बहरहाल, यह 1996 का साल था जब मैंने लिखने के लिए कंप्यूटर पर हाथ आज़माया। ‘जनसत्ता’ में सहायक संपादक के तौर पर काम करते हुए मैंने वहीं कंप्यूटर पर टाइपिंग सीखी और शुरुआत संपादकीय लिखने से की। उस शुरुआती दौर की एक पीड़ा साझा कर सकता हूं। अभ्यास के उस दौर में कीबोर्ड पर अक्षरों की जगह खोजते हुए अक्सर विचार प्रक्रिया टूट जाती थी। मुझे रुक कर याद करना पड़ता था कि मैं क्या लिखना चाहता था। लेकिन एक बार जब यह बाधा दूर हो गई, जब अंगुलियों ने अपने अभ्यास से जान लिया कि कौन सा शब्द कैसे लिखा जाएगा तो लिखने की प्रक्रिया मेरे लिए बहुत आसान हो गई।

यहां एक छोटा सा विषयांतर उचित लग रहा है। मैं खूब लिखता रहा हूं। तरह-तरह से लिखता रहा हूं। सबसे पहले मैं पंक्तियों के हिसाब से लिखता था- यानी डेढ़ सौ पंक्तियों या ढाई सौ पंक्तियों या 300 पंक्तियों के लेख। इसके बाद मैंने पन्नों के हिसाब से लिखे। यानी पांच पृष्ठ या छह पृष्ठ या दस पृष्ठ की टिप्पणियां। इसके बाद शब्दों का दौर आया- यानी 750 या हज़ार शब्दों का लेख। इसके बाद अखबार में काम करते हुए कॉलम में लिखना सीखा- यानी दो कॉलम, तीन कॉलम या चार कॉलम की खबर। जब रांची एक्सप्रेस में संपादकीय लिखने का मौका मिला, तो पहली बार सेंटीमीटर के हिसाब से लिखा। संपादकीय की पूरी जगह ऊपर से नीचे तक 49 सेंटीमीटर की होती थी। हम एक या दो या तीन संपादकीयों के हिसाब से लिखते थे कि 49 सेंटीमीटर की एक टिप्पणी होगी या 24-25 सेंटीमीटर की दो टिप्पणियां या फिर 17-17 और 15 सेंटीमीटर की तीन टिप्पणियां।

जब कंप्यूटर आया तो फिर मैंने कैरेक्टर्स के हिसाब से लिखना शुरू किया। कैरेक्टर- यानी कंप्यूटर के कीबोर्ड पर एक पंच- इसे एक तरह से वर्ण के हिसाब से भी लिखना कह सकते हैं। उन दिनों जनसत्ता के संपादकीय चार हज़ार से पांच हज़ार कैरेक्टर के हुआ करते थे। लेख 9000 कैरेक्टर का होता था। फिर वे दिन भी आए जब मैंने सेकेंड्स के हिसाब से लिखा- टीवी के लिए लिखते हुए 90 सेकेंड की स्टोरी या आधे घंटे की स्कि्रप्ट।

यह विस्तृत चर्चा बस यह समझाने के लिए कि लेखन की जो ढेर सारी प्रविधियाँ इन तमाम वर्षों में विकसित हुई हैं, उन सबसे अपने परिचय के बावजूद बहुत विश्वासपूर्वक यह कह पाना मेरे लिए मुश्किल है कि इन तमाम प्रविधियों का मेरे लेखन पर क्या असर पड़ा है। यह सच है कि यह फ़र्क सिर्फ प्रविधियों का नहीं रहा है, मूलत: उन माध्यमों का है जो अपनी-अपनी शर्तों से मेरे लेखन को बदलती रही हैं। इसके अलावा एक ही माध्यम के भीतर उसके अलग-अलग प्रारूपों ने भी लेखन में फर्क पैदा किया है। जैसे अखबार के लिए खबरें, विश्लेषण, संपादकीय या समीक्षाएं लिखते हुए, या फिर राजनीति, फिल्म, अर्थनीति या क्रिकेट पर लिखते हुए मेरी भाषा भी बदलती रही है और उसका विन्यास भी एक-दूसरे से काफ़ी भिन्न रहा है। इसी तरह टेलीविजन में 30 सेकेंड के पैकेज की लेखन प्रक्रिया आधे घंटे की डॉक्युमेंटरी की लेखन प्रक्रिया से कतई भिन्न रहा करती है।

मगर असली सवाल यह है कि जब मैं रचनात्मक लेखन की दुनिया में आता हूं- जब कविता या कहानी लिखने की कोशिश करता हूं तो तकनीक मेरे ऊपर क्या असर डालती है? क्या कंप्यूटर मेरे लेखन को कुछ बदलता है? इस सवाल का बहुत ठोस जवाब देना संभव नहीं है। बेशक, जब हम लिख रहे होते हैं तो बहुत सारी प्रक्रियाएं चुपचाप हमारे साथ चल रही होती हैं, हमारा मन और लेखन दोनों बदल रही होती हैं। मिसाल के तौर पर मुझे याद है कि मैं आम तौर पर नीली स्याही से लिखा करता था जो कुछ हल्की हुआ करती थी- शायद सुलेखा की। लेकिन अचानक कैमलिन की कुछ चमकती-तीखी नीली स्याही आ गई तो अचानक एक तरह की उत्फुल्लता शुरुआती दिनों में लेखन का हिस्सा बन गई। इसी तरह पहली बार काली स्याही का इस्तेमाल करते हुए एक अलग पुलक सी हुई। क्या इस उत्फुल्लता या पुलक या इसके बाद के दौर की उदासीनता का कुछ असर लेखन पर पड़ता होगा? उजले कागज पर सावधानी से उकेरे जाते नीले या काले अक्षर सोचने की प्रक्रिया को भी कुछ सावधान करते- कविता लिखते हुए एक-एक शब्द को मंथर गति से गढ़ने का कुछ प्रिय लगता सा काम चलता। यह तेजी से पत्रकारिता के लिए की जाने वाली कलम घसीट लिखाई से अलग हुआ करता और एक तरह का तोष देता। कहानी लिखते हुए भी घटनाओं के वर्णन की एक मंथर गति होती जिसमें एक-एक दृश्य को सहेज कर रचने-रखने की प्रक्रिया चुपचाप चलती रहती थी।

बेशक, कंप्यूटर ने मेरे लिए इस रचनात्मकता को एक रफ़्तार और सहजता दी। मेरे लिखने की रफ़्तार बहुत तेज़ है। शायद इसलिए कि सोचने की प्रक्रिया जैसे किसी लहर की तरह होती है। एक कड़ी दूसरी कड़ी से इस तरह जुड़ी होती है कि उसे जब हम लिखने बैठते हैं तो बीच की कुछ कड़ियां टूट जाती हैं। लेकिन कंप्यूटर ने हाथों को वह रफ़्तार दी कि अचानक अपनी भाषा की मैंने एक नई लय हासिल की। जिसे भाषा का प्रवाह कहते हैं उसे मेरे लिए कंप्यूटर ने आसान बनाया। अपनी कविताओं और कहानियों को देखते हुए कई बार मैं यह महसूस करता हूं कि शायद कलम से लिखी गई होतीं तो ये कुछ भिन्न रचनाएं होतीं। बेशक, उनमें कोई मौलिक भिन्नता नहीं होती, उनका मूल आस्वाद यही रहता लेकिन शायद कुछ परतें बदल गई होतीं। इसके अलावा कुछ कहानियां लिखने में भी मुझे कंप्यूटर से मदद मिली। मेरी पूरी लेखन-प्रक्रिया- यहां तक कि कहानी लेखन की प्रक्रिया भी- बहुत कुछ स्वत:स्फूर्त रही है। बहुत सुनियोजित-सुविचारित ढंग से मैं नहीं लिखता हूं। ऐसी कम कहानियां हैं जिनका कोई ढांचा पहले से मेरे दिमाग में तय रहा होगा। ‘उसके हिस्से का जादू’ और ‘पेइंग गेस्ट’ जैसी कहानियां भी इसी स्वतःस्फूर्तता का नतीजा रहीं। इनके लेखन में मुझे कंप्यूटर से मदद मिली। मैंने कई किस्तों में ये कहानियां लिखीं। शायद पन्नों पर इस तरह लिखना संभव नहीं होता। चूंकि कंप्यूटर पर एक फाइल थी जिसे अचानक खोज कर बढ़ा देना बहुत आसान था, इसलिए कहानियां बढ़ती रहीं। जब भी वे अटकतीं, मैं छोड़ देता। बाद में किसी दिन अनायास शुरू करता। ‘खोटा सिक्का’ नाम की कहानी भी मैंने इसी तरह लिखी। उसके अंत के लिए तो मुझे महीनों इंतज़ार करना पड़ा।

क्या ये सारी कहानियां वाकई उतनी बिखरी हुई हैं जितने बिखरे हुए ढंग से लिखी गईं? यह शिकायत किसी से नहीं मिली। शायद हम सबके सोचने का, चीज़ों को महसूस करने का, उनकी कल्पना करने का ढंग सरल रैखिक नहीं होता। उसमें कई तरह की वक्रताएं होती हैं। हम बिल्कुल अंधेरे बीहड़ में उतर कर रास्ता खोजते हैं। इस बिखराव की भी अपनी एक संगति होती है। बहुत सारे लेखकों की तरह-तरह की पर्चियों पर, इघर-उधर पड़े कागजों पर लिखने की जो दास्तानें आती हैं, वे भी शायद इसी बिखराव के बीच की संगति की ओर इशारा करती हैं। कंप्यूटर ने मेरा यह काम आसान बनाया। मेरे भीतर के बिखराव शायद गुम हो जाते, कई कहानियां अधूरी छूट जातीं, लेकिन वे बनी रहीं, बची रहीं और एक दिन मुकम्मिल हो गईं तो इसलिए भी कि मेरे पास एक कंप्यूटर था।

हो सकता है, इसमें कोई अतिशयोक्ति हो। नई तकनीक के आगे मेरा समर्पण हो। मेरे अपने अभ्यास से निकला तर्क हो। संभव है, मैं अब भी कलम से लिख रहा होता तो भी ऐसा ही अच्छा या बुरा लेखक होता। लेकिन मैं पिछले 20 बरस से कंप्यूटर पर ही लिख रहा हूं। कहानी-कविता और उपन्यास तक मैंने सीधे इस पर लिखे हैं। मुझे नहीं मालूम कि तकनीक ने मेरे लेखन में कोई गुणात्मक प्रभाव डाला है या नहीं, लेकिन इसमें शक नहीं कि मैं जैसा चाहता था, ठीक वैसा ही लेखक हूं।

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संपर्क:

ई-४, जनसत्ता, सेक्टर ९,

वसुंधरा, गाजियाबाद,

उत्तर प्रदेश

मो. - ०९८११९०१३९८

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