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व्योम में वास है विचारों का : एक शाम का वृत्तान्त बेतरतीब / अर्चना वर्मा / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

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रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2 अर्चना वर्मा व्योम में वास है विचारों का : एक शाम का वृत्तान्त बेतरतीब 28 अगस्त, 1915 हत्तेरे...

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

अर्चना वर्मा

व्योम में वास है विचारों का : एक शाम का वृत्तान्त बेतरतीब

28 अगस्त, 1915

हत्तेरे की। फिर वही हरकत। हाथों ने फिर अपने आप 2015 की जगह पर 1915 लिख दिया है। पिछले पन्द्रह साल से यही कर रहे हैं। बार बार टोके, सुधारे जाने के बावजूद! जैसे मैं अचेतन में अभी उसी शताब्दी में बसती हूँ, उन्नीसवीं में। यह भी याद नहीं आता कि जिस शताब्दी में बसती हूँ उसका सन पन्द्रह मेरे पैदा होने के पहले ही बीत चुका था। लेकिन ग़लती करने के लिये याद थोड़े ही रखना होता है। इतनी बार हो चुका; फिर भी बार बार दोहराया जाता है। उसके बाद या तो खुद ही नज़र जाती है या फिर कोई टोक कर सुधारता है।

तो करेक्शन प्लीज़, 28अगस्त, 2015। राजेन्द्र-यादव-कथा-सम्मान-समारोह। शाम का कार्यक्रम तो तय था। बाकी सुबह से लेकर शाम तक के लिये सबकुछ अनिश्चित।

कम्प्यूटर खोलते ही कौंध कर लुप्त हो जाने वाले पहले काले पन्ने पर सफ़ेद अक्षरों में लिखी एक पंक्ति कौंधी और लुप्त हो जाने के बावजूद हमेशा की तरह अटकी रह गयी ज़रा देर - मेमोरी रन्स ऐट सिन्गल चैनल। इकलौती धारा में चलती है स्मृति।

क्या सचमुच?

मुझे कोई पोस्ट नहीं लिखनी थी आज। लेकिन फ़ेस-बुक पर गयी। राजेन्द्र यादव के जाने के बाद उनके इस दूसरे जन्मदिन पर मुझे आस-पास सिर्फ़ यह महसूस करना था कि अनुपस्थिति के अहसास को धीरे-धीरे कैसे अपने भीतर सोखकर ज़िन्दग़ी एक सहज उपस्थिति में बदल लेती है, इतनी सहज कि अपनी तरफ़ अलग से ध्यान भी नहीं खींचती! वह जो गया था, वह अस्ल में कहीं गया नहीं था, बस उसकी उपस्थिति दिखाई देनी बन्द हो गयी थी, वैसे ही उसकी अनुपस्थिति भी दिखाई देनी बन्द हो जायेगी और अदृश्य ही वह उपस्थित हो जायेगा फिर से।

नहीं मुझे कोई पोस्ट नहीं लिखनी थी आज।

फ़ेसबुक भरापूरा था इबारतों से। कहीं स्मरण-नमन, कहीं निकटता की अभिव्यक्ति, कहीं उन पर अपने अधिकार का दावा जताने के लिये उनके परिवार को किसी का धिक्कार भी, कहीं उनका न रहना किसी के लिये सौभाग्य की निशानी” गया था, चला ही गया था अन्तिम रूप से; उससे प्यार किया जा सकता था, या घृणा, लेकिन उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था किसी हाल में।

खिसकाती रही स्क्रीन को ऊपर से नीचे, देखती रही एक के बाद एक इबारतें, कभी कभी सोचती रही कहीं कुछ दर्ज करूँ, लेकिन टाल जाती रही। अगर कल तक भी ऐसी ही ज़रूरत महसूस होती रही तो कल ही दर्ज करूँगी।

सब सच ही रहे होंगे अपनी अपनी भावनाओं में; उत्कट भी रही ही होंगी भावनाएँ; आज के दिन भी फ़ेसबुक पर ऐसा कुछ दर्ज कर देने के लिये, “जिस परिवार की ओर अपने लिये एक छोटी सी क्षमा -दृष्टि के लिये याचक की तरह देखते रहे वही परिवार आप की मृत्यु के बाद आपकी तस्वीर लगाकर गर्व के साथ जन्मदिन मना रहा है।ज्ज्क्या व्यक्त कर रही होगी यह टिप्पणी?

मन्नू दी याद आईं, टिंकू भी। और वही, याद में, अटकी रहीं देर तक। अटके रहे इस टिप्पणी के शब्द भी। कैसा महसूस हुआ होगा उन्हें? राजेन्द्र यादव की तकलीफ़ से हमदर्दी इज़ीक्वल्टू परिवार के लिये ऐसी क्रूर, निर्दय हिंसा! क्यों? फ़ेसबुक पर क्यों? किसे जताने के लिये? संसार को? परिवार को? अपने आपको? राजेन्द्र यादव के लिये वफ़ादारी का सबूत? परिवार के मुकाबले खुद को अपने अधिकार की सनद? आखिर क्या¸?

पिछले पचास सालों का इस दम्पत्ति का साथ और संगत याद में घूमता रहा। दोनों लेखक, दोनों दोस्त, दोनों एक दूसरे की कमजोरियों और ताकतों के साथ एक दूसरे को भीतर तक जानते हुए, समझते हुए, लेकिन इतनी सारी समानताओं के बावजूद दोनों बिल्कुल अलग-अलग दो संसारों के वासी, एक दूसरे की ज़रूरतों को जानने के बावजूद अपने आपे को तोड़कर एक दूसरे के साँचे में ढलने में असमर्थ, या कहूँ न ढलने की ज़िद पर आमादा। टूटने और बिखरने की ऐसी स्थितियों में फिर से बिखरे हुए टुकड़े चुने जाते हैं। राजेन्द्र यादव की तकलीफ़ को बहुत निकट से जानने का दावा करनेवाले के लिये क्या इतना असम्भव है यह समझना कि उस स्थिति में शामिल हर व्यक्ति किसी यातना से गुजरा होगा? सबसे ज्यादा तो वही जो सबसे ज्यादा निरीह और निरपराध रहा होगा! क्विकफ़िक्स कैन फ़िक्स एवरीथिंग एक्सेप्ट ब्रोकेन हार्ट्स, कहा जाता था विज्ञापनों की इबारत में। तब फ़ेवीकोल नहीं आया था। काँच की, चीनी मिट्टी की और ऐसी ही पता नहीं किस-किस सामान की नाजुक चीज़ों के नाजुक टुकड़े दिखाये गये होते थे उनकी तस्वीरों में। टूटे हुए, फिर जोड़े हुए। दिल कोई काँच या चीनी मिट्टी का थोड़े ही है जो क्विकफ़िक्स उसको जोड़ेगा। चीनी मिट्टी और काँच जैसे बेहूदा बिम्ब क्यों चुने गये दिल के लिये?

लेकिन इतनी दूर तक, इतनी देर तक सोचती क्यों रही मैं? बिना सोचे लिख दी गयीं फ़ेसबुक की टिप्पणियाँ इतनी देर तक अटकने-अटकाने के लिये थोड़े ही होती हैं। लेकिन उबरने के पहले ही सुनाई दे गयी यह अगली किसी की रिकॉर्ड की गयी आवाज़, “अपने दुर्भाग्य और हम सबके सौभाग्य से राजेन्द्र यादव के दिवंगत हो जाने के बाद” राजेन्द्र यादव ने खुद सुनी होती यह बात तो निस्संदेह अपना पुरजोर मशहूर ठहाका लगाया होता। हम न मरहिं मरिहै संसारा उन्होंने लिखा था। लेकिन मैं स्तब्ध रह गयी। मुझको हँसी नहीं आई। रोना भी नहीं आया। थिर होने के बाद कौतूहल उठा, क्या व्यक्त कर रही होगी यह टिप्पणी¸? क्रोध? ईर्ष्या? क्या’?

लेकिन न यह इबारत, न यह आवाज़ - इस पर भी कुछ दर्ज नहीं करूँगी। आज नहीं। कल तक भी ऐसा ही लगता रहा, तो कल शायद। इसके पहले कि यादों का यह समवेत हाहाकार महज़ एक रस्म अदायगी में बदल जाय, इसके पहले कि रस्मअदायगी- सा यह उद्वेलन हास्यास्पद में विघटित हो जाय, इसके पहले ही यह अध्याय बन्द होना चाहिये ; इस खयाल से निकला था यह फ़ैसला। समवेत उद्वेलन में यह समस्या होती है। उसमें अगर आप खुद शामिल न हों तो दूसरे लोग एक दृश्य की तरह दिखाई देते हैं और इस किस्म का हाहाकार हास्यास्पद लगने लगता है। सुबह उठी थी, सामने देखा था कैलेण्डर में, 28 अगस्त है, याद किया था, शाम को राजेन्द्र-कथा-सम्मान कार्यक्रम है, सोचा था आज कोई पोस्ट नहीं लिखनी। तब बहुत हलका महसूस किया था लेकिन अब फ़ेसबुक में दूसरों की पोस्ट पढ़ते पढ़ते ही शाम को जब कार्यक्रम में पहुँची, सिर बेतरह भारी हो चुका था।

जमावड़ा था, जमावड़े में परिचित लोग थे। कार्यक्रम का समय हो चला था। फ़ेसबुक दिवस की कोई चर्चा नहीं थी, असहजता सी थी हवा में ज़रूर! संजय सहाय ने मुस्कुरा कर हाथ जोड़े थे। स्वागत में। और मिलवाया था, “ये ’ मेरी बेटी।” मैंने इशारे की दिशा में देखा । छोटी सी, दुबली पतली, सांवली, सलोनी। कहा , “हम शायद पहले भी मिल चुके हैं न?’’

उसके चेहरे पर एक असमंजस का भाव आया। “मेरे खयाल से तो नहीं।“

“वहाँ, एक बार गया में” मैंने याद दिलाने की कोशिश की। इस बार उसके असमंजस में संजय भी शामिल थे, ‘‘गया में? नहीं तो ‘वहाँ कहाँ, आप किसी और के साथ कन्फ्यूज़ कर रही हैं।“

“ गया तो मैं कभी गयी ही नहीं” उसने कहा।

अचानक अपने आप समझ में आ गया। मैंने जो “मेरी बेटी” सुना; असल में संजय सहाय ने करगेती कहा था। उस वाक्य में जो डॉट् डॉट् डॉट् है उस जगह पर प्रकृति भर लीजिये। आसपास की परिचित समवेत भिनभिनाहट में सुनाई नहीं दिया था।

प्रकृति करगेती। उस शाम की; नहीं, इस साल की विजेता।

कार्यक्रम की शुरुआती औपचारिकताएँ हो चुकी थीं। प्रकृति करगेती अपनी कहानी की रचना प्रक्रिया पर बोलने के लिये डाइस पर आ रही थी। मेरे भारी सिर के भीतर जमे हुए थक्के में सुगबुग जैसा कुछ सरक सा रहा था। मेमोरी रन्स ऐट सिंगल चैनल। दिमाग़ में कम्प्यूटर के काले स्क्रीन के सफ़ेद अक्षर कौंधकर बुझ गये थे। स्मृति चलने के लिये अपनी इकलौती धारा ऐसे ही खोजती होगी क्या¸? सुगबुग के साथ? लेकिन वह तो कम्प्यूटर की स्मृति है, मेरा दिमाग़ कम्प्यूटर थोड़े ही है, यहाँ तो एक साथ अनेक होती हैं प्रस्थान की दिशाएँ” और चकराते हुए सिर में कुछ सरकता हुआ सा महसूस होता है। प्रकृति करगेती बता रही थी पढ़ाई के लिये अपने छोटे शहर से दिल्ली आना, साउथ एक्स मार्केट की शो विन्डोज़ की चकाचौंध में खड़े मुस्कुराते सजीले बुत, उसकी विजयिनी कहानी ऐसे ही बुत के बारे में है, हंस के जनवरी अंक में छपी है, अंक मेरे देखने से रह गया है। सभी कुछ देखने से रह जाया करता है आजकल। पढ़ने में फिसड्डी रही जा रही हूँ, लग कर देखना शुरू करूँगी। युवा लेखन के बारे मेँ यूँही उड़ते, फिसलते से आभास, थोड़ा ठोस तरीके से पकड़ने देखने की ज़रूरत है। ज़रा देर पहले कार्यक्रम शुरू करते समय संजय सहाय ने साल भर की कहानियों में से पुरस्कार के लिये चुनाव की प्रक्रिया बताते हुए उसी अंक में छपी असग़र वजाहत की कहानी का ज़िक्र भी किया था। वह भी शो-विण्डो और बुत के बारे में थी। दोनों एक दूसरे से उलट। पता नहीं उलट का मतलब क्या है, कहानी पढ़े बिना कैसे कहा जा सकता है?

मेमोरी चलती है सिंगल चैनेल में। साहचर्य का नतीजा शायद! कमलानगर में दोनों हाथों में शॉपिंग बैग उठाये, बोझ का अहसास कम करने के लिये तेजी¸ से चाल बढ़ाते हुए गलियारे से गुजर रही थी। अचानक महसूस हुआ कि कोई पीछे छूट गया। वैसे यह कोई खास बात नहीं थी। कमलानगर के गलियारों में छात्र छात्राएँ बहुत मिला करते थे। देखकर ठहर जाते थे। गुडाफ़्टरनून या गुडीवनिंग कहने के लिये, हाथ से शॉपिंग बैग ले लेने, सवारी ढूँढ देने, सवारी तक पहुँचा देने के लिये।

तेज़ी की झोंक में लगा, किसी के बहुत पास से गुजरी फिर भी अनदेखा छूट गया कोई, शायद कोई खड़ा था इन्तज़ार में, शायद उसे कुछ कहना रहा हो। ठिठक गयी। वापस मुड़ी। गलियारे की रेलपेल में कोई परिचित नहीं दिखा। हाथों के बैग भीड़ में टकराते फँसते दिक्कत में डाल रहे थे। जगह बनाते, खिसकते दीवार वाली साइड पर निकली तो देखा सामने। शोविण्डो में बुत। उसके कपड़ों के शोख रंगों की जो झाँई सी पड़ी थी उससे पहचाना, यही था। था नहीं, थी, जिसके लिये लौटी थी। सुन्दर अजन्ता सा मुखड़ा। कटा छँटा, छरहरा जिस्म। जब साँचे में ही ढाल कर निकालना है तो चाहे जितना सुडौल बना लो।

बहुत पहले की बात है। प्रकृति करगेती शायद तब पैदा भी न हुई हो। या पैदा तो हो गयी हो लेकिन बहुत छोटी सी रही हो। नन्ही मुन्नी बच्ची। दिल्ली की शोविण्डो में पहला बुत। करेक्शिन, कमलानगर की शोविण्डो में मेरा देखा हुआ पहला बुत जो बुत जैसा लगा ही नहीं पहले-पहल। खिड़कियाँ तब इतनी ऊँची, ऐसी चकाचौंध नहीं थीं जैसी प्रकृति ने देखीं। आदमकद से कई गुना ऊपर, सिर उठाकर देखने को मज़बूर करने वाली। तब ग्राउण्ड लेविल पर गलियारों से गुजरते बुतों के साथ खड़े होने का, उनके जीवित होने का भ्रम हो सकता था। पैकेजिंग की महिमा की शुरुआत बस हुई सी ही थी, अब की तरह शिखर पर नहीं पहुँची थी। उनकी पोशाकें भी अक्सर साड़ी या सलवार कमीज़ या स्कर्ट, बुत तब हमारी तरह के बनाये जाते थे ज्यादातर, हम बुतों को देख कर उनके जैसा बनने की या फिर इसकी तमन्ना पालने की नौबत को नहीं पहुँचे थे तबतक भी। तो कमर के ऊपर देह के आकार को रेखांकित करता, बाएँ कन्धे तक उठता चला जाता चौड़ा कण्ट्रास्ट बॉर्डर, घुटनों से कमर तक के शरीर को मछली के से आकार में समेटता कुहनी के सलीकेदार मोड़ में सँभाल कर इकट्ठा किया गया, कुहनी से बायें कन्धे तक फैल कर झरने की तरह नीचे गिरता साड़ी का पल्ला, मुस्कुराती आंखें, गर्दन तक खिसका हुआ ढीला सा जूड़ा - नामुमकिन था सोचना कि वह ज़िन्दा औरत नहीं है। उतना ही आसान था यह महसूस करना भी है तो मूर्ति ही लेकिन ज़िन्दा हो उठी है।

उस बुत ने बरबस माधवी मधुरांजलि की याद दिलायी थी। हालाँकि देखने में दोनों में कोई समानता नहीं थी।

इस किस्म के ‘पहले-पहल’ की तारीख-महीना-साल भी तो दर्ज नहीं करता कोई। फिलहाल दिमाग़ में ऐसी हर बात का समय सन्दर्भ 1990 हो गया है। लेकिन हो सकता है, उसके थोड़ा और पहले या ज़रा और बाद! 1980 या शायद 85 के आसपास की बात रही हो. शायद 1990 या 95 हो गया हो। माधवी मधुरांजलि आज भी याद आ जाती है कभी-कभी। उस बुत की तरह वह भी पहली थी। पहली का मतलब हिन्दी ऑनर्स में पहली वरना साइन्स और इंगलिश, इकनॉमिक्स वगैरह अन्य विभागों में पिछले कई सालों से यह सिलसिला चल रहा था।

दूसरे भी कुछ प्रदेश थे जहाँ से दिल्ली आने वाले छात्रों की गिनती बढ़ रही थी, नॉर्थ ईस्ट, उड़ीसा, फिर उत्तर प्रदेश भी जहाँ बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ जैसे अपने खुद के पुराने विश्वविद्यालय मौजूद थे और आस-पास के कई इलाकों के लिये उच्च शिक्षा के सम्मानित प्रतिष्ठित केन्द्र थे लेकिन बिहार से तो ऐसा लगता था मानो दिल्ली की दिशा में बाकायदा भगदड़ चालू हो चुकी थी। दूसरे प्रदेशों और दूसरे विभागों के बारे में तो सोचा जा सकता था कि वहाँ उन विषयों में उच्चतर शिक्षा की पर्याप्त उचित और ‘अप-टू-डेट’ व्यवस्था शायद न होगी, कई ऐसी भी जगहें थीं जहाँ लगातार कई सालों तक बार बार की अदूरदर्शी हड़तालों के नतीजे अन्ततः स्थगित सत्रों के रूप में सामने आ रहे थे, तीन साल की पढ़ाई छः सात साल में भी पूरी होने की नौबत नहीं रही थी जबकि दिल्ली अभी तक बची हुई थी। लेकिन बेशक ताज्जुब की बात थी बिहार जैसे हिन्दीभाषी प्रदेश से हिन्दी में ऑनर्स की पढ़ाई के लिये दिल्ली भेजा जाना, वह भी लड़कियों का, और होस्टल में जगह न मिलने के हालात में लड़कियों का किराये पर कमरे लेकर दो चार के झुण्ड में या अकेले रहना ऊपर से! यह किसी छोटी मोटी क्रान्ति की सूचना से कम न था। हिन्दी के छात्र छात्राएँ अमूमन जिस तबके से आते हैं उसे देखते हुए तो और भी ज्यादा। हम अपने वक्तों की याद करते। इस तरह कहीं किसी बेगाने अनजान शहर में लड़कियों का किराये पर कमरा लेकर पढ़ाई पूरी करने के लिये छोड़ दिये जाने का खयाल भी तब दिमाग़ में भूले से भी लाया नहीं जा सकता था, भले ही अनपढ़ या कमपढ़ रह जाया जाता। विस्मित भाव से हम अनुमान लगाते इन लड़कियों के माँ-बाप के बारे में। हिम्मत की हद है या हिमाकत की। कौन नहीं जानता अनदेखे अनजान शहरों में यूँ अकेली छोड़ दी गयी लड़कियों के साथ क्या क्या नहीं हो सकता, आज हास्यास्पद लगता है लेकिन तब हम एक गर्ल्स कॉलेज के हिन्दी विभाग की अध्यापिकाएँ आपस में यही कहते सुनते पाये जाते। ‘क्या क्या नहीं’ की हद छलात्कार या बलात्कार और शुचिता-भंग के इर्द-गिर्द घूम कर रह जाती। कितनी तरह की असुरक्षाएँ और मज़बूरियाँ झेल रही होंगी लड़कियाँ। अखण्ड-कौमार्य और एकनिष्ठ समर्पण की घुट्टी पर पाली गयी वह पीढ़ी इसके आगे अपनी इच्छा और पहल की बात तो शायद सोचने की भी हिम्मत नहीं कर सकती थी, यह भी नहीं कि असुरक्षा और मज़बूरी एक हद से गुजर जाने के बाद निडरता और लापरवाही में बदल जाती है, बदल जानी ही चाहिये। ज़िन्दग़ी से बड़ा कुछ और नहीं है।

बाद में तो दल के दल आ उतरने लगे और आदत सी हो गयी अपनी कक्षा में उनकी मौजूदगी की, फिर उनकी बहुसंख्यकता की। लेकिन उस साल - 20वीं सदी के शायद 80 या 85 या 90 या हो सकता कि 92-94 तक के भी किसी साल में हिन्दी आनर्स के पहले साल की पहली क्लास में हाजिरी लेते हुए इस नाम पर मैं अटकी थी, माधवी मधुरांजलि। वह “प्रेज़ेण्ट प्लीज़” कहने के बाद खुद ही मानो सफ़ाई देती हुई सी बोली, ‘‘हमारी तरफ़ ऐसे ही नाम रखते हैं।”

हालाँकि मैंने उससे कहा कुछ नहीं था लेकिन इसके पहले ही शायद इतनी बार कुछ न कुछ कहा सुना जा चुका था कि वह यहाँ, दिल्ली शहर में अपने नाम को लेकर कुछ असहज, आत्म-सजग सी हो उठी थी। “ऐसे ही नाम का मतलब कैसे नाम “ के जवाब उसने बताया था कि “हमारी तरफ़ कुछ जातों में जातनाम नहीं लिखते। जातनाम पता चलने से उत्पीड़न होता है। तो नाम के साथ उपनाम जैसा कुछ जोड़ देते हैं कि अधूरा सा न लगे।” मधुरांजलि उसके नाम का वही वाला हिस्सा था।

मैंने पूछा नहीं ‘कुछ जातों’ का मतलब कौन सी जातों में, उसने बताया नहीं; हालाँकि दिमाग़ में यह आया ज़रूर था, ऐसा जग-जाहिराना किस्म का ‘काव्यात्मक’ नाम जो रख सकते हैं कि चिढ़ाने और छेड़ने के काम लाया जा सके, वे किसी छिपाने लायक जातनाम वाले तो नहीं होंगे। यानी कि छिपाने ‘लायक’ जातनाम मेरे दिमाग़ में किन्हीं खास समुदायों के लिये दर्ज थे। सोचते ही अपना यह पूर्वग्रह अपने आप ही तस्लीम भी किया गया और शायद इसी सकपकाहट के संकोच में वह सवाल मैं टाल गयी। “हमारी तरफ़” का मतलब ज़रूर पूछा जिसके उत्तर में उसने बिहार के एक छोटे से शहर का नाम लिया था।

उस शहर के नाम की जगह एक छोटा शहर कहने का मतलब यह न निकाल बैठें कृपया, कि असल में शहर कोई है नहीं, या कहानी मनगढ़न्त है। वह शहर सचमुच है और कहानी भी सचमुच घटित हुई, शत-प्रतिशत; लेकिन उसका पता-ठिकाना गुम रखने के मकसद से यहाँ बताया नहीं जा रहा है। कहीं पड़ताल की मंशा से या बेमकसद ही महज़ जिज्ञासा या शु्द्ध संयोगवश आप वाकई वहाँ जा धमकें और 1990 या 92 या 94 या शायद 95 के दौरान की मेरी माधवी मधुरांजलि का जो हवाला जानबूझ कर गुमनाम रखा जा रहा है , उसे वहाँ जगजाहिर कर आयें! क्योंकि आजकल के अपने हिन्दुस्तान के हालात कुछ ऐसे ही हैं कि एक सिरे पर वह सबकुछ रोज़मर्रा की दर से घट ही रहा है जो घटा लेकिन दूसरे सिरे पर नाम भी नहीं लिया जा सकता कि यह घटा; भले ही उस सिरे से चल कर इस सिरे तक आ पहुँचा आदमी; क्षमा करें, औरत; एक ही हो।

इसी दौरान भारत को एक ही वर्ष में दो दो विश्व सुन्दरियाँ दे दी गयी थीं। तेज़ी से गली गली में ब्यूटी क्लिनिक खुल रहे थे। विश्वविद्यालय से सटी बंगलो रोड से किताबों की कतार की कतार दूकानें रातों-रात गायब होकर कपड़ों की दूकानों में बदल रही थीं और कपड़ों की दूकानों का फ़ैशन-हाउस कहने का चलन शुरू हो रहा था। आस-पास के बाज़ारों में दूकानें अपनी साज सज्जा बदल रही थीं। उनकी खिड़कियाँ शो-विण्डो बन रही थीं - लालसा के झरोखे जिनमें से झाँक कर कोई दूसरा संसार मुस्कुराता था। एक तरफ़ कैम्पस की कमलानगर क्राउड थी और दूसरी तरफ़ कनॉट-प्लेस-क्राउड जिसे अनुप्रास का लोभ छोड़ दिया जाय तो साउथ-डेल्ही कहना चाहिये क्योंकि कनॉट-प्लेस तो अब तक बहुत बेचारा और नाकाफ़ी सा हो चुका था और दिल्ली दक्षिण की ओर बढ़ चली थी। दोपहर से लेकर शाम तक कैम्पस फैल कर कमलानगर के गलियारों में बहने लगता था जिसमें दोनों ही किस्मों की क्राउड मौजूद हुआ करती थी, और ऐसे ही एक गलियारे में एक दिन एक बुत से पहली बार मेरी मुलाकात हुई थी।

चलन नम्बर दो भी शुरू होकर बाढ़ पर था, वेश-केश-क्रॉकरी-खान-पान और बाकी भी बहुत कुछ को ‘स्टेटमेण्ट’ यानी वक्तव्य कहने का चलन; और विश्वविद्यालय परिसर पर वक्तव्य-विशारदों की भीड़ ने ‘अत्त’ मचा रखी थी। वक्तव्यों की विषय सामग्री ‘ऐटीट्यूड’ था यानी ‘हू केयर्सज्, ‘गो टु हेलज्, ‘डैम इटज्, ‘ओह शिटज्, ‘फ़क यू’ जैसे तकिया-कलाम जो अपने हिन्दी अनुवाद में न तो शालीन रहेंगे और न श्रवण-सुखद ही साबित होंगे। फिर यह आश्वस्ति भी तो थी कि इतनी अंग्रेजी तो हर कोई सीख और बोल सकता था और परिसर पर अंग्रेजी का बोलबाला था। इतना फ़र्क ज़रूर आया था कि अंग्रेजीवाले गाली देने के लिये हिन्दी का इस्तेमाल करने लगे थे जिनमें अंग विशेष के फटने या फाड़ देने का ज़िक्र बहुतायत से हुआ करता था। मातृभाषा तो ठहरी आखिर मातृभाषा, असल वज़न तो उसी में महसूस होता है न!

यूँ कह लें कि बाढ़ थी, तेजी से ‘प्रलय’ की तरफ़ दौड़ रही थी, इसलिये भी प्रलय सरीखी जान पड़ रही थी कि बहुत तेज़ थी और आदत पड़ने का मौका नहीं दे रही थी।

इस पाँव-उखाड़ बहाव में पिछली पीढ़ी - यानी कि वे अध्यापक जन जिनका सीधा साबका कई कई दशकों तक नयी पीढ़ी के साथ पीढ़ी- दर- पीढ़ी पड़ता ही रहता है - हक्का-बक्का थी। हर अगला साल पिछले से कुछ ज्यादा अजीब था और हर अगला बैच और भी ज्यादा अजीबोगरीब!

माधवी मधुरांजलि सामान्यतः सुन्दर ही थी, एक अछूती, अनगढ़, ग्राम्य किस्म की सुन्दरता जिस पर छोटे शहर की छाप अभी बाकी थी लेकिन हिन्दी विभाग में, दिल्ली के भी, विशिष्ट ही कही जायेगी। जहाँ दाखिला लेने वालों का सामान्य-स्तर हमारे जैसे ए ग्रेड कॉलेज में भी आजकल के नतीजों में अंक-प्रतिशत की अधाधुन्ध बौछार के बावजूद 58-60 प्रतिशत के परे नहीं जाता और जो ‘हमारे’ ज़माने के स्केल पर ‘जस्ट-पास’ प्रतिशत से हर्गिज़ ऊपर नहीं कहा जा सकता, वहाँ उसके 80 प्रतिशत अंक थे। उसे दाखिला और भी किसी विषय में मिल सकता था लेकिन उसने हिन्दी को चुना जिसे उसने हमको तो अविश्वसनीय रूप से हिन्दी का प्रेम ही बताया था लेकिन बाद में राज़ यह खुला था कि इतने अंकों के साथ हिन्दी में होस्टेल में कमरा मिल जाना तय था जबकि बाकी हर विषय में या तो साफ़ मनाही थी या वेटिंग लिस्ट का नगण्यप्रायः चांस लेना पड़ता। किराये के कमरे का खर्चा उठाने लायक हालात उसके परिवार के नहीं थे।

तो हिन्दी आनर्स में दाखिले का फ़ैसला उसके लिये कुछ समझदारी कुछ लाचारी का फ़ैसला था। लेकिन इसके बावजूद अगले ही साल उसने होस्टेल छोड़ दिया था। वजह उसने यह बताई थी कि होस्टेल में फालतू के कायदे कानून बहुत हैं, तरह तरह के प्रतिबन्ध और निषेध। बाढ़ को बाँधता है कोई? इतना बँध कर बैठे तो कैसे चलेगी, कितना बढ़ेगी, कहाँ जायेगी कहाँ पहुँचेगी ज़िन्दग़ी? पूरे तीन साल। एक तो गुजर ही गया, बस दो और, कोई मजाक है? इतना वक्त है किसके पास?

कहानी चूँकि माधवी मधुरांजलि के बारे में नहीं, एक बुत के बारे में है, बल्कि कहानी तो शायद यह है ही नहीं, तो माधवी का वृत्तान्त जरूरी सूचनाएँ देकर समेटा जा सकता है।

कॉलेज कैम्पस पर मेरा घर अपनी छात्राओं के लिये ओपेन-हाउस जैसी जगह हुआ करता था। सप्ताह में दो तीन दिन तो ज़रूर ऐसा हो ही जाता कि माधवी मधुरांजलि शाम की चाय के समय आ जाती और होस्टेल में डिनर के पहले तक के दो ढाई घण्टे यहीं रहती। उत्सुक, जिज्ञासु, तत्पर, उसके कौतूहल और सवालों का कोई अन्त न था और कुछ महीने बीतते न बीतते तक उसने खुद अपनी टिप्पणियाँ देने लायक हिम्मत भी जुटा ली थी। कभी बचकानी, कभी जिज्ञासु लेकिन हमेशा समझदारी की दिशा में बढ़ती हुई।

पहला साल पार करते-करते वह अपने ग्राम्य, अनगढ़ अछूतेपन से छूटकर खासी सुगढ़ निकल आई थी और कमलानगर-क्राउड के ठप्पे से भी छूटने और कनॉटप्लेस-क्राउड में शामिल होने की दिशा में अग्रसर दिखाई देती थी। उसकी हिन्दी में एक ऐसा लचीलापन और प्रवाह था जो इस अंग्रेजीपरस्त कॉलेज ने पहले शायद कभी सुना ही नहीं था, कैम्पस की ‘बाइलिंगुअल’ यानी कि अंग्रेजी-हिन्दी की संयुक्त वाद-विवाद-प्रतियोगिताओं में शायद पहली बार हो रहा था कि एक हिन्दीभाषी प्रतियोगी बार बार प्रथम पुरस्कार पा रही थी और निर्णायक अपना निर्णय सुनाते समय यह कहना न भूलते थे कि इतनी सरस मधुर हिन्दी इसके पहले उनके सुनने में नहीं आई और उसके नाम के मधुरांजलि वाले हिस्से पर टिप्पणी करना भी। किसी और ने तो एक बार यह सुझाव भी दे ही डाला था कि नाम के किसी हिस्से में मेधाविनी भी होना चाहिये था जिस पर छूटते ही तपाक से उसने जड़ा था, माइसेल्फ़ माधवी एम. एम. अन्जली यानी माधवी मेधाविनी मधुरा अन्जली। ऐटीट्यूड के ज़माने में विनम्रता की जगह आसपास क्या, दूर दूर तक नहीं थी और सीखने में वह तेज थी। सबसे पहले ऐटीट्यूड ही सीखा था। अपनी कक्षा की बाकी छात्राओं के साथ भी उसका रवैया ऐसा ही था जिसकी वजह से वह अलग और अकेली दिखाई देती थी। दूसरे साल में होस्टेल के कायदे कानूनों से छूटकर उसने कॉलेज के बाद के घण्टों में कमलानगर के एक फ़ैशनहाउस में सेल्सगर्ल की नौकरी कर ली थी। दूकान बन्द होने के बाद शो विण्डो में खड़ी बुत को अगले दिन के लिये सँवारना उसकी ड्यूटी में शामिल था और इस काम को वह काफ़ी रच-रच कर करती रही होगी तभी उसकी खिड़की वाली बुत आसपास की सभी खिड़कियों से ज्यादा आकर्षक दिखाई देती थी।

दूसरे साल भी वह वाद विवाद प्रतियोगिताओं में तो जाती रही, ज्यादा पुरस्कार-राशि वाली प्रतियोगिताओं में खास तौर से, और उन्हें जीतती भी रही, लेकिन कक्षाओं में उसकी उपस्थिति गिर कर अनिवार्य न्यूनतम भर रह गयी। उसके कपड़े, जूते, प्रसाधन, वेशभूषा सब बदल चुके थे हालाँकि छुट्टियों में घर जाते वक्त वह अपने जिन कपड़ों को ‘अल्ट्रा’ कहती थी उन्हें एक सूटकेस में भरकर मेरे घर छोड़ जाती थी। वहाँ इनको पहना तो नहीं ही जा सकता था, यह बताया भी नहीं जा सकता कि यहाँ वह ऐसे कपड़े पहनती है। ब्राण्डेड। कैसे? कहाँ से? कितनी तनख्वाह मिलती रही होगी उसे फ़ैशन-हाउस की अपनी नौकरी से? इन सवालों का जवाब खोजने के लिये बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं हुआ करती। फ़िलहाल उस तफ़सील में जाने की कोई ज़रूरत नहीं, दरअस्ल वे मुझे मालूम भी नहीं। जानने में कोई रुचि भी नहीं।

स्टाइल का उसे नशा सा हो गया था। पहले साल की वह माधवी मधुरांजलि उसमें कहीं नहीं बाकी थी जो अपने हर कौतूहल को लेकर सबसे पहले मेरी ओर ही उन्मुख हुआ करती थी। छोटे शहर की पाल-पोस के संस्कार अपर्याप्त लगने तक ही में उसके लिये प्रासंगिक रही होऊँगी, अब जिस बहाव में वह थी उसके लिये मैं उसे कोई रास्ता नहीं दिखा सकती थी।

कभी कभार की मुलाकात में अब वह बात करने से बचती सी रहती थी। इसलिये तो शायद नहीं कि उसे कुछ छिपाने की ज़रूरत थी या कि मैं ही कोई कुरेद-बीन करने वाली थी। हमारे हिस्से की दुनिया में भी वह दौर आ पहुँचा था जिसमें इस किस्म के क्रिया-कलाप में छिपाने जैसा कुछ रह नहीं गया था। फिर भी शायद इसलिये कि कहीं कोई लिहाज बाकी था जिसकी वजह से वह मेरे सामने ‘ऐटीट्यूड’ लेकर प्रकट होना और मेरी अप्रासंगिकता मुझे जताना नहीं चाहती थी। शायद इस बात से बचने के लिये भी कि कहीं कोई ऐसी बहस छिड़ जाय जिसमें उठने वाले तर्कों का जवाब उसके पास न हो। तर्करहित रह जाने का मतलब कायल हो जाना नहीं होता और फ़ैसला कर लिया गया हो तो बहस में न पड़ना ही बेहतर।

जहाँ उसको जाना था उसके लिये अब तक के तर्क, विवेक, मूल्य, संस्कार - कुछ भी उसके काम लायक शायद नहीं रह गया था। लेकिन अब भी उसे भीतर कुछ कुरेदता सा था। शायद! भाषा पर उसका असामान्य अधिकार पढ़ाई और तैयारी के अभाव को ढँकता रहा और ठीक ठाक अंक भी उसे मिलते ही रहे लेकिन उसने समझ लिया था, रास्ता किधर है। फिर तीसरे साल वह छात्र संगठन की राजनीति की तरफ़ मुड़ गयी थी। भावी नेताओं की खेती कैम्पस पर इसी दौरान बोई और सींची जाती है। उसके पास वक्तृता-कौशल था, व्यक्तित्व था और सामने खुला मैदान था। संभावनाएँ अपरिमित थीं।

उस साल वह लगभग गायब सी ही रही। कक्षा से भी, कैम्पस से भी। फ़िलहाल वह विश्वविद्यालय-छात्र-संगठन में कॉलेज-प्रतिनिधि की हैसियत से चुनाव जीत कर अब के छात्र नेताओं के साथ और पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालय से निकले और अब उभरते हुए युवा नेताओं के सम्पर्क-साहचर्य में भविष्य का नक्शा लिखने में व्यस्त थी।

लेकिन फिर तभी वह काण्ड हुआ। नैना साहनी की हत्या जो तन्दूर-काण्ड के नाम से मशहूर हुई जिसने न सिर्फ़ उस वक्त बल्कि आने वाले लम्बे वक्तों के लिये भी ‘तन्दूर’ को एक विकट सन्दर्भ-संकेत बना दिया। आज तक भी वह सन्दर्भ बाकी है, संकेत भी! उसकी भी तफ़सील में जाने की यहाँ कोई ज़रूरत नहीं। हाई-सोसायटी के उन गलियारों में ऐसा होता आया है। अनगिनत उदाहरण होते आये हैं, होते रहेंगे। अभी हाल के किस्सों में सुनन्दा पुष्कर और इन्द्राणी मुकर्जी का नाम ले लीजिये। कभी कभार कोई मामला-मसला खुल भी जाया करता है। उनसे अन्दाज़ा भर लगाया जा सकता है कि उस दुनिया के तलपेटे में क्या है औरत की हैसियत। अचानक असुविधाजनक हो उठने वाली कोई लाड़ली, दुलारी हसीना रद्दी काग़ज़ की तरह रफ़ा-दफ़ा कर दी जाते देर नहीं लगती। औरत ही क्यों, निचले-मझोले तबकों से उठ कर ऊपर आते, धूमकेतु की तरह छा जाते मर्द भी ऐसे ही हश्र को पहुँचाये जाते हैं। नैना साहनी के किस्से में उसके पति का भी शायद यही हश्रो-हवाल हुआ हो वरना छत्रछाया की मदद मिली होती तो एक कृपापात्र उदीयमान नेता के लिये एक लाश को ठिकाने लगाना क्या मुश्किल था? कौन जाने किसी ने शायद सूराग़ ही दिया हो उसकी अचानक पकड़ के लिये!

उसके बाद माधवी से कोई मुलाकात नहीं हुई। कहाँ गयी होगी वह? क्या उसने कोई सबक सीख लिया¸? क्या उसने रास्ता बदल दिया? क्या उसने मैदान छोड़ दिया? क्या कगार पर जा पहुँचने के पहले ही उसने कदम लौटा लिये? या उसके साथ भी कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गुजरी?

पता नहीं। इतना पता है कि वह लौट कर घर नहीं गयी। उसके पिता आये थे। कॉलेज में पूछताछ से हत्प्रभ और अवाक् रह गये थे। वह कहाँ थी, क्या कर रही थी, उन्हें किसी बात का कोई अन्दाज़ा ही नहीं था। होस्टेल से बार बार चिट्ठियाँ भेजी गयी थीं, फीस जमा करने की, होस्टेल आ पहुँचने की, कमरा दखल कर लेने की आखिरी तारीखों के लिये चेतावनी की, उन तक एक भी पहुँची ही नहीं थी। छुट्टी में घर जाने के लिये होस्टेल से निकलने की तारीख अभिभावक से अनुमति से तय होती है। इसके लिये अभिभावक को होस्टेल के वॉर्डेन से बात करनी होती है, चिट्ठी देनी होती है। माधवी तो पहले साल के बाद ही होस्टेल छोड़ चुकी थी, उनसे पता नहीं कौन वार्डेन के नाम से बात करता रहा, उनकी भेजी हुई चिट्ठियों को वॉर्डेन तक पहुँचने के पहले ही कौन उड़ाता रहा।

वे थाने भी गये। गुमशुदग़ी की रपट भी लिखवाई लेकिन कहीं कोई सूराग़ नहीं था। कभी कुछ पता नहीं चला। ये सारी बातें माधवी की दुष्टता और चालाकी के प्रमाण की तरह कॉफ़ी-ब्रेक में गरमागरम चुस्कियों का चटपटा साथ देती रहीं। लेकिन माधवी थी कहाँ?

तो बुत की जिस कहानी के बारे में पहले भी कह चुकी हूँ, वह यहाँ से शुरू होती है। एक खयाल की तरह।

हमारा घर निरन्तर संवाद का कारखाना है, मैं और मेरे दोनों बेटे किसी भी फुरसत में बैठे किसी भी बात पर बतरस में व्यस्त पाये जाते हैं। तो इस खयाल पर भी बात मैंने छेड़ी जिसे लेकर यह कहानी मैं लिखना चाहती थी। कहानी एक लड़की के बारे में थी जिसने एक फ़ैशनहाउस की खिड़की में बुत बनकर खड़े रहने की नौकरी की थी। पहले पहल के बुत थे, शायद बहुत महँगे रहे होंगे, लेकिन आस-पास की दूकानों के साथ प्रतियोगिता में खड़े रह सकने के लिये ज़रूरी थे। तो उस लड़की को स्टाइल का नशा था। अगर वह कहानी मैंने सचमुच लिखी होती तो इस नशे को वक्त, मेहनत और युक्तियाँ लगाकर खड़ा किया होता। लेटेस्ट कपड़े, बैग, जूते ज्यूलरी। लेटेस्ट-लेटेस्ट। एक बार दोबार पहनो, फेंको। लेटेस्ट इससे ज्यादा देर कहाँ चलता है। अगला दिन, अगली पोशाक! वाह, क्या खूब, गज़ब, डैशिंग, किलिंग, रैविशिंग जैसी वाहवाही। रोज़ रोज़ नयी नयी वेशभूषा, केशभूषा, आभूषण, प्रसाधन वगैरह वगैरह का शौक पूरा करने के लिये उसने बिना हिले डुले, बिना पलक झपकाये, बिना साँस लिये काँच की खिड़की में खड़े रहने की नौकरी की लेकिन नौकरी के घण्टों के बाद भी वह इन गलियारों में चलता फिरता बुत बन कर रही आई।

तब का विमर्श “पूँजीवादी भोग-व्यवस्था सत्यानाश सत्यानाश” की लाइन पर चलता था, तब तक भी उपभोक्तावाद दुश्मन ही माना जाता था, अब की तरह स्टैण्डर्ड ऑफ़ लिविंग और क्वालिटी आफ़ लाइफ़ का घालमेल बनकर ब्यूटीज़ ऑफ़ लाइफ़ या प्लेज़र्स आफ़ लिविंग में नहीं बदला था।

दो तीन दिन बाद बड़े बेटे अँजोर ने पूछा था, कहानी हो गयी अम्मा? संवाद के हमारे कारखाने में दोनों बेटों के लिये हर वक्त चर्चनीय एक खयाल यह भी रहता आया है - कहानियों के लिये अम्मा के खयाल। दिमाग़ में तैरते हुए आते हैं और वैसे ही तैरते हुए से घुल जाते हैं। कहानी अक्सर हुए बिना ही रह जाती है। मैंने ‘अभी कहाँ’ की मुद्रा में हथेलियाँ पलट दीं।

अँजोर ने कहा, ‘‘लिख डालो अम्मा, नहीं तो कोई और लिख डालेगा।“

यह भी कोई बात है? कोई और कैसे लिख डालेगा? उन दिनों अँजोर अंग्रेजी में ऑनर्स कर रहे थे, उसके बाद मास-कॉम। वे अजब अजूबे से डिस्कोर्स हिन्दी में तब तक दाखिल नहीं हुए थे जिनसे उनका पाला पड़ रहा था। कोई मजाक है, ऐसे कैसे लिख डालेगा कोई और? मैंने कहा था।

‘‘बिकॉज़ आइडियाज़ लिव ऑल देयर; इन द ईथर” अँजोर ने कहा था, ‘‘जैसे तुम्हारे पास आया है, वैसे ही किसी और के पास भी गया होगा, नहीं तो चला जायेगा।“

मैं सवालिया आँखों से देखती रही थी, वह समझा रहा था, ‘‘सोचो, कैसे बताती हो? क्या कहती हो, कहती हो या नहीं? कि खयाल आया है। कहाँ से आया है? खयाल आया तो था लेकिन चला गया? कहाँ चला गया? हमसे ज्यादा हमारी भाषा को मालूम है हमारे खयालों का सच। वो कहीं से आते हैं। कहीं चले जाते हैं और ईथर किसी की बपौती नहीं है।“

“ आइडियाज़ लिव ऑल देयर; इन द ईथरज्ज्। मेरे दिमाग़ में अनूदित हुआ था - “व्योम में वास है विचारों का”

वही दिन थे जब संचार के आकाश में सैटेलाइट उतरा था, और केबिल के सहारे घर घर आ पहुँचा था, और उसके बाद दुनिया को दुबारा कभी वही दुनिया नहीं रह जाना था। स्टार चैनल पर साण्टा बारबरा, बोल्ड ऐण्ड ब्यूटीफुल, डाइनेस्टी, बे-वॉच जैसे सीरियल अवतरित हुए थे और स्त्री-शरीर, परिधान और आवरण, प्रेम, परिवार और दाम्पत्त्य के सम्बन्ध, सौन्दर्य-बोध, लिहाज़, शिष्टाचार, मर्यादा और मूल्य के पुराने बोध पके पुराने पत्तों की तरह झर कर गिरने और धरती की नमी पाकर सड़ गल जाने थे।

कार्यक्रम में समसामयिक कहानी पर प्रियदर्शन का बयान खत्म हो चुका है। सविता सिंह प्रकृति करगेती की इस कहानी पर अपना वक्तव्य शुरू कर रही हैं। उन्हें कहानी का विश्लेषण करना है। यहाँ से शुरू किया है उन्होंने, ‘‘यह ‘डेथ ऑफ़ द रियल’ की कहानी है।” फिर मैजिकल रियलिज्म पर एक संक्षिप्त वक्तव्य देने लगी हैं।

उन दिनों स्टार चैनल पर नियमित रूप से एक सीरियल देखती थी मैं - ‘ट्वाइलाइट ज़ोन।’ एक बार में एक एपीसोड में पूरा होने वाला। किसी और के लिख डालने की आशंका और उसके पहले खुद लिख लेने की कोशिश में लिखने फाड़ने फेंकने की खींचतान से गुजरते हुए जैसा कि अकसर होता है, अपने आप से बचने और काम से भागने की ज़रूरत से मैं अपना प्रिय सीरियल खोलकर बैठी।

और लीजिये, बात हम बुत की कर रहे थे। एक खिड़की में एक बुत - वह तो मानो किसी बेहद आदिम, प्रागैतिहासिक संसार का सीधा, सरल, सपाट मामला था। यहाँ मेरे सामने टीवी स्क्रीन पर था एक विशालकाय डिपार्टमेण्टल स्टोर जिसमें बुतों की पूरी बस्ती बसी हुई थी। जिधर देखो, उधर बुत। झुण्ड में, कतार में, अकेले, दुकेले, स्ति्रयों के, बच्चों के, पुरुषों के - पूरा संसार। और किस्सा यह था कि रात को वे सब के सब ज़िन्दा हो उठते थे।

आज बीस साल बाद वह सबकुछ धुँधलके में चला गया है। बस कुछ बिम्ब हैं जो बाकी रह गये हैं। वे भी बस कौंध कर गुम हो जाते हैं। एक दूसरे से अलग। मानो अलग अलग कहानियों के टुकड़े हों और उनके बीच का रिश्ता ओझल हो गया हो, कोशिश के बावजूद मुझे याद न आ रहा हो। याद रह जाने की वैसे कोई वजह भी नहीं, सीरियल तो एक के बाद एक, आते जाते बिलाते ही रहते हैं; सिवाय इसके कि मैं भी एक बुत के बारे में कहानी लिखने की कोशिश कर रही थी और उस वक्त यह सीरियल और उसका यह वाला एपीसोड मैंने देखा। बल्कि वह बरबस मुझे दिखाई दिया और मैंने यह सोचकर लिखने का इरादा छोड़ दिया कि अब इसकी कोई तुक नहीं। ईथर मेरे पास आने के पहले ही उधर कहीं और मुलाकात कर चुका है।

अब आज उसके बारे में मैं जो सोच रही हूँ और लिखने जा रही हूँ वह स्मृति के उसी धुँधलके में से कुरेद कर निकाला जा रहा है और इस स्मृति को कल्पना भी कहा जा सकता है बेशक। इन बिम्बों के बीच की खाली जगहों को भरने का काम कल्पना ही करने वाली है और अगर इस आधार पर मैं इसपर अपनी मौलिक रचना होने का दावा कर बैठूँ तो शायद उसे ग़लत भी नहीं माना जा सकता।

अब इसके बाद जो भी कहा जायेगा उसमें शायद की बहुतायत होगी क्योंकि जो बात कल्पना से कही जा रही है उसके स्मृति होने का भ्रम पाला जा रहा है।

तो शायद यूँ होता था कि वे सारे बुत दिन भर देखते थे ज़िन्दा लोगों को। वे बाहर से, पता नहीं किस दुनिया से आते थे, हँसते खिलखिलाते, चलते फिरते, खरीदते, वापस लौट जाते थे, उस दुनिया के बारे में उत्सुकता जगाते हुए। और रात को जाग कर बुत दिनभर के देखे सुने की चर्चा करते थे। तो शायद यह फ़ैसला हुआ कि रोज़ रात को एक बुत जायेगा, बाहर की दुनिया देखेगा और लौट कर आने के बाद सबको वहाँ के किस्से सुनाएगा। ठहरी हुई दुनिया में कोई व्यतिक्रम तो होगा। लेकिन एक बुत; बुत की शक्ल में एक औरत ही; कहती थी कि जब मैं बाहर जाऊँगी तो लौटकर वापस नहीं आऊँगी। बाकी के बुत समझाते थे, थोड़ी देर का शगल ठीक है लेकिन हमेशा के लिये वहाँ कैसे रहा जा सकता है, जहाँ के बारे में कुछ भी, बिल्कुल कुछ भी, जाना पहचाना नहीं है।

बाकी के बुत शायद सड़क से घूमकर वापस आ जाते थे। लेकिन एक औरत की जिज्ञासा इससे ज्यादा थी। और जब वह बाहर गयी, तो उस दुनिया की कोई भी जगह उसकी जानी पहचानी नहीं थी, सिवाय डिपार्टमेण्टल स्टोर के। लेकिन कुछ भी देखे बिना वह लौट कैसे सकती थी। स्टोर में घुसी। लेकिन वहाँ के बारे में भी एक यह बात उसे नहीं मालूम रही होगी कि हर चीज़ खरीदने के लिये पैसा लगता है। पैसा क्या होता है, उसे मालूम ही नहीं रहा होगा क्योंकि बुतों की जिस बस्ती से वह आई थी वहाँ पैसे से मतलब रखने वाले सारे काम इन्सान किया करते थे। तो शायद यह हुआ होगा कि छिपे कैमरा ने उसे चोर मानकर पकड़ा होगा, उसे शायद चोर का मतलब भी मालूम नहीं रहा होगा, शायद उसे मैनेजर के पास ले जाया गया होगा, शायद उसे जेल भेजा गया होगा, या शायद मैनेजर ने पैसे के बदले उससे कुछ और माँगा होगा, शायद उसे उस कुछ और के बारे में भी कुछ मालूम नहीं रहा होगा, शायद। हुआ चाहे जो भी, वह लौट कर नहीं पहुँची और बाकी बुतों ने समझा होगा कि वह बाहर जाना चाहती थी, और वापस नहीं आना चाहती थी। वह आज़ाद होना चाहती थी। शायद हो गयी।

जो भी हुआ रहा हो, ‘शायद’ के घेरे के भीतर उस सीरियल में, ये सब के सब शायदशुदा वाक्य खाली जगह को भरने के व्यायाम में मेरे रचे हुए हैं, ‘तयशुदा’ के घेरे में बस इतना हुआ कि वह कहानी फिर मैंने नहीं लिखी।

कार्यक्रम के समापन में धन्यवाद ज्ञापन के समय अचानक महसूस हुआ कि शुरू होते समय का भारी सिर अन्त तक आकर बिल्कुल हल्का हो चुका है। बहुत दिनों बाद एक बहुत अच्छी शाम। संजय सहाय को बधाई में बताया कि कार्यक्रम बहुत ही सुरुचिपूर्ण, वैचारिक भव्यता और सारतत्त्व से भरपूर था। इतने गुरू गंभीर शब्दों में नहीं, हिन्दी अंग्रेजी के घालमेल में ही बताया वरना शायद उसने चुटकी लेना समझ लिया होता। हाँ, सुबह-सुबह यही देखना चाहा था मैंने, अनुपस्थिति के बोध का धीरे-धीरे अदृश्य हो जाना, उपस्थिति के बोध में बदल जाना, यही होते हुए देख भी लिया!

अब आज, बीस बाइस या पच्चीस साल बाद उस बहुत पुराने विस्मृतिलोक में डूब गये विचार ने फिर अपना सामना कराया है। राजेन्द्र-कथा-सम्मान के कार्यक्रम से लौट कर ‘हंस’ का जनवरी का अंक निकाला है, प्रकृति करगेती की ‘ठहरे हुए लोग’ और असगर वजाहत की ‘किरच किरच लड़की’ पढ़ डाली है। प्रकृति करगेती की कहानी में जो बुत है उसने ज़िन्दा होकर, बाहर निकल कर ‘स्त्री की हैसियत से’ बाहर की दुनिया का खूँख्वार हालचाल देख आने के बाद अपनी काँच की खिड़की में बुत बने रहकर कैद हो जाना ज्यादा सुरक्षित पाया है। असगर वजाहत की कहानी में बेरोज़गारी के सबब से आखिरकार एक लड़की ने बुत बनकर खिड़की में खड़े रहने की नौकरी कर ली है और अन्ततः सचमुच के बुत में तब्दील हो गयी है।

इन सब लिखित-अलिखित कहानियों में या तो कोई बुत है जो ज़िन्दा हो गया है या कोई ज़िन्दा है जो बुत में बदल गया है। सारे बुत स्ति्रयाँ ही हैं। क्या इतना काफ़ी है यह मान लेने के लिये कि यहाँ हर किसी ने किसी न किसी की नकल की है? हम जानते हैं, अपने हिन्दी जगत में मौलिकता का दावा इस वक्त खासा दिक्कतज़दा मसला है जो हरवक्त पेश आया ही रहता है। जैसा कहा, असलियत तो यही है कि मुमकिन नहीं है यह सोचना कि यह बुत ज़िन्दा हो गया है, और उतना ही आसान है यह मान लेना भी कि कोई ज़िन्दा था, बुत बन गया है। बुत है तो या तो काँच का बक्सा होगा या खिड़की होगी या दूकान होगी। छोटी हो या बड़ी, होगी ही। वह क्या किसी से किसी की नकल की निशानी होगी? ऐसे में क्या सबसे पहले जिसने लिख डाला वह उसी विषय पर बाद में लिखने वालों का मौलिकता का दावा खारिज कर सकता है? इतनी बड़ी दुनिया की इतनी सारी भाषाओं में सबसे पहले किसने कहाँ क्या लिख डाला यह क्या कभी सन्दिग्धता के परे हो सकता है ? मौलिकता का दावा कोई दावा हो भी सकता है क्या? किसी विचार के लिखे जाने के भी पहले ही उसे सोच कर रख चुके होने का दावा भी दायर किया जा सकता है क्या?

अँजोर की बात याद आती है जो जाहिर है, उसकी मौलिक बात नहीं है, ‘‘आइडियाज़ ऑल लिव देयर इन द ईथर,’’ जिसका अनुवाद ; जैसा बताया; मैंने किया है, ‘‘व्योम में वास है विचारों का” और इस वृत्तान्त के शीर्षक की जगह लिख दिया है।

ईथर या व्योम नहीं चलता सिंगल चैनल में, मेमरी की तरह। वह फैलता है चारों तरफ़, किसी को कहीं भी जा टकरा सकता है। हिन्दी के हिस्से के बुत को ईथर इतनी देर प्रकृति करगेती की, असग़र वजाहत की कहानी तक थामे बैठा रहा। बुत होगा तो दूकान तो होगी ही, बाज़ार तो होगा ही, यहाँ दिये गये संभावित और वास्तविक संस्करणों में एक बार उपभोक्तावाद और स्टाइल का नशा है, एक बार स्त्री-विमर्श में लहूलुहान स्त्री का वजूद है, एक बार आजीविका या रोज़गार से परिभाषित और निर्मित हो जाने वाला अस्तित्व है। मौलिकता इन अर्थ साहचर्यों में, संरचनाओं में, वाक्य-विन्यासों में है और इनके अलावा और कहीं नहीं है।

मेरे साथ एक अजीब सी बात होती है अक्सर। लेकिन कोई भी बात इतनी अजीब नहीं होती कि किसी दूसरे के साथ होती ही न हो। और भी किसी के साथ होती ही होगी। मैं क्योंकि कोई खयाल दिमाग़ में आते ही लिख नहीं डालती, बल्कि असल में तो बिना किसी दबाव के शायद कभी भी लिख ही नहीं डालती इसलिये काफ़ी काफ़ी देर तक, कभी-कभी तो हमेशा के लिये भी, खयाल मेरे साथ मेरे दिमाग़ में रह जाता है, रचता-बसता, पिया जाता, पचाया जाता कि काफ़ी लम्बे समय बाद उसका आदी हो जाने पर मुझे लगता है कि ज़रूर कहीं पढ़ा होगा या किसी से सुना होगा, कहीं से आया होगा।

असल में ऐसा होता भी होगा। मेरा हिस्सा उसमें और बहुत सी पढ़ी-कही-सुनी बातों के साहचर्य-विरोध, बुन-लपेट और रख-छोड़ से उसे किसी नये संयोजन-क्रम में पहचान लेने भर का होता होगा। तो लिखने के लिये बैठते समय कई बार मैं इस तलाश और उधेड़-बुन में रहती हूँ कि यह बात मैंने कहाँ पढ़ी या किससे सुनी और कई बार कोई मित्र या छात्र याद दिलाता है कि उसके साथ बात करते हुए मैंने ही वह तर्कजाल बुना था। लेकिन इससे वह मेरा मौलिक नहीं हो जाता। पता नहीं किस किस के लिखे-पढ़े-कहे-सुने के कितने दीर्घ-क्षणिक साहचर्य को दिमाग़ समेटे रखता है।

अब मुमकिन नहीं इस अरबों साल की हो चुकी दुनिया में किसी बात का पहली बार होना, सिवाय सिर्फ़ अपने अकेले अस्तित्व स्वतःपूर्ण दायरे में किसी बात को पहली बार खुद जानने महसूस करने के। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि दूसरे किसी ने या बहुत सारे दूसरों ने भी पहली बार इसे नहीं जाना या महसूस किया है। बार-बार पहली बार। हर बार पहली बार। हर पेड़ की हर टहनी के लिये न सही, हर नये पत्ते के लिये पहली बरसात। अरबों-अरब बार। पहली बार। इसी तरह हर रोज़ नयी होती है दुनिया।

अन्त में एक अच्छी खबर। अब लगभग बीस साल बाद माधवी मेधाविनी मधुर अंजलि का फ़ोन आता है कभी कभी। 80 या 85 नहीं तो 90 से 95 के बीच जिस भी साल 18 साल की उम्र में मिली रही होगी वह उसके हिसाब से अब चालीस से थोड़ा कम से लेकर चालीस के थोड़ा बाद या पचास के आसपास की उम्र में होगी। वही करती है फ़ोन। मैं अगर वापस उसी नम्बर पर कॉल करूँ तो ‘यह नम्बर मौजूद नहीं है’ की सूचना मिलती है। वह सिम बदल देती है हर बार।

मुझे नहीं मालूम वह क्या कर रही है या अब तक क्या करती रही है। मुझसे उसे चाहिये कुछ नहीं, मैं उसे कुछ दे भी नहीं सकती। शायद कोई लिहाज़ बाकी है, शायद कोई स्मृति। शायद अतीत को काट कर अलग कर देने के बावजूद कहीं किसी डोर से जुड़े रहने की इच्छा। और वह अतीत भी उसने खुद चुना है जिससे वह जुड़े रहना चाहती है। मैं उसका वह वाला अतीत हूँ, यह सोचकर अच्छा लगता है। ज़िन्दग़ी की बाग़डोर उसने अपने हाथ में ले रखी है।

राजेन्द्र यादव अपने स्त्री-विमर्श में जिस स्त्री की कल्पना किया करते थे वह क्या ऐसी ही कोई औरत थी? अगर सचमुच ऐसी कोई मिली होती ते वे उसे बर्दाश्त कर पाये होते क्या?

वह वापस नहीं लौटी कभी, लौटेगी भी नहीं। कभी थकान कभी उदासी कभी अकेलेपन के बावजूद वह खुश है। अपने विचारों के व्योम में वास करती हुई, उसे धरती में बदलती हुई।

वह काँच की खिड़की के बाहर आ गयी है। यह शायद एक मौलिक बात है, बहुत सी लड़कियों की एक साथ मौलिक बात! 

--

संपर्क:

हाइबर्ड, जे-901,

निहो स्कॉटिश गार्डेन,

अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम,

ग़ाज़ियाबाद, पिन 291914

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रचनाकार: व्योम में वास है विचारों का : एक शाम का वृत्तान्त बेतरतीब / अर्चना वर्मा / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2
व्योम में वास है विचारों का : एक शाम का वृत्तान्त बेतरतीब / अर्चना वर्मा / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2
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