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मुझको प्यार तुमसे है / राम कृष्ण खुराना

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प्यार की परिभाषा बहुत कठिन है। क्योंकि प्यार आदि काल से चला आ रहा है और सभी ने इसकी अलग अलग परिभाषा दी है। सबने इसे अपने अपने हिसाब से समझा और समझाया है। सभी अपने अपने अनुभव के अनुसार प्यार की व्याख्या करते हैं। आधे अक्षर से शुरु होने वाले इस शब्द में सारी दुनिया समाई हुई है। प्यार शाश्वत है। जब से यह दुनिया बनी है प्यार चलता आ रहा है। जब तक यह दुनिया रहेगी प्यार कायम रहेगा। इसका कोई अंत नहीं है। हां प्यार के इज़हार करने का ढंग बदलता रहा है। प्यार को जताने के तरीकों में फर्क होता रहा है। समय और परिस्थितियों के अनुसार “आई लव यू” कहने के तरीके बदलते रहे हैं। लेकिन प्यार आज भी कायम है। फिर भी प्यार को इस समाज ने कभी मान्यता नहीं दी। शायद इसीलिए लोग प्यार चोरी चोरी ही करते हैं। प्यार तो सभी करते हैं परंतु वही प्यार जब कोई दूसरा करता है तो उसका विरोध होता है। चारों तरफ थू-थू होने लगती है। लोग इसके अंजाम से डरने लगते हैं। तभी किसी ने कहा है -

मद भरे जाम से डर लगता है,

प्यार के नाम से डर लगता है।

जिस का आगाज़ चोरी-चोरी हो,

उसके अंजाम से डर लगता है।!

 

दुनिया में शायद ही कोई शख्स ऐसा होगा जो प्यार के एहसास से अछूता होगा। प्यार, चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो, एक ऐसा सुखद एहसास देता है  जिसे शब्दों में बयान कर पाना बहुत कठिन है। जब प्यार होता है तो बस प्यार ही होता है। प्रेम में आकंठ डूबे हुए लोगों के चेहरे पर खुदाई नूर आ जाता है। फिर वो प्रेमी जब प्यार किया तो डरना क्या की भाषा बोलने लग जाते हैं। उनके लिए प्यार खुदा बन जाता है। प्यार इबादत हो जाती है। इश्क में जीना इश्क में मरना और हमें अब करना क्या” ही उनकी दिनचर्या बन जाती है। फिर रूठने मनाने का सिलसिला शुरु होता है। रुठने का भी एक अलग ही मज़ा होता है। प्रियतम के मनाने से, उसके मनाने के ढंग से पता चलता है कि वो अपने साथी को कितना प्यार करता है। इसीलिए बार बार रुठने को मन करता है। आप भी देखिए -

सोई यादों को जगाये कोई,

दिल में फिर आग लगाये कोई।

जाने क्यों आज यह जी करता है,

रूठ जांऊ तो मनाये कोई।!

 

लेकिन इसका दूसरा रूप भी है। रूठना इतना आसान नहीं है। रूठने के लिए भी कोई अधिकार होना चाहिए। रोने के लिए कोई कंधा होना चाहिए। बिना अधिकार के आप रूठ जायेंगे तो आपको मनाने कोई नहीं आयगा। यदि आपको किसी के आने की आस भी हो तो रूठने के लिए दिल भी तो होना चाहिए। इसीलिए किसी ने कहा है -

हम रूठें तो किसके भरोसे रूठें ?

कौन है जो आयेगा हमे मनाने के लिए ?
हो सकता है तरस आ भी जाये आपको,

पर दिल कहाँ से लायें आपसे रूठ जाने के लिये ?

 

दुनिया की एक सम्पर्क भाषा है उसे “एसपरेंटों” कहते हैं। परंतु उस भाषा को विश्व में लगभग 100 व्यक्ति ही जानते हैं। परंतु प्यार की एक ही भाषा है जिसे दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति जानता है। इस भाषा को सिखाने की जरुरत नहीं पडती। इस भाषा को पढाने के लिए कोई स्कूल कोई पाठशाला नहीं है। यह स्वाभाविक है। सबके दिलों में बसा हुआ है। प्यार में जबरदस्ती नहीं चल सकती। किसी को प्यार करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। प्यार हो जाता है। प्यार अपने आप होता है। इसीलिए प्रेमी प्यार में सब कुछ न्यौछावर करने को तत्पर रहता है। प्रेम में सब कुछ खो देना ही सब कुछ पाना है। प्यार में खो जाने के बाद फिर सब कुछ उल्टा होने लगता है। दिल बेचैन रहने लगता है। और लोग कहने लग जाते हैं कि -

जब से दिल से दिल लगा है दिल नहीं लगता।

 

दिल लगने के बाद प्यार के ढंग निराले हो जाते हैं। कहा भी है –

मकतबे इश्क का ढंग निराला देखा,

उसको छुट्टी न मिली जिसने सबक याद किया।

 

इसी बात को एक दूसरे कवि ने कुछ इस प्रकार कहा है –

खुशी जिसने खोजी वो धन ले के लौटा,
हंसी जिसने खोजी चमन ले के लौटा।
मगर प्यार को खोजने चला जो वो,
न तन ले के लौटा न मन ले के लौटा ।!

 

मुंशी प्रेम चंद ने कहा है कि “जिस मनुष्य के हृदय से प्रेम निकल गया वह अस्थि-चर्म का एक ढेर रह जाता है।” सच्चा प्रेम नाप तौल नहीं करता। यह सिर्फ देता जाता है। जब किसी से प्यार हो जाता है तो वो ही सबसे अच्छा लगने लग जाता है। कोई भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। प्रेमी को अपने प्रिय में ही सारा संसार नज़र आता है उसे और कोई इतना प्यारा नहीं लगता। और वो कहने लगता है -

जिन्दगी की बहार तुमसे है,

मेरे दिल का करार तुमसे है।
यूं तो दुनिया में लाखों है हंसी,

मगर क्या करूं मुझको प्यार तुमसे है।

 

प्रेम अन्धा होता है। इसी लिए वह स्पर्श से ही आगे बढता है। कहते हैं कि नारी का शरीर ब्याज होता है। प्रेम की पूंजी तभी सार्थक है कि ब्याज मिलता रहे। लेकिन प्रेम भी खतरों का छत्ता होता है। उसमें से शहद तो भाग्यवानों को ही मिलता है। अधिकांश का तो बर्रों से ही पाला पडता है। जिनको प्यार नहीं मिल पाता या जिनके सजना दूर चले जाते हैं उनके लिए समय काटना भी मुश्किल हो जाता है। प्रेमी के दूर जाने पर प्रेमिका का सजने-संवरने का मन भी नहीं करता। उसका हार-शिंगार सब धरा का धरा रह जाता है। पंजाबी के गायक गुरदास मान ने पंजाबी में इस व्यथा को कुछ इस प्रकार कहा है –

टंग्गे रहदें किल्ली दे नाल परांदे,

जिन्ना दे राती यार बिछुडे।

 

अर्थात जिनके साजन बिछुड जाते हैं, और जो रात को अकेले ही सोने के लिए मजबूर होते हैं उनके परांदे, उनकी चोटियां खूंटी के साथ ही टंगी रह जाती हैं। उनके मेकअप का सामान उनके डिब्बों में ही बंद हो कर रह जाता है। उनके कपडे अलमारियों में ही पडे रह जाते हैं। क्योंकि उनके सजने संवरने की इच्छा ही मर जाती है। सजना के लिए सजने वालियां अब किसके लिए सजें ?  इस बिछुडन को एक प्रेमिका इस प्रकार व्यक्त करती है -

अब हम बिछुडे तो शायद ख्वाबों मे मिलें,

जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।

 

यह ठीक है कि सूखे हुए फूलों की कोमलता समाप्त हो जाती है। उनकी अपनी खुशबू खत्म हो जाती है। लेकिन उन यादों की, एक साथ बिताए पलों की महक हमेशा हमेशा बनी रहती है। और प्रेमी सारा जीवन उन्हीं यादों के सहारे बिता देते हैं। लेकिन आजकल बेवफाई के किस्से आम हो गए हैं। जीवन भर साथ निभाने का वादा करने वाले समय की धार देखकर बदल जाते हैं। लोग पहले से ज्यादा समझदार हो गए हैं। उनका कहना हैं -

मैंने प्यार किया बड़े होश के साथ।
मैंने प्यार किया बड़े जोश के साथ।
पर हम अब प्यार करेंगे बड़ी सोच के साथ।
क्योंकि कल उसे देखा मैंने किसी और के साथ।

 

बात परिभाषा से शुरु हुई थी। मेरा मानना है कि प्यार को किसी एक परिभाषा में बांधना कठिन है। हरि कथा कि तरह प्यार की परिभाषायें भी अनन्त हैं। प्यार तो बहता हुआ एक सागर है। जिसके बहने में ही प्यार की महत्ता है, सुंदरता है, प्राण हैं, जीवन है।

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राम कृष्ण खुराना

Ram Krishna Khurana

khuranarkk@yahoo.in

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