सोमवार, 3 अप्रैल 2017

हास्य-व्यंग्य-संस्मरण : मेरे संपादक! मेरे प्रकाशक!! - यशवंत कोठारी - भाग 3

मेरे संपादक !

मेरे प्रकाशक!!

यशवंत कोठारी

भाग एक   , दो  यहाँ पढ़ें

(३)

कुछ शब्द नयी  पीढ़ी के नए संपादकों पर भी अर्ज़ करूँ तो आगे चलूं.

ये लोग सुंदर हैं, स्मार्ट हैं, अभी अभी डिग्री, डिप्लोमा, पीजी कर के निकले हैं युवा हैं अतः: अधीर हैं, किसी को कुछ समझते नहीं 75 साल के कहानीकार को १३५० शब्दों की कहानी भेजने को कहते हैं, किसी भी लेख का सर या पैर काट कर छापने की क्षमता रखते हैं. यदि विजुअल में हैं तो क्या कहने. खुद भी कवि, साहित्यकार का सपना पालते हैं, मेहनत नहीं केवल मशीन पर भरोसा, नेट से माल मारा चिपकाया और जीफ/जेपीईजी के साथ या सोशल मीडिया पर. ये पीढ़ी अखबारों में जान पहचान, एक आध किताब के सहारे घुसती है, फण्डा क्लियर है, जल्दी से जल्दी एक फ्लैट, कार व dink याने डबल इनकम नो किड. ये लोग भावनाओं से नहीं मशीन से चलते हैं, ये सब प्रभारी होते हैं.

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संपादकों की यह गाथा बिना पारिश्रमिक का जिक्र किये पूरी नहीं हो सकती. कभी टाइम्स में सबसे अच्छी व्यवस्था थी, हर पत्र का जवाब आता था. अब स्थिति ये है कि पारिश्रमिक की दरें ५० वर्ष पुरानी है, पेमेंट आने की गति भी बहुत सुस्त है, यदि आपने स्मरण करा दिया तो अगली रचना नहीं छपेगी. कई जगहों पर पेमेंट बंद कर दिए गए हैं, या इतने कम है की बताते शरम आती हैं. कुछ संपादक पूरा कापी राईट खरीद लेते हैं. विष्णु प्रभाकर ने कहा था-फिल्म या पत्रकारिता से ही पैसा कमाया जा सकता हैं साहित्य से नहीं.

एक और संपादक की याद आ रही है, वे  बड़े सम्पादक थे, जब भी गया प्रेम से मिले, निम्बू वाली चाय पिलाई, खूब गप्पें मारी, मगर मेरी रचना कभी नहीं छपी, बाद में और ऊँचे पद पर चले गए, मेरी रचनाएँ छपने लगी मैंने प्रभारी से पूछा तो उसने बताया, बॉस ने ही मना कर रखा था. आज कल प्रभारी सम्पादक भी खूब हो गये हैं, ये संपादक से भी भारी होते हैं. एक ही स्थान के बजाय अलग अलग स्थानों पर, किसी को नहीं पता क्या हो रहा है ? क्यों हो रहा है? एक प्रदेश के संपादक ने चार पांच लेख ले लिये, न छापे न वापस दे. आखिर में मैंने दूसरी जगह छपवा दिया वे नाराज हो गए, कुछ दिनों बाद उनके सेठजी उनसे नाराज हो गये, हटा दिए गए. पक्की नौकरी नहीं अब ठेके के संपादकों का युग है. तू नहीं और सही, और नहीं और सही. ई-पत्रिका के सम्पादक के रूप में मुझे रवि रतलामी (रविशंकर श्रीवास्तव – रचनाकार. कॉम) बहुत पसंद हैं,   तुरंत छापते हैं. अभिव्यक्ति की संपादिका भी अवसर देती हैं उदंती की रत्ना वर्मा भी  याद करती रहती हैं.

सम्पादक कथा अनंता.

(अगले भाग में जारी...)

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