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कंजूसों से न अँखियाँ मिलाना.../ व्यंग्य / अशोक जैन 'पोरवाल'

 

हे मेकअपधारी समस्त सुंदरियों! कभी भी “कंजूसों से न अँखियाँ मिलाना.... “क्योंकि यह सत्य बतलाया गया है, सन 1857 से 1947 तक दीर्घावधि क्रांति पक्ष की एक विशेष दर्शनशास्त्र की शाखा ने। उनके अनुसार, “कंजूस व्यक्ति ऐसा मूर्ख प्राणी है, जो कि धनी होने के बाद भी अपनी पूरी जिंदगी कंगाल ही बना रहता है और कंगाल ही मर जाता है।

एक प्रसिद्ध शायर ने साठ के दशक की एक प्रसिद्ध फिल्म में एक गीत के माध्यम से कन्याओं को सीख देते हुए कहा था कि, “परदेसियों से न अँखियाँ मिलाना। परदेशियों को है, एक दिन जाना।”

इसी तर्ज पर मैं एक कलमघीसू (व्यंग्यकार) साथ ही कंजूसों का सताया... उनकी कंजूसपंतियों का मारा उक्त दर्शन को अपने अनुभवों के आधार पर पूर्णतः सही मानते हुए कहता हूं कि, “कंजूसों से न अँखियाँ मिलाना। कंजूसों को है, एक दिन अपनी झूठी कंगाली में ही मर जाना।”

जैसा कि हम सभी जानते और समझते भी हैं, कि हमारी पृथ्वी पर मक्खियों के साथ ही साथ जन्मा और मक्खियों को ही चूस-चूस कर खाते हुए जीवित रहने वाला “कंजूस” नामक यह प्राणी एक बड़ा ही विचित्र प्राणी होता है। यह हर जगह पाया जा सकता है इसकी विलक्षण मानसिक प्रकृति इतनी विशाल होती है कि उन पर अनेकों शोध किये जा सकते हैं। मैंने भी एक छोटा सा शोध किया है। आइये! जानते हैं, इसके बारे में -

कंजूसों का मनोविज्ञान - “कंजूस मक्खी-चूस” की मानसिकता के साथ ही साथ ऐसे जन्तु “चमड़ी जाए पर दमड़ी (पैसा) न जाए” की मानसिकता में भी जीते हैं।

कंजूसपने एवं कंजूसपंतियों का जन्म - कब और कैसे हुआ होगा? इस संबंध में बहुत अधिक विरोधाभास है। फिर भी कुछ महत्वपूर्ण दृष्टिकोणों से देखें तो, जैसे- धार्मिक दृष्टि से यदि देखा जाए तो कहा जा सकता है कि इसकी शुरुआत हमारे मन की “माया मोह” वाली दुस्प्रवृत्ति के बंधनों के कारण हुई होगी? क्योंकि इस बंधन के कारण ही कंजूस प्राणी हमेशा अपनी लालची प्रवृत्ति के कारण अपने पास रखी 99 की राशि (मुद्रा) का सुख न भोगकर उसमें एक राशि (मुद्रा) और मिलाने (जोड़ने) के चक्कर में पूरी जिंदगी दुःख भोगता रहता है। जिसे आम बोलचाल की भाषा में 99 का चक्कर कहा जाता है।

व्यवहारिक दृष्टिकोणों से यदि देखा जाए तो कहा जा सकता है कि आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपय्या।” एवं “मेरा (परिवार का भी) क्या होगा, कालिया भविष्य? “जैसी नकारात्मक एवं चिंताजनक संवादों और कहावतों के कारण भी कंजूसपने और कंजूसपंतियों का जन्म हुआ है।

“टाईप ऑफ कंजूस” यानि कि कंजूसों की वैरायटी:-

महाजनी कंजूस - इस प्रकार के महाजनी कंजूसों के जीवाणु साहूकारी अर्थात महाजनी के धन्धे में पाये जाते हैं। इस धन्धे में साहूकार जरूरतमंद (गरीब) व्यक्ति को राशि (मुद्रा) उधार देता है और फिर एक बार से लेकर अनेकों बार तक या फिर कर्ज लेने वाले व्यक्ति की पूरी जिंदगी... इतना ही नहीं बल्कि कई बार तो उसकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी साहूकारों को ब्याज एवं मूलधन चुकाना पड़ता रहता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि महाजनी-कंजूस ऐसा व्यक्ति होता है, जिसका कि ईमान और धर्म ही नहीं बल्कि सब कुछ पैसा ही होता है। इसलिए वो ब्याज रूपी खून पी-पीकर और अधिक कंजूस बनता जाता है। “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए” की मनोवृत्ति के लोग इसमें शामिल किए जाते हैं।

स्वार्थी-कंजूस - इस श्रेणी में वैसे कंजूसों को शामिल किया जा सकता है जो कि अपने परिवार के सभी सदस्यों के सामने अपनी आर्थिक तंगी का रोना रोते रहते हैं किंतु, अपने शौक पूरे करने के लिए अपनी कंजूसी (आर्थिक-तंगी) छोड़कर पैसा पानी की तरह बहाते रहते हैं। अर्थात ऐसे कंजूस “स्वयं-हितायः स्वयं-सुखायः” के सिद्धांत पर चलते हैं।

टुच्चे-कंजूस - विगत कई वर्षों से मँहगाई की मार से टुच्चे-किस्म के कंजूसों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। ऐसे कंजूस अपनी “टुच्चागिरी” की कला से थोड़ा-थोड़ा करके भी बहुत कुछ बचा लेते हैं। अथवा जोड़ लेते हैं। उदाहरण विक्रेता से मोलभाव करने के बाद भी खुल्ले पैसे (रूपये) न होने का बहाना बनाकर अथवा बाद में दे देने का झूठा शपथ वाक्य बोलकर अपनी “टुच्चागिरी” से पैसे बचा-बचाकर कंजूस बन जाते हैं।

मुफ्तखोर कंजूस - ऐसे कंजूसों की हमेशा ही मुफ्त में अथवा मुफ्त के दामों में (सस्ते में) खाने-पीने और लेने की आदतें पड़ी होती हैं। इन कंजूसों का एक ही सिद्धांत होता है, ”राम-नाम जपना और पराया माल अपना” या फिर “खाएँ-पिएँ और खिसकें।”

पैतृक-कंजूस - ऐसे कंजूसों को कंजूसी के जीवाणु (जीन्स) उन्हें विरासत में ही मिलते हैं। पैदा होने के बाद से ही उन्हें कंजूसीपने की घुट्टी परिवार वालों द्वारा पिला दी जाती है। जो कि बाद में दूध के रूप में (मलाई मारने की कला के साथ) उनकी पूरी जिंदगी चलती रहती है। ऐसे कंजूसों पर अपनी जाति-विशेष एवं भौगोलिक स्थिति का भी विशेष प्रभाव पड़ता है।

सिद्धांतवादी-कंजूस - ऐसे कंजूस अपने कुछ विशेष संशोधित अथवा आधे-अधूरे सिद्धांतों का पालन करते हुए अपनी कंजूसपंतियों का नमूना पेश करते रहते हैं, जैसे - दहेज अथवा रिश्वत देना पाप है (लेना नहीं)। सादा-जीवन यानी कि फटेहाल रहना (उच्च विचार नहीं रखना) चाहिए।

ओवर स्मार्ट कंजूस - इस प्रकार के कंजूसों में कुछ निम्न प्रकार की मानसिक व्याधियाँ पाई जाती हैं, जैसे- ऐसे कंजूस सदैव ही अपने अहंकार एवं घमंड में चूर होते हुए स्वयं को बुद्धिमान और दूसरों को एकदम मूर्ख, अनपढ एवं गंवार समझते हैं। ऐसे कंजूस अपने आपको दरियादिली और दूसरों को कंजूसपने की हद में रहने वाला समझते हैं। ऐसे कंजूस अपने आपको ‘मितव्ययी’ होने का ढोंग करते हुए दूसरों को भी अपने जैसा बनाने की कोशिशें करते रहते हैं। ऐसे कंजूस अपने आपको ‘तीस मार खाँ; यानी कि ‘ओवर-स्मार्ट’ समझते हैं और अपनी कंजूसपंती छिपाते रहते हैं।

मोनी-कंजूस - इस श्रेणी में ऐसे कंजूसों को शामिल किया जाता है, जो कि यह समझते हैं, कि ‘बोलने में भी टके (पैसे) खर्च होते हैं।” इसलिए ऐसे प्रेमी अथवा पति अपनी प्रेमिका अथवा पत्नी से उसकी प्रशंसा में दो शब्द बोलने में भी कंजूसाई करते हैं। इतना ही नहीं ऐसे कंजूसों में मनमोहन सिंह यानी कि अपने मनमौजीराम तक का नाम आजकल शामिल किया जाने लगा है।

इश्किया-कंजूस - वर्तमान में समय की नजाकत को ... इंटरनेट ‘ब्वाय फ्रैंड्स’ एवं ‘ गलर्स-फ्रैंड्स’ को देखते हुए इस प्रकार के कंजूसों का भी तीव्र गति से जन्म होने लगा है। जिसके अनुसार जिसकी जितनी कम ‘गर्ल्स-फ्रैंड’ समझो वो उतना ही ‘इश्किया-कंजूस’।

जिस प्रकार ‘एक मूर्ख ढूंढो, हजार मिलते हैं।’ ठीक उसी प्रकार एक कंजूस ढूंढो, हजार मिलेंगे। इसलिए मैं तो अपने इस शोध कार्य में सिर्फ उपरोक्त कंजूसों की वैरायटियों को ही ढूँढ पाया हूँ। क्योंकि, इसलिए मैं अपना यह शोध कार्य बंद करते हुए पुनः कहता हूँ कि “कंजूसों से न अँखियाँ मिलाना...”

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संपर्क:

अशोक जैन 'पोरवाल' ई-8/298 आश्रय अपार्टमेंट त्रिलोचन-सिंह नगर
(त्रिलंगा/शाहपुरा) भोपाल-462039 (मो.) 09098379074 (दूरभाष) (नि.) (0755) 4076446

साहित्यिक परिचय इस लिंक पर देखें - http://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_59.html

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