रविवार, 19 जून 2016

कैसे-कैसे उतरी रचना काग़ज़ पर / मृदुला गर्ग / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

सफरनामा:

मृदुला गर्ग

कैसे-कैसे उतरी रचना काग़ज़ पर

मन है आज आपसे रचना प्रक्रिया के उस उत्तरार्द्ध की बात करूँ, जब शिल्प चुनने के बाद, कथा की परिकल्पना को बाकायदा या बेकायदा कागज़ पर उतारा जाता है। जहाँ तक रचना प्रक्रिया के गतिशील पूर्वार्ध का सवाल है, वह तो ताउम्र चलता है, मुतवातिर, हर साँस के साथ। प्रतिरोध, परकाया प्रवेश और रसोक्ति (आइरनी); ये तीन तत्त्व मेरी सभी रचनाओं के अभिन्न अंग रहे हैं। इस तात्ति्वक मर्म को छोड़ दें तो हर रचना की कथा वस्तु, शिल्प और भाषा अलहदा हैं। काफ़ी हद तक, ज़ुबान किरदारों के कब्ज़े में रही है या उस वक्त के, जिस में किरदार जी रहे थे या कह लें जिसमें मैंने उन्हें जिलाया था। कुछ मेरे कब्ज़े में भी रही ज़रूर पर हर नये कथानक के साथ, मुझे लगा कि ज़बान को कुछ हद तक नये सिरे से रचना होगा। और रचा भी। रचना प्रक्रिया के इस पूर्वार्ध पर बहुत बार अनेक संदर्भों में बात कर चुकी हूँ।

पर हाल में एक कहानी लिखे जाने के दौरान मुझे एकदम अलहदा किस्म का अनुभव हुआ। उस के बाद, पीछे मुड़ कर, शुरू से ले कर अब तक के सृजन पर निगाह डाली तो देखा, मेरी रचना यात्रा में कथा के कागज़ पर उतारे जाने की तकनीक का भी खासा दिलचस्प ग्राफ़ बन रहा है। “लिखने के दौरान” के बजाय “लिखे जाने के दौरान” जानबूझकर कह रही हूँ। क्यों, बाद में बतलाऊँगी।

सत्तर के दशक में मैंने लेखन की शुरुआत की तो हाथ से लिख कर। लिखाई खासी खराब थी इसलिए सम्पादकों के इसरार पर, जल्दी ही एक हस्तचालित टाईपराइटर खरीदा और हाथ से लिखे को टाइप करके प्रकाशक को देना शुरू किया। टाइप किया तो कई-कई बार। रचना में सुधार करने के लिए नहीं, टाइप की ग़लतियाँ सुधारने के लिए। उन दिनों हर संशोधन का मतलब था, दोबारा टाइप करना। यह सिलसिला बरसों बरस चला। रचना में सुधार तो हाथ से लिखते हुए ही हो चुका होता था। न जाने कितनी काट-पीट करती, बार बार लिखती तब जा कर रचना परवान चढ़ती। फिर भी तमाम काट-पीट के बावजूद कहानी एक बैठक में पूरी करके ही दम लेती। काटती रफ़्तार से, पुनः लिखती भी रफ़्तार से। हाँ, कभी-कभार कैफ़ियत यह भी होती कि सही लफ़्ज़ या जुमले के इंतज़ार में लेटे-लेटे छत निहारते घण्टों बीत जाते। पर एक बार सूझ जाते तो उसी रेस के घोड़े की रफ़्तार से लिखने लगती। लिखना शुरू करने के बाद अवरोध कम ही आता था। जिसे अमूमन ड्राफ़्ट कहा जाता है, मैं अलग अलग वह नहीं बनाती थी। कह सकते हैं ड्राफ़्ट एक ही रहता। उसी में लिखने के दौरान काट पीट हुआ करती, कुछेक अल्फ़ाज़ या जुमले जोड़ घटा या बदल कर। वैसे मैं बहुत तेज़ रफ़्तार से लिखती हूँ। एक वजह यह भी है कि मेरी लिखाई पढ़ने में तकलीफ़ होने की। कभी-कभी तो मैं खुद नहीं पढ़ पाती! पर भाव और विचार संवेग इतना उत्कट रहता है कि रफ़्तार ढीली नहीं होने देता।

पूरी कहानी मन माफ़िक लिख लेने के बाद ही टाइप करना शुरू करती। चूंकि मैंने बाकायदा टंकन सीखा नहीं था,कहानियाँ लिख कर ही उसका अभ्यास किया था इसलिए टंकन में ग़लतियाँ काफ़ी होतीं। इसलिए दोबारा-तिबारा टाइप करना पड़ता। यूँ बार-बार अपना रचा पढ़ने में एक फ़ायदा था। कहानी में थोड़ा बहुत बदलाव करने का रास्ता खुला रहता। पर टाइप करने की मेरी गति, हाथ से लिखने की तरह सरपट कभी नहीं हुई, दुलकी चाल ही चली। रचनात्मक आवेग-संवेग निबट जो चुका होता था, ऊपर से ग़लतियाँ करने पर दोबारा टाइप करने की आशंका भी डराये रहती। तो धीरे-धीरे टाइप करती। यानी टाइपराइटर मेरे लिए सृजन का जीवंत माध्यम नहीं बना, तकनीक ही बना रहा।

टाइपराइटर के इस्तेमाल के शुरुआती दिनों में पहला उपन्यास उसके हिस्से की धूप लिखने के दौरान एक दिलचस्प घटना हुई। प्रकाशक थे अक्षर प्रकाशन के राजेन्द्र यादव। तभी खरीदे, पुरानी वज़ा के रेमिन्गटन टाइपराइटर में मुझे “ख” अक्षर नहीं मिला। उसकी जगह र और व इस्तेमाल करके उपन्यास का पहला भाग टाइप करके यादव जी को थमा दिया। वे बोले, “इस औरत की क्या समस्या है; बार बार रवड़ी क्यों हो जाती है?” मैंने बतलाया, ख नहीं मिला सो रव लिखा है। उन्होंने कहा गाजर का हलवा खिलाओ तो ढूँढ देंगे। “खिलाया, ढूँढा, मिला। आधा ख्य था जिसे डन्डा मार कर पूरा ख बनाना होता था। अजीब सी आकृति का अक्षर मेरी पकड़ में नहीं आया था। ख मिला तो पूरा उपन्यास मय ख दोबारा टाइप किया। सौन्दर्य बोध का तकाज़ा था कि पूरी पाण्डुलिपि एक जैसी हो।

कम्प्यूटर का चलन हुआ तो अस्सी के दशक में बेटे कम्प्यूटर घर ले आये। पर हिन्दी के सॉफ़्ट वेयर में, कम्प्यूटर की भाषा में इतने “बग्स” थे कि वह नहीं लगवाया। मैं बरसों तक कम्प्यूटर का इस्तेमाल, अंग्रेज़ी के लेख लिखने और हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के लिए करती रही। शोधपरक लेख लिखने और अनुवाद करने के लिए कम्प्यूटर सुविधाजनक था क्योंकि उनके कई-कई ड्राफ़्ट बनाने पड़ते थे, जिनके दरम्यान खोजबीन भी करनी होती थी। इसलिए संशोधन करने और बीच-बीच में कभी भी, कहीं भी सामग्री डालने की तकनीकी सुविधा महत्व रखती थी। पर हिंदी का रचनात्मक गद्य पहले की तरह हाथ से लिखती रही। उसमें छह उपन्यास, दस कहानी संग्रह,दो नाटक और रविवार में पाँच साल तक लिखा गया स्तम्भ शामिल था।

बीच बीच में, जब हस्तचालित टाइपराईटर कमर और गर्दन के दर्द पर कुछ ज्यादा भारी पड़ गया तो हाथ से लिख कर पेशेवर टाइपिस्ट से भी टाइप करवाया। पर उसमें ग़लतियाँ इतनी होतीं कि हाथ से काट-पीट कर सही करना सौन्दर्य बोध को गवारा न होता और दोबारा टाइप करवाना, बटुए को। राजेन्द्र यादव ने सलाह दी, प्रेम पत्र लिखो साले को, सिर पीट कर तुम्हारी खराब लिखाई पढ़ना सीख जाएगा। मैंने आज़माया नहीं। इसलिए ग़लतियाँ बदस्तूर होती रहीं।

अलबत्ता, उपन्यास कठगुलाब का टाइपिस्ट इतना साहित्य प्रेमी निकला कि खुद कई बार ग़लतियाँ सुधारने की पहल की। उसके प्रेम की क्या कहूँ। एक बार जब पाण्डुलिपि ले कर आ रहा था तो रास्ते में पड़ती गंगा नदी उफ़ान पर थी। तब पाण्डुलिपि को सिर पर बाँध कर उसने नदी पार की। यूँ वह ठीक ठाक प्रकाशक तक पहुँची।

फिर वक्त ने करवट ली। 2003 से मैंने इंडिया टुडे में पाक्षिक स्तम्भ लिखना शुरू किया, जो 2010 तक चला। स्तम्भ, मैं हाथ से लिख कर ही उन्हें भेजती थी। उनकी इनायत थी। कहा कि खामख्वाह टाईप करने के चक्कर में आप दो बार ज़हमत क्यों उठाएं, हम तो कम्पोज़ करते हुए टाइप करेंगे ही। दो बरस यूँ ही चला। फिर 2005 में, हाथ में कुछ तकलीफ़ हो गई, जिसकी वजह से कुछ महीनों के लिए कलम पकड़ना मुश्किल हो गया। पर स्तम्भ था कि हर पन्द्रह दिन बाद सिर पर सवार! लिखे बग़ैर चारा न था। झक मार कर हिंदी का सॉफ़्टवेयर खरीदा। अर्से तक उसे सिर्फ़ इंडिया टुडे के स्तम्भ लेखन के लिए इस्तेमाल किया। कथा रचना उन दिनों कम की और जब की तो मेथी डाल कर उबाले गर्म पानी में हाथ सेंक, कुछ हद तक दर्द कम किया तो काफ़ी हद तक, उसे ही प्रेरक बना कर लिख डाला।

फिर हुआ यह कि 2007 में, जब मन में उपन्यास “मिलजुल मन” खदबदा रहा था, एक रात बारह बजे यकबयक उस का शिल्प सूझा। इल्हाम हुआ कि जीवनी और उपन्यास का मिलन कायम रख कर उसे औपन्यासिक जामा पहनाने के लिए, दो वाचक रखे जाएं। एक, दिवंगत किरदार की बहन; दूसरी, एक अन्य लेखिका, जो उनकी दोस्त भी हो। बहन, ज़ाहिर है, तरह-तरह के झूठ बोलेगी, जितना बतलाएगी उतना छुपाएगी या बेचारी जानती ही आधा-पौना होगी। ग़लत को सही करने और पोशीदा राज़ को अफ़शा करने का ज़िम्मा लेखक का रहेगा। शिल्प क्या सूझा, याददाश्त के कैदखाने के बन्द कपाट यूँ खुले कि साँस लेना दूभर हो गया। कलम ढ़ूँढे न मिला तो जाकर कम्प्यूटर धर पकड़ा और खटाखट उसपर पहला अध्याय लिख मारा। फिर क्या था। बारह अध्याय यूँ ही अजब-गज़ब नशे और बेखयाली में लिखे गये। फिर शायद उस बेमुरव्वत ज़ेहनी मशक्कत के चलते बीमार पड़ गई और कम्प्यूटर की ग़ुलामी से कुछ दिनों को छुटकारा मिल गया। दोबारा लिखने बैठी तो हाल यह पाया कि बिला कम्प्यूटर, शिल्प पकड़ में ही न आये। यानी कम अज़ कम उस रचना के लिए, वह मेरी मजबूरी बन चुका था। नीत्शे ने कहा था न, जब उसने टाइपराइटर पर लिखा तो सोच की धारा बदल गई। मेरे साथ वही हुआ, बस यहाँ गुनहगार टाईपराइटर नहीं, कम्प्यूटर था। यूँ जानिये कि मुँह को लगी शराब बन लिया कि लाख सिर मारो, छुड़ाये न बने। वैसे भी मेरे लिए कम्प्यूटर एक मायावी शै था, मेरी किरदार की मानिन्द। किरदार कब तर्क को, और कम्प्यूटर लिखने की बेसब्री को दग़ा दे जाए, पता नहीं रहता था। दो बार तो वाकई सिरे से यूँ बिगड़ा कि पहले न जाने कितने हिस्से बदलवाये, फिर नये कम्प्यूटर का ही जुगाड़ करना पड़ा। कम्प्यूटर की दग़ाबाज़ी पर यकीन ने पूरा उपन्यास, ज़बरदस्त व्यग्रता, दुश्चिन्ता और हौलेदिल में लिखवाया। उसके चलते उपन्यास में त्रासदी को धता बतलाते उल्लास का रंग और गहरा हो गया। सोचा था उपन्यास पूरा हो जाएगा तो लौट आएंगे हाथ से लिखने पर। पर वह न हुआ। अब मैं ज्यादातर कहानियाँ सीधे कम्प्यूटर पर लिखती हूँ और हस्तचालित टाइपराइटर से कहीं ज्यादा रफ़्तार से। फिर भी मुझे हिन्दी में फ़र्राटे से टाइप करना अब तक नहीं आया; कम अज़ कम उस तेज़ रफ़्तार से नहीं, जिससे हाथ से लिखा करती थी। सफ़र में होती हूँ या हिन्दी का साफ़्टवेयर उपलब्ध नहीं होता तो कभी-कभार थोड़ा-बहुत हाथ से लिख लेती हूँ पर 2007 के बाद से हर कहानी कम्प्यूटर पर ही लिख कर शुरु और खत्म करती आई हूँ। तय नहीं कर पा रही कि यह इसलिए हुआ क्योंकि मुझे दिमाग में हलचल मचाते भावों और विचारों से पैदा हुए उद्वेलन के साथ जीने की आदत हो गई। मैं उनकी गति पर कुछ हद तक लगाम कसना सीख गई। या इसलिए कि रचना की व्यग्रता को बढ़ावा देती कम्प्यूटर के बिगड़ जाने की आशंका, सृजन की एक और संचारक बन गई।

हाल में लिखी कहानी “वसु का कुटुम” के साथ अलग ही मंज़र पेश आया। वह यूँ कि कोई एक बरस पहले मेरी आँख का ऑपरेशन हुआ रेटिना का, खासा जटिल।ऑपरेशन हुआ, बिगड़ गया। दुबारा हुआ,फिर बिगड़ गया। एक तरफ़ डाक्टर कहे, यह क्योंकर बिगड़ा और किस तरह सुधरेगा, मुझे कोई इल्म नहीं है, अव्वल तो शायद सुधरे ही नहीं। दूसरी तरफ़ कहे, बिस्तर पर पड़े रहो, हिलो-डुलो मत,गर्दन तक ऊपर न उठाओ। कुछ मत करो। बस पड़े रहो। चाहो तो रेडियो सुन लो या टेलीविज़न सुन लो; देखो नहीं, महज़ सुन लो। अधलेटे पूरा आराम करोगी और हर डेढ़ घण्टे में आधे घण्टे तक पाँच-पाँच मिनट पर दवा डालोगी तो शायद कुछ सुधार हो जाए या शायद न हो....यानी जो होगा या नहीं होगा, ज़िम्मेवार तुम होगी हम नहीं। वाह! क्या खूब आलम था! मैं ही मरीज़, मैं ही तीमारदार, मैं ही अपनी तकदीर की सिरजनहार! डाक्टर थे बस हाज़िर-नाज़िर; मेरे उस अजब बेहरकत सफ़र के। सुनने-बोलने पर पाबन्दी नहीं थी।

उस हाल एक दिन मुझे सूझा कि मेरे पास जो निहायत फटीचर-सा मोबाईल है, उस में भी वॉईस रिकॉर्डर है। मैं जो लिख नहीं सकती, उस पर कह सकती हूँ। तो किया रिकॉर्ड। इस सूरते हाल कहानी यूँ लिखी गई कि जैसे-जैसे जो-जो मन में घटे, असलीयत में नहीं, उसे वैसे-वैसे लिख डालो। मज़े की बात यह हुई कि कहानी जो बनी उसमें मैं कहीं नहीं हूँ, न मेरी आँख का ज़िक्र है। किरदार जो हैं मुझसे एकदम अलहदा, अनेक अन्य जन हैं। कहानी उनकी है, मेरी कतई नहीं। यानी कहानी में एक दिलफ़ेंक किस्म का परकाया प्रवेश है। या कहें कहानीपन है; क्योंकि कहानी का मर्म ही है अतिक्रमण। नाटकीय मोड़ हैं तो आपको खुश रखने के लिए त्रासदी को लतीफ़ आइरनी से रंग दिया गया है।

तभी कहा था मैंने शुरू में “लिखे जाने के दौरान!” दरअसल यह कहानी मैंने न लिखी है, न बोल कर लिखवाई है, महज़ सुनाई है। लिखवाने के लिए बोलने यानी डिक्टेट करने और सुनाने के बीच का फ़र्क काफ़ी अहम है। बोलते वक्त मेरा मकसद उसे लिखवाना नहीं था; मन के भीतर घट रहे को कहना या सुनाना भर था। पर किसे? सशरीर श्रोता तो वहाँ कोई था नहीं। एक भी नहीं। मैं निपट अकेली थी। श्रोता थी तो मैं खुद या मेरे मन के भीतर बसी कोई अमूर्त छाया। या कहें कोई था तो केवल दो भागों में विभक्त मैं। एक वक्ता, दूसरा श्रोता। पर पात्र मैं नहीं बनी। पात्र बिल्कुल नहीं बनी, तभी न कहानी बनी वरना संस्मरण या आत्म निवेदन हो कर रह जाती। चूंकि यह सही मायनों में वाचन था इसलिए अपने स्वभाव में कहानी पूरी तरह वाचिक है। पर अन्ततः लिखी तो गई न? मैंने खुद टाइप करके या हाथ से लिख कर कागज़ पर नहीं उतारा पर उसे सुन कर किसी और ने तो टाइप किया। यानी लिखी मेरे ही आग्रह पर गई न? ईमानदारी का तकाज़ा है कि स्वीकार करूँ कि अन्तर्चेतना में लिखवाने का खयाल रहा होगा।

फिर भी चूंकि कहानी बोल कर कही गई है, लिख कर नहीं, इसलिए ज़ाहिर है, इसका अंदाज़े बयां मेरी बाकी कहानियों से फ़र्क है। टाइप हो कर आई और मैं पढ़ने लिखने लायक हालत में आई तो उसमें काफ़ी ग़लतियाँ दीखीं। वे तो होनी ही थीं। आसान काम नहीं है लरज़ती आवाज़ में रफ़्तार से बोले हुए को बाद में सुन कर लिख पाना। मैं लता कपरवान की ममनूं हूँ जिन्होंने यह काम किया। थोड़ी बहुत नोक पलक की ज़रूरत भी महसूस हुई। कुछेक खाली जगह भी मिलीं जिन्हें भरना ज़रूरी लगा। पर न मैं उसे सीधे सीधे कम्प्यूटर पर टाइप कर पाई, न हाथ से लिख पाई। जब-जब कुछ जोड़ा या बदला तो पाया कि मैं पहले उसे बोल कर रिकार्ड कर रही हूँ फिर सुन कर कागज़ पर उतार रही हूँ। मतलब यह कि सीधे लिखने और बोल कर लिखने के बीच ज़ुबान की रवानी और संवाद अदायगी में कुछ फ़र्क था। इसीलिए कहानी के अंदाज़ेबयां में बल न आने देने के लिए, शैली-शिल्प, रवानगी को बरकरार रखने के लिए; जो पहले कहने से रह गया था, उसे कह कर ही जोड़ना ज़रूरी था।

यूँ हाथ से लिखने से शुरू हो कर, टाइपराइटर की तकनीकी सहूलियत और कम्प्यूटर की मायावी दुनिया से होती हुई मैं पुरखों से विरासत में मिले वाचन पर आई। पर यह दावा कतई नहीं कर सकती कि आगे भी मैं कहानी का वाचन करूँगी, फिर उसे लिखूँगी। यह भी नहीं कि जैनेन्द्र जी और मनोहर श्याम जोशी की तरह बोल कर लिखवाने की शैली अख्तियार करने का मेरा कोई तय इरादा है। अब तक जो हुआ इत्तिफ़ाक से हुआ या मजबूरी में, हालात माकूल या ना माकूल होने से। मैंने बस इतना किया कि किसी एक तरीके से बँध कर रहने की ज़िद नहीं पकड़ी, न नई राह पकड़ने से परहेज़ किया।

आगे? सबसे ज्यादा सम्भावना तो इसी की है कि मैं कम्प्यूटर पर लिखती रहूँगी जैसे यह बयान लिख रही हूँ। पर इतना ज़रूर कहूँगी कि अगर कोई ऐसी इजाद हो जाए जिसके सहारे मैं लेटे-बैठे बोलती रहूँ और मेरा कहा बिना ग़लती टाइप हो जाए तो मेरे लिए सबसे मन माफ़िक होगा। पर टाइप होना चाहिए बग़ैर गलतियों के। वह होने से रहा कम अज़ कम मेरी ज़िन्दगी में। पर कौन जाने...आगे-आगे होता है क्या! मैं तो नहीं ही जानती...

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