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सुदामा पांड़ेय ‘धूमिल’ की काव्य संवेदना का प्रतिनिधित्व करती कविता ‘मोचीराम’ / डॉ. विजय शिंदे

प्रस्तुत आलेख आलेख के साथ सृजन प्रक्रिया है और 'धूमिल' के बहाने वर्तमान सामाजिक जीवन के संदर्भ भी जुडे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के अरविंद कॉलेज की एक विद्यार्थी किरण गौतम के एक प्रश्न के उत्तर में लिखा यह आलेख है। सच्चे मायने में इस लेख की प्रेरणा उन्हें ही माना जा सकता है। 'रचनाकार' में प्रकाशित मेरे पूर्व आलेख को पढकर उनके कुछ सवाल निर्माण हो गए थें। मुझे इस बात की खुशी है कि बच्चे हिंदी की पढाई के लिए तकनीकि सहायता ले रहे हैं और उस तकनीकि सहायता में 'रचनाकार' पत्रिका अपना बेहतर योगदान दे रही है।

     'धूमिल' की कविता में आदमी' आलेख लिखते वक्त सारी कविताओं को केंद्र में रखा था और इस आलेख में धूमिल की सारी कविताओं को मद्दे नजर रखते हुए 'मोचीराम' का मूल्यांकन किया है। इसे लिखते हुए मेरी आत्मा को भी खंगालने का एहसास हुआ और वर्तमान के बहुत ही कडवे दृश्य आंखों के सामने से गुजरते गए।

      आशा है यह आलेख 'रचनाकार' के पाठकों के साथ हिंदी प्रेमी और जानकारों को पसंद आएगा।

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सुदामा पांड़ेय ‘धूमिल’  का नाम हिंदी साहित्य में सम्मान के साथ लिया जाता है। तीन ही कविता संग्रह लिखे पर सारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था और देश की स्थितियों को नापने में सफल रहें। समकालीन कविता के दौर में एक ताकतवर आवाज के नाते इनकी पहचान रही हैं। इनकी कविताओं में सहज, सरल और चोटिल भाषा के वाग्बाण हैं, जो पढ़ने और सुननेवाले को घायल करते हैं। कविताओं में संवादात्मकता है, प्रवाहात्मकता है, प्रश्नार्थकता है। कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि मानो हम ही अपने अंतर्मन से संवाद कर रहे हो। समकालीन कविता के प्रमुख आधार स्तंभ के नाते धूमिल ने बहुत बढ़ा योगदान दिया है। उनकी कविता में राजनीति पर जबरदस्त आघात है। आजादी के बाद सालों गुजरे पर आम आदमी के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, अतः सारा देश मोहभंग के दुःख से पीड़ित हुआ। इस पीड़ा को धूमिल ने ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’ और ‘सुदामा पांड़े का प्रजातंत्र’ इन तीन कविता संग्रहों की कई कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया है। उनकी कविता में पीड़ा और आक्रोश देखा जा सकता है। आम आदमी का आक्रोश कवि की वाणी में घुलता है और शब्द रूप धारण कर कविताओं के माध्यम से कागजों पर उतरता है। बिना किसी अलंकार, साज-सज्जा के सीधी, सरल और सपाट बयानी आदमी की पीड़ाओं को अभिव्यक्त करती है। धूमिल का काव्य लेखन जब चरम पर था तब ब्रेन ट्यूमर से केवल 38 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु होती है। तीन कविता संग्रहों के बलबूते पर हिंदी साहित्य में चर्चित कवि होने का भाग्य धूमिल को प्राप्त हुआ है। "सुदामा पांड़ेय ‘धूमिल’ हिंदी की समकालीन कविता के दौर के मील के पत्थर सरीखे कवियों में एक है। उनकी कविताओं में आजादी के सपनों के मोहभंग की पीड़ा और आक्रोश की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। व्यवस्था जिसने जनता को छला है, उसको आइना दिखाना मानों धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य है। …..सन 1960 के बाद की हिंदी कविता में जिस मोहभंग की शुरूआत हुई थी, धूमिल उसकी अभिव्यक्ति करनेवाले अंत्यत प्रभावशाली कवि है। उनकी कविता में परंपरा, सभ्यता, सुरुचि, शालीनता और भद्रता का विरोध है, क्योंकि इन सबकी आड़ में जो हृदय पलता है, उसे धूमिल पहचानते हैं। कवि धूमिल यह भी जानते हैं कि व्यवस्था अपनी रक्षा के लिए इन सबका उपयोग करती है, इसलिए वे इन सबका विरोध करते हैं। इस विरोध के कारण उनकी कविता में एक प्रकार की आक्रामकता मिलती है। किंतु उससे उनकी कविता की प्रभावशीलता बढ़ती है। धूमिल अकविता आंदोलन के प्रमुख कवियों में से एक हैं। धूमिल अपनी कविता के माध्यम से एक ऐसी काव्य भाषा विकसित करते हैं जो नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की रुमानियत, अतिशय कल्पनाशीलता और जटिल बिंबधर्मिता से मुक्त है। उनकी भाषा काव्य-सत्य को जीवन सत्य के अधिकाधिक निकट लाती है। उन्हें मरणोपरांत 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।" (संसर्भ विकिपिड़िया)

संवेदना क्या है?

संवेदना के कई अर्थ निकलते हैं। सनसनी पैदा होना, उत्तेजना निर्माण होना, संवेदना निर्माण होना, मन की कई भावनाओं का निर्माण होना, संवेदन, महसूस करना, दृष्टिगत होना, सहानुभूति करना आदि अर्थों में संवेदना को प्रकट किया जा सकता है। "मन में होनेवाला बोध या अनुभव, अनूभूति; किसी को कष्ट में देखकर मन में होनेवाला दुख, सहानुभूति" (मानक हिंदी विशाल शब्दकोश, पृ. 668) का अर्थ ही संवेदना है, लेकिन इसमें केवल दुःख को ही क्यों जोड़े इसके अलावा सुख तथा अन्य अनुभूतियों का अनुभव करना भी आ जाता है। अंग्रेजी में इसके लिए Sympathy, Fellow Filling या Sensation शब्द का इस्तेमाल होता है। अलग-अलग परिस्थितियों में इसमें से उचित शब्द का इस्तेमाल होता है। काव्य संवेदना के लिए अगर अंग्रेजी में सीधे पर्याय ढूंढ़ना शुरू करेंगे तो Poetry sensation कहा जा सकता है। खैर कवि का सामाजिक भान और उसका अपने आस-पास के माहौल से जुड़ाव तथा एकाकार होना उसकी संवेदना को प्रकट करता है। सहज भाषा में अगर व्यक्त करें तो कहा जा सकता है कि जिसका ह्रदय पत्थर दिल है वह संवेदनाओं का वहन नहीं कर सकता और जिसका हृदय पिघल सकता है या पसीज सकता है वह संवेदनाओं से भरा होता है। दुनिया की छोटी-छोटी घटनाएं ऐसे व्यक्ति के मन पर प्रभाव डालती है और वह वाचा (वाणी), भाव, विचार, लिखावट बन प्रकट होती है। कवि या साहित्यकार बस इसी शक्ति के आधार पर लेखनी के माध्यम से मन की संवेदनाओं को प्रकट करता है। कवि का अनुभव जगत् जितना बड़ा उतना अभिव्यक्ति वैविध्य रहता है। अर्थात् रचनाकार की परिस्थितियां उसके लेखन का मूल स्रोत होती है और वहीं साहित्य में उतरती है।

पारिभाषिक तौर पर संवेदना शब्द को और गहराई में जाकर पहचाना जा सकता है। "साधारणतः संवेदना शब्द का प्रयोग सहानुभूति के अर्थ में होने लगा है। मूलतः वेदना या संवेदना का अर्थ ज्ञान या ज्ञानेंद्रियों का अनुभव है। मनोविज्ञान में इसका यहीं अर्थ ग्रहण जाता है। उसके अनुसार संवेदना उत्तेजना के संबंध में देह रचना की सर्वप्रथम सचेतन प्रक्रिया है, जिससे हमें वातावरण की ज्ञानोपलब्धि होती है। उदाहरण – हरी वस्तु; हरे रंग को देखने की संवेदना उत्तेजना मात्र है। उत्तेजना का हमारे मन पर मस्तिष्क तथा नाड़ी तंतुओं द्वारा प्रभाव पड़ने पर ही हमें उसकी संवेदना होती है। संवेदना हमारे मन की चेतना की वह कूटस्थ अवस्था है, जिसमें हमें विश्व की वस्तु विशेष का बोध न होकर उसके गुणों का बोध होता है। पौढ़ व्यक्तियों में यह संवेदना प्रायः असंभव हो जाती है। यद्यपि साधारणतः अंग्रेजी में ‘सिम्पैथी’ या ‘फेलो फीलिंग’ कह सकते हैं, किंतु मनोविज्ञान में ‘सेन्सेशन’ के रूप में ही इसका विशिष्ट प्रयोग होता है। यह हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं है। उदाहरणार्थ – मनोहारी संगीत सुनते ही हम अपना आकर्षण नहीं रोक सकते। संवेदना के लिए उत्तेजना की आवश्यकता है, जिससे संबंधित गुण ही हममें संवेदना उत्पन्न करता है। इसे तीन वर्गों में विभाजित किया है – विशिष्ट संवेदना, अंतरावयव संवेदना और स्नायविक संवेदना। इसमें विशिष्ट ज्ञानेंद्रिय तथा बाहरी उत्तेजना के द्वारा होनेवाली संवेदना की विशिष्ट संवेदना अथवा ‘इंद्रियसंवेदना’ कहते हैं। इस संवेदना की विशेषता यह है कि यह विशेष अवयवों से संबंध रखती है और प्रत्येक ऐसी संवेदना दूसरी इंद्रिय संवेदना से पृथक की जा सकती है। इसके कई भेद हैं, यथा – घ्राण, रस, त्वचा, दृष्टि तथा श्रोतृ संवेदना। इन भेदों में भी मात्राभेद होता है। इन्हीं संवेदनाओं के द्वारा हमें विश्व के विभिन्न पदार्थों का ज्ञान होता है, इसी प्रकार प्राणियों के शरीर की आंतरिक अवस्था के कारण उत्पन्न होनेवाली पचन क्रिया, रक्त संचार, श्वास-प्रश्वास आदि के अवयवों से संबंधित संवेदनाएं अंतरावयव संवेदना कहलाती है। यह प्रायः तीन भागों में विभाजित की जा सकती है। जिसे हम शरीर के किसी भागों में निश्चित कर सके। जैसे आघात, जलन आदि। जिसे हम संशयात्मक रूप में निश्चित कर सके, यह पेट आदि अवयव विशेष की साधारण क्रिया से उत्पन्न होती है। प्राणी की सामन्यवस्थाओं में होनेवाली वे संवेदनाएं, जिन्हें कहीं भी निश्चित ना कर सके, जैसे भूख-प्यास। स्नायविक संवेदनाएं ग्रंथि तथा पेशी आदि के संचालन से उत्पन्न होती है।" (हिंदी साहित्य कोश, पृ. 707-708) संवेदना के इस पारिभाषिक अर्थ को कविता या साहित्य के साथ जोड़े तो वह काव्य संवेदना या साहित्य संवेदना बनती है। किसी लेखक या कवि से बाहरी दुनिया का अपने विभिन्न अवयवों से आकलन और प्रतिक्रिया स्वरूप लिखा जाना ही उसकी साहित्य संवेदना या काव्य संवेदना होती है।

धूमिल की काव्य संवेदना और ‘मोचीराम’ की तुलना

धूमिल ने साहित्यिक सफर में बहुत लिखा है ऐसी बात नहीं है। अगर हिंदी दुनिया कहे तो कह सकती है कि उन्होंने बहुत कम लिखा है, परंतु जो लिखा वह डंके की चोट पर लिखा। जो भोगा, एहसास किया, अनुभव किया और जिसकी अनुभूति की वह बिना भय बेझिझक लिखा। ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’ और ‘सुदामा पांड़े का प्रजातंत्र’ यह इनके कविता संग्रहों के नाम है और इनकी प्रसिद्ध और चर्चित कविताओं के नाम हैं - ‘संसद से सड़क तक’, ‘एकांत कथा’, ‘वसंत से बातचीत का लम्हा’, ‘रोटी और संसद’, ‘कविता के द्वारा हस्तक्षेप’, ‘अंतर’, ‘प्रौढ़ शिक्षा’, ‘भाषा की रात’, ‘कविता’, ‘बीस साल बाद’, ‘जनतंत्र के सूर्योदय में’, ‘अकाल-दर्शन’, ‘वसंत’, ‘एकांत-कथा’, ‘शांति पाठ’, ‘उस औरत की बगल में लेटकर’, ‘कुत्ता’, ‘शहर में सूर्यास्त’, ‘एक आदमी’, ‘सच्ची बात’, ‘कविता के द्वारा हस्त्तक्षेप’, ‘अंतर’, ‘दिनचर्या’, ‘नगरकथा’, ‘गृहस्थी : चार आयाम’, ‘उसके बारे में’, ‘लोहे का स्वाद’, ‘धूमिल की अंतिम कविता’, ‘सुदामा पांड़े का प्रजातंत्र (एक)’, ‘सुदामा पांड़े का प्रजातंत्र (दो)’, ‘ट्यूशन पर जाने से पहले’, ‘न्यू ग़रीब हिंदू होटल’, ‘कविता के भ्रम में’, ‘रणनीति’, ‘ताज़ा ख़बर’, ‘कोड़वर्ड’, ‘सूखे की छायाएं और एक शिशिर संध्या’, ‘संसद-समीक्षा’, ‘संयुक्त मोर्चा’, ‘कर्फ़्यू में एक घंटे की छूट’, ‘घर में वापसी’, ‘गृह-युद्ध’, ‘रोटियों का शहर’, ‘मैमन सिंह’, ‘लोकतंत्र’, ‘मैंने घुटने से कहा’, ‘अगली कविता के लिए, ‘पर्वतारोहण : नवंबर 1971’, ‘बीसवीं शताब्दी का सातवां दशक’, ‘मैं सहज होना चाहता हूं’, ‘मेरा गांव’, ‘शिविर नंबरर तीन’, ‘चानमारी से गुज़रते हुए’, ‘नौजवान’, ‘जनतंत्र : एक हत्या संदर्भ’, ‘मुक्ति का रास्ता’, ‘गुफ़्तगू’, ‘मतदाता’, ‘चुनाव’, ‘सिलसिला’, 'स' और 'त' का खेल’, ‘निहत्थे आदमी से कहा’, ‘हरित क्रांति’, ‘हरित क्रांति (एक)’, ‘हरित क्रांति (दो)’, ‘हत्यारे (एक)’, ‘हत्यारे (दो)’, वापसी’, ‘अब मैं अगली योजनाओं पर बात करूंगा’, ‘लोहसांय’, ‘कमरा’, ‘आदम इरादों से बित्ता भर उठी हुई पृथ्वी’, ‘ख़ून का हिसाब’, ‘नींद के बाद’, ‘रात्रि-भाषा’, ‘भूख’, ‘प्रस्ताव’ आदि। इनमें से कई कविताओं को आपने पढ़ा होगा पढ़ने में आई होगी। इनकी भाषा सीधी, सहज, सरल, स्पष्ट है। पढ़ते वक्त आपको शब्दों के अर्थ को समझने के लिए शब्दकोश की जरूरत नहीं पढ़ती है। व्यंग्य और सामाजिक वास्तव भी इतना सच्चा कि मानो लगता है कोई हमारे सामने बैठकर बिना भय हमारी गलतियों को सरेआम सामने रख रहा है। समाज, राजनीति, अर्थनीति, सरकार, आम आदमी, मक्कार, दलाल, झूठा, फरेबी की शरीर के कपड़े एक एक करके उतारे जा रहे हो। हम अपनी ही लाज बचाने के लिए जांघों पर, छाती पर, मुंह पर हाथ धरे इधर-उधर भागे जाते हैं। धूमिल अपने-आपको भी इन लोगों में समाविष्ट करते हैं और बेशरम-मक्कारों की टोली का एक अंग है बताते हैं। यहां पर इन वाक्यों को लिखते हुए मुझे यशपाल की कहानी ‘परदा’ की याद आ रही है। मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, सभ्यता और संस्कृति का परदा उठते ही जैसे इस कहानी की महिलाएं अपने गरीबी और आबरू को बचाने के लिए कोने में भागने लगती है वैसे ही धूमिल की कविता को पढ़ने के बाद प्रत्येक आदमी अपनी लाज बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगता है। अपने निजी दु;खों को कविता में ताकत, संवेदना, बेबाकी तथा सौंदर्य के साथ परिपूर्ण रूप में जितनों ने हिंदी साहित्य में व्यक्त किया उसमें धूमिल, नागार्जुन, मुक्तिबोध... जैसे कवियों के नाम लिए जा सकते हैं। हिंदी जगत् के नए कवियों में कई दलित पीड़ित लोगों के प्रतिनिधि कवियों की अभिव्यक्ति बिल्कुल ऐसी ही है। यहां अगर नामों को गिनना शुरू करें तो कई नाम आ जाएंगे। यहां मेरा उद्देश्य नामों को गिनना नहीं है। किसी कवि की कविताओं को पढ़ने के बाद वह कविता अपनी लगती है और अपने लिए लगती है तो माने की वह सशक्त कविता है। कविता में भाषाई सौंदर्य हो न हो, अलंकार हो न हो, शुद्धता हो न हो कोई फर्क पड़ता नहीं है। हमारे हृदय को छूने की क्षमता, हमें झकझोरने की क्षमता, हमें थप्पड़े मारने की क्षमता और हमें प्यार से सहलाने की क्षमता उस कवि के शब्दों में हो तो वह कविता संवेदनात्मक पक्ष से भरी-पूरी है ऐसा कह सकते हैं। धूमिल की कविता बिलकुल ऐसी ही है।

धूमिल जिस युग में लिख रहे थे वह आजादी के पश्चात् के 15-20 वर्षों की स्थिति को बयां करती है। हमारा देश आजाद हो चुका था और एक-एक दिन आजादी का सफर आगे बढ़ रहा था। लेकिन भारत का तथा आर. के. लक्ष्मण के चित्रों का आम आदमी (Common Man) जिन अपेक्षाओं कि पूर्ति की अपेक्षा कर रहा था वह पूरी नहीं हो रही थी। अतः वह छटपटा रहा था, मोहभंग के कारण निराशा पनपते जा रही थी और इसी निराशा से विद्रोह-विरोध और आक्रोश भी प्रकट हो रहा था। धूमिल की ‘मोचीराम’ ही नहीं तो सारी कविताएं इसी बात को अभिव्यक्त कर रही थी। धूमिल की कविताओं के शीर्षक पर से एक नजर दौड़ाई जाए तो भी इस बात का पता चलता है। मोहभंग उस युग में भी और आज भी है और कल भी रहेगा। हमें जिनसे सबसे ज्यादा वापसी की अपेक्षाएं होती है वह अगर हो नहीं रही है या हमारे सपनों कि परिपूर्णता नहीं हो रही है तो मोहभंग की स्थिति पैदा होती है। मैंने ऊपर आम आदमी के साथ ‘Common Man’ शब्द का प्रयोग जानबूझकर किया है क्योंकि आजकल ‘आम आदमी?’ एक पार्टी बन गई है और कोई भी तथा किसी भी राजनैतिक पार्टी का नाम किसी गाली से कम नहीं होता है। अब आम आदमी नाम लेते ही राजनीतिक स्वार्थ, बड़े-बड़े सपने-वादें, दिनों-दिन अलग-अलग कांड़ों में दिल्ली के आम आदमी के 67 पार्शदों में से एक-एक का नाम सामने आता है। कुर्सी का लालच और उस पर संवार तथा उनसे छला ‘Common Man’ मोहभंग जैसे बीमारी से तड़प उठता है। अब आम आदमी इतना मजबूर है कि वह अपने लिए ‘आम आदमी’ शब्द का प्रयोग भी नहीं कर सकता क्योंकि इसका पेटेंट अण्णा हजारे के कंधे को सीढि बनाकर दिल्ली की राजगद्दी पर बैठे राजनेताओं के पास है। कल हमें इस बात से भी चकित होना नहीं चाहिए क्योंकि कोई ऐरा-गैरा उठकर ‘Common Man’ की पार्टी निकालकर अपने राजनीतिक रोटी भूनाने बाजार में उतर सकता है। कितनी बड़ी बिड़ंबना है कि अब शब्दों पर के अधिकार भी खत्म हो रहे हें। आदमी रोए तो उसे डर इस बात का है कहीं अपने आंसू, भावनाओं और संवेदनाओं को भी खोना पड़ेगा! वैसे यह भी मक्कारों के पास पहले से गिरवी पड़े है।

आज कल पूरे भारत में कांग्रेसियों का नामोनिशान मिटने की कगार पर है। जो भी उठता है वह जाते-जाते उस पार्टी को लात मारके जाता है। परंतु मरे हुए को लात मारने में भी भी क्या मजा। अब देखें इन शब्दों के साथ मेरे जैसे एक छोटे आदमी ने भी उनको लात मारी ही ना! यह परिस्थियां निर्माण क्यों हुई? बस, एक ही उत्तर है इस पार्टी से जनता का मोहभंग हुआ। चारों ओर भगवा और केसरियां रंग फैलने लगा है। भाजपा अब जीत चुकी है कई जगहों पर जीत रही है और 2019 में दुबारा जितने के दांवे भी हो रहे हैं। खैर कोई बात नहीं ‘Common Man’ उन्हें अब भी मुबारक बात दे रहा है, 2019 में भी दें, पर ‘Common Man’ का मोहभंग ना हो। हवा में और देश में कोई भी रंग क्यों न फैले कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है उसकी विश्वनियता से। आदमी के सपनें पूरे हो, उसके हाथ को काम मिले, उसके पेट को रोटी मिले...। यह नहीं मिलेगा तो वह आक्रोश करेगा, विद्रोह करेगा। धूमिल की कविताओं में तत्कालीन परिस्थितियों के इन्हीं पीड़ाओं का वर्णन ही तो है। आज ‘Common Man’ ने जिस पार्टी को इतनी बड़ी जीत दे दी है उसके अगर सपनें पूरे ना हो तो मोहभंग से आक्रोश पैदा होने में देर नहीं लगेगी। अर्थात् आज जो कवि और लेखक केसरियां झंड़ा लेकर गीत गाने लगे हैं उसका धूमिल होने में भी देर नहीं लगेगी। हालांकि समाज के हीत में हमेशा यहीं है हर युग में एक नहीं तो हजारों धूमिल हो।

यहां पर पूनरावृत्ति टालने के लिए समझता हूं कि धूमिल की कविताओं का आपने ने कहीं पाठ किया होगा, कम-से-कम चंद रचनाओं को आपने पढ़ा है। कहीं पाठ्यक्रम में, किसी किताब में, अखबार में, इंटरनेट पर। पढ़ा न हो तो किसी से सुना तो होगा ही। धूमिल कौन है और उनकी वेदनाएं क्या है यह आप जानते हैं ऐसा समझकर मैंने नीचे आकृति स्वरूप में संक्षिप्त तुलना की है। एक तरफ धूमिल की कविताओं की संवेदनाएं है और दूसरी तरफ ‘मोचीराम’ में अभिव्यक्त संवेदनाओं का लेखाजोखा है।

ऊपरी आकृति पर नजर दौड़ाने से यह पता चलता है कि ‘मोचीराम’ कविता धूमिल के काव्य संवेदनाओं का प्रतिनिधित्व करती है।

धूमिल की काव्य संवेदना पर अतिरिक्त जानाकरी पाने के लिए निम्म आलेखों को आप पढ़ सकते हैं -

1. रचनाकार (-पत्रिका), धूमिल की कविता में आदमी – डॉ. विजय शिंदे,

लिंक - http://www.rachanakar.org/2013/10/blog-post_5366.html

2. Research Front (-पत्रिका), धूमिल की कविता में आदमी – डॉ. विजय शिंदे, लिंक –

http://www.researchfront.in/02%20APR-JUNE%202013/7%20Dhumil%20ki%20kavita%20me%20aadami%20-%20Dr.pdf

‘मोचीराम’ कविता आम आदमी (Common Man) का प्रतिनिधित्व करती है। कविता का शीर्षक ही सामान्य लोगों का, दलित-पीड़ित-शोषितों का प्रतिनिधित्व करनेवाला है। समाज के भीतर ऐसे कई लोग हैं या युं कहे कि परंपरागत व्यावसायिक है जो भोगवाद की ज्यादा अपेक्षा किए बिना केवल पेट के लिए रोटी पाना है इसलिए व्यवसाय करते हैं। लेकिन ऐसे लोगों का सामान्य लोगों से बड़े लोगों तक संबंध आता है। इन्हें अच्छे-बूरे इंसान की बिल्कुल दुरुस्त पहचान होती हे। अनुभव जगत् की व्यापकता के कारण ये तुरंत उसे पहचान और पकड़ सकते हैं। मोची, नाई, लुहार, सुनार, धोबी... आदि इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। समाज की अच्छी परख का नतीजा यह है कि इनकी नजर से कुछ भी छुटता नहीं है। ‘मोचीराम’ कविता भी इसी कहानी को बयां करती है। यहां कुछ सवाल उठते हैं। जैसे क्या धूमिल मोची थे? क्या धूमिल की यह पीड़ा है? क्या धूमिल का प्रत्यक्ष शोषण हो रहा है? क्या धूमिल पर अन्याय हुआ है?... इस प्रकार के तमाम सवाल पैदा होते हैं और इनके उत्तर में एक ही जवाब आता है – नहीं। लेकिन बात यह है कि धूमिल कवि थें और आम आदमी (Common Man) की पीड़ा को वे अपनी पीड़ा मानकर लिखते जा रहे थें। अपने आस-पास की कमियों, घुटन, आक्रोश, दबाव, शोषण को खुली आंखों से देखकर चुप रहनेवाले और केवल प्रिय के सौंदर्य में उलझनेवाले अन्य कवि या रीतिकालीन कवियों जैसे कवि धूमिल नहीं थें। वे मुक्तिबोध के समकालीन कवियों में से थें। अतः बेबाकी से लिखते जा रहे थें।

धूमिल की काव्य संवेदना और ‘मोचीराम’ कविता की काव्य संवेदना पर और एक आकृति बनाई है, जिसमें धूमिल की प्रमुख काव्य संवेदनाएं मोचीराम में झलकती है या नहीं है इसका आकलन होता है।

उपर्युक्त आकृति से साफ तरिके से यह स्पष्ट होता है कि ‘मोचीराम’ यह कविता धूमिल की सारी वेदनाओं और संवेदनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। अब यहां पर ‘मोचीराम’ की उन काव्य पंक्तियों के आधार पर इसका सोदाहरण स्पष्टीकरण करना जरुरी है। कविता के आरंभ से लेकर अंत तक ऐसे कई मुद्दे निकलते हैं जिनका बहुत लंबा विश्लेषण धूमिल युग, वर्तमान युग, संवेदनात्मक पक्ष, भाव पक्ष एवं कलात्मक पक्ष के आधार पर किया जा सकता है। कविता के आरंभ से लेकर अंत तक इस कविता का यहां पर विवेचन किया जा सकता है। ‘मोचीराम’ कविता संवादात्मक शैली में लिखी है। धूमिल की कलापक्षीय विशेषताओं में संवादात्मकता भी एक ताकतवर विशेषता है। धूमिल एक मोची के पास गए हैं और वह धूमिल से बतियाये जा रहा है। यह धूमिल की वास्तव हो या उनका दुनियादारी का आकलन हो। या यह संवाद घटित न भी हुआ हो या वे अपने सामने कल्पना में किसी मोची से बात भी कर रहे हो, कोई फर्क नहीं पड़ता।

जूतों की, चप्पलों की मरम्मत करनेवाला मोची धूमिल से कहता है -

"बाबू जी सच कहू-मेरी निगाह में

न कोई छोटा है

न कोई बड़ा है

मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है

जो मेरे सामने

मरम्मत के लिए खड़ा है।"

इन पक्तियों में धूमिल की मूल काव्य संवेदना में से समानता की मांग, आम आदमी का नजरिया, सजग होने का आवाहन, परिवर्तनीयता, शोषित-पीड़ित व्यक्ति का बयान, सामनेवाले व्यक्ति को आंकने की क्षमता, अनुभव से परिपूर्णता है।

"आजकल

कोई आदमी जूते की नाप से

बाहर नहीं है,

फिर भी मुझे ख़याल ह रहता है

कि पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच

कहीं न कहीं एक आदमी है।"

कई बार तात्विक चिंतन होता है कि हम दुनिया में खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ जानेवाले हैं। लेकिन खाली हाथ आने और खाली हाथ जाने के 70-80 वर्षों के बीच कितना महाभारत और रामायण घटित होता है। यहां 70-80 बरस एक स्टॅड़ंर्ड समय बता रहा हूं यह किसी के लिए ज्यादा हो सकता है किसी के लिए कम भी हो सकता है। कुछ लोग भगवान के लिए ज्यादा प्रिय होते हैं? तो वह जल्दि उठा लेता है, कुछ लोग अप्रिय हो तो ज्यादा दिन टिक जाते हैं? ऐसा कहना भी एक प्रकार से ढ़कोसला है हालांकि भगवान अगर कहीं है तो वह पापियों को पहले उठाए। परंतु यह होता नहीं क्योंकि भगवान है ही नहीं! इस पर भी फिलहाल ज्यादा बात करना बड़ा मुश्किल काम है क्योंकि पता नहीं कहा से, किस रूप में भगवान के ठेकेदार की गोली हमारा सीना चीर दें? जैसे यहां भगवान की बात, जिसे दूसरे शब्दों में निर्माणकर्ता या दुरुस्ति करनेवाला कहा जा सकता है वैसे ही मोची को जूते का निर्माणकर्ता और दुरुस्ति करनेवाला कहां जा सकता है। जूते की नाप में फिट होना समानता के भाव को बता देता है। आदमी कितना भी बड़ा हो कितना भी छोटा हो जूते की नाप से बाहर नहीं है। एक मोची जूते के आधार पर असल आदमी की पहचान और खोज करते जा रहा है।

"यहा तरह-तरह के जूते आते हैं

और आदमी की अलग-अलग 'नवैयत'

बतलाते हैं

सबकी अपनी-अपनी शक्ल है

अपनी-अपनी शैली है

मसलन एक जूता है:

जूता क्या है- चकतियों की थैली है

इसे एक आदमी पहनता है

जिसे चेचक ने चुग लिया है

उस पर उम्मीद को तरह देती हुई हसी है

जैसे 'टेलीफ़ून' के खंभे पर

कोई पतंग फसी है

और खड़खड़ा रही है।"

ऊपर मैंने कई परंपरागत काम करनेवाले व्यवसायों को गिनाया है उसमें मोची का काम भी आता है, अतः उनके पास हर एक का आना होता है। बाजारीकरण के दौर में आप चाहे जिस भी दुकान से, कंपनी से जूता खरिदे उसकी मरम्मत या उसका चमकना मोची के पास ही संभव है। जैसे किसी डॉक्टर के लिए कोई भी शरीर शरीर होता है वैसे ही मोची के लिए जूता जूता ही होता है। फिलहाल वर्तमान युग में डॉक्टरों के लिए शरीर शरीर नहीं होता उसकी जेब कटवाने के लिए एक बकरा या मुर्गा होता है। डॉक्टर बेईमानी पर उतर चुके हैं परंतु मोचीयों ने अपनी ईमानदारी और ऍटीट्युट को बनाए रखा है। उसे कोई गाड़ी लेना नहीं होता या बहुत बड़ा घर और पैसों का आर्कषण नहीं होता है, उसकी मांग और खुशी शाम को वह और उसका परिवार पेटभर रोटी खाए, काफी है। अतः उसमें ईमानदारी टिकी है। देनेवाला सम्मान के साथ दें तो वह बड़े प्यार से लेगा और देनेवाला उसके साथ मेहनताने को लेकर बहस करने लगे तथा अपनी अमीरी का धौंस जमाने लगे तो मोची उसके पैसे और मुंह पर थूंक देगा। इन पंक्तियों में आदमी और उसकी विविधता है, उम्मीद है, भविष्य की आशा है, समानता है।

"बाबूजी! इस पर पैसा क्यों फूकते हो?'

मैं कहना चाहता हू

मगर मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही है

मैं महसूस करता हू- भीतर से

एक आवाज़ आती है - 'कैसे आदमी हो

अपनी जाति पर थूकते हो।'

आप यकीन करें, उस समय

मैं चकतियों की जगह आखें टाकता हू

और पेशे में पड़े हुए आदमी को

बड़ी मुश्किल से निबाहता हू।"

कवि धूमिल का जूता पहनने लायक नहीं है तो बड़े प्यार से मोची कहता है कि अब इसे फेंकना ही उचित है टांकना मुश्किल। नया खरिदने में ही भलाई है। ईमानदारी से मोची की सलाह पर धूमिल मन ही मन सोचते हैं कि भाई कैसा मोची हैं उसको दुरुस्ति से आज पैसे मिल रहे हैं और दो चार दिन बाद और टूटने पर भी मिलेंगे, पर यह बदलने की सलाह दे रहा है। मोची चकतियों को टांकता है और कवि अपनी आंखों को क्योंकि कवि भी अभाव की स्थितियों में जीने के लिए मजबूर है। अपने अभाव, गरीबी, पीड़ा और दुःख के आंसू कहीं मोची के सामने न गिर पड़े इसलिए धूमिल का आंखों के टांके मारना आजादी के पश्चात् मोहभंग की स्थितियों का बयान ही तो है।

"एक जूता और है जिससे पैर को

'नाघकर' एक आदमी निकलता है

सैर को

न वह अक्लमंद है

न वक्त का पाबंद है

उसकी आखों में लालच है

हाथों में घड़ी है

उसे जाना कहीं नहीं है

मगर चेहरे पर

बड़ी हड़बड़ी है

वह कोई बनिया है

या बिसाती है

मगर रोब ऐसा कि हिटलर का नाती है

'इशे बाद्धो, उशे काट्टो, हिया ठोक्को, वहा पीट्टो

घिस्सा दो, अइशा चमकाओ, जूत्ते को ऐना बनाओ

…ओफ्फ़! बड़ी गर्मी है।"

इन काव्य पंक्तियों में कवि एक अन्य आदमी की बात करता है, जो अमीर है, व्यावसायिक है, पैसेवाला है, पूंजीपति है। धूमिल उसकी विशेषताओं को गिनते कहते हैं कि वह अक्लमंद नहीं है, वक्त का पाबंद नहीं है, लालची है और उसमें गर्मी तथा घमंड़ भी है। उसको हिटलर का नाती कहना कवि के आक्रामकता के भाव को प्रकट करता है और ऐसे लोगों का सामाजिक या आम आदमी से नकार भी है। यह काव्यपंक्तियां दलाल और मक्कारों को उजागर करती है।

"और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िंदा रहने के पीछे

अगर सही तर्क नहीं है

तो रामनामी बेंचकर या रंड़ियों की

दलाली करके रोजी कमाने में

कोई फ़र्क नहीं है

XXX

कि यार! तू मोची नहीं, शायर है

असल में वह एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी का

शिकार है

जो वह सोचता कि पेशा एक जाति है

और भाषा पर

आदमी का नहीं, किसी जाति का अधिकार है।"

मोची और कवि का संवाद आगे बढ़ता है तब मोची से दुनिया की असलीयत का भी परिचय होता है। मोची का कहना है कि जिंदा रहने के पीछे कोई तर्क, कोई कारण, कोई ईमानदार वजह, कोई नियम और कानून, कोई सिद्धांत होना चाहिए। यह अगर नहीं है तो कवि और मोची की भाषा में ....दलाली करने जैसा है। मोची के मुख से इस बात को सुनकर कवि चकित होता है। अनायास ही कहते हैं कि तुम्हें मोची नहीं कोई शायर होना चाहिए। अर्थात् शायर-कवि-लेखकों के विचार-चिंतन में आदर्शवाद, वास्तववाद के कीड़े गुलाटियां मारते हैं। बस वहीं वास्तववाद, आदर्शवाद और तार्किकता मोची की वाणी में है। मोची का ऐसे कहना उसके विचार, कल्पना और भाषा पर के असाधारण अधिकार को भी बता देता है। यह काव्यपंक्तियां परंपरा, सभ्यता, सुरुचि, शालीनता और भद्रता का विरोध, पीड़ा और आक्रोश, मूल्यहनन का विरोध भी है।

"असलियत यह है कि आग

सबको जलाती है सच्चाई

सबसे होकर गुज़रती है

कुछ हैं जिन्हें शब्द मिल चुके हैं

कुछ हैं जो अक्षरों के आगे अंधे हैं

वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं

और पेट की आग से डरते हैं

जबकि मैं जानता हू कि 'इंकार से भरी हुई एक चीख़'

और 'एक समझदार चुप'

दोनों का मतलब एक है-

भविष्य गढ़ने में, 'चुप' और 'चीख'

अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से

अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं।"

कविता के अंत में कवि शब्दों के पीछे की ‘चीख’ और ‘चुप’ को व्यक्त करते हैं। कविता मोचीराम से शुरू होती है और आदमी की दलाल तथा मक्कार प्रवृत्ति को बयां करने तक का प्रखर स्वर धारण करती है। दुनिया की वास्तविकता से हम सभी परिचित होते हैं लेकिन उस पर बोलने से, उसका विरोध करने से सभी कतराते हैं। शुरू में ही लिखा है कि धूमिल, मुक्तिबोध, नागार्जुन जैसे चंद कवि और आदमी होते हैं। धूमिल के मन में उभरता मोची भी इन्हीं की बिरादरी का है, अतः सच्चाई को उघाड़ देता है। लेकिन कवि अंत में बता रहे हैं कि कोई अक्षरों से भयभीत है, अन्याय को चुपचाप सहते हैं, पेट की आग से डरते हैं। अर्थात् अलग-अलग परिस्थितियों में आदमी किसी-न-किसी भय के आगे मजबूरी से झूक चुका है, बिक चुका है। वह डिफेंसिव्ह मुड़ में हैं अपने स्वार्थ को अंजाम देने के लिए ‘चीख’ और ‘चुप्पी’ को अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करने लगा है। इन काव्य पंक्तियों में आम आदमी (Common Man), परिवर्तन अभाव से छटपटाहट, मोहभंग, पीड़ा और आक्रोश, व्यवस्था की कमियों पर चोट करना, मूल्यहनन का विरोध, अस्तित्वहीनता का बयान, तटस्थता का विरोध, दयनीयता का चित्रण और सजग होने का आवाहन है।

निष्कर्ष

धूमिल ने जितना भी लेखन किया है उसका लेखा-जोखा ‘मोचीराम’ कविता में है और ‘मोचीराम’ कविता के आधार पर धूमिल की काव्य संवेदना पर प्रकाश डाला जा सकता है। समकालीन कविता के प्रमुख आधार स्तंभ के नाते धूमिल ने बहुत बढ़ा योगदान दिया है। उनकी कविता में राजनीति पर जबरदस्त आघात है। आजादी के बाद सालों गुजर चुके पर आम आदमी के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, अतः सारा देश मोहभंग के दुःख से पीड़ित हुआ। इस पीड़ा को धूमिल ने ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’ और ‘सुदामा पांड़े का प्रजातंत्र’ इन तीन कविता संग्रहों की कई कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया है। उनकी कविता में पीड़ा और आक्रोश देखा जा सकता है। आम आदमी का आक्रोश कवि की वाणी में घुलता है और शब्द रूप धारण कर कविताओं के माध्यम से कागजों पर उतरता है। बिना किसी अलंकार, साज-सज्जा के सीधी, सरल और सपाट बयानी आदमी की पीड़ाओं को अभिव्यक्त करती है। संवादात्मक और व्यंग्यात्मक शैली में लिखी धूमिल की कविताओं का केंद्र आदमी रहा है। बार-बार कविताओं को पढ़ते आर. के. लक्ष्मण का ‘कॉमन मॅन’ नजरों के सामने आकर खड़ा होता है। संसद और संसद को चलानेवाली राजनीतिक व्यवस्था ‘आम आदमी’ के भलाई की बात करती है पर असल में वे अपनी ही भलाई सोचते हैं। राजनीति में प्रवेश कर चुका हर एक खद्दरधारी, टोपीधारी आम आदमी के खून को चुस रहा है। वर्तमान राजनीति में राजनेताओं के चेलों की भी एक लंबी फौज तैनात हो गई है। अर्थात् संसद (राजनीति) से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति का मूलमंत्र ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’ वाला बन चुका है। चुपचाप तुम भी खाओ और मैं भी खाता हूं का धर्म बड़ी ईमानदारी से निभाया जा रहा है। यह व्यवस्था चूहों के समान आम आदमी के सपनों को कुतर-कुतर खा रही है। धूमिल की कविताओं में ऐसी स्थितियों के विरोध में आक्रोश है। बार-बार आवाहन कर कवि ‘आदमी’ की कमजोरियों पर उंगली रखकर चेतित करने का प्रयास कर रहा है। अर्थात् ‘आम आदमी’ के सामने धूमिल की कविता जीवन सत्य उघाड़कर रख देती है।

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डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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सुदामा पाँडे धूमिल की सर्जना पर सार्थक, सटीक और प्रभावी आलेख द्वारा विजय शिंदे ने कवि की समग्रता को विवेचित करते हुए धूमिल की जनपक्षधरता को सही रुप में रेखांकित किया है। उत्तम आलेख केलिए समालोचक विजय शिंदे बधाई के पात्र हैं। - जगदीश पंकज

समीक्षा को और सफल और सार्थक बनाने के लिए दो आकृतियां बनाई हैं। साथ ही उन आकृतियों के अनुरूप विवरण में उसका विश्लेषण और वर्णन भी है। यह आकृतियां मैंने मेरे ब्लॉग पर जोडी है आपको इसके बारे में जानना है तो इस लिंक पर जाए - http://drvtshinde.blogspot.in/2017/04/blog-post.html

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