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'मोबाइल-महाराज' की जय हो। / व्यंग्य / अशोक जैन 'पोरवाल'

 

(नारदजी को प्रथ्वीलोक में 'कण-कण में भगवान' के स्थान पर 'हाथ-हाथ में मोबाइल' दिखलाई दिये। मनुष्य 'मोबाइलमय भक्त और वातावरण पूर्णतः मोबाइलपंतीनुमा। शायद, इसलिए मनुष्य के जीवन का नेटवर्क पूर्णतः 'बिजी' होकर ठप हो गया है।)

 

''मोबाइल-महाराज की जय हो ......... मोबाइल मईयया की जय हो ''मोबाइलनाथ जिंदाबाद ........... मोबाइलस्वामी अमर रहे ........... संत मोबाइलेश्वर की जय .......... सलाम-ए-मोबाइल ...... मोबाइल सर इज ऑलवेज राइट ....... वेलकम मिस्टर 'स्मार्टफोन' एण्ड ब्यूटीफूल मिस मोबाइली (मिस्ड कॉल करने वाली) माई डियर डॉलिंग, 'मोबी' आई.लव.यू...........।'' आदि तरह-तरह की पृथ्वीलोक से जोर-जोर से गूंजती हुई आवाजें जब स्वर्गलोक में नारदजी सहित सभी देवताओं ने सुनी तो नारदजी ने वहाँ बैठे एक स्मार्ट और हैंडसमनुमा देवता से मोबाइल की उत्पत्ति के संबंध में पूछा तो उन्होंने उत्तर देते हुए कहा, ''पृथ्वीलोक के एकमात्र सतीप्रधान देश भारतवर्ष में एक पतिव्रता नारी (पत्नी) ने अपने एकमात्र आंशिक मिजाज और दिलफेंक पति को पूर्णतः अपने वश में करने के लिए स्वर्गलोक की 'सी' ग्रेड की एक अप्सरा से टिप्स स्वरुप आशीर्वाद मांगा कि उसका पति सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, घर-बाहर सभी जगह उसे अपने साथ रखे ........... उसका पूरा ध्यान रखे ........ उसे सुरक्षित रखे। उस अप्सरा ने जैसे ही तदास्तुः कहा। वैसे ही वो पत्नी 'मोबाइल' में बदल गई इस प्रकार मोबाइल का नाम जन्म हो गया।''

स्वर्गलोक के सभी देवताओं को मोबाइल-महाराज की इतनी अधिक लोकप्रियता का जब पता चला तो उन्हें मोबाइल-स्वामी से ईर्ष्या होने लगी। अतः उन्होंने नारदजी को पृथ्वीलोक में जाकर मोबाइलनाथ की सही औकात का पता लगाकर आज ही सूर्यास्त से पूर्व रिपोर्ट देने का आदेश दिया।

उक्त आदेश का पालन करते हुए नारदजी जैसे ही पृथ्वीलोक में पहुँचे। उन्हें चारों ओर से उपरोक्त सभी तरह की जयकारों की गूंजती हुई आवाजें सुनाई देने लगी थी। उन्होंने देखा, यहाँ का सम्पूर्ण वातावरण 'मोबाइलपंती' नुमा हो गया था। मनुष्य एक हाथ से मोबाइल पकड़कर अपने कान से चिपकाएं हुआ था। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से की करीना कपूर ने एक फिल्म में फेवीकॉल से फोटो चिपकाएं हुआ था।

कुछ टेढ़े किस्म के मनुष्य अपनी गर्दन टेढ़ी करके उस मोबाइल को गर्दन से दबाकर जोर-जोर से बड़बड़ा रहे थे। भीड़ में भी सभी मनुष्य अपने आपको अकेला महसूस करते हुए स्वयं से ही बातें कर रहे थे। बातें करते हुए वे न जाने कहॉ भागे-चले जा रहे थे? उपरोक्त मोबाइलपंती को देखकर नारदजी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने निश्चय किया कि इस मोबाइलपंती के कुछ महत्वपूर्ण दृश्यों को देखने और समझने के लिए उन्हें घटना-स्थल तक अवश्य ही जाना होगा। अंततः उन्हें मिस इंण्डिया फिल्म के अनिल कपूर नुमा अपना अदृश्य स्वरुप बनाया और क्रमशः पहुंचने लगे निम्न घटना स्थलों परः-

1. मंदिर का दृश्य :- 'कोई भी शुभ कार्य करने से पहले थोड़ा मीठा हो जाये'। यानिकि 'वो' चॉकलेट मिल जाये? या फिर 'फ्री' में भगवान का प्रसाद ही मिल जाये? कुछ ऐसी ही मानवीय मानसिकता के चलते नारदजी भी भगवान के दर्शन करने के लिए मंदिर में जा पहुँचे। उन्होंने वहाँ देखा, एक पुजारी भगवानजी की एक हाथ से आरती कर रहा था। और दूसरे हाथ से मंदिर में लगी घन्टी को बजाने का प्रयास। उसका हाथ उस घन्टी तक छू भी नहीं पाया था कि अचानक पुजारी की जेब से मोबाइल की घंटी की मधुर आवाजें आने लगी। पुजारी ने आरती बीच में ही रोक दी और लगे बतियाने मोबाइल फोन पर। (इस दृश्य को देखकर नारदजी ने पहला सबक यह सीखा कि पृथ्वीलोक में भगवान से पहले मोबाइल को प्राथमिकता दी जाती है।)

अस्पताल का दृश्यः- नारदजी सर्वप्रथम मृत्यु की सैयया पर लेटे हुए एक मरीज से मिलने एक अस्पताल के गहन चिकित्सा यूनिट यानी कि आई.सी. यू. में पहुँचे। वहाँ इतनी अधिक खामोशी थी कि, सुई गिरने तक की आवाज भी सुनाई दे सकती थी। किंतु, तभी एक डाक्टर के कोट की जेब से मोबाइल की जोरदार घंटी बजने लगी। घंटी की आवाज जोर से झटका मारने जैसी थी। जिसे सुनकर बेचारा पलंग पर लेटा हुआ 'वो' मरीज डरके पलंग पर उठकर बैठ गया। ( इस दृश्य को देखकर नारदजी को यह शिक्षा मिली कि डाक्टरी ईलाज में इतनी शक्ति नहीं होती है जितनी कि मोबाइल की घंटी में होती है)।

श्मशान का दृश्यः- नारदजी ने देखा, श्रद्धाँजलि देने के लिए शोकसभा चल रही थी। सभी लोग अपना-अपना मुँह लटकाएं बैठे हुए थे। एक व्यक्ति रुआँसू होते हुए बोलने की कोशिश कर रहा था। कि तभी उसके मोबाइल फोन की घंटी बजी और वो वहाँ भीड़ से खिसका और थोड़ी दूर जाकर हंसकर बतियाने लगा। (उक्त दृश्य को देखकर नारदजी ने महसूस किया कि मोबाइल रोते हुए मनुष्य को ही नहीं बल्कि गूँगे को भी हसकर बातें करना सिखला देता है)

हालाँकि उपरोक्त नाजुक मौकों पर मोबाइल 'स्विचऑफ' किया जा सकता है, या फिर उसे 'साइलेंट मोड़' पर रखा जा सकता है। किन्तु कमबख्त दिल की तरह मोबाइल की घंटी है, कि (स्पेशल कॉल सुनने की चाह में) मानती ही नहीं।

रेल्वे ट्रैंक का दृश्यः- नारदजी ने देखा कि सड़क छाप आवारा चार पैरों वाले जानवर विशेषकर कुत्ते आदि तक किसी भी वाहन को अपनी ओर आते देख वहाँ से भागकर एक ओर हट जाते है। ताकि वो स्वयं और वाहन चालक दोनों दुर्घटना से बच सके। किंतु दो पैरों वाला मोबाइलधारी प्राणी विशेषकर नवयुवक एवं नवयुवतियाँ अपने दोनों कानों में 'ईयरफोन' की रुई ठूंसकर चिल्लाचोट वाले गाने अपने मोबाइल के माध्यम से सुनते हुए सड़कों रेलवे ट्रैंक आदि जगहों पर जब चलते हैं, तो वे बाहरी आवाजों से पूर्णतः बेखबर होकर ...... एक प्रकार से बहरे हो जाते हैं। लिहाजा, वे अपने पास से गुजरने वाले किसी भी वाहनों......... यहाँ तक कि रेलों की तेज आवाजों को भी नहीं सुन पाते है। अंततः वे रेल से कटकर अपने मोबाइल सहित मोबाइल गति को प्राप्त हो जाते है। (ऐसे दृश्यों को देखने के बाद नारदजी को यह कन्फर्म हो गया कि 'भैंस के आगे बीन बजाने' से एक बार भैंस को हटया भी जा सकता है। किंतु, वैसे ईयर फोन सहित मोबाइलधारी को न तो हटाया जा सकता है और न हीं बचाया जा सकता है।)

परिवार की महिला सदस्यों की बातचीतों के दृश्यः- जिसे सुना है, नारदजी ने अपना अत्यंत ही सूक्ष्म स्वरुप बनाकर (जिसे नंगी ऑखों से नहीं देख जा सकता है) उन महिलाओं के मोबाइलफोनों के स्पीकरों पर बैठकर। तद्पश्चात नारदजी ने निम्न निष्कर्ष निकाले हैं-

लगभग 75 प्रतिशत बातें प्रायः गृहणियों द्वारा अपनी ससुराल पक्ष की महिलाओं की शिकायतें ...... उनकी निंदाओं उनकी चुगलियों से भरी होती है। शेष 25 प्रतिशत बाते ही काम की अथवा सकारात्मक होती है।

ऽ बेटी द्वारा अपनी ससुराल से सर्वाधिक बातें अपनी माँ से की जाती है। उन बातों का केन्द्र बिन्दु सर्वप्रथम 'सास' बनती है। तद्पश्चात, ननद, जैठानी और देवरानी इत्यादि।

ऽ जब कभी भी बहू का फोन उसके मायके से (माँ का) आता है। हमेशा ही सास को यह खटका बना रहता है कि जरुर बहू की माँ अपनी बेटी को मेरे प्रति भड़का रही होगी? या फिर मेरी निंदा कर रही होगी?

ऽ चूँकि, नारदजी को सूर्यास्त से पूर्व स्वर्गलोक में जाकर मोबाइल महाराज के संबंध में अपनी रिपोर्ट देनी थी। इसलिए उन्होंने तुरंत ही आगे के कुछ दृश्यों को छोड़ा और चलने की तैयारी करने लगे। तभी उनका ध्यान एक समाचार पत्र के विशेष निम्न समाचार पर गया। लिखा थाः- पृथ्वीलोक में 'नोमोफोबिया' (यानी कि नो मोबाइल फोबिया नामक एक फोबिया पैदा हो गया है। इससे पीड़ित व्यक्ति सोते समय भी अपना मोबाइल अपने पास रखता है। प्रायः 14 से 25 वर्ष की आयु के नवयुवक इससे सर्वाधिक पीड़ित होते है। भारतवर्ष में बेंगलूरु में देश का पहला 'इंटरनेट डी-एडिक्शन क्लीनिक' खोला गया है। इस नोमोफोबिया से छुटकारा दिलाने के लिए। आदि-आदि।)''

ऽ अंततः नारदजी ने उपरोक्त सभी दृश्यों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की। अंत में अपनी निम्न विशेष टिप्पणी भी कीः- ''यह बड़े ही हर्ष का विषय है, कि पृथ्वीलोक का नास्तिक मनुष्य भी मोबाइल के माध्यम से ('सिम' और उपकरण) आत्मा और शरीर का भेद समझ चुका है। अर्थात जिस प्रकार 'सिम' के बिना उपकरण अर्थहीन होता है, ठीक उसी प्रकार आत्मा के बिना शरीर। अंत में मोबाइल धारियों के लिए एक संदेशः- 'सजन रे झूठ मत बोलो' (क्योंकि मोबाइल ने हीं सर्वाधिक झूठ बोलना सिखलाया है) खुदा के पास जाना है ......... वहाँ सूक्ष्म बनकर बिना मोबाइल के ही जाना है''। अंत में पुनः बोलो ''मोबाइल महाराज की जय हो।''

समाप्त

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संपर्क:

अशोक जैन 'पोरवाल' ई-8/298 आश्रय अपार्टमेंट त्रिलोचन-सिंह नगर
(त्रिलंगा/शाहपुरा) भोपाल-462039 (मो.) 09098379074 (दूरभाष) (नि.) (0755) 4076446

साहित्यिक परिचय इस लिंक पर देखें - http://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_59.html

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