कैसे-कैसे उतरी रचना काग़ज़ पर / मृदुला गर्ग / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

SHARE:

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2 सफरनामा: मृदुला गर्ग कैसे-कैसे उतरी रचना काग़ज़ पर मन है आज आपसे रचना प्रक्रिया के उस उत्तरार्...

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

सफरनामा:

मृदुला गर्ग

कैसे-कैसे उतरी रचना काग़ज़ पर

मन है आज आपसे रचना प्रक्रिया के उस उत्तरार्द्ध की बात करूँ, जब शिल्प चुनने के बाद, कथा की परिकल्पना को बाकायदा या बेकायदा कागज़ पर उतारा जाता है। जहाँ तक रचना प्रक्रिया के गतिशील पूर्वार्ध का सवाल है, वह तो ताउम्र चलता है, मुतवातिर, हर साँस के साथ। प्रतिरोध, परकाया प्रवेश और रसोक्ति (आइरनी); ये तीन तत्त्व मेरी सभी रचनाओं के अभिन्न अंग रहे हैं। इस तात्ति्वक मर्म को छोड़ दें तो हर रचना की कथा वस्तु, शिल्प और भाषा अलहदा हैं। काफ़ी हद तक, ज़ुबान किरदारों के कब्ज़े में रही है या उस वक्त के, जिस में किरदार जी रहे थे या कह लें जिसमें मैंने उन्हें जिलाया था। कुछ मेरे कब्ज़े में भी रही ज़रूर पर हर नये कथानक के साथ, मुझे लगा कि ज़बान को कुछ हद तक नये सिरे से रचना होगा। और रचा भी। रचना प्रक्रिया के इस पूर्वार्ध पर बहुत बार अनेक संदर्भों में बात कर चुकी हूँ।

पर हाल में एक कहानी लिखे जाने के दौरान मुझे एकदम अलहदा किस्म का अनुभव हुआ। उस के बाद, पीछे मुड़ कर, शुरू से ले कर अब तक के सृजन पर निगाह डाली तो देखा, मेरी रचना यात्रा में कथा के कागज़ पर उतारे जाने की तकनीक का भी खासा दिलचस्प ग्राफ़ बन रहा है। “लिखने के दौरान” के बजाय “लिखे जाने के दौरान” जानबूझकर कह रही हूँ। क्यों, बाद में बतलाऊँगी।

सत्तर के दशक में मैंने लेखन की शुरुआत की तो हाथ से लिख कर। लिखाई खासी खराब थी इसलिए सम्पादकों के इसरार पर, जल्दी ही एक हस्तचालित टाईपराइटर खरीदा और हाथ से लिखे को टाइप करके प्रकाशक को देना शुरू किया। टाइप किया तो कई-कई बार। रचना में सुधार करने के लिए नहीं, टाइप की ग़लतियाँ सुधारने के लिए। उन दिनों हर संशोधन का मतलब था, दोबारा टाइप करना। यह सिलसिला बरसों बरस चला। रचना में सुधार तो हाथ से लिखते हुए ही हो चुका होता था। न जाने कितनी काट-पीट करती, बार बार लिखती तब जा कर रचना परवान चढ़ती। फिर भी तमाम काट-पीट के बावजूद कहानी एक बैठक में पूरी करके ही दम लेती। काटती रफ़्तार से, पुनः लिखती भी रफ़्तार से। हाँ, कभी-कभार कैफ़ियत यह भी होती कि सही लफ़्ज़ या जुमले के इंतज़ार में लेटे-लेटे छत निहारते घण्टों बीत जाते। पर एक बार सूझ जाते तो उसी रेस के घोड़े की रफ़्तार से लिखने लगती। लिखना शुरू करने के बाद अवरोध कम ही आता था। जिसे अमूमन ड्राफ़्ट कहा जाता है, मैं अलग अलग वह नहीं बनाती थी। कह सकते हैं ड्राफ़्ट एक ही रहता। उसी में लिखने के दौरान काट पीट हुआ करती, कुछेक अल्फ़ाज़ या जुमले जोड़ घटा या बदल कर। वैसे मैं बहुत तेज़ रफ़्तार से लिखती हूँ। एक वजह यह भी है कि मेरी लिखाई पढ़ने में तकलीफ़ होने की। कभी-कभी तो मैं खुद नहीं पढ़ पाती! पर भाव और विचार संवेग इतना उत्कट रहता है कि रफ़्तार ढीली नहीं होने देता।

पूरी कहानी मन माफ़िक लिख लेने के बाद ही टाइप करना शुरू करती। चूंकि मैंने बाकायदा टंकन सीखा नहीं था,कहानियाँ लिख कर ही उसका अभ्यास किया था इसलिए टंकन में ग़लतियाँ काफ़ी होतीं। इसलिए दोबारा-तिबारा टाइप करना पड़ता। यूँ बार-बार अपना रचा पढ़ने में एक फ़ायदा था। कहानी में थोड़ा बहुत बदलाव करने का रास्ता खुला रहता। पर टाइप करने की मेरी गति, हाथ से लिखने की तरह सरपट कभी नहीं हुई, दुलकी चाल ही चली। रचनात्मक आवेग-संवेग निबट जो चुका होता था, ऊपर से ग़लतियाँ करने पर दोबारा टाइप करने की आशंका भी डराये रहती। तो धीरे-धीरे टाइप करती। यानी टाइपराइटर मेरे लिए सृजन का जीवंत माध्यम नहीं बना, तकनीक ही बना रहा।

टाइपराइटर के इस्तेमाल के शुरुआती दिनों में पहला उपन्यास उसके हिस्से की धूप लिखने के दौरान एक दिलचस्प घटना हुई। प्रकाशक थे अक्षर प्रकाशन के राजेन्द्र यादव। तभी खरीदे, पुरानी वज़ा के रेमिन्गटन टाइपराइटर में मुझे “ख” अक्षर नहीं मिला। उसकी जगह र और व इस्तेमाल करके उपन्यास का पहला भाग टाइप करके यादव जी को थमा दिया। वे बोले, “इस औरत की क्या समस्या है; बार बार रवड़ी क्यों हो जाती है?” मैंने बतलाया, ख नहीं मिला सो रव लिखा है। उन्होंने कहा गाजर का हलवा खिलाओ तो ढूँढ देंगे। “खिलाया, ढूँढा, मिला। आधा ख्य था जिसे डन्डा मार कर पूरा ख बनाना होता था। अजीब सी आकृति का अक्षर मेरी पकड़ में नहीं आया था। ख मिला तो पूरा उपन्यास मय ख दोबारा टाइप किया। सौन्दर्य बोध का तकाज़ा था कि पूरी पाण्डुलिपि एक जैसी हो।

कम्प्यूटर का चलन हुआ तो अस्सी के दशक में बेटे कम्प्यूटर घर ले आये। पर हिन्दी के सॉफ़्ट वेयर में, कम्प्यूटर की भाषा में इतने “बग्स” थे कि वह नहीं लगवाया। मैं बरसों तक कम्प्यूटर का इस्तेमाल, अंग्रेज़ी के लेख लिखने और हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के लिए करती रही। शोधपरक लेख लिखने और अनुवाद करने के लिए कम्प्यूटर सुविधाजनक था क्योंकि उनके कई-कई ड्राफ़्ट बनाने पड़ते थे, जिनके दरम्यान खोजबीन भी करनी होती थी। इसलिए संशोधन करने और बीच-बीच में कभी भी, कहीं भी सामग्री डालने की तकनीकी सुविधा महत्व रखती थी। पर हिंदी का रचनात्मक गद्य पहले की तरह हाथ से लिखती रही। उसमें छह उपन्यास, दस कहानी संग्रह,दो नाटक और रविवार में पाँच साल तक लिखा गया स्तम्भ शामिल था।

बीच बीच में, जब हस्तचालित टाइपराईटर कमर और गर्दन के दर्द पर कुछ ज्यादा भारी पड़ गया तो हाथ से लिख कर पेशेवर टाइपिस्ट से भी टाइप करवाया। पर उसमें ग़लतियाँ इतनी होतीं कि हाथ से काट-पीट कर सही करना सौन्दर्य बोध को गवारा न होता और दोबारा टाइप करवाना, बटुए को। राजेन्द्र यादव ने सलाह दी, प्रेम पत्र लिखो साले को, सिर पीट कर तुम्हारी खराब लिखाई पढ़ना सीख जाएगा। मैंने आज़माया नहीं। इसलिए ग़लतियाँ बदस्तूर होती रहीं।

अलबत्ता, उपन्यास कठगुलाब का टाइपिस्ट इतना साहित्य प्रेमी निकला कि खुद कई बार ग़लतियाँ सुधारने की पहल की। उसके प्रेम की क्या कहूँ। एक बार जब पाण्डुलिपि ले कर आ रहा था तो रास्ते में पड़ती गंगा नदी उफ़ान पर थी। तब पाण्डुलिपि को सिर पर बाँध कर उसने नदी पार की। यूँ वह ठीक ठाक प्रकाशक तक पहुँची।

फिर वक्त ने करवट ली। 2003 से मैंने इंडिया टुडे में पाक्षिक स्तम्भ लिखना शुरू किया, जो 2010 तक चला। स्तम्भ, मैं हाथ से लिख कर ही उन्हें भेजती थी। उनकी इनायत थी। कहा कि खामख्वाह टाईप करने के चक्कर में आप दो बार ज़हमत क्यों उठाएं, हम तो कम्पोज़ करते हुए टाइप करेंगे ही। दो बरस यूँ ही चला। फिर 2005 में, हाथ में कुछ तकलीफ़ हो गई, जिसकी वजह से कुछ महीनों के लिए कलम पकड़ना मुश्किल हो गया। पर स्तम्भ था कि हर पन्द्रह दिन बाद सिर पर सवार! लिखे बग़ैर चारा न था। झक मार कर हिंदी का सॉफ़्टवेयर खरीदा। अर्से तक उसे सिर्फ़ इंडिया टुडे के स्तम्भ लेखन के लिए इस्तेमाल किया। कथा रचना उन दिनों कम की और जब की तो मेथी डाल कर उबाले गर्म पानी में हाथ सेंक, कुछ हद तक दर्द कम किया तो काफ़ी हद तक, उसे ही प्रेरक बना कर लिख डाला।

फिर हुआ यह कि 2007 में, जब मन में उपन्यास “मिलजुल मन” खदबदा रहा था, एक रात बारह बजे यकबयक उस का शिल्प सूझा। इल्हाम हुआ कि जीवनी और उपन्यास का मिलन कायम रख कर उसे औपन्यासिक जामा पहनाने के लिए, दो वाचक रखे जाएं। एक, दिवंगत किरदार की बहन; दूसरी, एक अन्य लेखिका, जो उनकी दोस्त भी हो। बहन, ज़ाहिर है, तरह-तरह के झूठ बोलेगी, जितना बतलाएगी उतना छुपाएगी या बेचारी जानती ही आधा-पौना होगी। ग़लत को सही करने और पोशीदा राज़ को अफ़शा करने का ज़िम्मा लेखक का रहेगा। शिल्प क्या सूझा, याददाश्त के कैदखाने के बन्द कपाट यूँ खुले कि साँस लेना दूभर हो गया। कलम ढ़ूँढे न मिला तो जाकर कम्प्यूटर धर पकड़ा और खटाखट उसपर पहला अध्याय लिख मारा। फिर क्या था। बारह अध्याय यूँ ही अजब-गज़ब नशे और बेखयाली में लिखे गये। फिर शायद उस बेमुरव्वत ज़ेहनी मशक्कत के चलते बीमार पड़ गई और कम्प्यूटर की ग़ुलामी से कुछ दिनों को छुटकारा मिल गया। दोबारा लिखने बैठी तो हाल यह पाया कि बिला कम्प्यूटर, शिल्प पकड़ में ही न आये। यानी कम अज़ कम उस रचना के लिए, वह मेरी मजबूरी बन चुका था। नीत्शे ने कहा था न, जब उसने टाइपराइटर पर लिखा तो सोच की धारा बदल गई। मेरे साथ वही हुआ, बस यहाँ गुनहगार टाईपराइटर नहीं, कम्प्यूटर था। यूँ जानिये कि मुँह को लगी शराब बन लिया कि लाख सिर मारो, छुड़ाये न बने। वैसे भी मेरे लिए कम्प्यूटर एक मायावी शै था, मेरी किरदार की मानिन्द। किरदार कब तर्क को, और कम्प्यूटर लिखने की बेसब्री को दग़ा दे जाए, पता नहीं रहता था। दो बार तो वाकई सिरे से यूँ बिगड़ा कि पहले न जाने कितने हिस्से बदलवाये, फिर नये कम्प्यूटर का ही जुगाड़ करना पड़ा। कम्प्यूटर की दग़ाबाज़ी पर यकीन ने पूरा उपन्यास, ज़बरदस्त व्यग्रता, दुश्चिन्ता और हौलेदिल में लिखवाया। उसके चलते उपन्यास में त्रासदी को धता बतलाते उल्लास का रंग और गहरा हो गया। सोचा था उपन्यास पूरा हो जाएगा तो लौट आएंगे हाथ से लिखने पर। पर वह न हुआ। अब मैं ज्यादातर कहानियाँ सीधे कम्प्यूटर पर लिखती हूँ और हस्तचालित टाइपराइटर से कहीं ज्यादा रफ़्तार से। फिर भी मुझे हिन्दी में फ़र्राटे से टाइप करना अब तक नहीं आया; कम अज़ कम उस तेज़ रफ़्तार से नहीं, जिससे हाथ से लिखा करती थी। सफ़र में होती हूँ या हिन्दी का साफ़्टवेयर उपलब्ध नहीं होता तो कभी-कभार थोड़ा-बहुत हाथ से लिख लेती हूँ पर 2007 के बाद से हर कहानी कम्प्यूटर पर ही लिख कर शुरु और खत्म करती आई हूँ। तय नहीं कर पा रही कि यह इसलिए हुआ क्योंकि मुझे दिमाग में हलचल मचाते भावों और विचारों से पैदा हुए उद्वेलन के साथ जीने की आदत हो गई। मैं उनकी गति पर कुछ हद तक लगाम कसना सीख गई। या इसलिए कि रचना की व्यग्रता को बढ़ावा देती कम्प्यूटर के बिगड़ जाने की आशंका, सृजन की एक और संचारक बन गई।

हाल में लिखी कहानी “वसु का कुटुम” के साथ अलग ही मंज़र पेश आया। वह यूँ कि कोई एक बरस पहले मेरी आँख का ऑपरेशन हुआ रेटिना का, खासा जटिल।ऑपरेशन हुआ, बिगड़ गया। दुबारा हुआ,फिर बिगड़ गया। एक तरफ़ डाक्टर कहे, यह क्योंकर बिगड़ा और किस तरह सुधरेगा, मुझे कोई इल्म नहीं है, अव्वल तो शायद सुधरे ही नहीं। दूसरी तरफ़ कहे, बिस्तर पर पड़े रहो, हिलो-डुलो मत,गर्दन तक ऊपर न उठाओ। कुछ मत करो। बस पड़े रहो। चाहो तो रेडियो सुन लो या टेलीविज़न सुन लो; देखो नहीं, महज़ सुन लो। अधलेटे पूरा आराम करोगी और हर डेढ़ घण्टे में आधे घण्टे तक पाँच-पाँच मिनट पर दवा डालोगी तो शायद कुछ सुधार हो जाए या शायद न हो....यानी जो होगा या नहीं होगा, ज़िम्मेवार तुम होगी हम नहीं। वाह! क्या खूब आलम था! मैं ही मरीज़, मैं ही तीमारदार, मैं ही अपनी तकदीर की सिरजनहार! डाक्टर थे बस हाज़िर-नाज़िर; मेरे उस अजब बेहरकत सफ़र के। सुनने-बोलने पर पाबन्दी नहीं थी।

उस हाल एक दिन मुझे सूझा कि मेरे पास जो निहायत फटीचर-सा मोबाईल है, उस में भी वॉईस रिकॉर्डर है। मैं जो लिख नहीं सकती, उस पर कह सकती हूँ। तो किया रिकॉर्ड। इस सूरते हाल कहानी यूँ लिखी गई कि जैसे-जैसे जो-जो मन में घटे, असलीयत में नहीं, उसे वैसे-वैसे लिख डालो। मज़े की बात यह हुई कि कहानी जो बनी उसमें मैं कहीं नहीं हूँ, न मेरी आँख का ज़िक्र है। किरदार जो हैं मुझसे एकदम अलहदा, अनेक अन्य जन हैं। कहानी उनकी है, मेरी कतई नहीं। यानी कहानी में एक दिलफ़ेंक किस्म का परकाया प्रवेश है। या कहें कहानीपन है; क्योंकि कहानी का मर्म ही है अतिक्रमण। नाटकीय मोड़ हैं तो आपको खुश रखने के लिए त्रासदी को लतीफ़ आइरनी से रंग दिया गया है।

तभी कहा था मैंने शुरू में “लिखे जाने के दौरान!” दरअसल यह कहानी मैंने न लिखी है, न बोल कर लिखवाई है, महज़ सुनाई है। लिखवाने के लिए बोलने यानी डिक्टेट करने और सुनाने के बीच का फ़र्क काफ़ी अहम है। बोलते वक्त मेरा मकसद उसे लिखवाना नहीं था; मन के भीतर घट रहे को कहना या सुनाना भर था। पर किसे? सशरीर श्रोता तो वहाँ कोई था नहीं। एक भी नहीं। मैं निपट अकेली थी। श्रोता थी तो मैं खुद या मेरे मन के भीतर बसी कोई अमूर्त छाया। या कहें कोई था तो केवल दो भागों में विभक्त मैं। एक वक्ता, दूसरा श्रोता। पर पात्र मैं नहीं बनी। पात्र बिल्कुल नहीं बनी, तभी न कहानी बनी वरना संस्मरण या आत्म निवेदन हो कर रह जाती। चूंकि यह सही मायनों में वाचन था इसलिए अपने स्वभाव में कहानी पूरी तरह वाचिक है। पर अन्ततः लिखी तो गई न? मैंने खुद टाइप करके या हाथ से लिख कर कागज़ पर नहीं उतारा पर उसे सुन कर किसी और ने तो टाइप किया। यानी लिखी मेरे ही आग्रह पर गई न? ईमानदारी का तकाज़ा है कि स्वीकार करूँ कि अन्तर्चेतना में लिखवाने का खयाल रहा होगा।

फिर भी चूंकि कहानी बोल कर कही गई है, लिख कर नहीं, इसलिए ज़ाहिर है, इसका अंदाज़े बयां मेरी बाकी कहानियों से फ़र्क है। टाइप हो कर आई और मैं पढ़ने लिखने लायक हालत में आई तो उसमें काफ़ी ग़लतियाँ दीखीं। वे तो होनी ही थीं। आसान काम नहीं है लरज़ती आवाज़ में रफ़्तार से बोले हुए को बाद में सुन कर लिख पाना। मैं लता कपरवान की ममनूं हूँ जिन्होंने यह काम किया। थोड़ी बहुत नोक पलक की ज़रूरत भी महसूस हुई। कुछेक खाली जगह भी मिलीं जिन्हें भरना ज़रूरी लगा। पर न मैं उसे सीधे सीधे कम्प्यूटर पर टाइप कर पाई, न हाथ से लिख पाई। जब-जब कुछ जोड़ा या बदला तो पाया कि मैं पहले उसे बोल कर रिकार्ड कर रही हूँ फिर सुन कर कागज़ पर उतार रही हूँ। मतलब यह कि सीधे लिखने और बोल कर लिखने के बीच ज़ुबान की रवानी और संवाद अदायगी में कुछ फ़र्क था। इसीलिए कहानी के अंदाज़ेबयां में बल न आने देने के लिए, शैली-शिल्प, रवानगी को बरकरार रखने के लिए; जो पहले कहने से रह गया था, उसे कह कर ही जोड़ना ज़रूरी था।

यूँ हाथ से लिखने से शुरू हो कर, टाइपराइटर की तकनीकी सहूलियत और कम्प्यूटर की मायावी दुनिया से होती हुई मैं पुरखों से विरासत में मिले वाचन पर आई। पर यह दावा कतई नहीं कर सकती कि आगे भी मैं कहानी का वाचन करूँगी, फिर उसे लिखूँगी। यह भी नहीं कि जैनेन्द्र जी और मनोहर श्याम जोशी की तरह बोल कर लिखवाने की शैली अख्तियार करने का मेरा कोई तय इरादा है। अब तक जो हुआ इत्तिफ़ाक से हुआ या मजबूरी में, हालात माकूल या ना माकूल होने से। मैंने बस इतना किया कि किसी एक तरीके से बँध कर रहने की ज़िद नहीं पकड़ी, न नई राह पकड़ने से परहेज़ किया।

आगे? सबसे ज्यादा सम्भावना तो इसी की है कि मैं कम्प्यूटर पर लिखती रहूँगी जैसे यह बयान लिख रही हूँ। पर इतना ज़रूर कहूँगी कि अगर कोई ऐसी इजाद हो जाए जिसके सहारे मैं लेटे-बैठे बोलती रहूँ और मेरा कहा बिना ग़लती टाइप हो जाए तो मेरे लिए सबसे मन माफ़िक होगा। पर टाइप होना चाहिए बग़ैर गलतियों के। वह होने से रहा कम अज़ कम मेरी ज़िन्दगी में। पर कौन जाने...आगे-आगे होता है क्या! मैं तो नहीं ही जानती...

--

संपर्क:

ई 421(ग्राऊंड फ़्लोर) जी के -2

नई दिल्ली 110048

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कैसे-कैसे उतरी रचना काग़ज़ पर / मृदुला गर्ग / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2
कैसे-कैसे उतरी रचना काग़ज़ पर / मृदुला गर्ग / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2
https://lh3.googleusercontent.com/-hlFiBKeTbpY/V2Tzy8vbc8I/AAAAAAAAuao/Q0JfdUJ1bAo/image_thumb%25255B6%25255D.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-hlFiBKeTbpY/V2Tzy8vbc8I/AAAAAAAAuao/Q0JfdUJ1bAo/s72-c/image_thumb%25255B6%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2016/06/2016-2_15.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2016/06/2016-2_15.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content