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इधर की हिन्दी कहानियों का नयापन / प्रांजल धर / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

प्रांजल धर

इधर की हिन्दी कहानियों का नयापन

समय की जटिलता बढ़ी है, सूचना-संचार क्रान्ति ने समाज को झकझोर कर रख दिया है और नव-उदारवाद की कालीन पर चहलकदमी करता हुआ यथार्थ, लेखक के लिए बहुत कुछ नया लेकर आया है। यह बात ठीक है कि दुनिया एक वैश्विक ग्राम में तब्दील हो रही है, लेकिन उससे बड़ा सच यह भी है कि गाँव और शहर के बीच की खाई (जिसे थोड़ा प्रभावशाली शब्दों में रूरल-अर्बन डिवाइड कहा जाता है) अधिकाधिक चौड़ी होती चली गई है। यह ठीक है कि विकास के तमाम शहरी टापुओं पर अपना-अपना तम्बू गाड़कर बैठे साहित्यिक लोगों को फ़ेसबुक पर कुछ भी अभिव्यक्त कर डालने की आज़ादी है, लेकिन हमारा बहुत बड़ा आधारिक समाज ऐसा है जिसकी इण्टरनेट तक पहुँच ही नहीं है और जिसे अभी तक आज़ादी का अर्थ ही नहीं पता है। ऐसे परस्पर विरोधी भावों, घटनाओं, विचारों और भौतिक स्थितियों-परिस्थितियों की समग्रता को केन्द्र में रखते हुए, ग्लैमर और यशलोलुपता से अलग होकर, कुछ मौलिक रच पाना निश्चय ही एक दुरूह कार्य है। कविता, कहानी और उपन्यास समेत विधा चाहे जो भी हो, रचना-प्रक्रिया के ऐसे अनेक विघ्नों को पार करके ही कोई कथाकार कुछ ऐसा लिख पाता है जो पाठकों के हृदय को स्पर्श ही न करे, बल्कि उन्हें भीतर तक ऐसा महसूस हो कि उनमें कुछ जुड़ा, उनकी चेतना में कुछ तरंगें पैदा हुईं। जिन कुछ कहानियों पर यहाँ चर्चा की गई है, वे इस अर्थ में विशिष्ट हैं कि ये धीमे-धीमे लेकिन सतत रूप से चल रहे और क्रमशः जटिल होते जा रहे समय को लिपिबद्ध करने की एक ईमानदार कोशिश करती हैं। इनमें से कुछ में गाँव-गँवई के अपनापे के बरक्स महानगरीय जीवन की एकाकी संस्कृति के कुछ मर्मस्पर्शी चित्र मौज़ूद हैं और कुछ में सामाजिक परिवर्तन का दावा करने वाले विचारधारात्मक संगठनों की कमजोरियाँ भी निहित हैं। बदलते समय की गतिकी को पहचानना और उन चीजों की पड़ताल कर पाना जो समय के साथ नहीं बदलतीं, निश्चय ही किसी कहानीकार के लिए बेहद चुनौती भरा काम है और इन कहानियों में इस चुनौती को स्वीकार किया गया है।

पहली कहानी के रूप में संजय कुन्दन की कहानी ‘ज़िन्दगी एक मैनेजमेण्ट’ का उल्लेख करना चाहता हूँ, जो ‘शुक्रवार’ पत्रिका में तीस मई 2013 को प्रकाशित हुई थी। अंक इस समय मेरे सामने है। यह कहानी आज के उस नए समाज की सच्चाई बयान करती है, जो नई आर्थिक नीति और बाजार ने तैयार किया है या कर रहा है। नब्बे के दशक में भारत में भूमंडलीकरण और उदारीकरण के प्रसार के साथ कामकाज के तौर-तरीके बदले, और उसी के साथ हमारे सामाजिक मूल्य भी। अब वास्तविक सत्ता कॉरपोरेट के हाथ में आ गई है, जिसका मूल मंत्र है ‘यूज़ एण्ड थ्रो’। आज कॉरपोरेट के बूते विकास का दावा किया जा रहा है। न सिर्फ राजनीतिक बल्कि सामाजिक सत्ताएँ भी उसके आगे नतमस्तक हैं। कॉरपोरेट सिर्फ मुनाफ़ा जानता है। उसकी नजर में मनुष्य मुनाफा जुटाने वाली एक मशीन है। इससे ज्यादा उसका कोई मोल नहीं है। कॉरपोरेट या वित्तीय पूँजीवाद के लिए मनुष्यता या संवेदना का कोई अर्थ नहीं है। यह एक व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर देता है। जब तक व्यक्ति सफल है तब तक उसके पास तमाम सुख-सुविधाओं की चमक-दमक उपलब्ध रहती है, लेकिन ज्यों ही वह असफल होता है, बाजार से तालमेल नहीं बिठा पाता, वह अंधेरे के बियाबान में फेंक दिया जाता है। पूरा समाज इसी की चपेट में है। उसके पास कोई विकल्प नहीं रह गया है। अब बच्चे को शुरू से ही इस दर्शन में ढालने की कोशिश की जाती है। उसे शुरू से ही एक होड़ में खड़ा कर दिया जाता है। उसे इस लायक बनाने की कोशिश की जाती है कि वह बाज़ार के लिए सबसे उपयोगी सिद्ध हो सके। उसे बताया जाता है कि जीवन का मतलब है एक रेस, जिसमें सफल होना है। सफल नहीं हुए तो नष्ट हो गए। आज हर व्यक्ति एक होड़ में लगा है। वह सफल और ज्यादा सफल होना चाहता है। चूँकि बाज़ार ने हरेक को एक सपना दिखाया है, इसलिए सुख के साधनों की दौड़ में हर कोई शामिल हो गया है जिससे मनुष्य अपनी स्मृतियों से कट गया है। हरबर्ट मार्क्यूज़े की भाषा में कहें, तो वह निहायत स्वार्थी, मतलबी और अकेला हो गया है। यह कहानी इन्हीं मूल्यों को चुनौती देती है। इस तरह से यह बाजार के प्रतिरोध की कहानी है। नायक अर्पित इस कॉरपोरेट तंत्र में अपनी जगह बना चुका है। कहने के लिए उसके पास सब कुछ है जिसका एक नौजवान सपना देखता है - एक अच्छी खासी नौकरी, मोटी तनख्वाह, एक स्मार्ट प्रेमिका। लेकिन अर्पित यहाँ मिसफिट है क्योंकि उसे कामकाज का मशीनी अन्दाज़ पसन्द नहीं। उसके लिए हर इंसान बराबर है। वह किसी को उसके पद या तनख्वाह से नहीं आँकता। वह अपने से बड़े को इज्जत देता है। वह दूसरों के दुख पर दुखी होता है। वह किसी को कष्ट पहुँचाने के बारे में नहीं सोच पाता। लेकिन उसके ये सारे गुण ही उसके लिए बाधा बन जाते हैं क्योंकि कॉरपोरेट कल्चर इनकी इजाजत नहीं देता। वहाँ तो दूसरे के कन्धे और सिर पर पैर रखकर आगे बढ़ जाना होता है। लेकिन अर्पित को यह मंज़ूर नहीं। उसे कुछ लोगों को नौकरी से निकालने के लिए कहा जाता है। पर वह भारी द्वंद्व में पड़ जाता है। वह खुद से बड़े अपने अधीनस्थों की निजी ज़िन्दगी को जानता है। वह उनकी नौकरी चले जाने की स्थिति में उनके कष्ट की कल्पना कर सिहर जाता है। वह अपनी उलझन अपने बॉस और अपनी प्रेमिका से बताता है। दोनों की राय यही है कि वह अपनी संवेदना को परे रख कर नौकरी करे। अपने अधीनस्थों की चिन्ता करना उसका काम नहीं है। अर्पित के मन में एक बड़ा सवाल उठता है कि आखिर वह दोहरी ज़िन्दगी कैसे जिए? ऐसा कैसे हो सकता है कि वह नौकरी में निर्मम और कठोर रहे और उससे बाहर एक सहज व संवेदनशील इंसान बन जाए। वह विभाजित व्यक्तित्वों में जीने को तैयार नहीं। उसे लगता है नौकरी ही जीवन को निर्धारित करने लगी है। वह अपने सीनियर्स की इस गति को नहीं पाना चाहता, ‘‘मैं अपने सीनियर्स को देख रहा हूँ न। वे केंचुए में बदल गए हैं। न जाने कितने समझौते कर रहे हैं सिर्फ नौकरी बचाने के लिए। उन्हें डर है कि नौकरी चली गई तो अपने मकान की, अपनी गाड़ी की ईएमआई (किश्तें) कैसे भरेंगे। इसके अलावा उनके जीवन में कुछ है ही नहीं। वे कुढ़कर, रोकर नौकरी कर रहे हैं। नौकरी करने वाले रोबोट हैं वे। वे किसी के खिलाफ बोल नहीं सकते, इस डर से कि कहीं नौकरी न चली जाए। वे अपनी मर्जी से हँस नहीं सकते कि कहीं नौकरी न चली जाए। सोचो, ऐसे लोग कभी समाज के बारे में सोचेंगे, देश के बारे सोचेंगे। या यह सब छोड़ दो, अपने ही बारे में सोचेंगे क्या?’’

चूँकि समाज एक खास तरह से सोचने का आदी हो चुका है, इसलिए अर्पित की प्रेमिका को उसकी बातें समझ में ही नहीं आतीं और वह उसे छोड़कर चली जाती है। अर्पित एक अद्भुत निर्णय लेता है। वह अपने विभाग से किसी को और नहीं निकालता बल्कि इसके लिए अपने नाम की सिफारिश कर डालता है। इस तरह तमाम सुख-सविधाओं को छोड़कर अपने जीवन को दाँव पर लगा देता है। लेकिन यहाँ मामला सिर्फ नौकरी छोड़ने का नहीं है। वह अपने तरीके से जीने का फैसला करता है। अर्पित एक नज़र में आदर्शवादी चरित्र मालूम पड़ता है। भला कौन होगा जो आज के दौर में अपनी नौकरी इस तरह गँवा दे? सच्चाई यह है कि अर्पित एक विरला या असाधारण पात्र है, मगर काल्पनिक नहीं। लेखक ने उसका सृजन वास्तविकता के धरातल पर ही किया है। पिछले दिनों एक खबर से पता चला कि कई लड़कों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की ऊँची तनख्वाह की नौकरियों को लात मारकर, सरकारी उपक्रमों की नौकरी ज्वाइन की क्योंकि वे जीवन में सुकून चाहते थे। ऐसे भी उदाहरण हैं कि विदेश में मोटी कमाई कर रहे कई भारतीय स्वदेश लौटकर अपने मन-मुताबिक रोजगार या खेतीबाड़ी में लग गए। कई लड़के-लड़कियाँ अपना अच्छा-खासा करियर छोड़कर समाजसेवा में लगे हुए हैं। इसलिए अर्पित का चरित्र वास्तविक है। उसके जरिए कथाकार ने पूँजी पर मनुष्यता को स्थापित किया है। हिन्दी के लिए यह अपेक्षाकृत एक नया विषय है क्योंकि अभी हिंदी समाज में कॉरपोरेट का जाल पूरी तरह नहीं फैला है। लेकिन वह धीरे-धीरे अपनी गिरफ्त में समाज को लेता जा रहा है। इस तरह यह कहानी भविष्य के एक खतरे के प्रति आगाह भी करती है।

दूसरी कहानी के रूप में आकांक्षा पारे काशिव की कहानी ‘सखि साजन’ पठनीय है। हिंदी साहित्य में कई विषय और विचार ऐसे हैं, जिन्हें जानते-मानते सभी लोग हैं, लेकिन जिन पर लिखना लगभग वर्जित ही माना जाता है। यदि कोई लिखता है तो उस पर बोल्ड का ठप्पा लगना तय होता है। यह भी सच है कि कई बार कहानियों को ग़ैर-जरूरी ढंग से सनसनीखेज बनाने के लिए कुछ ऐसे तत्व डाल दिए जाते हैं जो आवश्यक नहीं होते। विश्व साहित्य के बरअक्स देखें तो हिंदी में अभी बहुत से विषय हैं जो अछूते हैं और उन पर काम होना बाकी है। यौनिकता को लेकर भारतीय साहित्य में हमेशा से ही शुचितावाद का रवैया रहा है। लेकिन यह शुचितावाद किन बातों के लिए होना चाहिए इसके कोई मापदण्ड तय नहीं हैं। स्त्री-पुरुषों के संबंधों पर तो फिर भी कलम चलाई गई है। लेकिन एक स्त्री का संबंध स्त्री से हो तो? विशुद्ध रूप से पाश्चात्य-से लगने वाले इन सम्बन्धों पर आजकल तो भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में भी बातें होने लगी हैं। यह अलग बात है कि हिंदी में अभी भी इस पर ठोस या उल्लेखनीय कुछ कम ही हुआ है। अंग्रेजी में तो फिर भी इन लेस्बियन-गे-बाइसेक्सुअल-ट्रांसजेंडर यानी एलजीबीटी सम्बन्धों पर बात हो रही है।

इस मुद्दे पर बात इसलिए क्योंकि जब मैंने आकांक्षा पारे काशिव की कहानी ‘सखि साजन’ पढ़ी तो लगा कि हिंदी में आखिर इस विषय पर बात क्यों नहीं हो रही है! सखि साजन के नाम से कुछ-कुछ तो इस विषय पर अन्दाज़ा होता है लेकिन कहानी जिस ढंग से आगे बढ़ती है वह तरीका नया है और सराहनीय है। इस कहानी की खास बात यह है कि न इस कहानी में कहीं लेस्बियन शब्द इस्तेमाल किया गया है, न कहीं ऐसे उत्तेजक, भड़काऊ संवाद या दृश्य दिखाई पड़ते हैं। इस कहानी में जैसी पीड़ा और वेदना साथ-साथ समानान्तर रूप से चलती है, उसका अहसास करने के लिए पाठक को माथे पर शिकन लानी पड़ती है क्योंकि इस कहानी में शब्द-चित्र के माध्यम से पाठकों की आँखें नम ज़रूर होती हैं।

डायरीनुमा शैली में लिखी गई इस कहानी में दो पात्रों की ज़िन्दगी कैद है जिसे तीसरा ही कोई पढ़ रहा है। जो पढ़ रहा है वह अपराधी के साथ जुड़ा हुआ व्यक्ति है। डायरी का एक-एक सफ़ा उस ज़िन्दगी को खोलता है, जो प्रकृति के विरुद्ध जी गई है। इसमें लेखिका ने कहीं भी इसे खुद से प्रकृति के विरुद्ध नहीं कहा है। न इसे कोई मनोविकार बताया है। यही इस कहानी की खूबी है। जो घट रहा है वह कोई रोक नहीं रहा और जब यह सिलसिला थमा तो कुछ दरक गया। अगर लेखिका चाहती तो अन्त में भाषण का सहारा ले सकती थी। लेकिन इस कहानी की मज़बूती ही यही है। इस कहानी का दूसरा अनोखापन यह है कि जिस शब्द का स्पष्ट रूप से कहीं भी किसी भी प्रकार से कोई उल्लेख तक नहीं किया गया है, वही पंक्तियों के बीच में लगातार चलते हुए इस कहानी की केन्द्रीय थीम बनकर उभरता है। एक नए विषय पर कहानी लिखकर लेखिका ने यह जताया है कि बिना कुछ शब्दों की साफ साफ कहन से बचते हुए कैसे समाज में आ रहे बदलावों को चित्रित किया जा सकता है।

तीसरी कहानी के रूप में पंकज सुबीर की कहानी ‘सी-7096 (यानी सी-सेवेन ज़ीरो नाइन सिक्स)’ का उल्लेख करना उचित लगता है। यह कहानी ‘बनास जन’ पत्रिका में वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई थी। वर्ष 2013 में मुम्बुई हमले के आरोपी अजमल कसाब को फाँसी दी गई और यह कहानी 2014 में सामने आती है। कहानी का प्रकाशन मेरे लिये दो मायनों में महत्वपूर्ण था, पहला तो यह कि कहानी उस शैली या शिल्प में नहीं थी जो अमूमन पंकज सुबीर की पहचान है। दूसरा यह कि इस कहानी को युवा आलोचक पल्लव ने ‘बनास जन’ हेतु स्वीकार किया था। यदि कोई आलोचक साथ में सम्पादक भी है तथा वह किसी रचना को अपनी पत्रिका में प्रकाशित करने हेतु चयनित करता है, तो रचना दो स्तरों से गुज़रकर प्रकाशित होती है, पहला आलोचकीय स्तर की गेटकीपिंग का तथा दूसरा संपादकीय नज़रिये का स्तर। ‘बनास जन’ में प्रकाशित होना इस बात की पुष्टि थी कि कहानी ने दोनों स्तरों को संतुष्ट¸ किया होगा। इस कहानी का नाम बाद में संग्रह प्रकाशित करते समय ‘सी-7096’ से बदलकर ‘कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन’ कर दिया गया। संग्रह पढ़ने के बाद जब मैंने पंकज भाई से पूछा तो उन्होंने बताया कि नाम बदलने का कोई विशेष कारण नहीं था, बस यह लगा कि ‘सी-7096’ शीर्षक पाठक को शायद कुछ ज्यादा ही उलझा रहा है। अब पाठक इस कहानी को ‘कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन’ के नाम से ही जानते हैं।

बतौर कहानीकार, ‘‘असल में कहानी का जन्म उस एक पंक्ति से हुआ था जो कसाब ने मरने से पहले कही थी ‘मेरी अम्मी को बता देना’। इस पंक्ति ने बहुत अंदर तक हिला दिया था और इसी के चलते कहानी ने जन्म लिया। जब कहानी लिखने का सोचा तो सबसे पहली मुश्किल यह थी कि कहीं ऐसा न हो कि कहानी आतंकवाद और उससे जुड़ी हुई घटनाओं को जस्टीफाई करने लगे। तब कहानी में दूसरे पात्र के रूप में महात्मा गांधी का विचार आया। इसलिए भी क्योंकि, यरवदा जेल जहाँ पर कसाब को रखा गया, वहीं पर अंग्रेज़ों ने गांधी को भी रखा था। तो एक काल्पनिक मुलाकात की भूमिका तो यरवदा नाम के कॉमन फैक्टर को बीच में रख कर बनाई जा सकती थी। गांधी का होना कहानी को कहीं भी फिसलने नहीं देगा। और इस माध्यम से हिंसा और अहिंसा के बीच के द्वंद्व को ठीक प्रकार से दिखाया भी जा सकेगा।’’ एक पाठक के रूप में आज यह आसानी से कहा जा सकता है कि कहानी में ऐसा संभव भी हुआ। कसाब की आक्रामकता और गांधी का मौन, इन दोनों का जो द्वंद्व दिखाया गया है, वह उभरे हुए शिल्प की तरह सामने आता है। गांधी की उपस्थिति ने कहानी को कसाब के अथवा किसी भी पक्ष में झुकने नहीं दिया, स्वयं गांधी के पक्ष में भी।

कहानी का निचोड़ यह है कि दुनिया में आतंकवाद का पहला कारण आर्थिक असमानता, भूख, गरीबी और बेरोज़गारी है। यदि इन समस्याओं का निराकरण हो जाए तो शायद आतंकवाद भी नहीं रहेगा। लेकिन हो यह रहा है कि आतंकवाद का सामने से कारण धर्म ही दिखाई देता है, क्योंकि बाहरी और स्पष्ट कारण वही दिखता है, आसानी से दिखता है और प्रचुरता से दिखता है। कोई यथार्थ की भीतरी तहों को उघाड़ने की जहमत ही नहीं उठाना चाहता। यह कहानी इन्हीं अन्तर्निहित तहों की पड़ताल की कहानी थी। वह जो नहीं दिख रहा है उसकी तलाश की कहानी थी। कसाब के घर में दोनों वक्त खाना बन जाए इतनी व्यवस्था भी नहीं थी, उसकी पढ़ाई छूट गई थी, घर में भुखमरी थी, जिसके चलते पिता ने उसे आतंकवादी संगठन के हाथों बेच दिया था। कसाब को बेचकर घर की आर्थिक स्थिति सुधारी गई थी। कहानी इसी एक घटना पर केन्दि्रत होकर चलती है और एक गहरी समाजार्थिक विसंगति को ठीक से स्थापित करती है।

यह कहानी तीन स्पष्ट खण्डों में बँटी हुई है। पहला खण्ड वह है, जहाँ पर कसाब आक्रामक है और गांधी मौन हैं। यहाँ पर कसाब बहुत तीखे सवाल करता है, देश, काल और स्वयं गांधीजी के बारे में भी। दूसरा खण्ड वह है, जहाँ पर दोनों सम यानी एक समतलता पर नज़र आ रहे हैं। एक दूसरे को समझने का, जानने का प्रयास कर रहे हैं। तीसरा खण्ड वह है, जहाँ पर गांधीजी हिंसा को खारिज करने के अपने सिद्धान्त के उजाले में कसाब को खड़ा हुआ छोड़कर निकल जाते हैं। इन तीनों खण्डों के सन्धिस्थल बहुत सॉफ़्ट ट्रांज़ीशन के साथ रचे गए हैं, ताकि पाठक को किसी भी प्रकार का झटका नहीं लगे। हृदय परिवर्तन जैसी कोई मेलॉड्रामिक स्थिति नहीं बने। हिंसा और अहिंसा में वैचारिक टकराहट हो। फिर यह भी हो कि पाठक उस मेटाफ़र को भी समझे जिसमें कहानी रची गई है, नहीं तो यह प्रश्न भी सामने आ जाएगा कि कसाब जैसा अनपढ़ और ज़ाहिल लड़का इतिहास और भूगोल के ऐसे-ऐसे प्रश्न कैसे कर सकता है। पाठक यह समझ सके कि यह मुलाकात एक वरचुअल मुलाकात है, और यहाँ गांधी और कसाब व्यक्ति नहीं है, बल्कि वे दो विचारधाराओं के प्रतीक के रूप में एक वरचुअल स्पेस में भिड़ रहे हैं। हालाँकि यह भी सच है कि कसाब ने जेल में रहते समय गांधी की आत्मकथा का अनुवाद तथा कुछ अन्य पुस्तकें भी पढ़ी थीं। गांधीजी जब तीसरे खण्ड में आक्रामक होते हैं तो कुछ मेलॉड्रामिक संवाद वहाँ आ गए हैं जैसे इसी लाठी से तोड़ दूँगा इन नरभक्षी इमारतों को। वहाँ पाठकों को थोड़ा अखर सकता था।

पंकज सुबीर ने ध्यान रखा है कि कहानी में बहुत अधिक पात्रों की गुंजाइश नहीं थी। अधिक पात्र कहानी का सन्तुलन बिगाड़ सकते थे। चूँकि मूल कहानी तो हिंसा में अन्तर्निहित तत्वों पर आधारित है, वे तत्व जो भूख और गरीबी जैसी चीजों की उपज हैं, न कि किसी धर्म की। धर्म तो हिंसा को ग्लोरिफाई तथा जस्टिफाई करने हेतु है ताकि जो आ रहे हैं उनके आने हेतु एक अतिरिक्त और सरल-खाँचाबद्ध आकर्षण भी बना रहे। गांधी ने इस कारण को बहुत पहले जान लिया था इसीलिए हिंद स्वरराज की बात कही थी, समानता की बात कही थी। गांधी जानते थे कि पढ़े-लिखे और भरे-पूरे लोगों को बरगलाया नहीं जा सकता। यदि समाज में समानता है तो हिंसा स्वयं ही अपना स्थान बनाने में नाकाम हो जाएगी। तब बड़ी-बड़ी लफ्फ़ाजियों की आवश्यकता नहीं रह जाएगी अहिंसा के पक्ष में। ‘सी-7096’ अथवा ‘कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन’ कहानी आज़ादी के भी पहले से आज तक और भविष्य में भी जाती है। दोनों पात्रों के साथ वह जाने कितने और पात्रों की रचना और उन पर चर्चा करती है। भूत भविष्य और वर्तमान तीनों की कहानी है यह।

चौथी कहानी अनघ शर्मा की ‘सब सीमाब सुनहरे’ है जिसके ज़िक्र से पहले यह कहना समीचीन लगता है कि कहानी क्या होती है? उसे कैसी होना चाहिए? और उसे कैसे लिखा जाये? इस पर हर लेखक का अपना निजी दृष्टिकोण हो सकता है7 पर कहानी पढ़कर पाठक को क्या महसूस हुआ, यह कहानी और उसके कहन की मुख्य बात है। अनघ शर्मा की जिस कहानी का ज़िक्र मैं कर रहा हूँ वो लमही के जुलाई-सितम्बर’15 के अंक में प्रकाशित हुई है। कहानी यूँ सरसरी तौर पर देखी जाये तो अपने सीधे-सादे कथ्य को कहती भर है। पर अगर इसे संवेदना के स्तर पर पढ़ें तो यह दो स्ति्रयों के अपने-अपने संघर्ष को बयान करती है। कहानी एक साथ दो स्तरों पर बात करती है। एक कहानी की नायिका छोटी नानी की तरफ़ से, दूसरी सहनायिका जानकी की तरफ़ से। कहानी लेखक के चिर परिचित अन्दाज़ में लिखी गयी है। एक नए तरीके से फ्लैशबैक से वर्तमान में लौटती हुई और बिम्बों से आगे बढ़ती हुई।

‘सब सीमाब सुनहरे’ कहानी में दो स्ति्रयों के एक साथ एक अनुभव और जीवन जीने को रूपायित किया गया है आपसी सहमति और असहमति के साथ। कहानी में नया क्या, अब ये बात आती है। अनघ की जितनी भी कहानियाँ आयी हैं सब 2010 के बाद ही आई हैं। उनकी कहानियों के कथानक नए होकर भी एक खास किस्म के अतीत को साधते हुए चलते हैं। यह कहानी एक साथ भाषा और बिम्ब के कई प्रयोग करती है और संवादों के भी, यहाँ तक कि कहानी में दिखाया गया पक्षी का बिम्ब भी कई जगह बोलता-सा नज़र आया है, ‘‘परिंदा सोच रहा था कि ये वही जानकी है। कितनी बदल गयी है। बाल कानों तक कटवा दिए है और टखनों तक जाने कैसी साड़ी लपेट रखी है। उल्टे हाथ की कलाई में कभी एक कंगन हुआ करता था। जाने कहाँ गया ? अब तो दोनों कलाइयाँ कोरी हैं। शिव मन्दिर की पुजारिनें इतनी नीरस, रूखी क्यों होती हैं?’’ कहानी की पृष्ठभूमि दक्षिण भारत का एक छोटा-सा शहर और उसका मन्दिर है। कहानी का एक हिस्सा पौराणिक बिम्बों के सहारे आगे बढ़ता है और रूढ़ियों पर प्रहार भी करता है। जैसे कि पश्चिम बंगाल की स्ति्रयों का नौकरी के लिए उत्तर भारत आना या शादी के नाम पर होने वाली खरीद-फ़रोक्त का ज़िक्र, कहानी छोटे हिस्सों में ही सही पर कई जगह फैली हुई इन कुरीतियों के बारे में बताती है और उनका विरोध भी करती है। ईश्वर भी इसमें सामान्य चरित्र की तरह ही आता है और कथानक का एक प्रमुख हिस्सा भी है।

यह कहानी स्त्री विमर्श की न होकर भी एक खास तरह का विमर्श करती है और स्त्री स्वतंत्रता की हिमायत करती है। कुछ संवादों में इसे बखूबी देखा जा सकता है; जैसे - ‘‘हर जिन्दगी एक खास मकसद के लिए होती है, इसे यूँ ही किसी फ़िज़ूल रूमानियत के लिए बर्बाद नहीं करते। रूमानियत बस थोड़ी ही देर साथ देती है, जो दूर तक हाथ पकड़कर साथ चले, झट उसकी हथेली थाम लेनी चाहिए।’’ एक और संवाद कहानी को गम्भीर बनाता है, ‘‘यूँ अपना आप खुद नहीं मिटाते जानकी, किसी कहानी की नायिका होना, प्रोटागोनिस्ट होना, ये कब कहता है कि आप लीक और लोक दोनों को तोड़ ही न सकें।’’ आज के सम्बन्धों के मानवीय पहलुओं को दिखाने वाला यह वर्णन भी उल्लिखित किया जाना चाहिए, ‘‘सम्बन्ध की मजबूती उसके साहचर्य में होती है न कि उसे ज़िम्मेदारी मानने में। सबको अपना-अपना बोझ खुद ही उठाना पड़ता है। इसे उठा कर चलने वाले को कभी-कभी बीच बीच में रुककर तलवों पर कड़वा तेल और पानी मिलाकर लगाते रहना चाहिए। एक तो थकान मिटती है और छाले भी नहीं पड़ते। बिन छालों के पैरों से चलोगी तो दूर तक चल पाओगी और कन्धों के बोझ को भी सँभाल पाओगी। मोंटी तुम्हारे जीवन का छाला है, इसे निकालो और कोई रुई का फाहा धरो।’’

कहानी ने कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति के लिए कुछ नए शब्द-चित्र भी गढ़े हैं जैसे एक जगह बादलों के लिए ‘‘छाँव के बड़े बड़े टुकड़े’’। इस कहानी की सबसे अच्छी बात यह है कि कहानी के सभी पात्रों में एक साफ़गोई है, अपने किसी भी लिए हुए निर्णय के लिए उन्हें कोई झिझक नहीं है। कहानी अपने कहने की शैली में भाषा का एक नया विस्तार दिखाती है। मिथकीय बिम्बों और पत्र शैली से बुनी यह कहानी अपनी बात कहने में पूरी तरह से सफल प्रतीत होती है।

पाँचवीं कहानी अमिय बिन्दु की ‘मोती’ है, जो मुझे बहुत पसन्द आई है। छीजती सम्वेदनाओं के दौर में जबकि हमारी ज़िन्दगी से इंसान बेदखल होते जा रहे हैं, ‘अक्षर पर्व’ में प्रकाशित अमिय बिन्दु की यह कहानी बरबस पाठकों का ध्यान खींचती है। जानवरों को लेकर पहले तो बहुत सारी कहानियाँ लिखी गई हैं लेकिन वर्तमान दौर में ऐसी कहानियों को याद करने के लिए दिमाग़ पर बहुत ज़ोर डालना पड़ता है। इस कहानी में कुत्ता मोती ही नायक है। वह आधुनिक शहरी परिवारों में पलने वाला ‘पेट (क्कद्गह्ल)’ नहीं है जो तमाम तरह के फ़ैशन, स्टेटस-सिम्बल और अकेलेपन का विकल्प हो।

‘मोती’ कहानी का सूत्रधार अपने बचपन में गली में खेलते समय कराहता हुआ पिल्ला देखता है और उसे उठा लाता है। अपने पिताजी के विरोध और बाज़दफ़ा उसे छोड़ आने के बावज़ूद वह उसके परिवार का हिस्सा बन जाता है और उसका इंसानी नामकरण होता है। इसके बाद उसे कहानी में मोती नाम से जाना जाता है। नामकरण भी दरअसल उस बदलती बयार का संकेत है जो आजकल फैशनेबल पेट्स में नहीं पाया जाता बल्कि उन्हें सजावट की तरह इस्तेमाल किया जाता है। मोती उस घर का ज़िम्मेदार सदस्य बनकर रहता है। भले ही उसे कार में न घुमाया गया हो, उसे गोद में न लिया गया हो, उसे उतना दुलराया न गया हो।

समय का फेर देखिये, जब मोती को शरण देने वाला लड़का अपने घर से काफी दूर कहीं बड़े शहर में नौकरी करने चला जाता है तो मोती घर पर अकेले बच गए माँ-बाप के अकेलेपन का सहारा बन जाता है। वही पिताजी जो कभी उसे भगा देने को तत्पर थे, उसे अपने बुढ़ापे की लाठी की तरह देखते हैं। जीविका की खोज में घर छोड़ चले बच्चों के पीछे माँ-बाप कितने अकेले हो जाते हैं इसे भी यह कहानी बखूबी रेखांकित करती है। गाँव और छोटे कस्बों में तो यह हर परिवार की नियति ही बन चुकी है। संयुक्त से एकल परिवार तक और फिर नाभिकीय परिवार से लिव-इन रिलेशनशिप, और इसके बाद इतने अधिक एकाकी बनकर हम इतने आत्मरत होते जा रहे हैं कि हमारे जीवन में दूसरे का प्रवेश हस्तक्षेप की मानिंद होता जा रहा है। स्वयं पति-पत्नी जैसे औपचारिक और प्रेमी-प्रेमिका जैसे अनौपचारिक सम्बन्धों में भी ‘स्पेस’ के नाम पर एक भयानक खामोशी पसरती जा रही है। यह खामोशी इन सम्बन्धों के चरमराकर टूट जाने पर भी नहीं हटने वाली। अपने-अपने इलेक्ट्रॉनिक गैज़ेट में खोये आसपास की दुनिया से बेखबर समय के एक ही कम्पार्टमेंट में यात्रा कर रहे अजनबियों के समय में यह कहानी मानवीय सम्वेदनाओं के लिए एक मर्मवेधी माहौल रचती है।

अस्तित्ववाद के बाद विखण्डनवाद, और उसके बाद भी एक लम्बा दौर तय कर लेने के बावजूद इंसान अभी तय नहीं कर पा रहा है कि उसके आगे बढ़ने की दिशा क्या हो? सारे आन्दोलन मूलगामी सिद्ध हो रहे हैं और हमारे गाँवों और कस्बों में जीवन बचे-खुचे लोगों से ही चल (रेंग) रहा है। महानगरों और राजधानियों की ओर कूच कर गए लोग अब इन लोगों के लिए बाहरी साबित होते हैं। संचार के द्रुत साधनों के बावजूद अब वे समाज का हिस्सा नहीं रह गए हैं। उनकी चिंताओं के बरअक्स गाँव और कस्बों की ज़िन्दगी हाशिये पर कर दिए गए लोगों की ज़िन्दगी है जिसमें गाहे-बगाहे झाँक लेने में कोई बुराई नहीं है। दूसरी ओर गाँवों और कस्बों में बच गए लोग उनकी ओर उसी उम्मीद और आसरे से देखते हैं। उनकी तस्वीर और यादों को उनसे जुड़ी चीज़ों में सहेजने की असफल कोशिश करते हैं मगर काल की मार से कुछ कहाँ बच पाता है! लेकिन कहानी खोए हुए मोती के माध्यम से यह एहसास-ए-सुखन जरूर देती है कि कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलेंगी और इंसानी ज़ज्बात इन्हीं चीज़ों में शामिल हैं।

कहानी की विशेष बात यह है कि वह कहीं भी शोर नहीं मचाती। न तो पीछे छूट आए माँ-बाप के अकेलेपन को लेकर अलग से कुछ कहती है और न ही मोती के प्रति अतिरिक्त सजगता दिखाती है। लेकिन जब सूत्रधार की घर से वापसी वाले दिन शाम को मोती घर नहीं लौटता तो कुछ वाक्यों में ही सारी सम्वेदनाएँ सतह पर आ जाती हैं। कहीं किसी वाद का ज़िक्र नहीं और न ही पलायन या बेदखली जैसी अनुभूति, लेकिन बूढ़े होते जा रहे पिता की रात भर की चिन्ता और सुबह-सबेरे मॉर्निंग वॉक के नाम पर मोती को खोजने निकल जाना मन को गीला कर देता है। शिल्प हालाँकि बहुत साधारण है जिसे और चौबस्त किया जा सकता था लेकिन कथ्य की सम्वेदनाएँ उस ओर नज़र ही नहीं जाने देंती। माँ-बाप को घर छोड़कर महानगरों में रह रहे हम जैसे लोगों को यह कहानी और भी अपनी लगती है। जीने का सहारा कोई भी हो सकता है लेकिन यह तय है कि सहारा चाहिए। फिर भी, मनुष्य न जाने क्यों और अकेले, और अकेले होते जाना चाह रहा है। गाँवों और कस्बों में तो आज भी तमाम तरह के पशु-पक्षी हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं, मगर महानगरों में एकाकीपन, सन्त्रास, अवसाद और उदासी में डूबे लोगों के लिए पेट्स एक मेडिकल ज़रूरत बनते जा रहे हैं।

छठवीं कहानी विवेक मिश्र की ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ है। यह दरअसल, आज के भयावह शोर के बीच स्मृतियों में दबी खामोशियों को टटोलता हुआ, टूटती हुई पितृसत्ता और ढहते हुए मूल्यों के बीच एक मध्यमवर्गीय परिवार की घुटन और डर के तिलिस्म में फँसे सदस्यों के जीवन की मामूली घटनाओं, उनसे उपजे द्वन्द्वों को, उनके छोटे-छोटे सुखों-दुखों में डूबकर सुनाया गया एक बेजोड़ किस्सा है। इसमें पत्नी अपने पति की बेवफाई और उपेक्षा झेलती हुए इतनी संवेदनहीन हो जाती है कि अपने एक बच्चे की मौत पर भी रो नहीं पाती। ये आँसू पति की मृत्यु से कुछ मिनट पहले, उसकी अपने व्यवहार की स्वीकारोक्ति से भरभराकर निकल पड़ते हैं और फिर जीवन्तता की प्रतीक गिलहरियाँ घर की चारदीवारी पर पैर जमाकर बैठ जाती हैं। पूरी कहानी में पाठक एक अजीब से सम्मोहन में बँधा लेखक के साथ चलता है और कहानी के अन्त में यह सम्मोहन जब टूटता है तो साथ ही साथ पितृसत्ता का जादू भी टूटता है।

सहज और सरल भाषा में कहानीपन को बरकरार रखते हुए विवेक मिश्र की कहानियाँ एक साथ कई स्तरों पर घटती हैं। यहाँ भी कहानी सिर्फ इतनी ही नहीं है कि यह एक स्त्री की घुटन और उससे उत्पन्न जड़ता को उसकी निरन्तरता के साथ बयाँ करती है, बल्कि यह इस तरह कही गई है कि इसको पढ़ते हुए पाठक उस घुटन को अपने ही अन्दर महसूस करने लगता है। यहाँ माँ का अकेलापन, पिता की चुप्पी, ताई का तिलिस्म, घर के एकान्त की सघनता, उसके आसपास तैरता रहस्य, मरा हुआ मँझला भाई, कम उम्र बहन की प्रौढ़ता को छूती समझदारी और उसका धीरे-धीरे माँ में तब्दील होते जाना, मरते हुए पिता की माँ को देखने की इच्छा के बहाने आत्मग्लानि या कि आत्मबोध होना, माँ का आकर पहली बार पिता की कुर्सी पर बैठना आदि ऐसे प्रसंग हैं जहाँ कहानी एक साथ कई स्तरों पर घटित होती हुई दिखाई देती है।

कहानी के अन्त में एक पत्नी, एक माँ के तनाव का आँसुओं में बह निकलना, हजारों स्ति्रयों के सदियों से रुके आँसुओं का बह निकलना ही लगता है। धीरे-धीरे घर की दीवारें साँस लेने लगती हैं, पाठक का मन भी जैसे शान्त होकर पैर जमाती गिलहरियों के साथ हल्के-से मुस्कुरा उठता है। विवेक मिश्र का स्ति्रयों के पक्ष में खड़ा कथाकार मन अद्भुत है, जो न सिर्फ स्त्री मन की पड़ताल करता है, बल्कि उसके रेशे-रेशे से परिचित भी कराता जाता है। स्त्री के पक्ष में खड़ी इस कहानी की खासियत ही यही है कि यह किसी विमर्श के इर्द-गिर्द नहीं बुनी गई है बल्कि घटना खुद विमर्श के नए आयाम खोलती हुई पितृसत्ता के विरुद्ध मौन परन्तु पूरी दृढ़ता से खड़ी स्त्री की बात गहन संवेदना के साथ पाठक तक पहुँचाती है। विवेक मिश्र ‘गुब्बारा’, ‘हनियाँ’, ‘पार उतरना धीरे से’ या ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ जैसी कहानियों से लेकर ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ तक अपनी-अलग भाषा और बिम्ब गढ़ते हुए लगातार आगे बढ़ रहे हैं। इस आगे बढ़ने में कहीं कोई दुहराव नहीं मिलता। वह हर कहानी में नए कथानक के साथ शिल्प और कहन का भी सन्धान करते हुए चलते हैं। जैसे इसी कहानी को पढ़ते हुए आपके सामने वह स्त्री आकर खड़ी हो जाती है जिसे हर स्त्री की तरह पराध्वनियाँ सुनाई देती हैं, ऐसी पराध्वनियाँ जिनके ज़रिये वह पुरुषों से अलग है पर इसमें कुछ ऐसा है कि वह हर स्त्री की तरह होते हुए भी, उनसे थोड़ा अलग है। मतलब उसका देखना अन्तर्मन के आर-पार देखना है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है पर लिखावट देखकर लिखने वाले के मन के भाव पढ़ लेती है। ऐसी कहानियाँ एक बार मन में बैठती हैं तो जीवन भर आपके साथ चलती हैं। इसलिए मुझे वर्तमान समय की कहानियों के प्रचलित कहन के टोटकों से अलग, जहाँ कहानी का कहानीपन गायब होता जा रहा है, विवेक मिश्र की उपस्थिति गहरे आश्वस्त करती है। इसके अतिरिक्त ऐसी कहानियाँ दूसरे कहानीकारों के लिए चुनौती भी पेश करती हैं।

सातवीं कहानी प्रेम भारद्वाज की कहानी ‘शहर की मौत’ है जो हमारे समय की अनेक आर्थिक-राजनीतिक और मानवीय विसंगतियों को बेहद बारीकी से रेखांकित करती है। नए शहरों और मॉल-कल्चर के हालिया उभार ने किस तरह हमारे देशजपने को खत्म कर दिया है, यही इस कहानी की आत्मा है। इस कहानी में चाची की चाय की वह दुकान, जिस पर चाय पीने वाले सभी लोग एक किस्म के घरेलू अपनापे का अनुभव करते रहे हैं, पूँजी के दबाव के आगे बेदखल होने के लिए मजबूर हो जाती है। यह दुकान महज एक दुकान नहीं है, शहर की एक प्रमुख मीटिंग सेंटर है। यहाँ सिर्फ चाय ही नहीं पी जाती, चर्चाएँ भी होती हैं - स्थानीय या राष्ट्रीय से लेकर अमेरिका और इराक तक की बातें। किसानों की आत्महत्या का सवाल हो, मेधा पाटेकर का आन्दोलन हो या फिर सिंगुर मामले पर ममता बनर्जी का अनशन ही क्यों न हो, दुनिया का कोई भी विषय इस चाय की दुकान पर होने वाले विमर्शों के दायरे से बाहर नहीं है। अमर्त्य सेन की भाषा में कहें तो आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन की यानी बतकही की पूरी परम्परा अपने इन्द्रधनुषी रंग में यहाँ सुलभता से मौजूद है। इसी दुकान पर चाय पी-पीकर बड़े होने वाले लोग आगे चलकर मुख्यमन्त्री तक बनते हैं लेकिन बदलते समय के साथ अपने सिद्धान्तों से समझौता कर लेते हैं और पूँजी तथा पूँजीवाद के आगे लाचार होकर घुटने टेक देते हैं।

कहानी ‘शहर की मौत’ आज के कॉरपोरेट ज़माने के इस द्वन्द्व को भी उजागर करती है कि किस प्रकार मीडिया चैनल वाले कुछ ‘स्टोरीज’ को यह कहकर खारिज कर देते हैं कि वह समाचारीय होने की बजाय साहित्यिक है और किस तरह साहित्यकार कुछ ‘स्टोरीज’ को यह कहकर दरकिनार कर देते हैं कि वह साहित्यिक होने की बजाय समाचारीय है। पत्रकारीय ढंग से कही गई इस कहानी में मुसलसल चलने वाला कथा-तत्व मजबूत है और गजब की किस्सागोई भी मौजूद है। ऐसी किस्सागोई जिसे पढ़ते हुए एक आम हिन्दी पाठक अपने जातीय परिवेश के लघु महासागर में गोते लगाने को मजबूर होने लगता है। प्रेम भारद्वाज का गम्भीर गद्य-लेखन पूँजीवादी आर्थिक नीतियों के सहज अमानवीय परिणामों को बहुत सहजता से बयाँ करता है। मानवता के प्रति लोगों की घटती संवेदना को यहाँ भ्रम और हकीकत के बीच चल रही लड़ाई के रूपक की शक्ल में पेश किया गया है। आज के तरक्कीयाफ्ता समाज में जो बीमारियाँ हैं, उनके प्रति प्रेम भारद्वाज बहुत सजग हैं। वे लिखते हैं कि भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में कर्मचारियों को अच्छा पैकेज इसीलिए दिया जाता है ताकि मनुष्यों का ‘सही इस्तेमाल’ किया जा सके।

आठवीं कहानी जिसका वर्णन-विश्लेषण करना आवश्यक लगता है, विमल चन्द्र पाण्डेय की ‘बाबा एगो हइये हँउएँ’ है। यह कहानी मैंने समालोचन ब्लॉग पर पढ़ी थी। यह कहानी अपनी संरचना में नई है, यहाँ दिल्ली पर थूककर उसे त्यागने के बिम्ब हैं, ‘अंगूर खट्टे हैं’ वाले भाव को विमल ने अपने व्यंग्यात्मक लहजे में इस कहानी के पात्र और स्थलों के ब्यौरे में बाकायदा बुना है। पत्रकारिता और साहित्य के मेलजोल को रूपायित करने वाली यह बहुकोणीय कहानी अपनी भाषिक संरचना में गजब की मजबूती प्रदर्शित करती है और पाठक के हृदय का इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम की तरह परीक्षण करती है। यह कहानी प्रवाहमान है और प्रवाहमान कहानी लिखना किसी भी कथाकार के लिए आसान नहीं होता, खासकर तब, जब उसमें समय की जटिल यात्रा का दस्तावेजीकरण भी करना हो। विमल के यहाँ यह दस्तावेजीकरण स्थानीयता की सोंधी खुशबू के साथ आता है। यह ऐसी स्थानीयता नहीं है कि दो-चार बनारसी शब्दों का घालमेल करके इसे दिखाने की कोशिश की जाए, बल्कि ऐसी स्थानीयता है जो कथ्य के हरेक वाक्य और शिल्प की हरेक सहज प्रस्तुति में आसानी से दिख ही जाया करती है। महानगरों के वैचारिक बुखार को मापने के लिए जिस वाचिक और भाषिक थर्मामीटर की जरूरत पड़ती है, वह विमल के पास है। वाक्यों की सहज-मृदुल संरचना की कहानीकार को बारीक और बेहद गहरी समझ है और वे चाहें तो कहानी की बुनावट और संरचनात्मकता की एक साहित्यिक फैक्टरी भी खोल सकते हैं।

नौवीं कहानी के रूप में कथाकार राकेश मिश्र की ‘सभ्यता समीक्षा’ का उल्लेख करना चाहूँगा। यह कहानी काफ़ी पहले पढ़ी थी, और तभी यह लगा था कि जॉन रीड की ‘टेन डेज़ दैट शुक द वर्ल्ड’ या नाज़ियों के दौर के अलग-थलग पड़े रहने वाले घेटो का इतना शानदार उपयोग किसी कथानक में किया जा सकता है। कहानी बहुत सारे खाँचों को तोड़ती है, मसलन किसी की शक्ल, बोली, पहनावा-ओढ़ावा या नाम का सरनेम वाला हिस्सा मात्र देखकर उसका किसी खास समुदाय से तादात्म्य स्थापित कर लेना खतरनाक किस्म का सरलीकरण हो सकता है। दरअसल इस कहानी का प्रतिपाद्य ही यही है कि हम क्यों कुछ स्टीरियोटाइप्स में जी रहे हैं, जीते ही चले जा रहे हैं और सहज सवालों से जूझने की बजाय उन्हें स्वयंसिद्ध (एक्जिअम) की तरह स्वीकार कर लिया करते हैं। कहानी के नैरेटर के बहाने राकेश मिश्र का ट्रीटमेण्ट ऐसा है कि इस कहानी में सचमुच सभ्यताओं की समीक्षा का विट-सा कुछ उठ खड़ा होता है। कहानी का कोमल पक्ष वह है जब समापन की तरफ बढ़ती कहानी में एक लड़की अपनी वेदना-व्याकुलता के चरम-बिन्दु को स्पर्श कर रही होती है। यह कहानी अपने भाषिक सन्तुलन, समय के प्रति कथाकार की गहरी समझ और उतने ही सटीक तरीके से उस समझ के वर्णन के लिए याद की जाती रहेगी।

दसवीं कहानी तरुण भटनागर की ‘गुलमेंहदी की झाड़ियाँ’ है, जो अभावों की कारुणिक कथा का साहित्यिक विस्तार है। यहाँ सुन्दर का अवयस्क होना उसकी रोज़ी-रोटी के लिए नकारात्मक साबित होता है। यह कहानी चीज़ों को स्याह-सफेद के विभाजन में देखने का विरोध करती है। ज़रूरी नहीं कि शराब पीने वाला आदमी बुरा ही हो, कभी-कभी ऐसा आदमी किसी गरीब और ज़रूरतमन्द को पचास की नोट भी दे सकता है। बिना किसी नैतिक अहंवाद के। कहानी एक बच्ची के मन में यथास्थिति को अन्ततः स्वीकार करवा लेती है क्योंकि वह बच्ची सोच लेती है कि गुलमेंहदी की झाड़ियाँ भले ही उसकी फ्रॉक और उसके शरीर को निरन्तर खरोंचते रहें, वह अब स्कूल के बारे में नहीं सोचेगी। पर कितना कोमल बालमन और सरल-हृदय है उसका, जब वह सोचती है, कि स्कूल के बारे में सोचो, तो कितनी जल्दी समय बीत जाता है। यह कहानी विकासशील और अल्पविकसित देशों में व्याप्त ऐसी समस्याओं का जायजा लेती है, जिस पर बातें तो कई दशकों से हो रही हैं, लेकिन जिनका कोई ठोस समाधान निकालने की ईमानदार कोशिश कभी की ही नहीं गई। तरुण की खूबी इस कहानी में यह है कि वे मानव-मन की छोटी-छोटी बुलबुलों-सदृश भावनाओं को अपेक्षित विस्तार दे पाने में सक्षम सिद्ध हुए हैं।

ग्यारहवीं कहानी कथादेश के दिसम्बर 2010 अंक में प्रकाशित कैलाश वानखेड़े की कहानी ‘कितने बुश कित्ते मनु’ है। यहाँ सरकारी तामझाम की निरर्थकता, फोटोकॉपी और फाइलबाजियों की विसंगतियाँ और व्यवस्था-तन्त्र की खामियों पर बारीक टिप्पणी है। यह कहानी हमें सोचने पर विवश करती है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र में आज़ादी के छह-सात दशक बाद भी कितना कुछ बदला है और कितना कुछ पूर्ववत जड़ बना हुआ है। कहानी बताती है कि सम्प्रेषण के माध्यम भले ही उन्नत होकर अब ई-मेल और फ़ैक्स की शक्ल में हमारे सामने आते हैं, लेकिन सम्प्रेषण के मुद्दे वही के वही और वहीं के वहीं हैं।

अन्त में बहुत विनम्रता के साथ यह स्वीकार करता हूँ कि इधर जो कहानियाँ मैंने पढ़ी हैं, उनमें से कुछ ऐसी कहानियों का ज़िक्र मैंने किया है, जिनकी चर्चा करना मुझे ज़रूरी लगा। खासतौर पर उनके किसी न किसी नएपन के कारण। यहाँ वर्णित सभी कहानियाँ इसी शताब्दी में प्रकाशित हुईं हैं, बल्कि कुछ तो काफी इधर ही यानी हाल-फिलहाल में ही छपी हैं। यह कोई सूची नहीं है। इसमें कोई रैंकिंग करने की कोशिश भी नहीं है। न तो इसका तात्पर्य किसी का भी उत्कर्ष-अपकर्ष दिखाना है, न ही कोई वरीयता या पसन्दगी-नापसन्दगी की सूची बनाना। यह भी कि, जिन कहानियों का उल्लेख नहीं किया है, उनमें से भी कई पढ़ी हैं, उनका आनन्द भी लिया है, लेकिन उन पर फिर कभी विस्तार से लिखा जाएगा।

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