रविवार, 28 मई 2017

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक :व्यंग्य होली-धुलेंडी हुड़दंगलीला प्रमोद ताम्बट

धुनिकता’ सदियों से ‘परम्पराओं’ की खटियाखड़ी करती चली आ रही है. अब ‘होली’ को ही देखिए, अच्छा खासा परम्परागत त्यौहार है. इन्द्रधनुष से भी ज्यादा रंग-बिरंगा और खूबसूरत, राजा-प्रजा के गुजरे जमाने से ही रिकार्ड तोड़ हर्षोल्लास एवं उमंगों के साथ मनाया जाता रहा है. क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या नौजवान, क्या लुगाइयाँ क्या षोड़षियाँ सभी सदियों से उम्र और सामाजिक बंधनों को परे रखकर एक-दूसरे का मुँह हरा-नीला करते और भाँग चढ़ाकर ठुमके लगाकर दुनिया भर के गम गलत करते चले आ रहे हैं. मगर आजकल? आजकल की मोबाइल-टेबलेट, लैपटाप-कम्प्यूटर से लैस हमारी आधुनिक पीढ़ी अबीर-गुलाल, रंग-रोगन और होली की बम्पर हुड़दंगलीला से घबराकर इससे कोसों दूर-भागती नजर आ रही है. ‘‘छी ई ई ई.....होओओओओली?, रंग-गुलाल, वार्निश, कीचड़-गोबर, गटर-स्नान! ऊपर से गाँजा-भाँग, शराब वगैरा-वगैरा.....! छीईईईई, व्हेरी डर्टी फेस्टिवल.....!’’ वेलेन्टाइन डे, चाकलेट डे, हग डे, किस डे जैसे स्वायंतः-सुखाय गैर-परम्परागत आयोजनों को ‘असहिष्णुओं’ के हाथों पिट-पिट कर भी मनाने के लिए उतावले हमारे पढ़े-लिखे माल संस्कृति वाले नौजवान ‘होली’ जैसे हंगामाखेज त्यौहार पर दिन भर घर के अन्दर दुबक कर मातम सा मनाते पाए जाते हैं.

[ads-post]

दरअसल देखा जाए तो ग्लोबलाइजेशन के जमाने में देश का ‘राष्ट्राइजेशन’, ‘विलेजाइजेशन’, ‘मोहल्लाइजेशन’ सिरे से लुप्त होता जा रहा है. ऐसे में ‘सामूहिकता’ से ‘दैया-दैया’ करने वाला ‘एकला चलो रे’ की संस्कृति का भूत एक दिन नितांत अकेले में मनाए जा सकने वाले त्यौहार का ‘डिजाइन’ लेकर आ खड़ा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं. हम देखेंगे कि जिस तरह लोग एकान्त में बैठकर ‘योग-साधना’ सी कर लेते हैं उसी तरह अपना-अपना ‘त्यौहार’ भी मना लेंगे. सुबह चुपचाप उठे और आइने में खुद को देखकर गुलाल मल लिया, गुझिया खा ली, दो पैग लगा के हिल लिए, मन गई होली. गले-वले मिलना तो खैर आजकल पूरी तौर पर ‘इगो’ की भेंट चढ़ ही चुका है. फिर अंत में फेसबुक, ट्विटर पर अपनी-अपनी सेल्फी चिपकाकर आभासी सामूहिकता के मजे ले लेंगे, हो गया.

यदि सामूहिक उत्सवधर्मिता की लोक परम्पराओं का इसी तरह सत्यानाश होता रहा तो एक दिन देश में हर वह गतिविधि जरूर नष्ट हो जाएंगी जिसमें चार आदमियों के इकट्ठा होने का पारम्परिक-अपारम्परिक रिवाज है. हो सकता है आने वाले समय में मुर्दों को कंधा देने वालों तक का टोटा हो जाए, झुँड बनाकर होली-दिवाली की बधाई देने, गले लगकर सारे गिले-शिकवे भूल जाने की बात तो छोड़ ही दीजिए.

कीचड़-गंदगी और तमाम तरह की हुड़दंग-लीला के बावजूद होली का त्यौहार कभी किसी जमाने में ऊँच-नीच, बड़े-छोटे का फर्क ताक पर रखकर इंसान को धरा पर बनाए रखने, उसकी अपनी असली औकात की याद दिलाते रहने वाला जरूरी त्यौहार हुआ करता था. गाँव का गाँव जब होली की मस्ती में डूब जाया करता था तो किसी को यह याद रखने की जरूरत नहीं होती थी कि कौन ‘छोटी जाति’ का है और कौन ‘बड़ी जाति’ का. धर्म-सम्प्रदायों के तकाजे इतने छोटे नहीं होते थे कि दूसरे की खुशी से दुखी करने लगें. छोटे-छोटे कस्बों और शहरी मोहल्लों में ‘बड़े-बड़े’ और ‘छोटे-मोटे’ लोगों के बीच मौजूद गहरी खाई होली के दिन पट जाती थी. बड़े अफसर शिद्दत से छोटे कर्मचारियों-चपरासियों के गले लग कर औकात के गणित को तिरोहित कर देते थे. मंत्री-नेता भले ही चरण छुआने घर से निकलते हों लेकिन हुरियारों के टोल में शामिल होते ही अपने रुतबे का मुखौटा और विशिष्टता की खाल उतार फेंकते थे और अपनी बड़ी सी तोंद का कष्ट भूलकर खूब कमर मटकाते थे. मगर अब धूल-गर्दा वाली ‘जमीन’ पर आकर होली की हुड़दंग-लीला में अपने आप को भुला देने के दिन लद गए. बड़े लोग होली जरूर खेलते हैं परंतु ‘आसमान’ पर टँगे-टँगे, छोटे लोगों की छाया से दूर रहकर. छोटे-मोटे लोग जरूर बड़ों के चरण छूने उनके बंगलों पर हाजिरी दे दें, लेकिन मजाल है जो कोई बड़ा, छोटे आदमी की देहरी चढ़ जाए और उसके माथे पर गुलाल लगा कर उसे गले लगा ले. अगर किसी बड़े ने गलती से ऐसा कर लिया तो समझ लीजिए पलक झपकते ही उसका कद घटकर छोटा हो जाएगा और ईगो लहूलुहान होकर छटपटाने लग पड़ेगा.

कहते हैं हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और लोकतंत्र का एक तकाजा है भाई-चारा. बरसों-बरस भाई-चारे को कायम रखने में होली की हुड़दंगलीला ने बड़ी भारी भूमिका निभाई है. परंतु अब, लोकतंत्र के इस तकाजे को पूरा करने वाले त्यौहार की ही दिन-ब-दिन मट्टी-पलीत हो रही है. ‘पढ़ाई’ और ‘कैरियर’ के नुकसान के डर से बच्चे ‘भाई-चारे’ का नुकसान कर लेते हैं और कपड़े व शरीर गंदा होने के डर से बड़े जहन की सफाई से चूक जाते हैं. होली के दिन आजकल ऐसा लगने लगता है जैसे शहर में कर्फ्यू अथवा धारा 144 लगी हुई है, और लोगों के घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगी हो. जगह-जगह तू-तकरार सुनाई देती है- ‘‘साले रंग डाला तो तेरा खून कर दूँगा.’’ इतर सम्प्रदाय भारी दहशत में रहते हैं और साम्प्रदायिक दंगे होने की संभावना प्रबल हो जाती है. एक बूँद रंग से रक्त की नदियाँ बहने लग जाती हैं. हद है, रंगों के उल्लास का इतना पतन हो जाएगा किसी ने सोचा नहीं था. सोचा कैसे नहीं होगा? जरूर सोचा गया है. बावजूद चाइनीज पिचकारियों और रंगों के होली के बाजार में वो गर्माहट नहीं दिखाई देती जो वेलेन्टाइन डे, हग डे, किस डे के बाजार में दिखाई देती है. कुछ तो बात है.

मैं अगर राजनीति में होऊँ और कार्पोरेट वाले मेरा साथ दें तो मैं सरकार से एक आर्डीनेंस पास करवाकर एक बहुत ही कड़ा कानून बनवा डालूं, ‘होली-धुलेंडी हुड़दंगलीला कानून.’ इस कानून के तहत हर एक इंसान के लिये होली खेलना अनिवार्य होगा. हर आदमी होली के दिन अपना-अपना नकली चोला और मुखौटा उतारकर अपने घर पर रखेगा और सामूहिक हुड़दंग में शामिल होगा. जो ऐसा करने में आनाकानी करेगा वह सजा भुगतेगा. होली के दिन कोई कमबख्त अगर जात-पात, बड़े-छोटे का चोला ओढ़े, मुखौटा चढ़ाए नजर आया तो मुकदमा चलवाकर जेल भिजवाने की बजाय उसे गोबर के हौद में उतरवा दिया जाएगा, और इस मनोहारी दृश्य की रंगीन फोटो उतरवाकर अखबारों में छपवा दी जाएगी, मीडिया पर फ्लैश की जाएगी, यू-ट्यूब, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, पर वायरल करवा दी जाएगी.

दीगर धर्मों-सम्प्रदायों में होली की परम्परा नहीं है मगर मैं फरमान जारी करूँगा कि या तो सब मिलजुल कर होली खेलों और देश के माथे पर चिपका धार्मिक अंधता, साम्प्रदायिकता, जातीयता-प्रांतीयता, भाषावाद का कलंक धो डालो, या हर साल होली के मौसम में छाई वासंती फिजाओं का, नशीली हवाओं का आनंद लेना भी बंद करो. सभी लोग एक-दूसरे को गुलाल से सराबोर कर दो, थोबड़े की रंगाई-पुताई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लो और कसके गले लगकर सारी कड़वाहट, गिले-शिकवे भूल जाओ अथवा जगह-जगह फूले हुए ‘टेसू’ का चटख लाल रंग देखकर भीतर उमड़ने वाले उल्लास और आनंद को अपने ही पैरों से कुचल डालो.

तो जनाब, शुक्र मनाइये कि मैं राजनीति में नहीं हूँ और न मुझे कार्पोरेट हाउसों का कोई सपोर्ट है. इसलिए जनम-जिन्दगी में मेरी तमन्ना पूरी होने के कोई आसार नहीं है. वरना, कसम से और कुछ करूँ न करूँ ‘होली-धुलेंडी हुड़दंगलीला कानून’ के तहत तमाम जात-पात भाषा-सम्प्रदाय के बंदों का आपस में होली खेलना अनिवार्य कर के ही दम लूँ. इसी बहाने शायद दिलों का बैर और बर्सों की दूरियाँ खत्म हों.

--

सम्पर्कः 105/32 शिवाजी नगर,

भोपाल-462016 (म.प्र.)

मो. 9893479106

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------