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प्राची // जून 2017 // हास्य-व्यंग्य // शाबाश उल्लू के पट्ठे // डॉ. राकेश कुमार सिंह

भी-कभी लगता है कि मैं अपनी पीठ खुद अपने ही हाथों ठोकूं, कहूं, ‘शाबाश उल्लू के पट्ठे!’ हल्दी की एक गांठ क्या पल्ले पड़ गई, तू तो पंसारी बन बैठा. कुछ इधर की, कुछ

उधर की जोड़-गांठ कर चार पंक्तियां क्या लिख लीं, कवि ही नहीं, कवियों का भाग्य विधाता बन बैठा. आज मैं एक साहित्य संस्थान का अध्यक्ष हूं. गिरधर कविराय ने जब लिखा था ‘लाठी में गुन बहुत हैं, सदा राखिए संग.’ तब जमाना दूसरा था. उन्हें आज लिखना होता तो वे भी लिखते, ‘पैसे में गुन बहुत हैं, सदा राखिये संग.’ पैसा है, तो पद है, पद है तो प्रतिष्ठा, प्रतिष्ठा है तो कवि हूं, लेखक हूं, साहित्यकार हूं, ‘साहित्य उद्धारक संस्थान’ का अध्यक्ष हूं. सब उल्लू वाहिनी की कृपा है. इसलिए मन में आता है कि मैं फिर वही कहूं, बार-बार कहूं- ‘शाबाश उल्लू के पट्ठे!’

कहते हैं एक पंडित को देखकर दूसरा पंडित भनभनाता है. एक कुत्ता दूसरे कुत्ते को देखकर गुर्राता है. एक कवि दूसरे कवि की टांग खींचता है. एक समीक्षक दूसरे की समीक्षा करता है. लेकिन एक मैं हूं कि मजाल है कि मेरी हिन्दी की कोई हिन्दी कर सके. बड़े साहित्यकार तो मेरे सामने मिमियाते हैं कि इस बार मुझ पर इनायत हो जाय. गले में माला पहने, शाल ओढ़े, उनका एक फोटो मेरे साथ हो जाय. बड़े-बड़े काव्य शिरोमणि और काव्य भूषणियों को मैं साहित्य उपदेश देता हूं. हम जैसों की ही करनी का फल है कि आज जगह-जगह पर ‘हिन्दी बचाओ’, ‘हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाओ’ जैसे मंझोले आन्दोलन चल रहे हैं.

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राज की बात बताऊं, वैसे यह रिसर्च का विषय है. कोई शोधार्थी मुझ पर शोध करे तो उसे कुछ भी खोजने की जरूरत नहीं. मैं ही उसे थीसिस लिखवा दूंगा. बताऊंगा कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती. राजा दशरथ की तरह ही मैंने भी चौथेपन में इधर-उधर से चार छंद पाये हैं और इन चार छंदों ने ही ‘साहित्य उद्धारक संस्थान’ पर अपना झंडा फहरा दिया है.

ये चार छंद भी मैंने बड़े जतन से पाये हैं. ये मेरे लिए आवश्यक सुरक्षा कवच थे. कोई यह न कह बैठे कि कल तक तो यह साहित्यकारों की बिरादरी में थे ही नहीं, फिर आज यह ‘साहित्य उद्धारक संस्थान’ के अध्यक्ष कैसे बन बैठे. सवाल नाजायज नहीं है. दलित साहित्य वाले कहते हैं कि नहीं- ‘दलित साहित्य वही लिख सकता है जो दलित हो.’ वैसे मैं घबराता नहीं हूं. लेकिन नाकेबंदी कर ली जाये तो बुरा भी तो नहीं है. मुझे विश्वास है कि ‘साहित्य उद्धारक संस्थान’ की मेरी कुर्सी पर आंच आती देखकर मेरे अहसानों तले दबे लोग फौरन उठ खड़े होंगे, कहेंगे- घोड़े पर लिखने के लिए घोड़ा होना आवश्यक है? बहुत से लोग खुद आंसू बहाते हुए मेरे आंसू पोंछने आ जायेंगे, और कहेंगे- ‘लो, मेरी रचनायें अपने नाम से पढ़ो, अपने नाम से छपवाओ. देखते हैं, आपको साहित्यकार कौन नहीं मानता! कैसे भी हो, आप साहित्यकार नहीं हो तो क्या हुआ, आप साहित्यकार निर्माता तो हो.’

कोई याद करे, न करे लेकिन मैं अपनी हिन्दी सेवाओं को खुद ही जब याद करता हूं तो बड़ा गौरवान्वित महसूस करता हूं. बड़ी ही सुखद अनुभूति होती है. एक बार हिन्दी में दस्तखत करने के लिए आये सरकारी आदेश को मैंने अपने विभाग में अंग्रेजी में लिखकर ‘सरकुलेट’ करवाया. लोग मेरे इस हिन्दी प्रेम से बहुत खुश हुए. कई बार लोगों ने मुझे ‘हिन्दी’ लिखने की जगह ‘हिन्दी’ लिखने की ओर ध्यान दिलाया. मैंने कहा- ‘मुझ हिन्दी सेवी को हिन्दी की जगह हिन्दी लिखना सिखाओगे. थोड़ा बहुत अशुद्ध लिखने की छूट नहीं दोगे. हिन्दी तुम्हारे कायदे कानून के चक्कर में फंसकर दम ही तोड़ देगी.’ लोग घबरा गये. कहने लगे- ‘लूली, लंगड़ी, कानी, भैंगी, जैसी भी है, मां है, मां को बचाना है. ‘हिन्दी’ लिखो तो ठीक. सोचो- ‘अक्ल बड़ी कि भैंस.’ हम गदहे की बात जम गई कि नहीं!’

आपको अच्छा लगे तो ठीक, न लगे तो भी ठीक. मुझे आपकी कोई चिन्ता नहीं. मुझे चिन्ता है तो ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने’ वाले मुहावरे की, उसकी सेहत की. हम जैसे लोगों की वजह से ही यह मुहावरा हिन्दी में अब तक जिन्दा है, अन्यथा कब का कर गया होता.

लोग कहते हैं, तो झूठ थोड़े ही कहते हैं कि आत्मकथा लेखन से भी ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने’ के मुहावरे को जीने की शक्ति मिलती है. वैसे, मैंने अभी तक आत्मकथा न लिखकर ठीक ही किया है, भले ही इससे शोधार्थियों को कुछ दिक्कतें उठानी पड़ सकती हैं. ‘सरकारी सेवा’ से लेकर ‘साहित्य उद्धारक संस्थान’ तक मेरी आत्मकथा (यदि लिखी जाये तो) में इतने हवाला हैं कि उनकी तारीफ करते-करते इतनी मालाएं पड़ जायेंगी कि गर्दन का तो कचूमर ही न निकल जाये.

प्रशासनिक सेवा में रहा हूं तो ‘साहित्य उद्धारक संस्थान’ में भी अपने प्रशासनिक अनुभव का भरपूर उपयोग करता हूं. तथाकथित महान साहित्यकार जब मेरे सामने पानी भरते हैं तो लगता है, अभी भी मैं प्रशासक हूं, अच्छा प्रशासक हूं. इन साहित्यकारों को बांध कर रखना हंसी खेल है? मेंढक की तरह इधर-उधर उछलने वालों को मैंने भेड़ों का एक झुंड बना दिया है. मजाल है कि एक भी इधर से उधर हो जाये. तीस-बत्तीस साल से मैं ही इस संस्था का अध्यक्ष हूं तो केवल अपनी प्रशासनिक क्षमता की वजह से ही. हां, मंत्री-महामंत्री वगैरह जरूर अपनी कुर्सियां खाली करते रहे हैं.

कहते हैं, ‘साहित्य उद्धारक संस्थान’ के अध्यक्ष के साथ चलना किसी साहित्यकार के तो सामर्थ्य की बात है नहीं. समझते ही नहीं, मैं पत्थर हूं, लेकिन ऐसा-वैसा नहीं, कितने ही जंग लगे लोहे के टुकड़ों को मैंने सोने में बदल दिया है. भूल जाते हैं कि उन्हें कोई साहित्यकार मानता है तो केवल मेरी वजह से. देखो, फिर मेरा मन विचलित हो रहा है, खुद को यह कहने के लिए कि- ‘शाबाश उल्लू के पट्ठे.’’

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सम्पर्कः

सुमन कॉटेज, शिवाकुज, बाबरपुर, सिकन्दरा, आगरा-282007

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