बुधवार, 10 अगस्त 2016

कबीर के ध्वज वाहक परसाई / विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र

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(परसाई पखवाड़ा - 10 - 21 अगस्त विशेष )



पिछली अर्धशती में हास्य और व्यंग्य एक नयी साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हुआ है . हास्य और व्यंग्य में एक सूक्ष्म अंतर है , जहां हास्य लोगों को गुदगुदाकर छोड़ देता है वहीं व्यंग्य हमें सोचने पर विवश करता है . व्यंग्य के कटाक्ष हमें तिलमिलाकर रख देते हैं . व्यंग्य लेखक के , संवेदनशील और करुण हृदय के असंतोष की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न होता है . शायद व्यंग्य , उन्हीं तानों और कटाक्ष का साहित्यिक रचना स्वरूप है  , जिसके प्रयोग से सदियों से सासें नई बहू को अपने घर परिवार के संस्कार और नियम कायदे सिखाती आई हैं और नई नवेली बहू को अपने परिवार में घुलमिल जाने के हित चिंतन के लिये तात्कालिक रूप से बहू की नजरों में स्वयं बुरी कहलाने के लिये भी तैयार रहती हैं . कालेज में होने वाले सकारात्मक मिलन समारोह जिनमें नये छात्रों का पुराने छात्रों द्वारा परिचय लिया जाता है , भी कुछ कुछ व्यंग्य , छींटाकशी , हास्य के पुट से जन्मी मिली जुली भावना से नये छात्रों की झिझक मिटाने की परिपाटी रही है और जिसका विकृत रूप अब रेगिंग बन गया है .


प्राचीन कवियों में कबीर की प्रायः रचनाओं में व्यंग्य है , पर उनका यह कटाक्ष किसी का मजाक उड़ाने या उपहास करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने के लिए ही होता है . कबीर का व्यंग्य करुणा से उपजा है, अक्खड़ता तो केवल उसकी ढाल है.


बात उन दिनों की है जब मैं किशोरावस्था में था , शायद हाई स्कूल के प्रारंभिक दिनों में . हम मण्डला में रहते थे .घर पर कई सारे अखबार और पत्रिकायें खरीदी जाती थी . साप्ताहिक हिंदुस्तान , धर्मयुग , सारिका , नंदन आदि पढ़ना मेरा शौक बन चुका था . नवीन दुनिया अखबार के संपादकीय पृष्ठ का एक कालम सुनो भाई साधो और नवभारत टाइम्स का स्तंभ प्रतिदिन मैं रोज बड़े चाव से पढ़ता था . पहला परसाई जी का और दूसरा शरद जी का कालम था यह बात मुझे बहुत बाद में ध्यान में आई . छात्र जीवन में जब मैं इस तरह का साहित्य पढ़ रहा था और इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर का नाट्यरूपांतरण देख रहा था शायद तभी मेरे भीतर अवचेतन में एक व्यंग्यकार का भ्रूण आकार ले रहा था . बाद में संभवतः इसी प्रेरणा से मैंने डा देवेन्द्र वर्मा जो मण्डला में पदस्थ एक अच्छे व्यंग्यकार थे व वहां संयुक्त कलेक्टर भी रहे , के व्यंग्य संग्रह का नाम "जीप पर सवार सुख" रखा जो स्कूल के दिनों में पढ़ी शरद जोशी की जीप पर सवार इल्लियां से अभिप्रेरित रहा होगा . मण्डला से छपने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र मेकलवाणी में मैंने " दूरंदेशी चश्मा " नाम से एक व्यंग्य कालम भी कई अंकों में निरंतर लिखा . फिर मेरी किताबें रामभरोसे , कौआ कान ले गया तथा मेरे प्रिय व्यंग्य लेख पुस्तकें छपीं , तथा पुरस्कृत हुईं .


हरिशंकर परसाई और शरद जोशी दो सुस्थापित लगभग समानान्तर व्यंग्यकार हुये .दोनों ही मूलतः मध्यप्रदेश के थे . जहां जबलपुर को परसाई जी ने अपनी कर्मभूमि बनाया वही शरद जी मुम्बई चले गये . उनके समय तक साहित्य में व्यंग्य को विधा के रूप में स्वीकार करने का संघर्ष था . व्यंग्य संवेदनशील एवं सत्यनिष्ठ मन द्वारा विसंगतियों पर की गई प्रतिक्रिया है,  एक ऐसी प्रतिक्रिया जिसमें ऊपर से कटुता और हास्य की झलक मिलती है, पर उसके मूल में करुणा और मित्रता का भाव होता है। व्यंग्य यथार्थ के अनुभव से ही पैदा होता है, यदि कल्पनाशीलता से जबरदस्ती व्यंग्य पैदा करने की कोशिश की जावे तो रचना खुद ही हास्यास्पद हो जाती है .इशारे से गलती करने वाले को उसकी गलती का अहसास दिलाकर सच को सच कहने का साहस ही व्यंग्यकार की ताकत है . व्यंग्यकार बोलता है तो लोग कहते हैं "बहुत बोलता है " , पर यदि उसके बोलने पर चिंतन करें तो हम समझ सकते हैं कि वह तो हमारे ही दीर्घकालिक हित के लिये बोल रहा था .


हरिशंकर परसाई (२२ अगस्त, १९२४ - १० अगस्त, १९९५) का जन्म जमानी, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने 18 वर्ष की उम्र में जंगल विभाग में नौकरीशुरू की . खंडवा में ६ महीने अध्यापन का कार्य किया . दो वर्ष (१९४१-४३) जबलपुर में स्पेंस ट्रेनिंग कालिज में शिक्षण की उपाधि ली, 1942 से वहीं माडल हाई स्कूल में अध्यापन भी किया  . तब के समय में अभिव्यक्ति की वैचारिक स्वतंत्रता का वह स्तर नहीं रहा होगा शायद तभी १९५२ में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी। १९५३ से १९५७ तक प्राइवेट स्कूलों में नौकरी की  .१९५७ में नौकरी छोड़कर स्वतन्त्र लेखन की शुरूआत उन्होंने की , तत्कालीन परिस्थितियों में साहित्य को जीवकोपार्जन के लिये चुनना एक दुस्साहसिक कदम ही था . जबलपुर से 'वसुधा' नाम की साहित्यिक मासिक पत्रिका निकाली, नई दुनिया में 'सुनो भइ साधो', नयी कहानियों में 'पाँचवाँ कालम' और 'उलझी-उलझी' तथा कल्पना में 'और अन्त में' इत्यादि कहानियाँ, उपन्यास एवं निबन्ध-लेखन के बावजूद वे मुख्यत: व्यंग्यकार के रूप में विख्यात हुये . उन्होंने अपने व्यंग्य के द्वारा बार-बार पाठकों का ध्यान व्यक्ति और समाज की कमजोरियों और विसंगतियों की ओर आकृष्ट किया . परसाई जी जबलपुर व रायपुर से प्रकाशित अखबार देशबंधु में पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। स्तम्भ का नाम था-पूछिये परसाई से। पहले पहल हल्के, इश्किया और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे। धीरे-धीरे परसाई जी ने लोगों को गम्भीर सामाजिक-राजनैतिक प्रश्नों की ओर प्रवृत्त किया , दायरा अंतर्राष्ट्रीय हो गया मेरे जैसे लोग उनके सवाल-जवाब पढ़ने के लिये अखबार का इंतजार करते थे .


सरकारें और साहित्य अकादमीयां उनके नाम पर पुरस्कार स्थापित किये हुये हैं पर स्वयं अपने जीवन काल में उन्होंने संघर्ष किया जीवन यापन के लिये भी और वैचारिक स्तर पर भी . उन पर प्रहार हुये , विकलांग श्रद्धा का दौर तो इसी से जन्मी कृति है .उन पर अनेकानेक शोधार्थी विभिन्न विश्वविद्यालयों में डाक्टरेट कर रहे हैं . आज भी परसाई जी की कृतियों के नाट्य रूपांतरण मंचित हो रहे हैं , उन पर चित्रांकन , पोस्टर प्रदर्शनियां , लगाई जाती हैं ,  और इस तरह साहित्य जगत उन्हें जीवंत बनाये हुये है . वे अपने साहित्य के जरिये और व्यंग्य को साहित्य में विधा के रूप में स्वीकार करवाने के लिये सदा जाने जाते रहेंगे .

vivek ranjan shrivastava

vivekranjan.vinamra@gmail.com
बंगला नम्बर ओ बी. ११ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर ४८२००८
०९४२५८०६२५२

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