साम्प्रदायिकता के सवाल और समकालीन हिंदी कहानी / विनोद तिवारी / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

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रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2 विनोद तिवारी साम्प्रदायिकता के सवाल और समकालीन हिंदी कहानी इस लेख को शुरू करते हुए नीरज सिंह ...

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

विनोद तिवारी

साम्प्रदायिकता के सवाल और समकालीन हिंदी कहानी

इस लेख को शुरू करते हुए नीरज सिंह की एक कहानी ‘सवाल’ की याद ताज़ा हो जाती है। सासाराम (बिहार) से निकलने वाली पत्रिका ‘अब’ ने साम्प्रदायिकता पर एक अंक निकाला था, बाद में संभवतः ‘मेरा शहर मुझे वापस दे दो’ नाम से यह पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ। इसमें यह कहानी संकलित है। पूरी कहानी की तफ्सील में जाने का यहाँ अवकाश नहीं है। महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक है ताज साहब की बेगम का ‘सवाल’। यह सवाल ही इस कहानी की जान है। ताज साहब जिस मोहल्ले में रहते हैं उसे छोड़कर किसी ऐसी महफूज़ जगह पर जाने की बात करते हैं, जहाँ ‘‘मजहबी जूनून को बढ़ाने वाले, अपने मजहब को सबकुछ मानने वाले लोग नहीं रहते हों। भाई को भाई से लड़ाकर अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने वाले लोग नहीं रहते हों बल्कि महज इन्सान और इंसानियत को सबकुछ समझने वाले लोग रहते हों7 जहाँ हम अपने विचारों और उसूलों के अनुसार आजादी से जी सकें, महज हिन्दुस्तानी बनकर जी सकें।’’ ताज साहब की यह बात सुनकर उनकी बेगम जब यह सवाल पूछती हैं कि, ‘’ इस शहर में या इस समूचे मुल्क में ऐसी भी कोई जगह है क्या?’’ तो बीस-बाईस साल पहले पूछा गया उनका यह सवाल अचानक आज फिर मशहूर अभिनेता आमिर खान की पत्नी का सवाल क्यों बन जाता है कि, ‘‘क्या हमें यह मुल्क छोड़कर कहीं और चले जाना चाहिए क्योंकि, इस मुल्क में असाधारण रूप से असहनशीलता बढ़ती जा रही है।’’ जब आमिर खान अपनी पत्नी की इस भावना को सार्वजानिक रूप से साझा करते हैं तो वे देश को तोड़ने वाले एक राष्ट्र-विरोधी मुसलमान हो जाते हैं। सिर्फ और सिर्फ मुसलमान। इस पहचान के सामने उनकी सारी पहचान किसी काम की नहीं। सरकार ने उनकी टिप्पणी को नजरंदाज नहीं किया वरन उन्हें ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ के विज्ञापन से निकाल बाहर किया। ऐसा आदमी क्या भारत की तस्वीर पेश करेगा। यह तो भारत की छवि बिगाड़ रहा है। अनुपम खेर ने इसी तर्क को आधार बना कर दिल्ली में सच्चे और अच्छे ‘भारतीयों’ को साथ लेकर कदम-ताल किया। जिसका पारितोषिक उन्हें ‘पद्मभूषण’ के रूप में प्राप्त हुआ।

एक ऐसे समय में जब हिंदूवादी राजनीति करने वाली पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ इस देश की शासन-सत्ता पर काबिज है, जब देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता के बीच की बहस खुलकर सड़क से संसद तक गूंजी हो, जब गाय और धर्म को एक दूसरे का पर्याय मान लिया गया हो, जब लव जेहाद व घर वापसी का नारा बुलंद कर साम्प्रदायिक

माहौल बिगाड़ा जा रहा हो, जब अयोध्या में ‘बाबरी मस्जिद’ की जगह पर ‘राम मंदिर’ बनाये जाने का हल ढूंढें जाने की कोशिशें तेज़ हो गयी हों और जब विश्व हिन्दू परिषद् हर गाँव में एक ‘राम मंदिर’ बनाए जाने की कार्ययोजना पर काम कर रहा हो, हिंदी कहानियों में साम्प्रदायिकता के सवाल पर बात करना नए सिरे से उन कहानियों को देखने समझने की मांग प्रस्तुत करता है।

वस्तुतः देखा जाय तो भूमंडलीकरण ने भारतीय राजनीति में दो तरह की प्रवृत्तियों को फलने-फूलने के लिए बहुत ही उर्वर जमीन मुहैया कराई। पहला, अकूत लूट, खसोट, बेईमानी और भ्रष्टाचार की संस्कृति का एक अबाध और निरापद तंत्र (ह्य4ह्यह्लद्गद्व) के रूप में विकास और दूसरा, धर्म और सम्प्रदाय आधारित कट्टर मानसिकता से संरचित साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद का उभार, विकास और उसका प्रबन्धन। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर इस तरह का सरकारी भ्रष्टाचार और राष्ट्रवाद के नाम धार्मिक-साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काकर एक खास तरह के साम्प्रदायिक-उन्माद को रचने की राजनीतिक मोर्चाबंदी इससे पहले नहीं देखी गयी। यह साम्प्रदायिक-उन्माद एक तरह से आर्थिक उदारीकरण के बाद विकसित उस राजनीति की ही अनुकृति है जिसने ‘उपभोक्ता’ और ‘भक्त’ दोनों को एक कर दिया 7 इसमें, भक्ति चाहे धर्म के प्रति हो, चाहे बाज़ार के प्रति, चाहे ईश्वर के प्रति हो चाहे राष्ट्र के प्रति, ‘कंज्युमरिज्म’ में कोई फर्क नहीं पड़ता। ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ कहीं और से नहीं इसी तंत्र और व्यवस्था से विकसित हुआ है। राष्ट्रीयता और संस्कृति के नाम पर काम करने वाले तमाम तरह के ‘डायस्पोरा’ (ओं) के काम करने के तरीके और मकसद को आप खंगालिए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। इसीलिए, राष्ट्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक, आवासी से लेकर आप्रवासी तक आपको ‘राष्ट्र-भक्ति’ ‘राज-भक्ति’ और ‘धर्म-भक्ति’ के नाम पर एक तरह का एक ग्लोबल मन-मिजाज मिलेगा। भूमंडलीकरण, सांस्कृतिक और धार्मिक बहुलता को किस कदर किसी एक ही धर्म और धारणा के तहत ग्लोबल स्तर पर केंद्रीकृत करता है इसके सबसे बड़े प्रमाण एन.आर.आइ. हैं। ये एन.आर.आइ. वे लोग हैं जो इस देश को रहने लायक न मानकर या डालर की मोटी कमाई करने के नाम पर इस देश को टाटा-बाय-बाय कर चले थे। पर, इस देश को मेहनत और पसीने से सींचने वाले किसानों, मजदूरों, मेहनतकश लोगों से अचानक वे इसलिए महत्त्वपूर्ण हो गए कि उनके पास पूंजी, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और प्रबंधन का बेहतर कौशल था/है। क्या भारत की सोलहवीं लोकसभा का चुनाव इसी पूंजी, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और बेहतर प्रबंधन कौशल पर नहीं लड़ा गया? ‘यह ‘राजभक्ति’ और ‘राष्ट्रभक्ति’ एक खास तरह की सोच और धारणा द्वारा पिछले कई वर्षों से संचालित ‘राष्ट्रवादी’ परियोजना का ही प्रतिफल और विस्तार है। मुसलमानों के लिए ‘तबलीगी जमात’ और हिन्दुओं के लिए ‘विश्व हिंदू परिषद्’ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस परियोजना की नुमायिन्दगी करने वाले महत्त्वपूर्ण संगठन हैं। इन दोनों ही संगठनों का बहुराष्ट्रीय धार्मिक नेटवर्क है । जिस साल ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना ( 1925 ) हुयी उसी साल ‘तबलीगी जमात’ की भी स्थापना हुयी। ‘‘अन्तर्रष्ट्रीय स्तर तबलीगी जमात का काम 1951 से ही मिस्र, इराक, सूडान, सीरिया, जार्डन, फिलिस्तीन, लेबनान, यमन, लीबिया, ट्यूनीशिया, अल्ज़ीरिया, और मोरक्को में है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया बर्मा, और श्रीलंका के साथ-साथ अमरीका, अफ्रीका और योरोप के 135 देश तबलीग की गतिविधियों के दायरे में हैं।’’ वहीं विश्व हिन्दू परिषद - जिसकी स्थापना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सरपरस्ती में 1964 में हुई - ने धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कायम कर ली है।’’ अनिवासी भारतीयों के बीच उसे खासी लोकप्रियता और समर्थन हासिल है। विहिप ब्रिटेन और अमरीका में रहने वाले भारतीयों के बीच शुरू से ही काम करती है। अमरीका में उसकी स्थापना 1970 में हुयी। आज वहां के सभी राज्यों में उसकी शाखाएं हैं। वह युवा कार्यक्रम चलाती है, ग्रीष्म-कालीन शिविर लगाती है, एक द्वैमासिक पत्रिका ‘हिन्दू विश्व’ का प्रकाशन करती है, एक मासिक न्यूज़ लेटर भी निकालती है, किताबों की दुकानों का संचालन करती है और विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच काम करती है। अनिवासी भारतीय विहिप के लिए काफी मात्रा में कोष उपलब्ध कराते हैं। एक ‘इण्डिया डेवलपमेंट एंड रिलीफ फंड’ नामक अलाभकारी कर-छूट वाले संगठन के जरिए अनिवासी भारतीयों की रकम संघ परिवार के पास आती है। इस धन से ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ और ‘सेवा भारती’ जैसे संगठन चलाये जाते हैं। विहिप ‘रामकृष्ण मिशन’ ‘डिवाइन लाईफ सोसाईटी’ और ‘इस्कान’ जैसे संगठनों की मदद भी करती है।’’

हालाँकि, इस परियोजना के बीज आपको ‘राष्ट्र-राज्य’ की उस बृहत्तर परियोजना में ही मिलेंगे जिसे हमने साम्राज्यवादी औपनिवेशिकता की गुलामी से मुक्त होने के लिए स्वीकार किया था। यह बात लगभग सभी ने स्वीकार की है कि इस उपमहाद्वीप में साम्प्रदायिकता का जन्म ‘आधुनिकता’ और ‘राष्ट्रवाद’ के साथ-साथ हुआ। या इसे यों भी कहा जा सकता है कि, यह औपनिवेशिक आधुनिकता के साथ प्रकट हुआ जिसे पैदा किया उस ब्रिटिश साम्राज्य ने जिसका सूर्य कभी भी अस्त नहीं होता था। राष्ट्रवाद का यह सूर्य ज्यों-ज्यों परवान चढ़ता गया अपने आकार-प्रकार में साम्प्रदायिकता और स्याह, डरावनी और क्रूर होती गयी। क्या ब्रिटिश उपनिवेश बनने से पूर्व भारत में ‘नेशनलिज्म’ और ‘रिलिजियस कम्युनिटी’ जैसी संकल्पना मौजूद थी? क्या हिन्दू जातीयता, मुस्लिम कौमियत जैसे अस्मिता (identity) परक समुदायों के रूप में कौमों का विभाजन स्पष्ट था? कदाचित नहीं। इस देश में धार्मिक समुदाय के रूप में ‘हिन्दू’ और ‘मुस्लिम’ समुदायों की जातीय पहचान और निर्मिति बहुत पुरानी नहीं है। यह ‘निर्मिति’ यह ‘पहचान’ उपनिवेशवाद की देन है। इन्हीं अर्थों में पार्थ चटर्जी भारतीय राष्ट्रवाद को औपनिवेशिक आधुनिकता अथवा पश्चिमी आधुनिकता से विरासत में प्राप्त विमर्श (स्रद्गह्म्द्ब1ड्डह्लद्ब1द्ग स्रद्बह्यष्शह्वह्म्ह्यद्ग) मानते हैं। पर, बात अब पार्थ चटर्जी के ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ संबंधी विचार तक ही सीमित नहीं रह गयी है। अब तो ‘राष्ट्रवाद’ का भी ‘ग्लोबलाइजेशन’ हो चुका है। उसमें वह शहीदी ‘नैतिकता’ और ‘रोमानियत’ अब कहाँ। बल्कि, एक खास ढंग का सांस्कृतिक-राजनीतिक छद्म पसरा है जिसमें ‘धर्म’ ‘मजहब’ और ‘रिलिज़न’ की आधारभूत संकल्पनाएँ मटियामेट हो चुकी हैं। आज वैश्विक स्तर पर संचालित साम्प्रदायिकता और आतंकवाद इस ग्लोबल ‘राष्ट्रवाद’ के नतीजे हैं। इसमें ‘हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी सभी तरह के पुण्यात्मा और पापी शामिल हैं।

ऐसे परिदृश्य में सांप्रदायिकता की समकालीन समझ और चेतना को जानने-पहचानने की कोशिश में युवा पीढ़ी के कहानीकारों की पिछले दो दशकों की हिंदी कहानियों के ‘पाठ’ से एक पाठकीय और आलोचकीय रिश्ता कायम करने के बाद जो चेहरा उभरकर सामने आता है उनमें अधिकांश कहानियाँ साम्प्रदायिक दंगों को आधार बना कर लिखी गयी कहानियाँ हैं। जिनमें अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय पर कट्टर हिन्दूवादी सम्प्रदाय (यों) के क्रूर, हिंसक और भयाक्रांत करने वाले दंगों का विविध चित्रण मिलता है। यहाँ, उन सभी कहानियों का नामोल्लेख करना या उनका क्रमवार सर्वेक्षण पेश करना न तो संभव है और न ही जरूरी। विश्लेषण-विवेवचन के लिए मात्र छः कहानियों - यूटोपिया (वंदना राग), परिंदे के इंतज़ार सा कुछ (नीलाक्षी सिंह), चोर-सिपाही (मो. आरिफ़), शह और मात (राकेश मिश्र), खाल (मनोज पाण्डेय) और दंगा भेजियो मेरे मौला (अनिल यादव) को आधार बनाया गया है। इन पाँच-छः कहानियों का ही चुनाव क्यों इसकी आधी जिम्मेदारी मेरी और आधी संपादक राकेश बिहारी की। गरज यह कि, ‘शे’र मेरे हैं सब खवास पसंद / पर मुझे गुफ्तगू अवाम से है।’ इसलिए, गाली और प्रशंसा दोनों के समान हकदार हम दोनों ही हैं।

[एक]

‘‘एक पुरानी मस्जिद थी कहीं। कहीं किसी शहर अयोध्या में, जो शायद इसी भारत के किसी कोने का हिस्सा थी। वीडियो में बताया जा रहा था, उस मंदिर की बुनियाद झूठ पर रची थी। कमेंट्री चल रही थी और मस्जिद टूट रही थी। हमें नीच समझा..., डरपोक समझा, हम पर राज किया...। अब तो इकट्ठे हो जाओ और इस मस्जिद को खत्म करो वर्ना नपुंसक कहलाओ। यह संदेश दो हमारी कौम नामर्द नहीं और उन लोगों को कह दो इस देश में रहना है तो यहाँ के बन कर रहें।’’- (यूटोपिया)

यूटोपिया बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद की कहानी है। ध्वंस के बाद, मुस्लिम समुदाय पर तारी भय, आतंक और बेबसी की कहानी। शौर्य दिवस के नाम पर हर साल छः दिसंबर के दिन हिन्दूवादी संगठनों के शौर्य, वीरता और मर्दानगी के प्रदर्शन की कहानी और इन सबसे अलग ‘आपसी प्रेम और विश्वास’ पर ‘धर्म’ के बलात्कार की कहानी। पहल में प्रकाशित होने के साथ ही यह कहानी खूब चर्चित हुयी। इस कहानी में वंदना ने हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे का प्रत्यक्ष चित्र कहीं नहीं प्रस्तुत किया है वरन इस देश के मुसलामानों के प्रति कट्टर हिन्दू साम्प्रदायवादियों के दिलो-दिमाग में घृणा और नफरत का जो जहर भरा रहता है, उस मनःस्थिति को, उसकी पूरी सचाई को रचने की कोशिश की है। एक कौम के प्रति दूसरे कौम के लोगों के भीतर कैसे सुनियोजित तरीके से नफरत और हिकारत की भावना पैदा की जाती है, यह कहानी एक हद तक उस नियोजन के लिए जिम्मेदार चरित्रों को सामने ले आती है, पर सचेत ढंग से एक हद तक ही। इस हद पर आगे बातचीत की जायेगी। अच्युतानन्द गोसाईं के चरित्र का विकास और निर्माण जिस ढंग से इस कहानी में किया गया है वही इस कहानी को एक साथ प्रमाणिक और संदिग्ध दोनों बनाता है। हिंदूवादी संगठन कैसे बेरोजगार हिन्दू नवयुवकों को ‘राष्ट्र’ के नाम पर बहकाकर उन्हें उग्र, क्रूर और संवेदनहीन बना रहे हैं, इसका भी सटीक चित्रण इस कहानी में किया गया है। लम्पटई (लुम्पेनिज्म) इन मुफ्तखोर और बेकार नवयुवकों का चरित्र है। अच्युतानंद के लम्पट दोस्त यह तय करते हैं कि छः दिसंबर की पूर्व संध्या पर उस लड़की को उठाया जायेगा जिसका नाम नज्जो है, क्योंकि - ‘‘अच्चू भैया का दिल कहीं उस मियाइन में अटक गया था। इस बार इस शहर में छः दिसंबर की बरसी अभूतपूर्व ढंग से मनायी जायेगी। साले, अच्चू को तबाह करने पर तुले हैं। सालों को सबक सिखाने के मकसद से मस्जिद गिराई थी, फिर भी नहीं सुधरते, डिस्टर्बेंस पैदा करते रहते हैं ...’’ और 5 दिसंबर की शाम को रास्ते से नज्जो को उसकी माँ के सामने से उठा लिया जाता है और नगर पार्षद श्री राममोहन के फ़ार्म हॉउस ‘नयी दुनिया’ के कमरा न. 1 में तोहफे के रूप में पहुंचा दिया जाता है जहाँ पहले से ही अच्युतानंद गोसाई बेसुध पड़ा हुआ है - ‘‘भइया आपके लिए तोहफा है, कल की तारीख में खोलियेगा इसे, गुडनाइट !’’ यहाँ, एक बात काबिलेगौर है कि, इस ‘तोहफे’ को खोलना और उसके साथ खेलना अच्युतानंद जैसे नवयुवकों के लिए केवल एक प्लेज़र भर नहीं है बल्कि इस खेल में अपनी साम्प्रदायिक और धार्मिक-राष्ट्रीयता वाली भावना और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति दृढ़ संलग्नता और सन्नद्धता को प्रमाणित करने का माकूल मौका भी है 7 वर्ना तो, अच्युतानंद गोसाई अपने किशोरवय में कितना शर्मीला और संकोची स्वाभाव का लड़का था, नज्जो की माँ ने ‘‘बचपन में उस लड़के को कई एक बार पुचकारा था, कैसे गुलाबी होंठ थे उस लड़के के, एकदम लड़कियों जैसे नर्म’’। उसी लड़कियों जैसे नर्म लड़के को उसकी दूकान पर काम करते देख नगर पार्षद राममोहन उसे उसके भाई से यह कह कर अपने साथ ले जाते हैं कि, ‘‘लड़के को कहाँ उलझा रखा है? हमारे साथ लगा दो, कुछ पार्टी का काम सिखायेंगे, यहाँ तो पैसे का हिसाब करते-करते यह भरी जवानी में बूढ़ा हो जायेगा।’’ राममोहन के यहाँ इस तरह से न जाने कितने बेरोजगार नवयुवक पार्टी का काम सीखने के लिए लाये जाते थे। काम सिखाने के नाम पर ‘‘सबसे पहले वे (पार्षद राममोहन) अपने रंगरूटों को बढ़िया भोजन करवाते थे , फिर पीने पिलाने के तौर -तरीकों की शुरुआत बियर से होती थी। जब लड़के उनके डेरे पर बैठने के आदी हो जाते थे तो उनकी बिधिवत कोचिंग शुरू होती थी। उन्हें धर्म, भारतीय संस्कृति के प्रेरक प्रसंग सुनवाए जाते थे। शहर में यज्ञों का आयोजन, शहर उत्सव समिति में शिरकत और त्यौहार प्रबंधन समिति के लिए तैयार किया जाता था। मकसदहीन लड़के बामकसद हो श्री राममोहन के पूरे मुरीद हो जाते थे।’’ फिर तो राममोहन के एक इशारे पर ये लड़के कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते थे। इसी तरह की ट्रेनिंग से अच्युतानंद मंझकर तैयार होता है और ‘हिन्दू धर्म’ और अपनी मातृ-भूमि ‘हिन्दू-भूमि’ के लिए ‘उसके भीतर अंदरूनी अलख’ जग जाती है। इस अलख को ज्वालामुखी बनाने के लिए इन नवयुवकों को बार-बार छः दिसंबर का वीडियो दिखाया जाता है कि, कैसे हमने बाबरी मस्जिद का विध्वंश कर अपने धार्मिक और राष्ट्रीय गौरव व स्वाभिमान को पुनर्स्थापित किया।

छः दिसंबर अब सम्प्रदायवादी हिन्दुओं के लिए ‘शौर्य दिवस’ है। हर साल यह शौर्य दिवस हिंदूवादी संगठनों द्वारा शहर-शहर कसबे-कसबे में मनाया जाता है। नज्जो ने जबसे पढ़ना सीखा था, उसने जाना था - ‘‘उसके शहर की दीवारें कैसे गेरुए अक्षरों से पुती रहती थीं। ‘राम लला हम आयेंगे/ मंदिर वहीं बनाएँगे।’ यह जुमला कभी पुराना नहीं होता था, हर बरस यूँ ही नया और ताज़ा हो दीवारों पर दमक उठता था। उसके अपने घर में भी हर बरस छः दिसंबर से पहले तैयारियां कर ली जाती थीं। घर के पर्दों को खींच कर ताना जाता था, दरवाजों पर ताले जड़ दिए जाते थे। मिट्टी के तेल के कनस्तर भरवा लिए जाते थे और छुरों में धार चढ़वाई जाती थी। अम्मी ऐसे समय में कुछ गम खा जाती थीं। वे किसी बाबर को नहीं जानती थीं। उन्हें अयोध्या की सरहदों और उसके होने के बारे में भी बहुत कम ही पता था। यहाँ इस शहर में बैठे-बैठे क्या फर्क पड़ता था, अगर कहीं कोई मस्जिद बचे या ढहे? मगर पप्पू, गुड्डू और राजा (नज्जो के भाइयों) को फर्क पड़ता था। मौलवी उस्मान अली फर्क पड़वाते थे और इस तरह पूरे मोहल्ले में फर्क एक निहायत जज्बे की तरह हवाओं के हाजमे में फूंक दिया जाता था जिंदा और पोशीदा तरीके से।’’ ‘राष्ट्र-धर्म’ के नाम पर जो जहर, जो हिंसक प्रतिशोध नवयुवकों के दिलो-दिमाग में भरा जाता है, घृणा और नफरत की उन्हें जो ट्रेनिंग दी जाती है, उसमें बदला लेना एक तात्कालिक प्रतिक्रिया भर नहीं होती, वरन वह एक ऐसी मानसिकता है जिसमें मर्दानगी के साथ-साथ देशभक्ति और राष्ट्रीयता की भावना अन्तर्निहित होती है कि, इनको सबक सिखाना बहुत जरूरी है। कई बार क्या प्रायः सैन्य-बलों में यही भावना, इसी तरह का जूनून काम करता है। महत्त्वपूर्ण यह है कि यह जूनून दोनों तरफ है। जहाँ ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा देकर इस्लामिक संप्रदायीकरण और सांगठनिक धार्मिक एकजुटता की वैश्विक कार्यवाहियां हैं, वहीं दूसरी तरफ इसी तर्ज़ पर ‘हिन्दू धर्म खतरे में है’ का नारा देकर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दू धर्म को भी साम्प्रदायिक रंग देने और उस भगवा रंग से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति और उसकी चालें मौजूद हैं। राजनीतिक फायदे के लिए पहले भी अविभाजित भारत में इस तरह की चालें चली गयी हैं, जिन पर खूब लिखा गया है। उनको दोहराना यहाँ जरूरी नहीं। पर एक बात की और ध्यान दिलाना आवश्यक है कि, उस समय हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जो स्वरूप था आज की हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता उससे कई मायनों में भिन्न और खतरनाक है। आज ‘नेशन स्टेट’ और ‘कार्पोरेट’ साम्प्रदायिकता को जिस तरह केवल और केवल अपने फायदे के लिए एक ‘डिवाइस’ की तरह उपयोग में ला रहा है वह अत्यंत खतरनाक है। दरअसल, ‘राष्ट्र’ एक समग्र प्रक्रिया की संरचित उपलब्धि होता है। ‘राष्ट्र-राज्य’ इस उपलब्धि को एक व्यवस्था देने वाला तंत्र (सिस्टम) है। दुर्भाग्य से, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों ही इस उपलब्धि और इस व्यवस्था में फेल रहे। ‘धर्म’ अभी भी इन दोनों के सेंटिमेंट का बहुत ही नाजुक मसला है। इन दोनों ही देशों में ‘राष्ट्रवाद’ अभी भी ‘धर्म’ आधारित सेंटिमेंट के द्वारा संचालित होता है। एक में अधिक और दूसरे में थोड़ा कम। पर है यह दोनों में। अन्यथा, क्या कारण है कि है कि जब भी ऐसे राष्ट्रवादियों को शासन-सत्ता में अवसर मिलता है उनके राष्ट्रीय चरित्र, उनका राष्ट्रवाद ‘धर्म और संस्कृति’ के उस तथाकथित देशभक्ति के रूप में ही प्रकट होता है जिसमें एक दूसरे के प्रति घृणा और नफरत के जहर के सिवा और कुछ नहीं होता। ऐसे में अल्बर्ट आइन्स्टीन की कही हुई वह बात याद आती है कि, ‘Nationalism is an infantile disease. It is the measles of mankind. (राष्ट्रवाद एक बचकाना मर्ज़ है। यह मानवजाति का चेचक है )।’’

अच्युतानंद के सामने नज्जो की देह पड़ी है, उसे विश्वास ही नहीं होता कि यह सच हो सकता है उसे अब भी यह सपना ही लगता है - ‘‘आह! उसने बगल में लिटाई छाया को छू-छू कर तय करना चाहा, ये सच है या सपना ? क्या...? सबसे पहले उसने दहकते अंगारों की दहक परखने की कोशिश की। उसकी उँगलियों में जुम्बिश हुयी और अनारों को छूते हुए उसके हाथ जल गए।’’ जिस देह को अब तक वह सपना समझता रहा था वही देह उसके सामने एक अवश सचाई बन कर नए साल के तोहफे के रूप में पड़ी है 7 अच्युतानंद की वासना अपने पूरे जूनून पर है। कामना और वासना का यह जूनून तब और दोगुना हो जाता है जब इसमें शौर्य और मर्दानगी का वह पुरुषार्थ भी शामिल हो जाता है जिसे उसने श्री राममोहन के यहाँ उस वीडियो फिल्म में बार-बार देखा था- ‘‘वो एक टूटी फूटी सी मस्जिद , उसके आस-पास हज़ारों कारसेवक, मस्जिद के ऊपर चढ़े लोग, चीखती आवाजें, ‘एक धक्का और दो...।’ उत्तेजना से उसका पूरा शरीर फड़कने लगा, उसने अपना मोर्चा संभाला, उसके कानों में वही-वही आवजों की रेलमपेल मच गयी। घड़ी की टिकटिक, समय का बदलना, नए दिन का आगाज, नयी दुनिया की ईजाद..., के स्वर से स्वर मिला सारी की सारी पृथ्वी थरथरायी और अलसुबह शौर्य दिवस का सूरज इस्तकबाल में इठलाता चला आया।’’ कहानी शौर्य दिवस के इसी इठलाते सूर्योदय के साथ खत्म होती है। बाबरी मस्जिद और नज्जो की देह में यहाँ कोई अंतर नहीं। जैसे छल और बलपूर्वक बाबरी मस्जिद के ऊपर चढ़कर उसे क्षत-विक्षत कर अधिकार में ले लिया जाता है, उसी तरह नज्जो की देह पर भी बलपूर्वक अधिकार किया जाता है। इसके साथ ही पारस्परिक प्रेम, विश्वास और सद्भाव का वह झीना भरम भी टूट जाता है जिसे बचपन में एक ही मोहल्ले में रहते, हुए साथ-साथ खेलते हुए कभी अच्युतानंद और नज्जो ने महसूस किया था। नज्जो की माँ ने महसूस किया था। पर नहीं हिन्दू-मुस्लिम ये दो कौमें हैं, दो राष्ट्र हैं, इनके बीच कभी भी प्रेम, सद्भाव और विश्वास कायम नहीं हो सकता। इसकी अपेक्षा करना यूटोपिया है।

यूटोपिया के इस निष्कर्ष तक पहुँचने में यह कहानी जिन परिस्थितियों का या यह कहें कि जिस एक ही तरह की सिचुएशन का सहारा लेती है (जो कि कहानी में वह बार-बार दोहराई जाती है) वही इस कहानी की ताकत भी है और कमजोरी भी। ताकत इस लिहाज़ से कि बहुत अधिक चरित्रों, घटनाओं और ब्यौरों से यह कहानी बच जाती है जो कि आज की हिंदी कहानी की कई बड़ी मुश्किलों में से एक है। पर, कमजोरी इस तरह कि, बार-बार छः दिसंबर की गूंजें-अनुगूंजें एक जज्बाती टेक की तरह कहानी में सुनायी देती हैं। गोया, यह टेक छूट गयी तो कहानी भी हाथ से छूट जायेगी। एक प्रसिद्ध रूसी मुहावरा है, ‘‘अतीत का विचार करोगे तो अपनी एक आँख गँवा बैठोगे और अतीत को छोड़ दोगे तो अपनी दोनों आँखें गँवा बैठोगे।’’ यूटोपिया बार-बार केंद्र से परिधि की और जाने वाली और बार-बार परिधि से केंद्र में लौट आने वाले शिल्प की कहानी है। अच्छा होता कि कहानी अपनी केन्द्रीयता में परिधि से केंद्र की ओर बढ़ती तो संभवतः निर्धारित केन्द्रीयता को पूरी अनिवार्यता के साथ स्थापित कर पाती। निश्चित ही ऐसी कहानियों में अतीत से मुक्ति संभव नहीं पर उसके तनाव और असंतुलन को अपने सृजनात्मक हुनर से साध पाना ही तो कला है। इस कहानी के परिस्थिति निर्माण में सरलीकरण के तत्व अधिक हैं 7 इसीलिए, साम्प्रदायिकता पर लिखी गयी इधर की तमाम हिंदी कहानियों के प्रचलित सामान्य मुहावरे से अलग होते हुए भी यह कहानी इस आरोप से मुक्त नहीं हो सकती कि यह एक ‘नुस्खे’ के सहारे बुनी हुयी कहानी है। यूँ, तो हर कहानी ही किसी न किसी नुस्खे का सहारा लेती है, लेती रही है। नुस्खे का प्रयोग कहानी के लिए उतना ही पुराना है जितनी कि कहानी कला। पर, जब किसी वास्तविक घटना को कहानी का विषय बनाया जाता है तो जरूरी यह है कि उस प्रस्तुत नुस्खे को कहानीपन में बदल कर यथार्थ का पुनःसृजन किया जाय जो सरलीकृत ढंग से सतह पर पसरा हुआ मिला था। वास्तव में, एक लेखक अपनी रचनात्मक चेतना, जीवन-जगत के अनुभव और समकालीन विवेक से अपने साहित्यिक चरित्रों में अपना समकक्ष ढूंढता है। अपनी रचना में उसे पा लेना ही दरअसल उसकी कलात्मक उपलब्धि है। नज्जो में तो नहीं पर अच्युतानंद गोसाईं में कहीं कहीं इसकी झलक मिलती है पर वह भी एक सघन अनुभवात्मक निर्मिति में नहीं परिणत हो पाती। बल्कि सुनी-सुनाई बातों के सामयिक मुहावरे में ही घट कर रह जाती है। यही वह सीमा है जिसकी बात लेख के शुरू में उठाई गयी थी। इसका जो सबसे मूलभूत कारण है, वह इन दोनों कौमों के बीच वास्तविक उनकी ज़मीनी सचाइयों और उनके तनावों से उत्पन्न समकालीन परिस्थितियों की पकड़ और उसके अनुभवात्मक विस्तार को सृजनात्मक ऊँचाई न दे पाना। अपनी वस्तुगत निर्मिति की दृष्टि से यह कहानी इतिहास में दर्ज की जाने वाली कहानी तो है पर अपने ‘समय’ का अतिक्रमण कर क्लासिक नहीं बन पाती।

[दो]

‘‘अम्मी चौंकी। मेरी बात से नहींज्समाचार का वक्त खिसकते जाने से। उन्होंने टी. वी. आन कर दिया। परदे पर बाबर जानी की मस्जिद टूटी पड़ी थी। मैंने तारीख याद की। छः दिसंबर.. अम्मी अवाक थीं । टी.वी. के भीतर शोर था। उसके बाहर भी शोर था... अचानक मुझे अहसास हुआ। मैंने दौड़ कर टी. वी. की आवाज धीमी कर दी। सोफे पर बैठ गयी । फिर वे अचानक उठीं और उन्होंने खिड़कियाँ बंद कर बत्तियाँ बुझा दीं । मुझे करंट छू गया। - (परिंदे के इंतजार सा कुछ)

वंदना राग की कहानी ‘यूटोपिया’ में शुरू में प्रेम सम्बन्धी कुछ संकेतों के द्वारा पाठक को आभास होता है कि, अच्युतानंद गोसाई नज्जो को प्यार करता है। लेकिन नहीं, अच्युतानंद के लिए नज्जो की देह का आकर्षण ही है जो प्रेम का भ्रम पैदा करता है अथवा कहानीकार ने जान बूझकर इस भ्रम को निर्मित किया है। क्योंकि, अंत में जिस तरह से उस देह को वह प्राप्त करता है उससे वह सारा भ्रम टूट जाता है। इसलिए, ‘यूटोपिया’ प्रेम कहानी के ताने-बाने में साम्प्रदायिकता के चित्रण की कहानी नहीं है। वह साम्प्रदायिक नफरत, और तद्जनित जघन्य प्रतिक्रियात्मक कृत्य की कहानी है। इसके ठीक उलट नीलाक्षी सिंह की कहानी ‘परिंदे के इंतज़ार सा कुछ’ मूलतः एक प्रेम कहानी है। साम्प्रदायिक घृणा और नफरत के तनाव में यह प्रेम कहानी कैसे टूटती है, खत्म होती है, इसकी कहानी है ‘परिंदे के इंतज़ार सा कुछ’। ‘बाबरी मस्जिद’ का टूटना इन दोनों कहानियों का ‘मोटिव’ है अंतर बस इतना है कि यूटोपिया में जो ‘बाबरी मस्जिद’ है वह भूतकाल में हैं, क्षत-विक्षत छः दिसम्बर के एक भयावह तवारीख के रूप में। जबकि ‘परिंदे के इंतज़ार सा कुछ’ में जो ‘कहानी-समय’ है वह वही समय है जब बाबरी मस्जिद टूटती है और पूरी दुनिया के नक्शे में उत्तरप्रदेश का वह छोटा सा शहर अयोध्या उभर कर हिन्दुओं के शौर्य और गौरव के प्रतीक के रूप में सामने आता है। इस कहानी में उसी समय और परिवेश को लिया गया है जब पूरा हिंदूवादी संगठनों द्वारा इस देश को, उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि को, उसकी सांस्कृतिक रहन को कलंकित किया जाता है। पूरा राष्ट्र इस कृत्य से शर्मशार हुआ। यह कहानी इसी ‘देश’ और ‘काल’ को अपना विषय बनाती है। ‘प्रेम कहानी’ जैसे एक नुस्खे के द्वारा ही इस कहानी को कहा गया है पर इस कहानी को प्रस्तुत करने का जो ढंग है उसके चलते यह नुस्खे वाली कहानी होने से अपने को बचा लेती है। जैसा कि, पूर्व में ही कहा गया है कि केवल नुस्खे का प्रयोग करने मात्र से कोई कहानी कमजोर नहीं होती। उस नुस्खे के साथ लेखक की अपनी रचनात्मक कल्पनाशीलता किस तरह के भाषिक शिल्प में सामने आती है मुद्दा यह है। अब सवाल यह है कि, इस तरह का शिल्प कहानी के अपने विषयगत ‘प्लाट’ और उसकी ‘ओब्जेक्टिविटी’ को सघन करता है या केवल परिधि को ही सजाता, संवारता जब केंद्र में स्थिर होता है तो कहानी की केन्द्रीयता गढ़ंत प्रतीत होती है या स्वाभाविक 7 क्योंकि, इस शिल्प में एक तरह की भाववादी-कलावादी बाजीगरी होती है और यह बाजीगरी, यह कौशल युवा पीढ़ी के प्रायः सभी कहानीकारों में है। इस बिंदु पर आगे बात की जायेगी।

हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता के तानेबाने में नसरीन अख्तर और शिरीष की इस प्रेम कहानी को नीलाक्षी सिंह जिस तरह से प्रस्तुत करती हैं वह उनकी सृजनात्मक क्षमता का बेहतर नमूना है। यह कहानी अपने विषय-वस्तु में जिस सधे हाथ से कहानीपन को साधती और संरचित करती है, उसकी इस संरचना और उसके प्रस्तुतीकरण की तकनीक और तरकीब के नाते यह हिंदी की युवा-पीढ़ी के कहानीकारों की कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियों में उद्धृत की जाती है। कहानी को जिस सिनेमाई तरतीब और तरकीब में पेश किया गया है उसके चलते इस कहानी में पाठकों को एक तरह की दृश्य-परकता का आभासी सुखबोध (विजुअल यूफोरिया) भी होता है। कहानी जिस प्रस्तावना और उस प्रस्तावना के सहवर्ती दृश्य से शुरू होती है वह काबिलेगौर है - ‘‘खुश्क गर्मियों के ठीक बाद के दिनों की शुरुआत थी। रह रह कर दरख्तों में कोई एक नम्रजान पत्ती काँप उठती। लंबी कतार में शाख विशाख हो फैले कचनार के नीचे मुझे पहली बार दिखा था, शिरीष। मैं, नसरीन अख्तर...मेरी उमर तब बाईस साल, चार महीने, सत्रह दिन। ये साल, ये महीने, ये दिन...सब कैद हो जाने चाहिए तारीख में...वजह...यहीं से मेरी जिंदगी पलटी खाती है। मैं चलती-चलती बुरी तरह लँगड़ा गयी थी। दाहिनी एड़ी मुड़ी पड़ी थी और सैंडिल की हील लचकी जान पड़ी। मैं झुक कर ठोंक-पीट मचा कर हार चुकने के बाद उस अपनी जगह से पूरी तरह हिल चुकी चीज को हाथ में लेकर फर्स्ट एड की किस्म का कुछ कर ही रही थी कि मेरे साथ खड़ी भली-सी लड़की मनी को किसी मर्दानी आवाज ने पुकारा। मामूली ना-नुकर के बाद पहचान निकल आयी। मनी ने शिरीष के साथ कभी दस ग्यारह साल गये पढ़ाई की थी। भली लड़की का भला परिचित नजदीकी मोची का पता थमा गया। मैं अपने पचड़े में ऐसी खस्ताहाल थी कि उसके बारे में कोई खास राय कायम किये बगैर मोची तक बढ़ गयी... हमारी ये पहली मुलाकात बगैर कुछ घटवाये, बड़े सस्ते भाव गुजर गयी थी। ’’

नसरीन और शिरीष की यह पहली मुलाकात बगैर कुछ घटवाये, बड़े सस्ते भाव से गुजर तो गयी पर कहानीकार ने इसके तुरंत बाद ही कॉलेज के कैंटीन में फिर दोनों को मिला दिया। दोनों में परिचय हुआ। मनी, ने - जो उसकी ‘बैचमेट’ और उससे बस ‘दस घर के फासले पर रहने वाली’ कान्यकुब्ज ब्राह्मण लड़की थी, यह परिचय कराया। फिर तो ‘मैं, मनी और वह’। दो से चार भले। और सचमुच में इन तीनों के साथ चार और दोस्तों को जोड़कर कहानीकार ने सात दोस्तों का एक ‘ग्रुप’ बना दिया 7 इस इन्द्रधनुषी ग्रुप का नाम रखा गया - ‘नासमझ’ (NASAMJH)। नसरीन, अतुल, शिरीष, अनन्या, मनी, ज्योति और हर्ष, सबके नाम के पहले अक्षर को लेकर बनाया गया अर्थपूर्ण नाम ‘नासमझ’। अर्थपूर्ण इस लिहाज से कि, यह समूह किसी विचार, किसी दायित्व या किसी सामजिक-राजनीतिक कर्तव्य-बोध से उपजी सोच का नतीजा नहीं है बल्कि यूँ ही एकसाथ पढ़ने, घूमने और आये दिन पिकनिक पर जाने वाले दोस्तों का गठजोड़ है। ‘‘मनी का तो परिचय मिल ही गया है। अनन्या अमीर घर से ताल्लुक रखती थी और बैडमिंटन की अच्छी खिलाड़ी थी। ज्योति बड़ी उजली, लेकिन जरा मोटी। बगैर कपट के शांत हँसी हँसने वाली लड़की। तीन लड़कों में एक शिरीष, एक हर्ष जो बेहद चुप्पा था और एक अतुल, वह इतना भोला था कि मैं उसे दिन में सात बार के औसत से उल्लू बनाती थी। हम लोग ब्रेक में, लंच में, शाम में, सुबह में...अक्सर मिल लेते।’’

शिरीष से ‘न-स-र’ की दोस्ती चाय पीने और चेखव के पढ़ने पढ़वाने की बातचीत से धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। एक रोज जब दोनों ‘क्लास खत्म होने के बाद मैदान में छितर-छितर कर बैठे थे बेमकसद...तो शिरीष उसके पास खिसक आया। उसने पूछा - ‘‘तुमने कभी परिंदों के पैरों की पोजीशन पर गौर किया है, जब वे उड़ रहे होते हैं? नहीं तो! देखो आज देखो इत्मीनान से। तुम्हें क्या लगता है? इतने ऊपर उड़ रहे हैं। मुझे नहीं दिखता। तुम पागल हो। तुम बेवकूफ। उसने कहा । अब गर्मी नहीं पड़ती कि हाफ आस्तीन पर ही टिके रहो। पूरे आस्तीन की कमीज पहन लेते तो कम जँचने का डर था क्या? बस...सुबह से मैं राह देख रहा था। तुम कुछ कहती क्यों नहीं...अभी टोक दिया तुमने...अब हाफ शर्ट पहन कर ठंडक में काँपते हुए आना सफल हुआ। बस। मैंने मुँह चढ़ा लिया। वह चुप बैठा रहा कुछ देर। फिर उसने कहा, वो देखो...वो...उस मैना का नाम नसर है, जिसकी नजर कमजोर है, जिसे नहीं दिखता कि परिंदे उड़ते वक्त अपने पैरों का क्या करते हैं। न...स...र... नसरीन अख्तर...। मेरे सीने में कुछ तेज-सा चुभा और मैंने उसे कस कर हथेली से दाब दिया और घुटनों पर झुक गयी।’’ ‘न-स-र’ के सीने की यह टीस, यह चुभन हथेली से दाबने से भला कहाँ दबने वाली थी। शिरीष अब उसके लिए ‘‘एक खूबसूरत अहसास था। एक दोस्त। जिंदगी में पहला मर्द दोस्त। मर्द कहने में परेशानी लगती थी। लेकिन हकीकत यही थी। वह मर्द था लेकिन फिर भी अपने हाथों दोस्त बना लिया गया था। उसका होना मुझे सहेजने लगा था। उसके होते यह ख्वाहिश होती थी कि उससे उलझा जाए। उसके न होने पर अफसोस भी होता झगड़े का, हँसी भी आती और फिर से झगड़ने का बहाना भी वहीं से हाथ आता। उसके होने पर मैं उसकी हर बात को काटती और उसके न होने पर हर बात को जोड़ती। उसके होने पर मैं उसके पहले न होने की वजह पूछती और उसके न होने पर, उसके तब होने को परखती। उसके होने पर मैं बच्ची बन जाती और उसके न होने पर उसकी माँ बन जाती।’’ यह एहसास, इस मासूम अहसास को दर्ज करने वाली यह भाषा, इस भाषा में दो जवां दिलों की धड़कने सुनकर कहीं आपको ‘गुनाहों के देवता’ के सुधा-चंदर की याद तो ताज़ा नहीं हो आयी? पर, यह ‘गुनाहों का देवता’ वाली प्रेम कहानी नहीं। यह एक हिन्दू लड़के और मुसलमान लड़की की प्रेम कहानी है। धर्म और समाज के लिए साम्प्रदायिकता जैसे खतरनाक और असाध्य रोग को प्रकट करने वाली प्रेम कहानी।

प्रेम की चुभन का एहसास अभी नसरीन घुटनों पर झुकी अपने सीने में महसूस ही रही होती है कि, ऐसे फ़िल्मी सीन के तुरंत बाद ही अचानक कहानीकार को याद आता है कि कहानी का लक्ष्य इस तरह की कोरी भावुकता नहीं है, कहानी को इस भावुकता से निकालना होगा। उसे उसके केंद्र की और ले चलना होगा। और तभी बिना किसी संदर्भ-प्रसंग के (यहाँ आप उस तथाकथित सरलीकृत कथ्य का प्रमाण की तरह सहारा लेकर कहने के लिए स्वतंत्र हैं कि अध्यापकीय आलोचना बिना सन्दर्भ-प्रसंग के सोच ही नहीं पाती) यह उद्धरण कहानीकार की ओर से चेंप दिया जाता है - ‘‘ये खबर लपट की तरह बढ़ चली थी कि दो साल बीते जिस बूढ़े हिंदू ने काठ के रथ पर सवार होकर एक मस्जिद के विनाश के लिए कमर कस ली थी, वही,उस बार असफल हो जाने पर, अब एक बार फिर...अपने तीर तरकश इकट्ठा कर रहा था । उस मस्जिद का ढह जाना उतना ही जरूरी था, जितना कि उसका न ढहना। मस्जिद के ढहने, न ढहने - दोनों स्थितियों में खून का बहना तय था । लोगबाग अपनी नस्ल का खून पहचानते थे और वे दूसरे गुटों से खींच-खींच कर अपनी नस्ल वालों को अपने पास जमा कर लेना चाहते थे, ताकि इकट्ठे रह कर वे अपने खून को बचा सकें।...वह मस्जिद कभी भी ढहायी जा सकती थी, उनके हाथों, जो अपने को कारसेवक कहते थे। बस लोग दिल को पकड़ कर उसी घड़ी का इंतजार कर रहे थे। क्योंकि उसके बाद या तो उनके खून का रहना तय था, या उनके खून के प्यासों के खून का। मैं उसी ज़हरीले समय में साँसें खींच रही थी। आप सोचेंगे ये कैसी लड़की है जो बस अपनी बातें करती है। न घर की बात, न परिवार की बात, न समय की बात, न समाज की बात, न दोस्तों की बात, न बिरादरी की बात। बस अपनी और एक खास इंसान की बात, दरअसल मैं इन दोनों की बात नहीं करती। यदि वह मेरी जिंदगी में आया न होता तो मैं किसी की भी बात नहीं करती। तब यकीनन मेरी जिंदगी में सब कुछ बेखास ही होता। शिरीष ने मुझे अपने आप से जोड़ा । और तब मैं अपनी दुनिया से अपने को जोड़ रही थी। देखूँ तो ये दुनिया है कैसी शुरुआत अम्मी से ही...।’’

फिर तो दुनिया को देखने की ऐसी शुरुआत होती है जो बिना सांस लिए चलती चली जाते हैं। बातों की रील कहीं पर रुकती ही नहीं। बातों के चित्र एक एक कर सेल्युलायिड पर चलते चले जाते हैं। रेखाचित्र बनते चले जाते हैं। पहले अम्मी का फिर मनी का, फिर एक-एक कर अनन्या, ज्योति, हर्ष और अतुल का। कहानी का एक तिहाई हिस्सा इन चरित्रों के रेखाचित्र बनाने में सर्फ किया गया है 7 हर एक के गुणधर्म का विस्तार से वर्णन। गरज यह कि, इन्हीं के माध्यम से नैरेटर दुनिया के साथ अपने होने को दर्ज कर सकता है। जबकि, मूल कथा के लिहाज से इतने विस्तार से प्रत्येक चरित्र का, उसके गुणधर्म के आधार पर रेखाचित्र बनाने की जरूरत क्यों, यह बात समझ में नहीं आती। वही वाली बात है, ‘लिखते रुक्का लिख गए दफ्तर, शौक ने बात क्या बढ़ाई है।’ दिलचस्प यह है कि, वर्णन के इस शौक में कहानीकार कई जगह अपनी ही बात को परस्पर काटती चलती है। वह खुद ही सुनिश्चित नहीं कर पाती कि वह कहना क्या चाह रही है और कह क्या रही है। जैसे कुछ उदहारण :

1. एक सुराख जो उनके मन में कभी बन चुका था, उन्हें किसी चीज से जुड़ने नहीं देता । चाहे वो चीज उनकी इकलौती औलाद ही क्यों न हो। हम दोनों में दुनियादारी की तमाम बातें होतीं पर दिल का हिसाब किताब हमारे दरम्यान नहीं होता। अम्मी जितनी खोलें बेरुखी की, अपने ऊपर चढ़ाती जातीं, उतनी ही खोलें मेरे लिए भी छोड़ती जातीं और तब मेरे पास उन खोलों को अपने ऊपर ओढ़ लेने के सिवा कोई चारा न होता।

अपनी अम्मी के लिए ‘सुराख’ ‘दिल के हिसाब-किताब’ ‘खोलें’ जैसे इन लक्षणों को अगले ही अनुच्छेद में खुद नसरीन ही जैसे झुठला दे रही हो - ‘‘अम्मी की कोई दोस्त न थी, न कोई राजदार। वह कभी खुशी का इजहार न करतीं, तो कभी गम को भी नहीं सँजोतीं।’’ अगर गम को अम्मी संजोतीं नहीं तो दिल को चाक कर देने वाला वह कौन सा गम है जिसके चलते उनके मन में एक सुराख बन गया था।

2. और आखिर में अतुल। वह जब मुस्कुराता तो उसके बायें गाल में लड़कियों की तरह गड्ढे पड़ते थे। प्यारा लड़का...,जो बातें बहुत करता था। उसे नाराज कर देना ज्यादा आसान था कि मना लेना... मैं जान नहीं पायी।

यह जान न पाना जानबूझकर है या स्वाभाविक, इस अनिश्चितता को पाठक जरूर जान लेता है। यह वही भाववादी-कलावादी बाजीगरी का शिल्प है जिसकी बात ऊपर कही गयी है। क्योंकि, सत्य यही है कि शिल्प, टेक्निक और भाषा की योग्यता के आधार पर कथावस्तु को कहानीकार ‘डेकोरेट’ करके वातावरण को घनीभूत तो कर सकता है पर उससे असलियत नहीं पैदा की जा सकती।

15-20 पेज के इस अनपेक्षित वर्णन के बाद कहानीकर को पुनश्च ध्यान आता है कि अब तो कहानी अंत की ओर बढ़ रही है अब गंतव्य पर उतरने के लिए यात्रा के सारे सामान समेटने होंगे। और फिर अचानक नैरेटर उपस्थित होता है , कहानी अपने केंद्र से दूर न चली जाय इस चिंता के साथ - ‘‘जिंदगी का ऐसा ही खूबसूरत जायका मेरे काबू में था कि तभी वह खबर लपट की तरह बढ़ी आयी कि कारसेवक बाबर जानी की उस मस्जिद को तोड़ डालने के लिए मोर्चाबंदी कर चुके थे। लोगों में सनसनी फैल गयी । बल्कि ऐसा कहें कि एक सनसनी जो उनमें फैली हुई थी, उसे नाम मिल गया। लोग एक साथ उत्तेजित भी हुए और घबड़ा भी गये। वे फैसला नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें दूसरों की जान के पीछे पड़ना है या कि अपनी जान बचानी है? इस राष्ट्रीय असमंजस वाले हालात से बेपरवाह...मेरे ग्रुप का कार्यक्रम झटपट तैयार हो गया...अगले इतवार हम साथ मिल कर कहीं चलते हैं, पिकनिक मनाने।’’ इस राष्ट्रीय समस्या से बेपरवाह पिकनिक मनाने जाने की यह चाहना जिस सामाजिक और राजनीतिक चेतना-शून्यता को सामने ले आती है उससे साफ़ है कि इन युवाओं का अपने ‘समय’ के प्रति किस तरह का रवैय्या है। कहानीकार ने जिस तरह से इस कहानी में युवाओं के इस बेपरवाह ‘ट्रेंड’ को प्रस्तुत किया है वह अविश्वसनीय नहीं लगता। उत्तर-पूंजीवादी नव-उदारवाद की लहर में उपजी यह वह पीढ़ी है जिसे देश या राज्य की किसी राजनीतिक या सामजिक समस्याओं से सीधा कोई सरोकार नहीं है। यह पीढ़ी मार्केट को साधने वाली पीढ़ी है। इनका कंसर्न ‘मुक्त बाज़ार’ में सभी तरह के वैचारिक दृष्टियों और सरोकारों से मुक्त होना है। यह ‘नेटवर्क’ वाली पीढ़ी है। अन्यथा क्या कारण है कि, इस कहानी में जो आसन्न राष्ट्रीय संकट है उसको जानते-समझते हुए भी उसके लिए चिंतित होने की बात कौन कहे ये युवा पिकनिक मानते हैं 7 ज़र्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के प्रसिद्द निबंध ‘ज्ञानोदय क्या है ? (What is Enlightenment?) की आलोचना करते हुए जो बात मिशेल फूको ने कही थी कि, ‘‘या तो तुम ज्ञानोदय को चुनो और उसकी तर्कशील पद्धति के साथ रहो या फिर ज्ञानोदय की आलोचना करो और उसकी तर्कशील पद्धति से बचे रहो।’’ अगर इसी बात को दूसरे ढंग से भूमंडलीकरण के बारे में लागू किया जाय तो कहा जा सकता है कि, ‘‘या तो तुम भूमंलीकरण को चुनो और उसके फैलाए अर्थतंत्र के साथ चलो या फिर उसकी आलोचना करो और बाजारवाद के मायाजाल से बचे रहो। कहना न होगा कि युवा पीढ़ी का अधिकांश किस ओर है।

बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए जिस मोर्चाबन्दी की बात ऊपर कही गयी है वह सच साबित होती है। 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद का नामोनिशान मिटा दिया जाता है,बाबर जानी की मस्जिद नेस्तनाबूत कर दी जाती है। पूरे देश में राष्ट्रस्वभिमानी साम्प्रदायिक ज्वार पूरे उफान पर है 7 ऐसे में नसरीन की अम्मी की चिंता उन्हें हलकान किये हुए थी, वह - ‘‘रात को दरवाजे की छेद से आँखें सटा कर बार बार बाहर झाँकतीं। अम्मी बार-बार अपने से वायदा कर रही थीं कि हालात यदि एक बार सँभल गये तो वे दूसरे मुसलमानों की तरह इस इलाके को छोड़ कर अपने गढ़ में जा बसेंगी। लेकिन हम बच पाएँगे... सवाल वही था एक। नसरीन की अम्मी के लिए यह डरावना आतंक और उससे निकल पाने की, जीवन को बचा पाने की यह मजबूर लालसा केवल उनकी ही नहीं बल्कि इस देश के उन तमाम मुसलमानों की है। नसरीन और उसकी मम्मी को अगली ही सुबह ‘नासमझ’ ग्रुप के उसके दोस्त शिरीष, अतुल और हर्ष उनको वहां से निकाल कर हर्ष के घर ले जाते हैं जिससे लोगों को शक न हो और वे दोनों माँ बेटी महफूज़ रह सकें। नसरीन की अम्मी को उसके दोस्तों पर एक तरह का विश्वास था कि वे उनके साथ बुरा नहीं करेंगे। फिर भी उनके मन में अपने मुसलमान होने और उनके हिन्दू होने के नाते जो दूरी बन गयी थी वह आड़े आ रही थी। नसरीन सोचती है - ‘‘भगवान की जमीन पर वह मस्जिद हमने नहीं बनायी थी न इन लोगों का कोई हाथ उस मस्जिद को तोड़ने में था। फिर भी हम दोनों खेमे के लोग कतरा कर गुनहगारों की तरह खड़े थे। एक दीवार थी,जो हमेशा से थी। जिसे बीच-बीच के ये वाकये और पुख्ता बना रहे थे। वही दीवार हमें एक दूसरे से नजरें नहीं मिलाने दे रही थी। इमारत ही गिरानी थी तो गिराने के लिए यह दीवार ही क्या बुरी थी !’’ दो दिनों में धीरे-धीरे हर्ष की माँ और बहनों के साथ घुलने-मिलने से नसरीन की अम्मी का मन थोड़ा हल्का हुआ। पर, अचानक दृश्य परिवर्तित हुआ और नसरीन की मामूजान अपने साथ अपनी कौम के कुछ लोगों को लेकर आ धमके और जबरदस्ती उन दोनों को वहां से ले जाने की जिद करने लगे - ‘‘यहाँ तुम दोनों को सब मार डालेंगे। ये स्या...’ उसके बाद वही जानी पहचानी चीजें... मैं सुनती रही... जिन्हें पिछले दिनों यूनिवर्सिटी आने जाने में सुनती थी। सब कुछ वही था, बस ‘मुसलमानों’ की जगह ‘हिंदू’ चिपका दिया गया था यहाँ। मैं अब एकदम ठंडी हो चुकी थी - अपने मामूजान को पहचान कर । तभी बाहर खड़े लोगों ने अपना काम कर दिया। घर के एक कोने से आग की लपटें उठने लगीं। मैंने उसका हाथ झटक कर कहा - ‘नहीं जाना हमें। ‘ वह मुझे अजूबे की तरह देखने लगा। उसने दाँत पीसे और अम्मी से कहा - चलो वक्त नहीं है हमारे पास ! कैसे कैसे तलाशा है तुम्हारा ठिकाना। इन हरामखोरों के इलाके में हम जान मुट्ठियों में लेकर आए हैं। चल!’’ दोनों की जिद के आगे जब मामूजान की एक न चली तब उन्होंने गाली बकते हुयी जाते-जाते उस कमरे में आग लगा दी। किसी तरह नसरीन के दोस्तों ने आग बुझाई। पर, अभी समस्या दूसरी थी। भय यह था कि, हर्ष के आस-पड़ोस के लोगों को इस झगड़े-फसाद का पता चल गया तो इन सबकी काहिर नहीं। सारे दोस्त सोच नहीं पाते हैं कि क्या करें। अंत में शिरीष कहता है कि, कल किसी तरह इन दोनों को छुपाकर स्टेशन पहुँचाया जाय और ये यहाँ से दूर मेरे भाई के पास दूसरे शहर में चली जायेंगी। लेकिन अब हर्ष के घर रुकना महफूज़ नहीं। इसलिए ज्योति के घर चुपके से इन दोनों को पहुँचाया जाता है, जहां से अल्लसुबह उन्हें महफूज़ जगह पर पहुँचाने के लिए स्टेशन निकलना है। पर, वह सुबह नहीं आती। फ़िल्मी अंदाज में कहानी मोड़ लेती है। ज्योति के घर के सभी लोग जब गहरी नींद में सो रहे होते हैं तो दोनों माँ बेटी चुपके से घर छोड़ कर न जाने कहाँ जाने के लिए निकल पड़ती हैं। अब वे दुनिया में अकेले हैं और सच तो यह है कि - ‘‘दुनिया में सबको एक न एक बार ऐसा लगता है कि वह अकेला रह गया है। यह अकेलापन दरअसल अपने आप के होने का बोध है। एसेंस आफ आइडेंटिफिकेशन।’’ जब सुबह शिरीष और उसके दोस्त उन्हें स्टेशन छोड़ने के लिए आते हैं तो वे दोनों वहां से गायब मिलते हैं। शिरीष को उसके नाम का एक लिफाफा मिलता है जिसमें नसरीन की पलकों का एक टूटा हुआ सा मखमली एहसास बंद है जो कभी नसरीन की पलकें चूमते समय टूट कर गिर गए थे और जिन्हें संभालकर रख लिया गया था 7 शिरीष की आँखों से आंसुओं के ढलकने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह रुकने का नाम ही नहीं लेता। वह उस नसरीन से एक सवाल करता है जो अब वहां नहीं है और उसका जवाब भी खुद ही देता है। दोनों की पारियां अब वह अकेले खेलता है - ‘‘क्या आधी रात में इस तरह जाना जरूरी था नसर? क्या तुम्हारी राह देखी जाए? उड़ चुके परिंदों का इंतजार सही है क्या? तुम क्या पाकर लौटोगी नसर? पाकर नहीं... खोकर। वह खौफ...जो मुझे इंसान की तरह जीने नहीं देता था, हमेशा एक औरत...एक मुसलमान बना डालने की धौंस देता था...उस खौफ को खोकर...अब लौटना होगा।’’

इसी के साथ कहानी खत्म होती है। पर, नसरीन आजतक नहीं लौटी। आज तक वह खौफ़ नहीं दूर हुआ बल्कि सच तो यह है कि वह और अधिक स्याह होता गया है।

[तीन]

‘‘एक बात मुझे बराबर साल रही है। युगों-युगों से एक साथ रहते चले आने के बाद भी हम एक दूसरे से अचानक नफरत क्यों करने लगते हैं? क्यों एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं? क्यों भेड़िये बन जाते हैं हम साल में दो-तीन बार। जिस डोर से हम बंधे हैं वह इतनी कमजोर कैसे है। अगर वह कमजोर है तो बंधे कैसे हैं।’’- (चोर-सिपाही)

‘चोर-सिपाही’ मो. आरिफ की कहानी है। कभी बहुत पहले इसी नाम की एक फिल्म देखी थी। यह बहुत पुरानी फिल्म है। संभवतः इमरजेंसी के ठीक बाद की ‘76 या ‘77 की। प्रयाग राज निर्देशित इस फिल्म में दो हीरो हैं विनोद खन्ना और शशि कपूर। एक चोर है एक सिपाही। परवीन बाबी हीरोइन हैं। हालाँकि, सिवाय नाम की समानता के इन दोनों की कहानी में कोई समानता नहीं। पर हाँ, इन दोनों कहानियों में बचपन में खेले जाने वाले ‘चोर-सिपाही’ खेल को पृष्ठभूमि जरूर बनाया गया है। मो. आरिफ ने ‘चोर-सिपाही’ में गुजरात में गोधरा नरसंहार को कहनी का विषय नहीं बनाया गया है। इस विषय पर हिंदी में सबसे अच्छी कहानी असगर वजाहत की ‘शाहआलम कैम्प की रूहें’ है। इस कहानी की खूब चर्चा हुयी। मो. आरिफ की कहानी ‘चोर-सिपाही’ अहमदाबाद में श्रृंखलाबद्ध ढंग से हुए बम विस्फोट के बाद पूरे शहर में फैली अफवाहें, आशंका, भय और नीरव सन्नाटे को वातावरण के रूप में लेती है। इस विस्फोट में ज्यादातर हिन्दू समुदाय के लोग मारे गए हैं - ‘‘पूरा अहमदाबाद एक बार फिर (गोधरा के बाद) मुसलमानों से खफा है। और उनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। बोलते हुए इमाम साहब की आवाज भर आयी...बैठे लोगों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। पूरा अहमदाबाद अगर फिर से मुसलमानों से नाराज हो जाएगा तो हम कैसे बचेंगे। कहाँ जायेंगे।...लगा इमाम साहब रो पड़ेंगे...सभी बैठे हुए रो पड़ेंगे...मामू रो पड़ेंगे...मैं भी रो पडूंगा।’’ दंगे के बाद पूरे अहमदाबाद में कर्फ्यू लगा दिया गया है। डायरी-लेखन की टेक्निक में बुनी गयी इस कहानी में साम्प्रदायिक नफ़रत और घृणा के चलते बचपन, दोस्ती, प्रेम, विश्वास, सबकुछ को संदेहास्पद, विवश और भयग्रस्त होकर टूटते और खत्म होते हुए दिखाया गया है। साम्प्रदायिक दंगों में बच्चे कैसे एकाकी, अलग-थलग, भयग्रस्त, सूने-सूने और खाली हो जाते हैं सलीम इसका सबसे बड़ा उदहारण है। गुलनाज और पराग मेहता का प्यार कैसे इस घृणा की भेंट चढ़ता है, कैसे पराग मेहता को पीट-पीटकर लहूलुहान किया जाता है और अंततः वह अस्पताल में दम तोड़ देता है। कैसे इस्माइल मामू और मनसुख पटेल की गाढ़ी दोस्ती शको-शुबहे के बीच फंसती है, यह कहानी इन इन्दिराजों को बड़ी संजीदगी से पेश करती है।

सलीम, जिसकी डायरी से यह कहानी बनी है, एक दस साल का लड़का है जो छुट्टियों में इलाहाबाद से अपने मामू के यहाँ अहमदाबाद घूमने आया है। जिस दिन वह अहमदाबाद पहुँचता है उसके अगले दिन ही बम-विस्फोट की दुर्घटना हो जाती है। कर्फ्यू के हालत में वह पूरी तरह से घर में ही कैद होकर रह जाता है। कुछ भी करने या खेलने को न मिलने से वह ऊबता रहता है। करे क्या ? इसलिए वह डायरी लिखता है और घर में ही मामू के बच्चों और उम्र में उससे थोड़ी बड़ी गुलनाज आपा के साथ चोर-सिपाही खेलता है। इसी चोर सिपाही के खेल में घर में जो गुप्त से गुप्त जगहें हैं वह भी उसे पता चलती हैं। उन चोर जगहों का इस्तेमाल घर के सभी सदस्य शहर में साम्प्रदायिक दंगे होने के बाद फैली मार-काट और हिंसा से बचने के लिए करते हैं। मो. आरिफ ने बच्चों के इस खेल को, साम्प्रदायिक हिंसा के समय उत्पन्न भय और आतंक से घबराये बड़े लोगों के डर को इस खेल के माध्यम से जिस प्रतीकात्मक ढंग से चित्रित किया है वह रचनाकार की कल्पना शक्ति और यथार्थ को रचने की उसकी क्षमता को प्रदर्शित करता है। खासकर, वह सिचुएशन कहानी में देखने लायक है जब इस्माइल मामू अपने घर की तरफ अपने सबसे विश्वसनीय किन्तु हिन्दू दोस्त मनसुख पटेल और उनके साथ आयी भीड़ से डरकर घर के सभी लोगों को छिपने के लिए कह कर सबसे सुरक्षित जगह पर खुद छिप जाते हैं। डरे, सहमें, कातर इस्माइल मामू। जब मनसुख पटेल उन्हें उसी दोस्ताना भाव से ढूंढते हैं जैसे वे पहले इस घर में आते। इस्सू, कहाँ हो इस्सू। पर इस्सू तो बेड के नीचे अपना पूरा शरीर सिकोड़कर दम साधे पड़े हुए हैं। इस दृश्य का मार्मिक बिंदु तब उपस्थित होता है जब मनसुख पटेल उन्हें ढूँढ़ते हुए उस बिस्तर तक पहुँच जाते हैं और जब उन्हें इस बात का आभास होता है कि मामू नीचे छिपे हैं - ‘‘मैंने महसूस किया कि मनसुख पटेल बड़े मामू को उस दशा में देख कर अचम्भा, अविश्वास, और लाज से तर हो गए। ...मामू उन्हें देखे जा रहे थे - डरे सहमें, दुबके टकटकी बंधे मनसुख पटेल को देखे जा रहे थे मामू। जैसे कोई चोर जो चारों ओर से घिर गया हो और बाहर निकलने के रास्ते बंद हों। जैसे कोई भयभीत मेमना। लेकिन मनसुख न सिपाही लग रहे थे, न शेर, न भेड़िया।...मनसुख पटेल के मुख से बमुश्किल से मामू का नाम फिसला- ...इस्स...मा...इल। मामू बुदबुदाए म...न...सुख। फिर मामू ने धीरे-धीरे आँख खोल दी। एक बार फिर बुदबुदाए - मन...सुख मैं बहार निकल सकता हूँ...कुछ करोगे तो नहीं न? मामू जैसे याचना कर रहे हों।’’ अपने बचपन के गाढ़े दोस्त की यह दयनीयता और उसके भीतर की इस कातर पुकार को सुनकर जैसे जड़ हो गए -‘‘बेड पर हाथ की पकड़ ढीली हुयी...संतुलन थोड़ा बिगड़ा और वे वहीँ जमीन पर लुढ़कने लगे, जैसे मूर्छा आई हो।’’ ऐसी परिस्थिति की मनसुख पटेल ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि, वर्षों की दोस्ती और विश्वास का तह नतीजा होगा। बहुसंख्यक समुदाय का होना मात्र उनके लिए इस कदर शर्मिंदगी का सबब बनेगा कि अपने दोस्त की नजरों में वह भी उन्हीं दंगाइयों की तरह हो गए हैं जो धर्म के नाम पर प्रेम और विश्वास के सभी रिश्ते-नाते अपनी ऊष्मा खो दें।

वस्तुतः, इस्माइल शेख का यह भय निराधार भी नहीं है। गोधरा के समय ही मुसलामानों पर क्या-क्या कहर नहीं बरपाए गए। खुद उनके अब्बा और मझले भाई को गाँधी चौक पर आग लगाकर जिस तरह जला दिया गया था। जिस तरह से मुसलामानों के घर के घर साफ़ कर दिए गए, उनके घरों की बहू बेटियों के साथ जो हुआ, उससे इस तरह के आतंक और भय का पैदा होना स्वाभाविक है। कहानी में, जब गोधरा के उस बर्बर और अमानुषिक कृत्य की याद को सलीम की नानी साझा करते हुए बताने लगती हैं कि, कैसे नामुरादों ने उन्हें भी नहीं छोड़ा था जो बीमार थीं, उन्हें भी नहीं छोड़ा जो मरने को थीं और उन्हें तक नहीं बख्सा जिनके पैर भारी...सातवाँ आठवां महीना चल रहा था। इस पर, उनके यहाँ काम करने वाली रहीमन दाई का यह कथन देखना चाहिए - ‘‘बस कुछ को छोड़ा। दाई ने नानी को लगभग काटते हुए कहा। किन्हें ? नानी और मामी की आवाज़ एक साथ आयी। ...जब उन्होंने चिल्लाकर कहा...गिड़गिड़ा कर कहा कि, मुझे छोड़ दो, भैया मुझे न छुओ...महीने से हूँ...मासिक धरम हो रहा है। सुनकर वे गुस्से से दन्त पीसते हुए, तलवार भाँजते हुए आगे बढ़ जाते थे।’’ धरम तो धरम है, भले ही मासिक धरम हो। हिन्दू धर्म में ऐसी वर्जित और त्याज्य समझी जाती है। आपदधर्म में इस मान्यता का इस तरह से प्रयोग कितना करारा व्यंग्य है।

अब, यहाँ इस कहानी को लेकर जो सबसे जरूरी बात है वह यह कि, मो. आरिफ ने इस कहानी में बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता की जगह अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता को कहानी के केंद्र में रखा है। इस तरह की थीम की कहानियां हिंदी में कम हैं। मनसुख पटेल और पराग मेहता जैसे चरित्रों का जो विकास इस कहानी में किया गया है वह इस बात का उदहारण है कि दोस्ती और प्यार में मजहब की कोई गांठ नहीं होनी चाहिए। गुलनाज और पराग मेहता के बीच का प्यार, जिसमें पराग मेहता अपनी जान गँवा देता है, प्रचलित साम्प्रदायिक नुस्खे वाली कहानियों की तरह नहीं खत्म होती। यही इस कहानी की खासियत है। पराग मेहता की हस्पताल में मृत्यु की खबर फैलने के बाद क्या नहीं हो सकता था। क्योंकि, पराग मेहता भा.ज.पा. सांसद वीरशाह मेहता का भांजा था। वह कर्फ्यू वाले माहौल में रात को चोरी छिपे गुलनाज के बुलाने पर उससे मिलने उसके घर के पिछले गेट पर पहुँचता है। माहौल को देखते हुए वह लौटने की जल्दी में है। दोनों एक दूसरे को सहेजते हैं, ढाढस बंधाते हैं कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जायेगा। गुलनाज उसे समझाती है कि, ठीक से जाना। उधर मस्जिद वाला रास्ता न लेना। पर, पराग मेहता पकड़ा जाता। मस्जिद के पास इकट्ठे लोगों का कहना था कि, ‘‘ये हिन्दू लड़का बड़े संदेहास्पद ढंग से मस्जिद के आस-पास घूम रहा था। इसकी मंशा ठीक नहीं लग रही थी। विश्व हिन्दू परिषद का मेंबर है। बुलाने पर भागने लगा।’’ लोग उसको पकड़कर उसकी जमकर पिटाई करते हैं और पूछते हैं कि इधर क्या कर रहा था। जब वह बताता है कि इस्माइल साहब के यहाँ से आ रहा था, तब लोग उसे उठकर इस्माइल शेख के घर ले आते हैं। पर, वहां घर के सभी सदस्य पराग मेहता को नहीं पहचानते हैं। पहचानते भी कैसे? किसी ने उसे देखा तक नहीं था। पराग मेहता की पहचान तो इस समय गुलनाज के एक हाँ या सर हिलाने की मोहताज थी पर। पर आश्चर्य, गुलनाज़ पराग को पहचानने से इनकार कर देती है। अस्पताल में पराग मेहता अपना दम तोड़ देता है। पता नहीं, पिटाई और चोट के कारण या गुलनाज के न पहचाने जाने के कारण। आप यहाँ, यह सोच सकते हैं कि, भला वह और करती क्या। जिस घर, परिवार और समाज में इस बात को लेकर हर समय भय, आतंक और बर्बरता पसरी रहती हो कि एक हिन्दू लड़का है एक मुस्लिम लड़की के साथ या एक मुस्लिम लड़का एक हिन्दू लड़की के साथ प्यार कैसे कर सकते हैं, उस समाज में गुलनाज का डर जायज है। कहानी इस बिंदु पर चुप हो जाती है कुछ नहीं कहती।

यह सच है कि, प्रचलित नुस्खे और मुहावरों में साम्प्रदायिकता पर हिंदी में लिखी गयी कहानियों, जिसमें बहुसंख्यक समाज की अल्पसंख्यकों के प्रति जो साम्प्रदायिक घृणा, नफरत और हिंसा को थीम बनाया जाता है, यह कहानी इससे अलग ‘टोन’ की कहानी है। पराग मेहता और मनसुख पटेल जिस प्यार और विश्वास को अपने अन्दर जीते हैं उसपर संदेह और अविश्वास की लकीर गुलनाज़ और इस्माइल शेख ही खींचते हैं। इस दृष्टि से यह कहानी मुसलमान समुदाय की तुलना में बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय के प्रति सद्भाव की कहानी है। एक पाठक को निश्चित ही, यह ‘पाठ’ भिन्न लग सकता है। वह भी तब जब कहानीकार खुद उस अल्पसंख्यक समुदाय से आता हो। पर एक आलोचक के लिए, यह इतना विश्वसनीय पाठ भी नहीं हो पाता। काश! कहानीकार, गुलनाज़ और इस्माइल शेख के दिलो-दिमाग में घर कर गए भय और आतंक के उन भावों को प्रकट कर पाता, जिसे उसे करना भी चाहिए था, जिसकी चर्चा इस लेख के शुरू करते हुए की गयी है।

[चार]

‘‘इधर देश की राजनीतिक दशा भयंकर होती जा रही थी। कम्पनी की फौजें लखनऊ की तरफ बढ़ी चली आती थीं। शहर में हलचल मची हुयी थी। लोग बाल-बच्चों को लेकर देहातों में भाग रहे थे। पर हमारे दोनों खिलाड़ियों को इनकी जरा भी फ़िक्र न थी। ...एक दिन दोनों मित्र मस्जिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मीर साहब उन्हें शिकस्त पर शिकस्त दे रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक आते हुए दिखाई दिए। वह गोरों की फौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार करने के लिए आ रही थी।’’ यह लखनऊ, वाजिद अली शाह के समय का लखनऊ है जिसका चित्रण प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में किया है। जिसका जिक्र राकेश मिश्र की कहानी, ‘शह और मात’ में आता है। राकेश मिश्र की कहानी,‘शह और मात’ में जो लखनऊ है वह अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वस्त कर दिए जाने और गोधरा नरसंहार के बाद का लखनऊ है। शुरू में ऐसा लगता है कि यह कहानी दो दोस्तों - आलोक और अनुराग की कहानी है जो दुनियाबी कारणों से एक दूसरे से दूर अलग-अलग शहरों में रहने के लिए विवश हैं, वर्ना कभी वे दोनों ‘शांति’ सीरियल के दोनों दोस्तों की तरह एक साथ रहने का स्वप्न देखा करते थे। आलोक भूमंडलीकरण के बाद, ‘सामंती-पूंजीवादी-युग’ से आगे बढ़ चुकी उस दुनिया का नागरिक है जहाँ ‘सूचना और संचार क्रांति’ के दम पर सब कुछ पाया जा सकता है। वह लखनऊ ‘निट’ का छात्र है जबकि उसका दोस्त अनुराग हिंदी साहित्य का विद्यार्थी है। जिसके चलते उसे जिन्दगी की लौ टिमटिमाती हुयी सी प्रतीत होती है। परन्तु, यह ग्लोबलाइजेशन के बाद विकसित बाजारू-तंत्र और उसके चलते मानवीय रिश्तों के दरकने की कहानी नहीं है।

अनुराग लखनऊ अपने बचपन के दोस्त आलोक से मिलने आता है। उन दोनों के बीच शुरुआती बातचीत की प्रस्तावना के कुछ ही पन्नों के बाद कहानी अपने कथ्य की ओर मुड़ जाती है। काफी ज़द्दोजहद के बाद दोनों दोस्त यह तय करते हैं कि पुराने लखनऊ में चलकर ‘शाम-ए-अवध’ का नज़र किया जाय। परंतु उनकी इस योजना की ऐसी की तैसी हो गई क्योंकि, ‘‘उस शाम आठ बजे कोई रिक्शा या ऑटो पुराने लखनऊ जाने को तैयार न हुआ, पता चला, कल से ही शहर में किसी अनहोनी की आशंका थी। दूर गुजरात में किसी ट्रेन में कुछ उपद्रवियों ने आग लगा दी थी जिसके बाद पूरा गुजरात जल रहा था और उसकी लपटें यहाँ भी साफ महसूस की जा रही थीं। सारा शहर जैसे बारूद के ढेर पर बैठा था। पता नहीं इस विस्फोट को किस मिर्जा, किस सौदा, किस अनीस के कलामों ने रोके रखा था। दोनों जब पुराने लखनऊ जाने के लिए ऑटोवालों से पूछताछ कर रहे थे, तो वे उन्हें बड़ी अजीब नजरों से घूर रहे थे। एक ने तो थोड़ी अजीब आवाज में पूछा भी था, ‘उधर के ही रहने वाले हो क्या?’ नहीं, रहता तो यहीं पर हूँ। फिर मरने का शौक है क्या?’’ फिर तो ‘शाम-ए-अवध’ के नज़ारे का शौक धरा का धरा रह जाता है।

खैर, लखनऊ गोधरा की लपटों से बच जाता है। यहाँ कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं भड़कता है। सबसे दिलचस्प यह है कि इस एक एक संकेत के, इस एक आशंका और सिचुएशन के, कहानी में आगे कहीं भी साम्प्रदायिक माहौल खराब होने का कोई वर्णन या संकेत नहीं मिलता। फिर भी यह साम्प्रदायिकता को प्रश्नांकित करने वाली एक अच्छी कहानी है। ‘यथार्थ’ को किसी ‘स्टीरियोटाईप’ में इकहरे वर्णन या भाषिक बाजीगरी के सहारे दोहराया जाय महत्व उसका नहीं। उसकी जगह उस ‘यथार्थ’ को एक नयी ‘कहानी’ में पुनर्रचित किया जाय, पुनः पाया जाय, महत्त्व इसका होता है। अमृत राय इसी को इस तरह पेश करते हैं - ‘‘यथार्थ के जिस हिस्से को आप रूपायित करना चाहते हैं, कल्पना उसे ‘बाडी’ देती है, बनी-बनायी और सुनी-सुनायी बात को लेकर यदि कहानी लिखी गयी है तो वह कहानी नहीं है।’’

अनुराग एक नए ‘आइडिया’ के साथ अलोक को यह बताता है कि, तुमने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और नवाब वाजिद अली शाह का जिक्र किया न, तो क्यों न हम दोनों भी थोड़ी नवाबी चाल चलें। कल जब वह गोरखपुर अपने घर लौटने के लिए बादशाहपुर (लखनऊ के पास का रेलवे स्टेशन) से ट्रेन पकड़ने जाएगा और आलोक उसे छोड़ने जाएगा तो क्यों न दो घंटे पहले ही वहां चलकर नवाबी अंदाज में शतरंज की बिसात बिछायी जाय। स्टेशन के शोर-शराबे और चिल्ल-पों से बेपरवाह आलोक और अनुराग दोनों अपनी बाजियां खेलने में मशगूल हैं। ‘शह और मात’ का खेल दोनों के बीच चल ही रहा होता है कि अचानक ‘वह’ (यह वही शख्श है जिसके लिए इस कहानी का ताना-बाना बुना गया है) प्रत्यक्ष होता है और आलोक को एक गलत चाल चलने से रोकता है - ‘‘नहीं, नहीं भाई साहब,यह क्या कर रहे हैं, उसे वहीं रहने दें आप हाथी के आगे से प्यादे को हटाइए। दोनों ने चौंककर आवाज वाली दिशा में देखा। वह एक 35-40 साल का शख्स था, दाढ़ी-बाल खिचड़ी हो चुके थे। आदमी ने हालाँकि सफारी सूट पहन रखा था लेकिन लगता था जैसे वह कई दिनों से सफर में हो।’’ उसने जिस तत्परता से हस्तक्षेप किया उससे लगा कि यह आदमी शतरंज के खेल का माहिर है। उसको यह बखूबी पता था कि एक गलत चाल से सबकुछ खत्म हो सकता है। वह शख्स अब पूरी मुस्तैदी से आलोक के जगह पर जम गया और आलोक-अनुराग दोनों एक तरफ हो गए। बातों ही बातों में यह खेल मय कहानी सहित मुग़ल काल में चली जाती है। वह शख्स बड़ी कुशलता से अपनी चाल चलता जा रहा था और यह बताता जा रहा था कि, कैसे नूरजहाँ ने इस खेल का ईजाद किया था। कैसे जहाँगीर और नूरजहाँ के बीच शतरंज की बाजियां लगती थीं। जहाँगीर, बादशाह की तरह हमेशा हाथी से खेलता था और नूरजहाँ घोड़े से। नूरजहाँ जब चाहती जहाँगीर से जीत सकती थी। पर अगर वह ऐसा करती तो सियासी लड़ाई हार जाती। एक बार उसने निश्चित किया कि, आज बादशाह सलामत को हराना है। और सचमुच वह जहाँगीर को शह देती है। जहाँगीर को निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझता - ‘‘उन्होंने लगभग थकी आवाज में कहा, बेगम, यह बाजी तो आप जीत गयीं। नूरजहाँ के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गयी। उसने बड़ी संजीदगी और शाइस्तगी से कहा, नहीं जहाँपनाह एक चाल है आपके पास और बाजी पलट सकती है। बादशाह ने लाख जोर लगाया लेकिन वह चाल नहीं सूझी। कौन-सी चाल है? लाचारगी से कहा उन्होंने। वह चाल आपको सिर्फ मैं बता सकती हूँ। लेकिन इसके बदले में आप मुझे क्या देंगे?...मलिका, सबकुछ तो आपका ही है। अब आपको और क्या चाहिए? मुझे हिंदुस्तान...। नूरजहाँ की आवाज में बर्फ का-सा ठंडापन था । बादशाह यकायक संजीदा हो गये। वो सारा आवेग सारा आराम कहीं परे चला गया । बादशाह ने अपना सारा दिमाग लगाया और उनके मुँह से निकला, ‘हिंदुस्तान की शर्त पर... कभी नहीं।’’ और बादशाह जहाँगीर ने जो चाल हिन्दुस्तान को बचाने के लिए उस समय चली थी वही चाल उस शख्स ने चली और दोनों दोस्तों को पराजित कर दिया।

एक तरह से, देखा जाय तो इस कहानी को यहीं खत्म हो जाना चाहिये। क्योंकि, कहानी अपने कथ्य को इस प्रतीकात्मकता के साथ पा लेती है - हिन्दुस्तान की शर्त पर कभी नहीं। पर, कहानीकार ने आगे बढ़कर उस शख्स (जो अब बादशाह भाई है, गरज यह कि वह बादशाहपुर स्टेशन पर ही नमूदार हुआ था) के आदमियत को, उसकी संजीदगी को जो ऊँचाई दी है उससे यह कहानी और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। उस सामान्य और सरलीकृत ‘पाठ’ और धारणा से भिन्न एक ऐसी कहानी जिसमें यह साधारणीकरण निहित होता है कि, इस देश के मुसलमानों ने इस देश को अपना देश कभी माना ही नहीं। यह बात तो उस प्रतीकात्मकता में पूरी हो जाती है। पर, कहानीकार को लगता है कि पाठक ऐसे, यूँ ही इस पर विश्वास क्यों करने लगा। इसीलिए, इसे विश्वसनीय बनाने के लिए बादशाह भाई के चरित्र को उदात्त बनाना जरूरी प्रतीत होता है और कहानी बादशाहपुर से बाराबंकी तक बढ़ जाती है। दरअसल, यह समस्या राकेश की लगभग सभी कहानियों में है। राकेश के पास ‘कहानी’ तो है पर ‘कहन’ की समस्या है। चेखव का एक मशविरा है - ‘‘नए-नए लेखक प्रायः कहानी में बहुत कुछ ठूंसने की कोशिश करते हैं, परिणाम यह होता है कि, कहानी का प्रायः आधा भाग अनावश्यक या अतिरिक्त रहता है। लिखना तो इस तरह चाहिए कि पाठक कहानीकार के स्पष्टीकरण के बिना ही, कहानी के क्रम, पात्रों के वार्तालाप व व्यवहार से समझ जाएँ कि बात क्या है।’’

[पाँच]

‘खाल’ और ‘दंगा भेजियो मेरे मौला’ दोनों दो भिन्न अर्थध्वनियों की कहानियां हैं। ‘खाल’ एक ऐसे समुदाय के लोगों के अन्दर छिपी उस साम्प्रदायिक मानसिकता को सामने लाने वाली कहानी है जिसमें अपने को बौद्धिक, सेक्युलर और तरक्कीपसंद कहलाने वाले बुद्धिजीवी और कलाकार लोग रहते हैं। अपने शीर्षक की ध्वन्यार्थकता में ही यह कहानी यह अर्थ देती है कि, खाल के नीचे सब एक जैसे हैं। खाल की एक परत हटाओ तो उनके भीतर साम्प्रदायिक ज़हर वैसे ही है जैसे सामान्य तौर पर एक साम्प्रदायिक व्यक्ति में होते हैं। इस कहानी में चित्रकार मनोहर दा का चरित्र इसी बात की तस्दीक करता है। कहानीकार ने मनोहर दा का जो स्केच बनाया है उससे सार्वजनिक जीवन में उनकी छवि क्या है, आपको पता लग जायेगा - ‘‘कौन मनोहर दा? आप नहीं जानते उन्हें? अरे, अखबार नहीं देखते क्या आप? अभी कल ही तो मुख्यमंत्री से कलाभूषण पुरस्कार लेते हुए उनकी तस्वीर सारे अखबारों में छपी थी और मेरा दावा है कि आप उन्हें एक बार देख भर लें, फिर कभी नहीं भूल पायेंगे। लंबा-चौड़ा कद, आकर्षक गोरा रंग, उन्नत ललाट, करीने से बिखेरे गये बड़े बड़े बाल और खिचड़ी दाढ़ी। जींस और कुर्ता उनका बारहमासी पहनावा है फिर भी, इसलिये कि वे नित-नवीनता के पुजारी हैं सो कल को आप उन्हें धोती-कुर्ते में भी देख सकते हैं। गले में एक साफ-शफ्फाक अंगोछा और आवाज...आवाज का तो क्या कहना! गहरे कुएं से छनकर आती धीर गंभीर, पर टनकदार आवाज। इस टनकदार आवाज में आप उन्हें विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर बोलते-बहसियाते एक बार सुन लें बस, आप उन पर फ़िदा हो जायेंगे।’’ इन्हीं मनोहर दा का मोबाइल कहीं गिर जाता है। कलाकार अपने में मस्त रहने वाले बेपरवाह टाइप के जीव होते हैं, सो मनोहर दा भी हैं। अब मुश्किल यह है कि बिना मोबाइल के आज के ज़माने में भला किसी का काम कैसे चल सकता है। उसमें भी उसी मोबाइल में देश-विदेश के न जाने कितने रसूखदार लोगों के नंबर थे। मनोहर दा की छटपटाहट स्वाभाविक है। उन तमाम जगहों पर मोबाइल ढूँढा गया जहाँ उसके मिलने की सम्भावना थी। पर उसे नहीं मिलना था तो नहीं मिला। रिंग करके भी देखा गया पर कुछ न हुआ। तय हुआ कि, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज काराई जाय।

इस कहानी में जो ‘लोकेल’ है वह ‘इलाहाबाद’ का है। मनोज पाण्डेय की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे अपनी कहानियों में दृश्य-परिदृश्य का जितना अर्थपूर्ण चित्रण कर लेते हैं उस तरह का चित्रण युवा पीढ़ी के रचनाकारों के यहाँ कम है। जितना सामने दिख रहा है उससे अधिक अर्थपूर्ण होता है जो पृष्ठभूमि में दिख रहा होता है। इसी कहानी में पुलिस थाने का जो चित्रण है वह कितना लाक्षणिक और प्रामाणिक है - ‘‘हम मुंशीजी के कमरे में पहुंचे। मुंशीजी ने हमें बैठने के लिए भी नहीं कहा। वह नीचे देखता हुआ कुछ लिखता रहा या लिखने का अभिनय करता रहा। मुंशी के पीछे लहराते हुए पीत-परिधान में आक्रामक मुद्रा में धनुष ताने राम का चित्र लगा हुआ था। पृष्ठभूमि में एक प्रस्तावित मंदिर का मॉडल था जिस पर भगवा ध्वज लहरा रहा था।’’ कहानीकार द्वारा इस परिदृश्य का चित्रण अनायास नहीं है, इसका पता तो कहानी के आखिर में चलता है। रिपोर्ट दर्ज़ हो गयी। इधर प्रथम लगातार उस नंबर पर काल कर रहा था। काफी मशक्कत के बाद आखिर नंबर मिल गया। उससे बात करने पर यह पता चला कि, हसन मोहम्मद नाम के एक रिक्शे वाले को वह गिरा हुआ मिला था। चौक, जानसेनगंज की कई शराब की हौलियों काफी ढूंढ-ढांढ के बाद पता चला कि वह अपने घर चला गया है। उसका घर यूनिवर्सिटी के पास मनमोहन पार्क की पाकड़ वाली गली में है। बहरहाल, जब प्रथम और मनोहर दा उसके घर पहुँचते हैं, हसन ही दरवाजा खोलता है। ‘‘कपड़े के नाम पर उसके बदन पर एक लुंगी ही थी जो पता नहीं कब की धुली थी। सींकिया बदन, पूरे बदन पर हड्डियां उभरी हुई। सिकुड़ी हुई खुरदुरी त्वचा। गले में एक काला मटमैला धागा । मनोहर दा उस दीन के सामने दीनानाथ लग रह थे।’’ मनोहर दा ने दहाड़ते हुए पूछा मोबाईल कहाँ है ? अबै दे रहे हैं साहब 7 तबतक, उसका बच्चा मोबाइल हाथ में लिए आता है, ‘इ का है अब्बा?’ मोबाइल देखते ही मनोहर दा ने उस बच्चे से अपना मोबाइल पाने के लिए तेज़ झपट्टा मारा। मोबाइल दूर जाकर गिरा और बच्चा वहीं रखी चारपाई से टकरा गया। उसके माथे से खून बहने लगा। ‘‘मनोहर दा ने अपना मोबाइल अपने कब्ज़े में किया- ‘‘मनोहर दा ने फुर्ती से मोबाइल उठाया और बाइक की तरफ झपटे। आसपास के लोग हमें संदेह की दृष्टि से देख रहे थे और जाने क्या-क्या बातें कर रहे थे। बच्चा चिल्ला-चिल्लाकर रो रहा था। बाइक स्टार्ट हो पाती इससे पहले हसन रिक्शेवाले की आवाज आयी, अरे जायें साहेब, देख लिया आपको। इत्ता भी नहीं कि मेरे बच्चे के लिए एक खिलौना ही लेते आते। अब तो मोबाइल मिल गया ना...अब तो कर लो दुनिया मुट्ठी में। हम इस दुनिया में थोड़े ही हैं साहेब।’’ पर, मोबाइल तो गिरने से वह चटक गया था, काम भी नहीं कर रहा था। मनोहर दा का गुस्सा सातवें आसमान पर था। ‘‘मनोहर दा की आंखों में एक ठंडी हिंसक चमक उभर आई। उन्होंने बस्ते से सिगरेट का पैकेट निकाला। एक सिगरेट जलाई और तीन-चार कश लेने के बाद सिगरेट जूते से कुचल दिया। आओ थाने चलते हैं, मनोहर दा ने कहा। अब थाने चलकर क्या करेंगे? मुंशी का रवैय्या भूल गए क्या आप? नहीं याद है इसीलिए कह रहा हूं। इस हरामजादे हसन को तो मैं.....मैं अब नामजद रिपोर्ट करूंगा। आप किस गुमान में हैं दादा? थाने में आपकी दाल नहीं गलने वाली। आपका मोबाइल गुम हुआ तो उसने ईमानदारी से वापस भी कर दिया। ये खराब हो गया तो यह उसकी नादानी भर थी और फिर थाने में आपने सिपाही और मुंशी का रवैया देखा नहीं। दोनों की ऐसी की तैसी। मैंने देखा सालों को पर तुमने कुछ नहीं देखा। क्या नहीं देखा। क्या नहीं देखा। थाने में घुसते ही हनुमान मंदिर, सिपाही का जनेऊ, मुंशी का तिलक और उस मुंशी के पीछे लगा श्रीराम का पोस्टर। मैं पसीने-पसीने हो गया। फिर भी कुछ नहीं हुआ तो? मैंने भरे स्वर में सवाल पूछा। शहर का एस.पी. मेरे साथ बैठकर शराब पीता है। मैं सबकी ऐसी की तैसी कर दूँगा। उस मुसल्ले हसन को तो मैं...।’’ सबकुछ को बेपर्द करते हुए कहानी इस नुक्ते पर खत्म हो जाती है। साम्प्रदायिकता पर लिखी जाने वाले हिंदी कहानियों की तुलना में यह कहानी धार्मिक और सामाजिक तनाव व अंतर्विरोध को किसी बहुत बड़े परिदृश्य में चित्रित करने वाली कहानी नहीं है। पर, अनुभव, संवेदना और दृष्टि तीनों ही बिन्दुओं पर यह एक बेहतर कहानी का नमूना अवश्य है। ऐसी ही कहानियों के लिए विलियम फाकनर ने ‘चेतन-रूपक’ जैसे पद का इस्तेमाल किया है।

अनिल यादव की कहानी ‘दंगा भेजियो मेरो मौला’ मोमिनपुरा नामक एक ऐसी मुसलमान बस्ती की कथा है जहाँ इस देश के नागरिकों के लिए उपलब्ध नागरिक जीवन की आवश्यक आवश्कताओं, जरूरी सुविधाओं से वंचित मुसलमान बुनकर रहते हैं। मुसलमान होने के नाते यह बस्ती प्रशासन-तंत्र और व्यवस्था द्वारा गहरी घृणा और नफरत की शिकार है। कहानी कलेजे को चाक कर देने वाले नंगे यथार्थ के एक दृश्य में प्रस्तुत होती है- ‘‘धूप इतनी तेज़ थी कि पानी से उठती भाप झुलस रही थी। कीचड़ के बीच कूड़े के ऊँचे ढेर पर छः एकदम नए छोटे-छोटे ताबूत रखे थे। सामने जहाँ तक मोमिनपुरा की हद थी, सीवर के पानी की बजबजाती झील हिलोरें मार रही थी, कई बिल्लियों और एक गधे की फूली लाशें उतरा रही थीं। हवा के साथ फिरते जलकुम्भी और कचरे के रेलों के आगे काफी दूरी पर एक नाव पानी में हिल रही थी जिसकी एक तरफ अनाड़ी लिखावट में लिखा था ‘दंगे में आएंगे’ और नाव की नोंक पर जरीदार कपड़े का एक मोटा सा झंडा फड़फड़ा रहा था।’’ ‘दंगे में आएंगे’ यह अधूरा वाक्य ही अपनी गूँज-प्रतिगूंज में पूरी कहानी के नग्न यथार्थ और उसमें पोर-पोर पसरी हुयी अमानवीयता को प्रतिध्वनित करता है।

हर साल बरसात आते ही मोमिनपुरा की दुनिया बजबजाते नरक में तब्दील हो जाती। नदी किनारे शहर के बाहर सबसे निचले हिस्से में बसी इस बस्ती में बारिश के साथ ही जैसे कहर टूट पड़ता था। शहर भर का कूड़ा-कचरा बहकर इस बस्ती में आ जाता, सीवर लाईने उफान उठतीं, मैनहोल पर लगे ढक्कन उछलने लगते और बीस लाख की आबादी वाले का मल-मूत्र बरसाती रेलों के साथ हहराता हुआ मोमिनपुरा में भर जाता - ‘‘चतुर्मास पर जब साधु-संतों के प्रवचन शुरू होते, मंदिरों के देवताओं के श्रृंगार उत्सव होते, कजरी के दंगल आयोजित होते और हरितालिका तीज पर मारवाड़ियों के भव्य जुलूस निकलते तभी यह बस्ती इस पवित्र शहर का कमोड बन जाती।’’ ऐसे हालात में पानी बिजली की सभी सुविधाएँ भी ठप्प कर दी जातीं । मोमिनपुरा को उसके हाल पर जीने मरने के लिए छोड़ दिया जाता । पर इस साल हालत बहुत ही खराब हो गयी। पानी डेढ़ महीने तक जमा रह गया। ‘‘इस साल कई नए अपशकुन पैदा हुए। मल्लाहों ने अपनी नावें देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि जिस नाव से भगवान राम को पार उतारा था उसे भला गू-मूत में कैसे चला सकते हैं। म्युनिसिपैलिटी ने इस साल पानी निकासी के लिए एक पम्प भी नहीं लगाया, अफसरों ने लिख कर दे दिया सारे पम्प खराब हैं, मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, सरकार पैसा भेजेगी तो पानी निकाला जाएगा। लोक निर्माण विभाग ने घोषित कर दिया कि हाईवे की पुलिया से अगर हर साल की तरह पानी निकासी की गयी तो जर्जर सड़क टूट सकती है और शहर का सम्पर्क बाकी जगहों से टूट सकता है। आपदा राहत विभाग ने ऐलान कर दिया कि यह बाढ़ नहीं मामूली जलभराव है, इसलिए कुछ करने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता। अस्पतालों ने मोमिनपुरा के मरीजों को भरती करने से मना कर दिया कि जगह नहीं है और संक्रमण से पूरे शहर में महामारी का खतरा है।’’ इस तरह कहानीकार ने हर तरफ से चाक-चौबंद बंदोबस्त कर दिया जिससे वह जो सिद्ध करना चाहता है वह बिना कुछ कहे सिद्ध हो जाय। और कहानी में ऐसा ही होता भी है। फिर भी कहानी को और विश्वसनीय बनाने के लिए अनिल यादव ने बस्ती के क्रिकेट खेलने वाले निठल्ले लड़कों को इकट्ठा कर उनके हीरोयिक जज्बे को चित्रित करना जरूरी समझा। परवेज, इफ्फन, यासीन, जुएब, लड्डन, मुराद और न जाने कौन-कौन से ग्यारह लड़कों की क्रिकेट टीम - ‘मोमिनपुरा क्रिकेट क्लब’ (एम.सी.सी.)। ये लड़के ऐसी हालत में आपस में चंदा इकट्ठा कर किसी तरह से एक पुरानी नाव खरीद कर ले आते हैं। ‘‘यह नाव दिन भर बस्ती के लोगों का असहनीय दुःख ढोती।’’ यह नाव ही अब बस्ती के लोगों के लिए एकमात्र सहारा है। ये लड़के मिलकर यह तय करते हैं कि इस बदतर स्थिति से मुक्ति दिलाने के लिए हम लोगों को उन नेताओं, समाजसेवियों, अफसरों, हाकिमों, स्वयंसेवी संगठनों, मीडिया से मदद की गुहार करनी चाहिये। यही वह बिंदु है जहाँ कहानी अपने उस पक्ष को रखती है जिस पर पाठक यह आरोप न लगा सके कि, बस्ती के लोगों ने अपनी स्थिति से उबरने का कोई प्रयास भी तो नहीं किया। एम.सी.सी.के लड़के रोज ही इस आशा में जाते हैं कि आज किसी न किसी को बस्ती में जरूर ले आ पाने में वे सफल होंगे। हर जगह टीम के ग्यारह मुंह एक साथ खुलते - ‘’ जनाब, खुदा के वास्ते बस एक बार चल कर देख लीजिये हम लोग किस हाल में जी रहे हैं। पानी ऐसे ही बढ़ता रहा तो सारे लोग मारे जायेंगे।’’ बस्ती के लोग रोज ही इनसे पूछते कि ‘बेटा वे कब आएंगे?’ बस्ती पूछती रहती, लोग टरकाते रहते। अंत में, एक दिन बस्ती अपने तजुर्बे से यह बात कह देती है कि, बेटा, वे लोग नहीं आयेंगे। ‘‘उस दुनिया के लोग यहाँ सिर्फ दो बखत आते हैं या दंगे में या इलेक्शन में।’’ बस्ती के इसी तजुर्बे-बयानी को लड़कों ने सच मानकर अपनी नाव पर मोटे अक्षरों में लिख दिया ‘वे दंगे में आएँगे।’ अब तो बस सबको दंगे का इंतज़ार रहने लगा। ‘‘अगले जुमे को एम.सी.सी. के सभी ग्यारह खिलाड़ियों ने फज़र की नमाज़ के वक्त नाव में सिजदा कर एक ही दुआ मांगी - दंगा भेजियो मेरो मौला, गू-मूत में लिथड़ कर मरने की जिल्लत से बेहतर है कि खून में डूब कर मरें।’’ इन लड़कों की दुआ कबूल कर ली जाती है। मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाईवे की पुलिया टूट जाती है (या क्या पता इन लड़कों द्वारा तोड़ दी जाती है - जोड़ मेरा)। सड़क तोड़कर उफनाता हुआ कचरे, गू-मूत से सना पानी का सैलाब पास के मोहल्लों और गाँवों में भरने लगता है। ‘‘प्रभात फेरी करने वालों की अगुवाई में शहर और गाँव से निकले जत्थे मोमिनपुरा पर चढ़ दौड़े। सीवर के बजबजाते पानी में हिन्दू और मुसलमान गुत्थमगुत्था हो गए।’’ इसी के साथ कहानी खत्म हो जाती है।

निश्चित ही इस कहानी के कथ्य और शिल्प दोनों में एक नयापन है। यह कहानी हिन्दू साम्प्रदायिक मानसिकता को एक नए कथ्य के द्वारा अभिव्यक्त करती है। पर, नयापन मात्र से ही कोई कहानी अच्छी भी हो यह जरूरी तो नहीं। ‘दंगा भेजियो मेरे मौला’ एक तरह से कीचड़ को कीचड़ से धोने वाली कहानी है। इस कहानी की खूब चर्चा हुयी है। अपनी कथायुक्ति, परिस्थितियों के नारकीय चित्रण और वातावरण के सघन तनाव से यह कहानी अपने कथ्य को हासिल करती है। अनिल यादव के पास यह रचनात्मक हुनर है कि, पूर्व निर्धारित कथ्य को केवल एक विश्वसनीय वातावरण तैयार कर कैसे कहानी में अर्जित किया जा सकता है। परन्तु, जिन परिस्थितियों और वातावरण के तनाव और अन्तरविरोध से यह कहानी बुनी गयी है वे परिस्थियाँ और वातावरण वास्तविक कम गढ़ंत अधिक हैं। मोमिनपुरा नामक जिस मुसलमान बस्ती को इस कहानी का लोकेल बनाया गया है, उस बस्ती की बद से बदतर स्थिति का जो चित्रण किया गया है अव्वल, तो ऐसी किसी वास्तविक बस्ती पर ही पाठक के मन में सवालिया निशान छोड़ती है। पर, कहानीकार की कल्पना में ऐसी किसी बस्ती का वजूद मान भी लिया जाय तो ऐसा सलूक इस देश में सिर्फ मुसलमान बस्तियों के साथ ही होता है, इसको स्वीकारने में पाठक को मुश्किल होती है। मक्सिम गोर्की ‘रचना शिल्प की बात’ करते हुए ‘विश्व रचना की व्याख्या’ (Exposition du systeme du monde) जैसे प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक फ्रांस के मशहूर गणितज्ञ पिएरे सीमोन दे लाप्लास को उद्धृत करते हैं - ‘‘कुछ परिघटनाओं का कारण ढूँढने की अपनी व्यग्रता में एक वैज्ञानिक को, जिसमें प्रबल कल्पना-शक्ति होती है, अक्सर परीक्षण द्वारा प्राप्त निष्कर्ष के पहले ही कारण का पता चल जाता है। स्वरचित व्याख्या के सही होने के पूर्वग्रह के प्रभाव में तब भी वह उसका त्याग नहीं करता जबकि तथ्य उसका खंडन करते हैं। इसके विपरीत वह तथ्यों में फेरबदल और संशोधन करता है ताकि वे उसके सिद्धांत और व्याख्या के अनुकूल हो जायं। वह स्वाभाविकता को तोड़ता-मरोड़ता है ताकि जबरदस्ती उसे अपनी कल्पना-शक्ति के अनुकूल बनाये। यह नहीं सोचता कि, समय केवल परीक्षण तथा परिकलन के परिणामों की ही पुष्टि करेगा।’’ इस उद्धरण के तुरंत बाद गोर्की कहता है कि, ‘‘साहित्यकार का काम भी वैज्ञानिक के समान होता है और उसे भी परीक्षण द्वारा प्रस्तुत निष्कर्ष के पहले ही कारण का पता चल जाता है’’

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रचनाकार: साम्प्रदायिकता के सवाल और समकालीन हिंदी कहानी / विनोद तिवारी / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2
साम्प्रदायिकता के सवाल और समकालीन हिंदी कहानी / विनोद तिवारी / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2
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